मोदी के गुजरात मे करोड़ों की ‘राजनीति’, हजारों वोटों का हिसाब,बोगस पार्टियों के नेता बने नवाब

- गुजरात में चंदे का ऐसा गणित कि कैलकुलेटर भी शर्मा जाए!
- वोट हजारों में, चंदा करोड़ों में लोकतंत्र का नया गणित कौन समझाए?
- 957 करोड़ की ‘जनसेवा’, वोट सिर्फ 11 हजार बैलेंस शीट भारी, जनसमर्थन हल्का!
- 608 करोड़ की बरसात, वोटों की बूंदाबांदी नोटों का मौसम आखिर किसके लिए?
- 416 करोड़ रुपए की कमाई, एक उम्मीदवार की लड़ाई चुनावी मैदान छोटा, हिसाब-किताब बड़ा!
- 200 करोड़ की रुपए की ‘राजनीति’ और 140 वोट मतपेटी ने भी शायद हिसाब मांग लिया!
- 17 उम्मीदवार, 22 हजार वोट और 2,316 करोड़ रुपए लोकतंत्र में वोट की कीमत या चंदे का कमाल?
- 73 फीसदी दलों का वित्तीय हिसाब गायब—लोकतंत्र में पारदर्शिता भी ‘लापता’!
- गांधी के गुजरात में करोड़ों का चंदा, हजारों वोट सत्य और पारदर्शिता का हिसाब कौन देगा?
राजनीति में वोट को जनसमर्थन का पैमाना माना जाता है और चंदे को राजनीतिक गतिविधियों का ईंधन। लेकिन गुजरात से सामने आए आंकड़े इस स्थापित गणित को ऐसी चुनौती देते हैं कि सवाल पैदा होना स्वाभाविक है कि अगर चुनावी मैदान में वोट हजारों में हों और राजनीतिक दलों की घोषित आय सैकड़ों करोड़ में, तो आखिर यह धन किस लोकतांत्रिक गतिविधि का विस्तार कर रहा है? सवाल किसी एक दल या व्यक्ति पर आरोप लगाने का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को समझने का है जिसमें बेहद सीमित चुनावी उपस्थिति वाले पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दल करोड़ों रुपये की आय घोषित करते हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के आंकड़ों के अनुसार गुजरात से जुड़े पांच ऐसे दलों ने वित्त वर्ष 2019-20 से 2023-24 के बीच कुल 2,316 करोड़ रुपए की आय घोषित की। इसी अवधि में इन दलों ने कुल 17 उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे और उन्हें करीब 22 हजार वोट मिले। यानी लोकतांत्रिक मैदान में उपस्थिति बेहद सीमित रही, लेकिन घोषित आर्थिक गतिविधि का आकार बहुत बड़ा रहा। आम उम्मीदवार टिकट पाने से लेकर पोस्टर छपवाने तक चंदे के लिए भटकता है और यहां कुछ दलों की बैलेंस शीट करोड़ों में मुस्कुराती दिखाई देती है। वोटर पूछ सकता है कि आखिर यह कौन-सा चुनावी मौसम है जिसमें मतपेटी खाली-सी और हिसाब-किताब भारी-भरकम दिखाई देता है?

वोट बनाम नोट का गुजरात मॉडल?
पहले आंकड़ों को समझना जरूरी है। यहां 2,316 करोड़ रुपए का मतलब केवल 2023-24 में मिला चंदा नहीं है। यह पांच दलों की 2019-20 से 2023-24 तक की कुल घोषित आय है। यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि पांच साल की आय को एक वित्त वर्ष का चंदा बताना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। एडीआर के अनुसार शीर्ष दस पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दलों में पांच गुजरात से थे और इन पांचों की संयुक्त घोषित आय 1,158.115 करोड़ रुपए नहीं, बल्कि शीर्ष दस के संदर्भ में उस आंकड़े का अलग वर्गीकरण है। जबकि संबंधित पांच गुजरात दलों की पांच-वर्षीय कुल आय 2,316 करोड़ रुपए बताई गई है। अर्थात असली सवाल सनसनी से नहीं, दस्तावेज से पैदा होता है। राजनीतिक दलों के पास पैसा कहां से आया, किस मद में आया, किसने दिया और उसका इस्तेमाल किस तरह हुआ?
भारतीय नेशनल जनता दल की बैलेंस शीट ने सबका ध्यान खींचा
भारतीय नेशनल जनता दल ने 2019-20 से 2023-24 के बीच 957.45 करोड़ रुपए की कुल आय घोषित की। एडीआर के विश्लेषण में यह शीर्ष दस पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दलों में सबसे अधिक घोषित आय थी। इसी दल से जुड़े चुनावी प्रदर्शन का आंकड़ा करीब 11,496 वोटों का बताया गया है। यहां फिर वही सवाल सामने आता है कि इतनी बड़ी घोषित आर्थिक गतिविधि और सीमित चुनावी समर्थन का रिश्ता क्या है? इस सवाल का जवाब केवल वोटों की संख्या देखकर नहीं निकाला जा सकता। किसी राजनीतिक दल की आय का इस्तेमाल चुनाव प्रचार के अलावा संगठन, सामाजिक गतिविधियों, प्रशासनिक खर्च या अन्य वैध मदों में भी हो सकता है। इसलिए कम वोट और अधिक आय अपने आप में किसी अपराध का प्रमाण नहीं हैं।
लेकिन लोकतंत्र में पारदर्शिता का सवाल उठाने के लिए इतना अंतर जरूर पर्याप्त है।
416 करोड़ और चुनाव में एक उम्मीदवार
सत्यवादी रक्षक पार्टी की पांच वर्षों की घोषित कुल आय 416.23 करोड़ रुपए रही। एडीआर के अनुसार इसमें वित्त वर्ष 2023-24 में आय में बड़ा उछाल आया और उस साल 330.56 करोड़ रुपए की आय घोषित की गई। रिपोर्टों के अनुसार इस दल ने 2024 लोकसभा चुनाव में एक उम्मीदवार उतारा। 2023-24 में पार्टी द्वारा प्राप्त दान और उसके चुनावी खर्च का भी उल्लेख किया गया है। निष्कर्ष निकालने से पहले दस्तावेज देखना जरूरी है कि बड़ी आय होना और कम उम्मीदवार उतारना अपने आप में गैरकानूनी गतिविधि सिद्ध नहीं करता। असली जांच का विषय धन का स्रोत, वास्तविक दानदाता, खर्च और संबंधित वित्तीय दस्तावेज हैं।
200 करोड़ की आय, 140 वोट और सवालों की कतार
सौराष्ट्र जनता पक्ष ने पांच साल में 200.42 करोड़ रुपए की कुल आय घोषित की। जन मन पार्टी की घोषित आय 133.56 करोड़ रुपए रही। दोनों गुजरात से जुड़े पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दल हैं। चुनावी राजनीति की दृष्टि से इन आंकड़ों और प्राप्त मतों का अंतर बेहद बड़ा दिखाई देता है। यही वह जगह है जहां व्यंग्य जन्म लेता है। लोकतंत्र में वोट गिनने वाली मशीन और पैसा गिनने वाली मशीन जब एक ही पार्टी का हिसाब लगाएं तो दोनों के आंकड़े इतने अलग क्यों निकलते हैं? कम वोट पाने वाली पार्टी को पैसा रखने का अधिकार कानून से स्वतः समाप्त नहीं हो जाता। सवाल केवल इतना है कि उस पैसे का स्रोत और इस्तेमाल नियमानुसार तथा पारदर्शी था या नहीं।
17 उम्मीदवार और करीब 22 हजार वोट
एडीआर के आंकड़ों के अनुसार पांच गुजरात-आधारित दलों ने 2019 से 2024 के बीच कुल 17 उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे और उन्हें करीब 22 हजार वोट मिले। किसी उम्मीदवार के जीतने का उल्लेख नहीं है।
यानी पांच साल में घोषित आय 2,316 करोड़ रुपए और चुनावी समर्थन लगभग 22 हजार वोट। अब गणित लगाने की बारी पाठक की है। मगर यहां भी एक सावधानी जरूरी है कि पूरी आय को वोटों से भाग देकर ‘प्रति वोट खर्च’ निकालना भ्रामक होगा, क्योंकि पांच साल की कुल आय को केवल चुनावी खर्च मानना सही नहीं होगा। असल मुद्दा इससे ज्यादा गंभीर है कि क्या राजनीतिक वित्त की निगरानी इतनी पारदर्शी है कि नागरिक यह जान सके कि किसी दल की घोषित आय वास्तव में कहां से आती है?
गुजरात ही बार-बार चर्चा में क्यों?
एडीआर की रिपोर्ट बताती है कि 2,764 पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों में से 2,025 यानी 73.26 प्रतिशत के दोनों वित्तीय रिकॉर्ड सार्वजनिक क्षेत्र में उपलब्ध नहीं थे। केवल 739 दलों के रिकॉर्ड का विश्लेषण किया जा सका। गुजरात उन राज्यों में था जहां अनुपालन अपेक्षाकृत बेहतर था, फिर भी शीर्ष दस अधिक आय वाले पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दलों में पांच गुजरात से निकले। यही विरोधाभास ध्यान खींचता है। एक ओर रिकॉर्ड उपलब्ध कराने की व्यवस्था है, दूसरी ओर देश की बड़ी संख्या में पार्टियों के वित्तीय दस्तावेज सार्वजनिक डोमेन में ही नहीं हैं। लोकतंत्र में पार्टी बनाना आसान होना चाहिए, लेकिन पार्टी के वित्त का हिसाब उससे भी आसान होना चाहिए, यह पारदर्शिता की बुनियादी मांग है।
असली सवाल-हिसाब कौन पूछेगा?
मामला केवल गुजरात के पांच दलों का नहीं है। यह उस पूरी व्यवस्था का सवाल है जिसमें पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दलों की संख्या हजारों में है और उनके वित्तीय रिकॉर्ड की उपलब्धता सीमित है। एडीआर ने ऐसे दलों की नियमित निगरानी, निष्क्रिय दलों की सूची से हटाने और वित्तीय खुलासे को मजबूत करने जैसी सिफारिशें की हैं। बाद की मीडिया रिपोर्टों में गुजरात के कुछ ऐसे दलों के खिलाफ आयकर विभाग की कार्रवाई और संदिग्ध राजनीतिक चंदे से जुड़े आरोपों की जांच का भी उल्लेख हुआ है। लेकिन यह स्पष्ट रखना जरूरी है कि जांच या छापेमारी अपने आप में अपराध सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है। संबंधित एजेंसियों की जांच और न्यायिक प्रक्रिया के निष्कर्ष अलग विषय हैं। इसलिए इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा सवाल किसी पार्टी का नाम, किसी नेता का चेहरा या किसी विचारधारा का झंडा नहीं है। सवाल है लोकतंत्र में राजनीतिक धन का रास्ता कितना साफ है? करोड़ों रुपये अगर राजनीति में आते हैं तो नागरिक को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि वे किसने दिए, क्यों दिए, किस खाते में गए और कहां खर्च हुए। चुनाव में वोट कम आए या ज्यादा, यह अलग सवाल है, लेकिन धन का हिसाब सार्वजनिक और सत्यापन योग्य होना चाहिए। गुजरात को लेकर व्यंग्य चाहे जितना किया जाए, महात्मा गांधी का नाम लेना तभी सार्थक होगा जब सार्वजनिक जीवन में सत्य और पारदर्शिता को भी उसी गंभीरता से लिया जाए। गांधी के गुजरात में करोड़ों की राजनीतिक आय और हजारों वोटों के इस असाधारण अंतर को देखकर आश्चर्य होना स्वाभाविक है, मगर लोकतंत्र की असली परीक्षा आश्चर्य में नहीं, हिसाब मांगने और हिसाब सार्वजनिक कराने की व्यवस्था में है।
* पांच गुजरात-आधारित पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दलों की पांच साल में घोषित आय 2,316 करोड़ रुपए
* राजनैतिक दलों ने संबंधित अवधि में कुल 17 उम्मीदवार मैदान में उतारे, कुल वोट करीब 22 हजार
* एडीआर के मुताबिक 2,764 पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दलों में 73.26% के वित्तीय रिकॉर्ड सार्वजनिक नहीं



