Newsई-पेपरउत्तर प्रदेशलखनऊशिक्षा

खोखले दावे करने वाली एक और कंपनी के साथ एमओयू हुआ रद्द, योगी सरकार की बुरी पिटी भद्द

 आरजी स्ट्रैटेजीस ग्रुप ने किया 1.65 लाख करोड़ का करार, कंपनी का कोई वजूद ही नहीं

  • 18 हजार करोड़ के निवेश का दावा करने वाली टूबी एजुकेट (इंडिया) प्रा. लि. भी निकली जाली
  •  कर्जदार निदेशक के एनजीओ ने किया 1400 करोड़ के निवेश का दावा
  •  सारे करार यूपी के सरकार के ग्लोबल इन्वेस्टर मीट 2023 में हुए
  •  दोषी अफसरों की न बर्खासतगी और उनके घर पर बुलडोजर

लखनऊ। उत्तरप्रदेश सरकार के 2023 में हुए लखनऊ इन्वेस्टर मीट में लाखों करोड़ के निवेश का दावा करने वाली एक और कंपनी के साथ करार रद्द हो गया है। इस कंपनी ने राज्य में 1.65 लाख करोड़ रुपये के निवेश का दावा किया था, लेकिन अब पता चला है कि इस कंपनी का भारत सरकार के कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय में कोई वजूद ही नहीं है। अब यूपी सरकार का सूचना विभाग पूरे मामले को दबाने में जुटा है, क्योंकि इन्वेस्टर मीट 2023 में एमओयू करने वाली कई जाली कंपनियों पर सवाल उठे हैं और सरकार की बुरी भद्द पिटी है।

उस इन्वेस्टर मीट में सीएम योगी आदित्यनाथ ने राज्य में 33.5 लाख करोड़ के निवेश का दावा किया था। उन्होंने फरवरी 2023 में हुई इन्वेस्टर मीट में यह दावा भी किया था कि इन्हीं समझौतों के जरिए यूपी को 2030 तक एक ट्रिलियन डॉलर की इकोनमी बनाया जाएगा। लेकिन, सूचना विभाग के खबर को दबाने की लाख कोशिशों के बाद भी सच आखिरकार सामने आ ही गया।

कौन है वह फर्जी कंपनी

उस कंपनी का नाम आरजी स्ट्रैटेजीस ग्रुप है, जिसने इन्वेस्टर मीट में 1.65 लाख करोड़ रुपए के निवेश का दावा किया था। अब पता चला है कि भारत सरकार के कंपनी मंत्रालय के रजिस्टर में इस नाम की कोई कंपनी है ही नहीं। लेकिन एमओयू में इसी कंपनी ने यूपी में सेमीकंडक्टर, डिस्प्ले फैब और चिप बनाने का कारखाना लगाने का दावा किया था। मीडिया ने भी इसे हाथों-हाथ लिया और यूपी को हाईटेक सेमीकंडक्टर हब बनाने की सरकारी कोशिशों की काफी तारीफ की गई थी। अब सवाल यह है कि क्या योगी सरकार के अफसरों ने केवल आंकड़े जुटाने के लिए सड़क से किसी कंपनी को उठाकर उससे एमओयू साइन करवा लिया ? अगर ऐसा नहीं है, तो क्या सरकारी अफसरों ने उस कंपनी की पृष्ठभूमि और वित्तीय खातों को देखे-परखे बिना ही एमओयू साइन करवा लिया? अगर यही सच है तो यह माना जा सकता है कि बिना जांचे-परखे यूपी सरकार के इन्वेस्टर मीट में फर्जी एमओयू हो रहे हैं, जिससे सरकार की नाक कट रही है।

एक और कंपनी जाली निकली

इन्वेस्टर मीट 2023 में एमओयू करने वाली टूबी एजुकेट (इंडिया) प्रा. लि. नाम की एक और कंपनी जाली निकली है। कंपनी ने गाजियाबाद और गौतम बुद्ध नगर में करीब 18 हजार करोड़ रुपये के निवेश का एमओयू किया था। लेकिन कंपनी ने आज तक एक भी बैलेंस शीट दाखिल नहीं की। कंपनी के निदेशक ने खुद माना है कि वे कंपनी को बंद करने जा रहे हैं। सवाल यह उठता है कि जिस कंपनी की अपनी कारोबारी स्थिति स्पष्ट नहीं थी, उसे हजारों करोड़ रुपये के निवेशक के रूप में कैसे स्वीकार कर लिया गया।

600 स्टूडेंट्स का स्कूल और 40 हजार करोड़ के निवेश का दावा

यूपी के एक स्कूल में 600 बच्चे पढ़ते हैं। लेकिन उसी स्कूल ने इन्वेस्टर मीट 2023 में सरकार से 40 हजार करोड़ के निवेश का एमओयू कर लिया। हकीकत यह थी कि उस स्कूल की औकात 40 हजार करोड़ रुपए के निवेश की थी ही नहीं। सूत्रों के अनुसार, इन्वेस्टर मीट में अपने नंबर बढ़वाने के लिए यह सारा खेल उद्योग संवर्धन विभाग के अधिाकारियों ने खेला था और सीएम योगी आदित्यनाथ इसके शिकार बन गए। अब जबकि पूरी सच्चाई सामने आ गई है, योगी सरकार को ऐसे अफसरों को फौरन बर्खास्त कर नए, काबिल और इमानदार अफसरों की भर्ती करनी चाहिए, वरना लोगों का यूपी के इन्वेस्टर मीट और एक ट्रिलियन की इकोनमी से भरोसा ही उठ जाएगा।

फर्जी एनजीओ और 1400 करोड़ का निवेश

लखनऊ के इन्वेस्टर मीट में एक एनजीओ ने राज्य में करीब 1400 करोड़ के निवेश का दावा किया था। अब पता चला है कि एनजीओ के निदेशक पर ही कई लोगों का पैसा बकाया है। सह आरोप उसी एनजीओ में काम करने वाले एक कर्मचारी ने लगाया है। इससे पहले पुच एआई के साथ हुए 25 हजार करोड़ रुपये के एमओयू को भी रद्द करना पड़ा था। उस समय भी सवाल उठे थे कि जिस स्टार्टअप को बने ही एक साल हुए थे, उसके साथ इतने बड़े निवेश का समझौता कैसे किया गया। साफ है कि उद्योग विभाग के अफसर केवल सीएम से शाबासी लेने के लिए बिना जांचे-परखे इस तरह के फर्जी एमओयू करवाकर सीएम की नाक कटवा रहे हैं।

एमओयू को पुख्ता निवेश न मानें

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी इन्वेस्टर मीट में एमओयू होना सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन एमओयू को पुख्ता निवेश नहीं माना जा सकता है। कई समझौते आगे नहीं बढ़ पाते। हालांकि जब किसी सरकार द्वारा इन एमओयू के आधार पर लाखों करोड़ रुपये के निवेश और लाखों रोजगार के दावे किए जाते हैं, तब यह जरूरी हो जाता है कि निवेशकों की साख, वित्तीय स्थिति और परियोजनाओं की व्यवहार्यता की गंभीर जांच हो। सवाल यह भी है कि क्या ऐसे आयोजनों का उद्देश्य वास्तविक निवेश लाना है या फिर बड़े-बड़े आंकड़ों के जरिए विकास की तस्वीर पेश करना। उत्तरप्रदेश सरकार लगातार यह कहती रही है कि निवेश प्रस्तावों को चरणबद्ध तरीके से जमीन पर उतारा जा रहा है और बड़ी संख्या में परियोजनाओं पर काम भी शुरू हो चुका है। सरकार समय-समय पर विभिन्न जिलों में निवेश परियोजनाओं के शिलान्यास और उद्घाटन के आंकड़े भी जारी करती रही है। हालांकि जिन एमओयू पर सवाल उठे हैं, उन्हें लेकर सरकार की विस्तृत प्रतिक्रिया सामने आने का इंतजार है। यदि इन कंपनियों की जांच, पात्रता और चयन प्रक्रिया को लेकर सरकार कोई स्पष्टीकरण देती है, तो इससे कई सवालों के जवाब मिल सकते हैं। उत्तर प्रदेश को देश की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल करने का लक्ष्य महत्वाकांक्षी है। इसके लिए बड़े निवेश और उद्योगों की जरूरत भी है। लेकिन यदि निवेश समझौतों में शामिल कुछ कंपनियों की बुनियादी जानकारी तक स्पष्ट नहीं मिलती, तो स्वाभाविक रूप से पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं। यह मामला केवल कुछ कंपनियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा है जिसके आधार पर लाखों करोड़ रुपये के निवेश के दावे किए जाते हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन एमओयू में से कितने वास्तव में उद्योगों, रोजगार और आर्थिक विकास में बदलते हैं और कितने केवल कागजों तक सीमित रह जाते हैं।

 

पिछले मार्च में रद्द हुआ था एमओयू

उत्तर प्रदेश सरकार से फरवरी 2023 के इन्वेटर समिट में एमओयू करने वाली कंपनी व्यू नाउ इन्फोटेक प्राइवेट लिमिटेड से करार को योगी सरकार ने पिछले मार्च में रद्द कर दिया था। ऐसा कंपनी के संस्थापक की ईडी के हाथों मनी लॉन्ड्रिंग में गिरफ्तारी के बाद किया गया। सूचना विभाग ने भी व्यू नाउ नाम की इस कंपनी को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है। कंपनी ने यूपी के विभिन्न जिलों में डेटा सेंटर के लिए 13,500 करोड़ रुपये के निवेश की बात कही थी। कंपनी का मालिक सुखविंदर सिंह खरौर है। यूपी के तत्कालीन मुख्य सचिव डीएस मिश्रा की उपस्थिति में एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए थे, जिसमें सरकार ने दावा किया था कि उत्तर प्रदेश “डेटा सेंटर ऑपरेटरों के लिए तेजी से पसंदीदा गंतव्य बनता जा रहा है”। खारौर ने तब कहा था कि उनकी कंपनी राज्य के सभी 75 जिलों को कवर करते हुए 750 डेटा सेंटर स्थापित करेगी। कंपनी का दावा है कि उसने गाजियाबाद के मोर्टा में एक पायलट डेटा सेंटर पहले ही खोल रखा है। योगी सरकार को व्यूनाऊ से कोई पैसा नहीं मिला है। एक सरकारी अफसर ने दावा किया कि किसी भी लेन-देन से पहले निवेशक की साख की जांच की जाती है।

ईडी ने अपनी जांच में पाया कि व्यूनाउ के प्रमोटर और निदेशक एक ऐसी योजना चला रहे थे, जिसमें वे लोगों को क्लाउड पार्टिकल्स या सर्वर में निवेश करने के लिए लुभाते थे, जिसके लिए वे प्रति वर्ष 48 प्रतिशत किराया रिटर्न की गारंटी देते थे। इन प्रमोटरों और निदेशकों ने निवेशकों से कहा कि वे इन क्लाउड पार्टिकल्स को ग्राहकों को किराए पर देंगे और किराए से होने वाली आय निवेशकों को मिलेगी। लेकिन असल में कोई ग्राहक था ही नहीं। नए निवेशकों को लाने के लिए कंपनी ने सहयोगी फर्मों- ज़ेबाइट रेंटल प्लैनेट प्राइवेट लिमिटेड (जेडआरपीपीएल) और ज़ेबाइट इन्फोटेक प्राइवेट लिमिटेड (ज़िपएल) के बैंक खातों का उपयोग किया।

ईडी ने यह साबित कर दिया है कि ग्राहकों से निवेशकों को किराए के रूप में दिया गया पैसा वास्तव में नए निवेशकों से प्राप्त हुआ था और कोई वास्तविक किराये की आय उत्पन्न नहीं हुई थी। व्यूनाउ ग्रुप ने 41,253 रुपये प्रति क्लाउड पार्टिकल बेचे थे, जिससे कंपनी को 3,558 करोड़ रुपये मिले। कंपनी ने यह पैसा चैनल के भागीदारों को कमीशन देने में खर्च किया। बाकी बचे पैसों से लक्जरी गाड़ियां, जेवरात और बर्तन जैसे सामान खरीदे गए।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button