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दीर्घायु हॉस्पिटल बना मौत का अस्पताल, यहां का डॉक्टर एस के जायसवाल “यमराज”इसके हाथ खून से हुए लाल

ऑपरेशन के दौरान महिला की मौत, इलाज पर उठे गंभीर सवाल

* रक्षक बना भक्षक? जिम्मेदारों की जवाबदेही पर सवाल, परिजनों ने डॉक्टर एसके जायसवाल पर लगाया लापरवाही का आरोप

* “अस्पताल जिंदगी बचाने की आखिरी उम्मीद होता है… लेकिन जब उसी अस्पताल से किसी अपने की मौत की खबर मिले, तो दर्द के साथ कई सवाल भी जन्म लेते हैं।”

 

  • पित्ताशय की पथरी के ऑपरेशन के दौरान 36 वर्षीय अंशु सिंह की मौत       
  • परिजनों ने चिकित्सकीय लापरवाही का लगाया गंभीर आरोप                   
  • डॉक्टर एसके जायसवाल की भूमिका पर परिवार ने उठाए सवाल
  • परिजनों का दावा—ऑपरेशन से पहले मरीज की हालत ठीक थी
  • ऑपरेशन के दौरान तबीयत बिगड़ने के बाद मौत होने की बात
  • परिवार ने सारनाथ थाने में शिकायत दर्ज कराई
  • अस्पताल पक्ष के अनुसार मौत की वजह अलग बताई गई
  • मौत की वास्तविक वजह जांच के बाद ही होगी स्पष्ट
  • अस्पताल की पूर्व घटनाओं और व्यवस्थाओं को लेकर भी उठे सवाल
  • परिजनों ने निष्पक्ष जांच और दोष साबित होने पर कार्रवाई की मांग की
  • अस्पताल गई थी जिंदगी की उम्मीद लेकर, घर लौटी मौत की खबर

वाराणसी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में चिकित्सा सुविधाओं का बड़ा नेटवर्क है। सरकारी और निजी अस्पतालों में रोजाना बड़ी संख्या में मरीज इलाज और जिंदगी की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं। लेकिन आशापुर-सारनाथ क्षेत्र स्थित दीर्घायु हॉस्पिटल में 36 वर्षीय अंशु सिंह की ऑपरेशन के दौरान हुई मौत ने चिकित्सा व्यवस्था और मरीजों की सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
अंशु सिंह जौनपुर के शाहगंज क्षेत्र के छतईन कला की रहने वाली थीं। परिजनों के अनुसार उन्हें पित्ताशय में पथरी की समस्या थी। उपचार के लिए उन्हें दीर्घायु हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। परिवार को उम्मीद थी कि ऑपरेशन के बाद अंशु स्वस्थ होकर अपने घर लौटेंगी। लेकिन ऑपरेशन के दौरान उनकी मौत हो गई।
एक महिला जो अपने पैरों पर अस्पताल पहुंची थी, कुछ ही घंटों बाद उसकी मौत की खबर ने पूरे परिवार को झकझोर दिया। अब परिवार मौत की वजह और इलाज के दौरान हुई घटनाओं की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है।

 

पति का आरोप—ऑपरेशन को लेकर पहले ही जताई थी चिंता

मृतका के पति ऋषि सिंह का आरोप है कि ऑपरेशन से पहले उन्होंने चिकित्सक से मरीज की स्थिति को देखते हुए ही ऑपरेशन करने की बात कही थी। उनका दावा है कि ऑपरेशन वाले दिन भी परिवार की ओर से सावधानी बरतने और जरूरत पड़ने पर किसी अन्य अस्पताल में रेफर करने का अनुरोध किया गया था।
परिवार का आरोप है कि इसके बावजूद ऑपरेशन किया गया। इसी दौरान अंशु की तबीयत बिगड़ी और उनकी मौत हो गई।
ऋषि सिंह ने डॉक्टर एसके जायसवाल की भूमिका पर सवाल उठाते हुए पूरे मामले की जांच की मांग की है। उनका कहना है कि उनकी पत्नी अस्पताल में इलाज के लिए आई थीं और परिवार चाहता है कि उनकी मौत की वास्तविक वजह सामने आए।
हालांकि चिकित्सकीय लापरवाही के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। मौत का वास्तविक कारण जांच और उपलब्ध चिकित्सकीय रिकॉर्ड से ही स्पष्ट हो सकेगा।

भाई ने भी अस्पताल प्रशासन पर लगाए गंभीर आरोप

मृतका के भाई सत्यम सिंह ने भी अस्पताल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार ऑपरेशन के दौरान अंशु की तबीयत बिगड़ने की सूचना परिवार को मिली। परिवार का दावा है कि उन्होंने ऑपरेशन रोकने अथवा मरीज को किसी बड़े अस्पताल में रेफर करने की बात कही थी।
सत्यम सिंह ने यह भी आरोप लगाया कि बाद में मामले को समझौते के जरिए खत्म करने का प्रयास किया गया और कथित तौर पर रकम की पेशकश की गई। इन आरोपों की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में जांच एजेंसियों के लिए इन दावों की सत्यता की जांच करना जरूरी है।

मौत के बाद सारनाथ थाने में शिकायत

अंशु सिंह की मौत के बाद परिवार में आक्रोश फैल गया। परिजनों की ओर से सारनाथ थाने में शिकायत दर्ज कराए जाने की बात कही गई है। शिकायत में चिकित्सकीय लापरवाही का आरोप लगाया गया है।
परिवार का आरोप है कि अंशु का ऑपरेशन डॉक्टर एसके जायसवाल की देखरेख में हुआ था और ऑपरेशन के दौरान लापरवाही के कारण उनकी मौत हुई।
अब पुलिस जांच के साथ-साथ चिकित्सा विशेषज्ञों की राय भी महत्वपूर्ण होगी। ऑपरेशन से पहले मरीज की स्थिति क्या थी, ऑपरेशन के दौरान कौन-कौन सी चिकित्सकीय प्रक्रियाएं अपनाई गईं, अचानक तबीयत क्यों बिगड़ी और मौत का वास्तविक कारण क्या था—इन सभी सवालों के जवाब जांच से ही सामने आ सकते हैं।

अस्पताल प्रबंधन का पक्ष भी महत्वपूर्ण

किसी भी चिकित्सकीय घटना में केवल परिजनों के आरोपों के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। अस्पताल प्रबंधन और संबंधित चिकित्सकों का पक्ष भी जांच का अहम हिस्सा होगा।
यदि अस्पताल प्रबंधन के अनुसार मौत किसी अचानक उत्पन्न चिकित्सकीय जटिलता या हार्ट अटैक के कारण हुई है, तो मेडिकल रिकॉर्ड, ऑपरेशन नोट, जांच रिपोर्ट और पोस्टमार्टम रिपोर्ट जैसे दस्तावेजों से स्थिति स्पष्ट की जा सकती है।
यही कारण है कि पूरे मामले में भावनाओं के साथ-साथ चिकित्सकीय तथ्यों की जांच भी आवश्यक है।

दीर्घायु हॉस्पिटल से जुड़ी पुरानी घटनाएं भी चर्चा में

परिजनों और स्थानीय स्तर पर दीर्घायु हॉस्पिटल से जुड़ी कुछ पुरानी घटनाओं का भी उल्लेख किया जा रहा है। वर्ष 2020 में अमृता पटेल की प्रसव के बाद मौत का मामला सामने आया था। उनके परिवार की ओर से इलाज में लापरवाही का आरोप लगाए जाने की बात कही गई थी, जबकि अस्पताल पक्ष ने मौत का कारण अधिक रक्तस्राव बताया था।
वर्ष 2021 में बायोमेडिकल वेस्ट को लेकर भी अस्पताल का नाम चर्चा में आया था। नगर निगम की कार्रवाई में अस्पताल के बाहर बायोमेडिकल कचरा पाए जाने पर जुर्माने की बात सामने आई थी।
वर्ष 2026 में बीएचयू छात्र आदित्य गोस्वामी की मौत के मामले में भी दीर्घायु हॉस्पिटल का नाम सामने आया था। उपलब्ध विवरण के अनुसार छात्र को मृत अवस्था में अस्पताल लाया गया था और आरोप नशा मुक्ति केंद्र से जुड़े लोगों पर लगाए गए थे। इस घटना को वर्तमान मामले की चिकित्सकीय लापरवाही का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
अब सितंबर 2026 में अंशु सिंह की मौत ने एक बार फिर अस्पताल की कार्यप्रणाली को चर्चा में ला दिया है।

अस्पताल की व्यवस्था पर भी उठ रहे सवाल

परिजनों और स्थानीय लोगों की ओर से अस्पताल की व्यवस्थाओं को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। अस्पताल में इमरजेंसी सुविधाओं, पार्किंग और एंबुलेंस की व्यवस्था को लेकर शिकायतों का उल्लेख किया गया है।
यदि इन व्यवस्थाओं को लेकर आधिकारिक शिकायतें मौजूद हैं तो संबंधित विभागों को अस्पताल के भवन, अग्नि सुरक्षा, मेडिकल सुविधाओं, पार्किंग, इमरजेंसी व्यवस्था और अन्य निर्धारित मानकों की जांच करनी चाहिए।
वाराणसी विकास प्राधिकरण, स्वास्थ्य विभाग और अन्य संबंधित विभागों की जिम्मेदारी है कि अस्पतालों में लागू मानकों का समय-समय पर परीक्षण किया जाए।

सवाल जो अभी भी जिंदा हैं

  • अंशु सिंह की मौत के बाद कई सवाल परिवार और समाज के सामने हैं।
  • क्या ऑपरेशन से पहले मरीज की पूरी मेडिकल स्थिति का आकलन किया गया था?
  • ऑपरेशन के दौरान अचानक ऐसी कौन-सी परिस्थिति पैदा हुई जिससे अंशु की जान चली गई?
  • क्या परिवार की ओर से ऑपरेशन रोकने या रेफर करने की मांग की गई थी?
  • मौत की वास्तविक चिकित्सकीय वजह क्या थी?
  • क्या अस्पताल में सभी जरूरी इमरजेंसी सुविधाएं उपलब्ध थीं?
  • इन सवालों का जवाब आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और मेडिकल रिकॉर्ड से मिलना चाहिए।
  • एक मौत, पीछे छोड़ गई पूरे सिस्टम के लिए सवाल

अंशु सिंह अस्पताल में मौत के लिए नहीं, इलाज और जिंदगी की उम्मीद लेकर पहुंची थीं। परिवार ने उन्हें डॉक्टरों के भरोसे सौंपा था। लेकिन जब वही मरीज वापस घर नहीं लौटी तो उस परिवार की दुनिया उजड़ गई।
अस्पताल में भर्ती होने वाला हर मरीज केवल एक मरीज नहीं होता। वह किसी का जीवनसाथी, किसी की बहन, किसी की बेटी, किसी की मां और किसी पूरे परिवार की उम्मीद होता है।
इसलिए अंशु सिंह की मौत का सच सामने आना सिर्फ उनके परिवार की मांग नहीं, बल्कि मरीजों के भरोसे का सवाल भी है।
यदि जांच में किसी प्रकार की चिकित्सकीय लापरवाही सामने आती है तो कानून के अनुसार जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। और यदि आरोप जांच में सही नहीं पाए जाते हैं, तो यह बात भी स्पष्ट रूप से सामने आनी चाहिए।
मौत का कारण जो भी हो, सच छिपना नहीं चाहिए। क्योंकि एक परिवार को न्याय तभी मिलेगा, जब उसके सबसे बड़े सवाल का जवाब मिलेगा—अंशु की मौत आखिर हुई कैसे?

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