डॉक्टर ए के रॉय मौत का कारोबारी,मरीजों की जान का सौदा कर रहा बारी-बारी
चन्दौली के सीएमओ की कारस्तानी

- चकिया में असली अस्पताल, नकली डॉक्टर और मौत का कारोबार
- इलाज नहीं, यहां चल रहा है जान से खिलवाड़ का संगठित व्यापार
- इलाज के नाम पर लूट, चकिया बना झोलाछापों की सुरक्षित मंडी
- डिग्री के बिना ‘डाक्टर’, मरीजों की मजबूरी से करोड़ों का खेल
- किराए के डॉक्टर, निरीक्षण के दिन ही दिखाई देते हैं भगवान
- डायग्नोस्टिक सेंटर या मौत की फैक्ट्री?
- ऑपरेशन गैर-प्रशिक्षित हाथों से, जिम्मेदारी शून्य
- मौत के बाद सेटिंग, थाने से अस्पताल तक नेक्सस
- झोलाछाप, आशा, कमीशन नेटवर्क का खुला खेल
- सवाल सिस्टम पर कब टूटेगा मौत का यह कारोबार?
चंदौली। चकिया क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर जितनी चमकदार बोर्डों पर दिखती है, हकीकत उतनी ही डरावनी है। निजी अस्पतालों, नर्सिंग होम, डायग्नोस्टिक सेंटरों और क्लीनिकों की बाढ़ ने यह भ्रम जरूर पैदा किया है कि इलाके में बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं, लेकिन अंदर की सच्चाई इससे बिल्कुल उलट बताई जा रही है। स्थानीय लोगों, मरीजों, सामाजिक संगठनों और स्वास्थ्य विभाग से जुड़े सूत्रों के अनुसार, चकिया में इलाज कम और कारोबार ज्यादा होता है। आरोप है कि यहां असली डॉक्टरों से ज्यादा नकली डॉक्टर सक्रिय हैं। ऐसे लोग, जिनके पास न तो एमबीबीएस, न बीएएमएस, न बीएचएमएस और न ही किसी तरह की मान्य मेडिकल डिग्री है, वे खुलेआम अपने नाम के आगे ‘डॉ’ लिखकर मरीजों का इलाज कर रहे हैं। ग्रामीण, गरीब और अशिक्षित मरीज इन्हें असली डॉक्टर समझकर अपनी जान सौंप देते हैं। सबसे गंभीर बात यह है कि इन कथित अस्पतालों और डायग्नोस्टिक सेंटरों के बाहर बड़े-बड़े बोर्डों पर डिग्रीधारी डॉक्टरों के नाम लिखे होते हैं, लेकिन मौके पर वे डॉक्टर अक्सर नदारद रहते हैं। इलाज, इंजेक्शन, ड्रिप, जांच और रिपोर्टिंग का काम ऐसे लोगों द्वारा किया जाता है, जिन्हें मेडिकल साइंस की बुनियादी जानकारी तक नहीं होती। चकिया के लोग सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर यह सब कैसे संभव है? क्या स्वास्थ्य विभाग को इसकी जानकारी नहीं है? अगर जानकारी है, तो कार्रवाई क्यों नहीं होती? और अगर जानकारी नहीं है, तो यह विभागीय लापरवाही नहीं तो और क्या है? एक स्थानीय नागरिक ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा, चकिया में अस्पताल अब इलाज के लिए नहीं, मुनाफे के लिए खोले जा रहे हैं। यहां प्रोफेशनल डॉक्टर कम और बिजनेसमैन ज्यादा हैं। मरीज को बीमारी नहीं, उसकी जेब देखकर ट्रीटमेंट तय होता है। इलाज के नाम पर चल रहे इस कथित संगठित कारोबार का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि इसमें मानव जीवन सिर्फ एक ‘केस’ बनकर रह गया है। जब तक मरीज से पैसे निकलते रहते हैं, इलाज चलता है। हालत बिगड़ते ही या तो रेफर कर दिया जाता है या फिर मौत के बाद सेटिंग शुरू हो जाती है। चकिया की यह तस्वीर सिर्फ एक कस्बे की कहानी नहीं है, बल्कि पूरे जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल है। अगर यही हाल रहा, तो न जाने कितनी और जिंदगियां इस मौत के कारोबार की भेंट चढ़ेंगी।

अस्पताल कम, बिजनेस हब ज्यादा चकिया की नई पहचान
चकिया कस्बे में बीते कुछ वर्षों में निजी अस्पतालों, नर्सिंग होम और क्लिनिकों की संख्या जिस तेजी से बढ़ी है, उसने स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर नहीं बल्कि मुनाफे की मानसिकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि यहां अस्पताल खोलना अब सेवा नहीं, निवेश का धंधा बन चुका है। बड़े-बड़े बोर्ड, एसी कमरों और आकर्षक नामों से मरीजों को यह भरोसा दिलाया जाता है कि उन्हें बेहतर इलाज मिलेगा, लेकिन अंदर घुसते ही हकीकत कुछ और ही होती है। इलाज की जगह पहले पैकेज बताया जाता है। भर्ती से पहले फीस, जांच से पहले भुगतान और डिस्चार्ज से पहले पूरा हिसाब। मरीज की हालत कैसी है, यह बाद की बात है। एक स्थानीय व्यापारी का कहना है कि चकिया में अस्पताल अब सेवा केंद्र नहीं, कैश काउंटर बन गए हैं।
डिग्री के बिना ‘डॉक्टर’: भरोसे का सबसे बड़ा धोखा
सूत्रों के अनुसार चकिया में ऐसे कई अस्पताल और क्लिनिक हैं, जहां इलाज करने वाले व्यक्ति के पास कोई मान्य मेडिकल डिग्री नहीं है। न एमबीबीएस, न आयुष से जुड़ी कोई मान्यता, फिर भी नाम के आगे ‘डॉ’ लिखकर मरीजों को भ्रमित किया जाता है। ग्रामीण इलाकों से आए मरीज डॉक्टर और कंपाउंडर का फर्क नहीं समझ पाते। उनके लिए सफेद कोट ही सबसे बड़ा प्रमाण बन जाता है। एक सामाजिक कार्यकर्ता का कहना है कि यह सिर्फ कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि भरोसे का खुला शोषण है। गरीब मरीज अपने खेत, गहने और जमीन बेचकर इलाज के लिए आता है और सामने बैठा व्यक्ति असल में डॉक्टर ही नहीं होता।
किराए के डॉक्टर निरीक्षण के दिन ही सक्रिय सिस्टम
स्वास्थ्य विभाग से जुड़े सूत्रों का दावा है कि कई निजी अस्पतालों में डॉक्टर सिर्फ कागजों पर मौजूद हैं। डिग्रीधारी डॉक्टरों को महीने या प्रति विजिट के हिसाब से ‘हायर’ किया जाता है। जैसे ही विभागीय निरीक्षण की सूचना मिलती है, ये डॉक्टर अस्पताल में हाजिर हो जाते हैं। निरीक्षण खत्म होते ही गायब। बाकी दिनों में इलाज, इंजेक्शन, ड्रिप और यहां तक कि छोटे ऑपरेशन भी ऐसे लोग करते हैं जिन्हें मेडिकल प्रशिक्षण नहीं है। सवाल यह है कि अगर यह सब विभाग को पता है, तो कार्रवाई क्यों नहीं होती?
डायग्नोस्टिक सेंटर जांच कम, जोखिम ज्यादा
चकिया में डायग्नोस्टिक सेंटरों की हालत और भी चिंताजनक बताई जा रही है। सोनोग्राफी, एक्स-रे, ब्लड टेस्ट और पैथोलॉजी जैसी जांचें सीधे मरीज की जान से जुड़ी होती हैं, लेकिन आरोप है कि इन जांचों को बिना मानक और बिना विशेषज्ञ की निगरानी में किया जा रहा है। रिपोर्ट पर डॉक्टर का नाम और रजिस्ट्रेशन नंबर होता है, लेकिन मशीन किसी ऐसे व्यक्ति के हाथ में होती है जिसे मेडिकल साइंस की बुनियादी समझ भी नहीं। एक अस्पताल कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि डॉक्टर सिर्फ साइन के लिए हैं, असली काम हमसे कराया जाता है।
ऑपरेशन थिएटर या प्रयोगशाला?
सबसे गंभीर आरोप ऑपरेशन से जुड़े हैं। सूत्रों का दावा है कि कुछ निजी अस्पतालों में सिजेरियन, अपेंडिक्स और अन्य छोटे ऑपरेशन गैर-प्रशिक्षित लोगों द्वारा किए जाते हैं। जरा सी चूक मरीज की जान ले सकती है, लेकिन यहां जोखिम को नजरअंदाज कर मुनाफा प्राथमिकता बन जाता है।
मौत के बाद ‘सेटिंग’ न्याय नहीं, समझौता
चकिया में लापरवाही से मरीज की मौत होने के बाद जो प्रक्रिया शुरू होती है, वह और भी डरावनी है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि जैसे ही मौत होती है, अस्पताल प्रबंधन, बिचौलिये और थाना स्तर पर सेटिंग सक्रिय हो जाती है। परिजनों को समझाया जाता है, डराया जाता है और अंततः समझौते पर मजबूर किया जाता है। एक व्यक्ति ने आक्रोश में कहा कि यहां मौत भी एक फाइल बन जाती है, जिसे पैसे से बंद कर दिया जाता है। गरीब परिवारों के लिए न्याय सिर्फ एक शब्द बनकर रह गया है।
झोलाछाप आशा-कमीशन नेटवर्क
चकिया और आसपास के गांवों में झोलाछाप डॉक्टरों का बड़ा नेटवर्क सक्रिय बताया जा रहा है। ये झोलाछाप पहले गांव में इलाज शुरू करते हैं, हालत बिगड़ते ही मरीज को शहर के निजी अस्पताल में रेफर कर देते हैं। हर रेफरल पर कमीशन तय होता है। आरोप यह भी हैं कि कुछ मामलों में आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से भी रेफरल होता है। एक ग्रामीण का कहना है कि यहां मरीज नहीं, कमीशन चलता है।
रेफर का खेल जिम्मेदारी से पलायन
जैसे ही मरीज की हालत गंभीर होती है, निजी अस्पताल जिम्मेदारी लेने के बजाय उसे रेफर कर देते हैं। लेकिन उससे पहले मोटी रकम वसूली जा चुकी होती है। कई मामलों में रेफर तब किया जाता है, जब मरीज की हालत हाथ से निकल चुकी होती है।
स्वास्थ्य विभाग की भूमिका चुप्पी क्यों?
सबसे बड़ा सवाल स्वास्थ्य विभाग पर है। लोग पूछ रहे हैं कि बिना मानक के अस्पतालों को लाइसेंस किस आधार पर दिया गया? निरीक्षण रिपोर्ट कौन बनाता है? शिकायतों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती? अगर ईमानदार जांच हो जाए, तो आधे अस्पताल अपने आप बंद हो जाएंगे।
जिलेभर में फैला नेटवर्क
सूत्रों के अनुसार चकिया अकेला मामला नहीं है। पूरे जिले में सैकड़ों निजी अस्पताल, डायग्नोस्टिक सेंटर और क्लिनिक ऐसे हैं, जिनकी वैधता संदिग्ध है। यह एक संगठित समस्या बन चुकी है।
कानून और हकीकत के बीच खाई
कानून साफ है बिना मान्य डिग्री इलाज करना अपराध है, बिना पंजीकरण जांच केंद्र चलाना दंडनीय है और लापरवाही से मौत पर आपराधिक मामला बनता है। लेकिन चकिया की जमीनी हकीकत इन नियमों को आईना दिखा रही है।
कब रुकेगा मौत का यह कारोबार?
चकिया में नकली डॉक्टरों और फर्जी अस्पतालों का यह कथित नेटवर्क सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि मानवता के खिलाफ अपराध है। सवाल अब यह नहीं है कि गड़बड़ी है या नहीं—सवाल यह है कि सिस्टम कब जागेगा और कितनी जानों की कीमत पर?
अस्पताल कम, बिजनेस हब ज्यादा
चकिया में दर्जनों निजी अस्पताल, नर्सिंग होम और क्लीनिक संचालित हो रहे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि इनमें से कई अस्पताल सिर्फ नाम के हैं। इलाज की जगह यहां जांच, दवा और बेड के नाम पर खुली लूट होती है।
डिग्री के बिना डॉक्टर, नाम के आगे ‘डाक्टर’
सूत्रों के मुताबिक कई संचालकों के पास कोई मान्य मेडिकल डिग्री नहीं है। इसके बावजूद वे खुद को डॉक्टर बताकर इलाज कर रहे हैं। यह सीधे-सीधे कानून का उल्लंघन है, लेकिन कार्रवाई न के बराबर है।
किराए के डॉक्टर, सिर्फ निरीक्षण के दिन
स्वास्थ्य विभाग से जुड़े सूत्रों का दावा है कि कई अस्पतालों में डिग्रीधारी डॉक्टर सिर्फ कागजों पर हैं। निरीक्षण के दिन उन्हें बुला लिया जाता है, बाकी समय अस्पताल गैर-प्रशिक्षित लोग चलाते हैं।
डायग्नोस्टिक सेंटर जांच या धोखा?
सोनोग्राफी, ब्लड टेस्ट और पैथोलॉजी जैसी जांचें बिना मानक के की जा रही हैं। रिपोर्ट पर डॉक्टर का नाम होता है, लेकिन मशीन किसी और के हाथ में।
कानून क्या कहता है?
बिना डिग्री इलाज करना अपराध है। बिना पंजीकरण डायग्नोस्टिक सेंटर चलाना दंडनीय है। लापरवाही से मौत पर आपराधिक मामला बनता है।
* चकिया में नकली डॉक्टरों पर कार्रवाई क्यों नहीं?
* स्वास्थ्य विभाग किसके संरक्षण में आंख मूंदे बैठा है?
* कितनी मौतों के बाद सिस्टम जागेगा?
* क्या पूरे जिले में विशेष जांच होगी?




