मोदी ने यूजीसी को कर दिया तबाह व बर्बाद,विकसित भारत रह जायेगा बस ख्वाब ही ख्वाब

- शिक्षा का सौदा, युवाओं की बलि और यूजीसी की दलाली
- मोदी सरकार की शिक्षा नीति पर सीधा अभियोग
- डिग्री नहीं बिक रही, भविष्य नीलाम हो रहा
- यूजीसी अब नियामक नहीं, सत्ता का मुंशी
- नेट-जेआरएफ नहीं, गरीबों की छंटनी परीक्षा
- सरकारी यूनिवर्सिटी को बीमार करो, प्राइवेट माफिया को खिलाओ
- मोदी सरकार की नजर में छात्र नागरिक नहीं, ग्राहक जो फीस भरे, कर्ज ले और चुप रहे
- छात्र जब सड़क पर उतरता है, तो वो राजनीति नहीं करता भविष्य का हिसाब मांगता है

देश का भविष्य किसके हाथ में होता है?
छात्रों के हाथ में, युवाओं के हाथ में, शिक्षकों के हाथ में। लेकिन आज देश का भविष्य डिग्रियों में नहीं, फीस की रसीदों में कैद कर दिया गया है, और इसके लिए जिम्मेदार है मोदी सरकार और उसकी शिक्षा नीति।
आज हर मंच से कहा जाता है, युवा देश की ताकत हैं।
लेकिन सवाल ये है कि अगर युवा ही सरकार के लिए बोझ है, तो ताकत कैसी? यूजीसी…यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन जिसे विश्वविद्यालयों की रीढ़ कहा जाता था, आज वही यूजीसी सरकार के आदेशों पर चलने वाला एक खोखला दफ्तर बन चुका है।

यूजीसी का काम था, शिक्षा को सस्ता बनाना, रिसर्च को बढ़ावा देना, छात्रों को आगे बढ़ाना, लेकिन आज यूजीसी क्या कर रही है? फीस बढ़ाने के फरमान, स्कॉलरशिप में कटौती
नेट-जेआरएफ जैसे एग्जाम्स को इतना कठिन बना देना
कि गरीब छात्र पहले ही हार मान ले ये सुधार नहीं है, ये शिक्षा से सामाजिक छंटनी है। सरकारी विश्वविद्यालयों को जानबूझकर फंड काटकर, पोस्ट खाली छोड़कर,
इन्फ्रास्ट्रक्चर तोड़कर बीमार किया जा रहा है। ताकि एक दिन कहा जा सके कि सरकारी यूनिवर्सिटी फेल हो गई, और फिर रास्ता साफ हो प्राइवेट कॉलेजों, कॉर्पोरेट यूनिवर्सिटीज और शिक्षा माफिया के लिए।
आज शिक्षा ज्ञान नहीं है, आज शिक्षा मुनाफा है। आज रिसर्च स्कॉलर लैब में नहीं, किराए और मेस की फीस के हिसाब में फंसा हुआ है।
सरकार कहती है कि डिजिटल इंडिया है, सब ऑनलाइन है। लेकिन सवाल ये है कि ऑनलाइन किसके लिए। उस छात्र के लिए जिसके गांव में आज भी नेटवर्क नहीं है या उसके लिए जिसके घर में एक मोबाइल पूरे परिवार में चलता है। ये डिजिटल क्रांति नहीं है ये डिजिटल बहाना है।
आज कहा जाता है कि देश में आईआईटी बढ़ रहे हैं, आईआईएम बढ़ रहे हैं। लेकिन सच ये है कि आईआईटी बढ़े हैं, लेकिन वहां पहुंचने वाले गरीब छात्र घटे हैं। क्योंकि प्रतियोगिता नहीं बढ़ी, खर्च बढ़ा है। यूजीसी नियम बदलती रहती है, सिलेबस बदलता है, एग्जाम पैटर्न बदलता है। लेकिन नहीं बदलती सरकार की सोच।
क्योंकि मोदी सरकार की नजर में छात्र नागरिक नहीं है वो ग्राहक है। ग्राहक जो फीस भरे, कर्ज ले और चुप रहे।
आज अगर छात्र सड़क पर है, तो वो देशद्रोही नहीं है।
वो अर्बन नक्सल नहीं है। वो किसी पार्टी का एजेंट नहीं है। वो ठगा हुआ नागरिक है। जो पूछ रहा है कि मेरा भविष्य क्यों बेचा जा रहा है। याद रखिए जिस देश में
शिक्षा अमीरों की जागीर बन जाती है, वहां लोकतंत्र सिर्फ पोस्टर में बचता है। आज संकट यूजीसी का नहीं है, आज संकट भरोसे का है। ये भरोसा छात्रों का, युवाओं का, शिक्षकों का मोदी सरकार से खत्म हो रहा है। ये चेतावनी है, ये रोष है, ये भविष्य की आवाज है। क्योंकि अगर शिक्षा बचेगी नहीं, तो देश भी नहीं बचेगा। जब देश नही बचेगा तो विकसित भारत नही घण्टा बनेगा।




