
लखनऊ के अलीगंज क्षेत्र में हुए भीषण अग्निकांड ने पूरे उत्तर प्रदेश को झकझोर दिया। एक व्यावसायिक भवन में लगी आग ने कई परिवारों की दुनिया उजाड़ दी। कुछ ही मिनटों में धुआं, चीखें और अफरातफरी का ऐसा मंजर बना जिसने सुरक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक निगरानी और सरकारी जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हादसे के बाद सरकार ने जांच के आदेश दे दिए। अधिकारियों ने कार्रवाई का आश्वासन भी दिया। लेकिन सवाल यह है कि हर बड़े हादसे के बाद यही प्रक्रिया क्यों दोहराई जाती है? पहले हादसा होता है, फिर जांच होती है, फिर जिम्मेदार लोगों की तलाश होती है, और कुछ समय बाद पूरा मामला धीरे-धीरे सार्वजनिक स्मृति से गायब हो जाता है। क्या नागरिकों की सुरक्षा का मॉडल अब केवल हादसे के बाद की कार्रवाई तक सीमित रह गया है?

इस घटना में सबसे बड़ा नुकसान उन परिवारों का हुआ है जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया। जिन माता-पिता ने अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए भेजा था, उन्होंने शायद कभी नहीं सोचा होगा कि एक शैक्षणिक परिसर में सुरक्षा की इतनी बड़ी कमी हो सकती है। जिन छात्रों ने भविष्य के सपने लेकर कोचिंग संस्थान का रुख किया था, वे अचानक एक ऐसी त्रासदी के केंद्र में पहुंच गए जहां जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर केवल कुछ मिनटों का रह गया।
सरकार और प्रशासन से सबसे पहला सवाल यही है कि क्या उस भवन के पास आवश्यक अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र था? यदि था, तो फिर सुरक्षा उपाय विफल कैसे हो गए? यदि नहीं था, तो इतने समय तक भवन संचालित कैसे होता रहा? क्या संबंधित विभागों ने कभी निरीक्षण किया था? यदि किया था, तो कमियां क्यों नहीं पकड़ी गईं?
यह केवल एक भवन का मामला नहीं है। यह पूरे प्रदेश में मौजूद हजारों व्यावसायिक परिसरों, कोचिंग संस्थानों, अस्पतालों, छात्रावासों और बहुमंजिला इमारतों की सुरक्षा का प्रश्न है। यदि राजधानी जैसे शहर में ऐसी स्थिति हो सकती है, तो छोटे शहरों और कस्बों में हालात कितने चिंताजनक होंगे, इसका अनुमान लगाया जा सकता है।
हर बार प्रशासन दावा करता है कि सुरक्षा मानकों का पालन कराया जा रहा है। लेकिन जब कोई बड़ा हादसा होता है, तब सामने आता है कि कई भवनों में आपातकालीन निकास मार्ग नहीं हैं, अग्निशमन उपकरण काम नहीं कर रहे, विद्युत तारों का रखरखाव नहीं हुआ और निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित रहा। आखिर यह लापरवाही किसकी है?
जनता यह जानना चाहती है कि सरकारी विभागों की भूमिका क्या है। यदि भवन नियमों का पालन नहीं कर रहे थे, तो जिम्मेदार अधिकारी क्या कर रहे थे? यदि अनियमितताएं मौजूद थीं, तो उन पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि सब कुछ नियमों के अनुसार था, तो फिर इतनी बड़ी त्रासदी कैसे हो गई?
सबसे चिंताजनक बात यह है कि उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों के दौरान कई स्थानों पर आग लगने की घटनाएं सामने आई हैं। हर बार जांच समितियां बनती हैं, रिपोर्ट तैयार होती है और सुधार के वादे किए जाते हैं। लेकिन क्या वास्तव में व्यवस्था में कोई मूलभूत परिवर्तन हुआ? यदि हुआ होता, तो शायद आज यह हादसा नहीं होता।
सरकार अक्सर विकास, निवेश और आधुनिक बुनियादी ढांचे की बात करती है। लेकिन विकास केवल नई इमारतें बनाने का नाम नहीं है। विकास का अर्थ यह भी है कि नागरिक उन इमारतों में सुरक्षित महसूस करें। यदि सुरक्षा व्यवस्था ही कमजोर है, तो ऊंची इमारतें और बड़े संस्थान केवल संभावित खतरे के केंद्र बन सकते हैं।
इस घटना ने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है। प्रदेश में तेजी से बढ़ते कोचिंग उद्योग और निजी शैक्षणिक संस्थानों की निगरानी कौन कर रहा है? हजारों छात्र प्रतिदिन इन परिसरों में जाते हैं। क्या उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त व्यवस्था है? क्या नियमित निरीक्षण होते हैं? क्या अभिभावकों को इन व्यवस्थाओं की जानकारी दी जाती है?
हादसे के बाद राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो गई है। विपक्ष प्रशासनिक विफलता की बात कर रहा है, जबकि सरकार जांच और कार्रवाई का भरोसा दे रही है। लेकिन पीड़ित परिवारों के लिए राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का कोई अर्थ नहीं है। उन्हें जवाब चाहिए। उन्हें यह भरोसा चाहिए कि भविष्य में किसी और परिवार को ऐसी त्रासदी का सामना नहीं करना पड़ेगा।
सरकार को केवल दोषियों की पहचान करके अपनी जिम्मेदारी पूरी मानने की भूल नहीं करनी चाहिए। असली जिम्मेदारी उस पूरी व्यवस्था की समीक्षा करना है जिसने ऐसी परिस्थितियां बनने दीं। यदि केवल कुछ निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई होती है और व्यापक तंत्र की जवाबदेही तय नहीं होती, तो यह न्याय नहीं बल्कि औपचारिकता होगी।
यह हादसा केवल एक समाचार नहीं है। यह एक चेतावनी है। यह बताता है कि कागजी नियम और वास्तविक सुरक्षा में कितना अंतर हो सकता है। यह याद दिलाता है कि प्रशासनिक लापरवाही की कीमत आम नागरिक अपने जीवन से चुकाता है।
आज उत्तर प्रदेश की जनता सरकार से एक सीधा सवाल पूछ रही है—क्या नागरिकों की सुरक्षा वास्तव में प्राथमिकता है, या फिर सुरक्षा के दावे केवल तब तक हैं जब तक कोई बड़ा हादसा सामने नहीं आता? जब तक इस प्रश्न का ईमानदार और ठोस उत्तर नहीं मिलता, तब तक अलीगंज की यह त्रासदी केवल एक दुर्घटना नहीं बल्कि व्यवस्था की विफलता का प्रतीक बनी रहेगी।




