न्यायालय का खेल, भगवाई गुंडे स्वतंत्र को 10 दिन में बेल,उमर खालिद,शरजील इमाम व संजीव भट्ट को जेल,न्यायतंत्र हुआ फेल
दस दिन बनाम छह साल, जमानत के तराजू पर न्याय का सवाल

- स्वतंत्र भारद्वाज को 10 दिन बाद अंतरिम राहत, अदालत की टिप्पणी ने छेड़ी नई बहस
- एक तरफ दस दिन की हिरासत ‘आत्मचिंतन’ के लिए पर्याप्त, दूसरी तरफ छह साल से लंबी विचाराधीन कैद
- उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने बढ़ाए संवैधानिक सवाल
- ‘बेल नियम, जेल अपवाद’ का सिद्धांत और यूएपीए की कठोर जमानत व्यवस्था आमने-सामने
- मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट की दूसरी पीठ ने भी लंबे कारावास और देरी पर जताई गंभीर चिंता
- आरोप, मीडिया नैरेटिव और अदालत फैसले से पहले ही दोषी ठहराने की प्रवृत्ति खतरनाक?
- वीडियो से लेकर भाषण तक आरोपों की गंभीरता का फैसला अदालत करेगी, सोशल मीडिया नहीं
- लोकतंत्र में असली कसौटी सरकार नहीं, कानून की समान कसौटी और नागरिक की स्वतंत्रता
नई दिल्ली। स्वतंत्र भारद्वाज की गिरफ्तारी और कुछ ही दिनों बाद मिली अंतरिम जमानत ने भारत में जमानत व्यवस्था, विचाराधीन कैद और कानून के समान अनुप्रयोग पर फिर बहस छेड़ दी है। 15 सितंबर 2026 को पटियाला हाउस कोर्ट ने जंतर-मंतर पर हुई कथित मारपीट के मामले में स्वतंत्र भारद्वाज को तीन सप्ताह की अंतरिम जमानत दी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार अदालत ने उनकी लगभग दस दिन की हिरासत और इस अवधि में आत्मचिंतन का अवसर मिलने का उल्लेख किया। दूसरी ओर उमर खालिद और शरजील इमाम 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगा मामले की कथित बड़ी साजिश से जुड़े यूएपीए मुकदमे में लंबे समय से जेल में हैं। जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने दोनों की जमानत याचिका खारिज की थी और उन्हें संरक्षित गवाहों की गवाही पूरी होने या एक वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद फिर जमानत मांगने की अनुमति दी थी। जुलाई में निचली अदालत ने इसी आधार पर उनकी जमानत याचिकाएं सुनने से इनकार किया। मगर कहानी यहीं खत्म नहीं होती। मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट की दूसरी पीठ ने उसी जमानत व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा था कि लंबे कारावास और मुकदमे में देरी की स्थिति में व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संवैधानिक संरक्षण महत्वपूर्ण है। यही वह विरोधाभास है जिस पर सवाल उठना चाहिए क्या अलग-अलग मामलों में अलग कानूनी कसौटियां इसलिए हैं क्योंकि कानून अलग है, या न्याय की गति और जमानत की संवेदनशीलता में कहीं असमानता पैदा हो रही है?

दस दिन की हिरासत से छह साल की कैद तक सवाल सिर्फ जमानत का नहीं
स्वतंत्र भारद्वाज मामले में अदालत से मिली राहत को लेकर सार्वजनिक बहस इसलिए तेज हुई क्योंकि गिरफ्तारी के कुछ ही दिनों बाद उन्हें अंतरिम जमानत मिल गई। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार यह मामला जंतर-मंतर पर एक प्रदर्शन के दौरान कथित मारपीट से जुड़ा है और अदालत ने 15 सितंबर को तीन सप्ताह की अंतरिम जमानत दी। भारद्वाज की ओर से अदालत में शिकायतकर्ता द्वारा उन पर हमला किए जाने का दावा भी किया गया था, जबकि शिकायतकर्ता पक्ष ने मारपीट और जातिसूचक टिप्पणी के आरोप लगाए। यानी मामला अभी आरोप और बचाव के स्तर पर है, अंतिम दोषसिद्धि का नहीं। पत्रकारिता की पहली जिम्मेदारी होती है कि आरोप को अपराध सिद्धि न बनाया जाए।
सोशल मीडिया पर स्वतंत्र भारद्वाज के नाम से प्रसारित कई वीडियो को लेकर गंभीर दावे किए जा रहे हैं। यदि उन वीडियो की प्रामाणिकता और संदर्भ न्यायिक रिकॉर्ड में स्थापित होते हैं तो उनका कानूनी महत्व अलग होगा। लेकिन केवल वायरल वीडियो के आधार पर किसी व्यक्ति को अपराधी घोषित करना भी उसी न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करेगा जिसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। मुद्दा यह नहीं कि किसी आरोपी के प्रति सहानुभूति दिखाई जाए। मुद्दा यह है कि एक ही लोकतांत्रिक व्यवस्था में आरोपी के अधिकारों की कसौटी व्यक्ति की विचारधारा देखकर बदलनी नहीं चाहिए।
‘बेल नियम, जेल अपवाद’ लेकिन हर कानून की अपनी कसौटी
भारतीय आपराधिक न्यायशास्त्र में ‘बेल नियम है और जेल अपवाद’ का सिद्धांत स्थापित है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में यह बात बार-बार सामने आई है कि मुकदमे से पहले लंबे समय तक जेल में रखना स्वयं में गंभीर संवैधानिक प्रश्न पैदा कर सकता है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी फर्क भी है। यूएपीए सामान्य आपराधिक कानून जैसा नहीं है। इसकी धारा 43डी(5) जमानत के लिए कठोर मानदंड निर्धारित करती है। न्यायिक फैसलों में यह भी कहा गया है कि यूएपीए मामलों में सामान्य ‘बेल नियम, जेल अपवाद’ सिद्धांत उसी तरह लागू नहीं होता और अदालत को आरोपों तथा उपलब्ध सामग्री की एक विशेष कसौटी पर जांच करनी होती है। इसलिए स्वतंत्र भारद्वाज के मामले को उमर खालिद या शरजील इमाम के मामले से सीधे जोड़ते समय कानून की धाराओं, आरोपों और मुकदमों की प्रकृति को नजरअंदाज करना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि छह वर्ष की विचाराधीन कैद पर सवाल नहीं उठाए जा सकते।
उठाए जाने चाहिए।
छह साल की कैद और अभी तक अंतिम फैसला नहीं
उमर खालिद 13 सितंबर 2020 से हिरासत में हैं। 2026 में उनके छह साल पूरे होने पर उनकी लंबी विचाराधीन कैद को लेकर सार्वजनिक बहस फिर तेज हुई। शरजील इमाम भी लगभग छह वर्ष से इस मामले में जेल में रहे हैं। मार्च 2026 में उन्हें पारिवारिक कारणों से दस दिन की अंतरिम जमानत मिली थी, लेकिन यह स्थायी जमानत नहीं थी। जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत नहीं दी। उसी आदेश में पांच अन्य आरोपियों गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत दी गई। अदालत ने खालिद और इमाम के मामले में कहा कि वे संरक्षित गवाहों की गवाही पूरी होने या एक वर्ष पूरा होने के बाद, जो पहले हो, फिर जमानत मांग सकते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि अदालत ने उनके अपराध को अंतिम रूप से सिद्ध कर दिया। जमानत का फैसला दोषसिद्धि का फैसला नहीं होता। यही फर्क सार्वजनिक विमर्श में सबसे ज्यादा खोता जा रहा है।
मई में सुप्रीम कोर्ट की दूसरी पीठ ने उठाए गंभीर सवाल
मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट की दूसरी पीठ ने एक अन्य यूएपीए मामले में लंबे कारावास और मुकदमे में देरी के संदर्भ में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत अस्वीकार करने वाले जनवरी के आदेश पर गंभीर आपत्ति दर्ज की। पीठ ने के.ए.नजीब के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि लंबे समय तक विचाराधीन कैद और मुकदमे में अत्यधिक देरी संविधान के अनुच्छेद 21 के प्रश्न पैदा कर सकती है। रिपोर्ट के अनुसार पीठ ने जनवरी के आदेश को लेकर गंभीर रिजर्वेशन व्यक्त किए। क्योंकि इससे बहस का रास्ता ‘अदालत सरकार के इशारे पर चलती है’ जैसे अप्रमाणित आरोप से हटकर उस असली संवैधानिक प्रश्न की ओर जाता है कि क्या कठोर कानून के तहत भी विचाराधीन कैद की कोई संवैधानिक सीमा होनी चाहिए?
मीडिया का ट्रायल लोकतंत्र के लिए असली खतरा
किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी के बाद मीडिया में आरोपों का प्रसारण शुरू होता है। फिर सोशल मीडिया उन आरोपों को हजारों पोस्ट में बदल देता है। फिर जनता के एक हिस्से में यह धारणा बन जाती है कि गिरफ्तारी मतलब अपराध सिद्ध। यही लोकतंत्र का सबसे खतरनाक शॉर्टकट शुरू होता है। गिरफ्तारी अपराध सिद्ध नहीं करती, चार्जशीट दोषसिद्धि नहीं है, जमानत अपराध मुक्ति नहीं है और जमानत से इनकार दोषसिद्धि नहीं है। इन चारों बातों को अलग-अलग रखना ही न्यायिक पत्रकारिता की बुनियादी जिम्मेदारी है। स्वतंत्र भारद्वाज के मामले में भी यही कसौटी लागू होनी चाहिए और उमर खालिद, शरजील इमाम सहित किसी भी आरोपी के मामले में भी।
शरजील इमाम का ‘चिकन नेक’ तर्क भाषण को संदर्भ से काटना कितना उचित?
शरजील इमाम के मामले में उनके भाषणों और कथित बड़ी साजिश के आरोपों को लेकर लंबे समय से विवाद है। उनके समर्थक उनके भाषणों के उस हिस्से पर जोर देते हैं जिसमें ‘चिकन नेक’ यानी सिलीगुड़ी कॉरिडोर के जरिए उत्तर-पूर्व को शेष भारत से जोड़ने वाले संकरे भूभाग की नाकेबंदी की बात का उल्लेख है। दूसरी तरफ अभियोजन का मामला इससे कहीं व्यापक है। जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उपलब्ध सामग्री को देखते हुए उनके खिलाफ प्रथमदृष्टया गंभीर भूमिका का उल्लेख किया और इसी आधार पर जमानत से इनकार किया। इसलिए केवल एक वाक्य को पूरे मुकदमे का पर्याय बना देना भी तथ्यात्मक रूप से अधूरा होगा। पूरा भाषण क्या था, उसका संदर्भ क्या था, अभियोजन के पास कौन-सा साक्ष्य है और अदालत उस साक्ष्य का परीक्षण किस स्तर पर कर रही है। उमर खालिद के मामले में भी यही कसौटी होनी चाहिए। उमर खालिद के समर्थक उनके भाषणों को लोकतांत्रिक, अहिंसक और गांधीवादी परंपरा से जोड़ते रहे हैं। अभियोजन पक्ष का मामला इसके विपरीत दिल्ली दंगों की कथित बड़ी साजिश में उनकी भूमिका से संबंधित है। जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन सामग्री के आधार पर उनके खिलाफ प्रथमदृष्टया भूमिका का उल्लेख करते हुए जमानत नहीं दी। अदालत के सामने मामला केवल यह नहीं है कि किसी भाषण में हिंसा की सीधी अपील की गई थी या नहीं। मामला कथित व्यापक साजिश, संगठनात्मक भूमिका और उपलब्ध साक्ष्य की न्यायिक व्याख्या से जुड़ा है। इसलिए किसी भी तरफ से ‘सिर्फ भाषण था’ या ‘सिर्फ आरोप ही अपराध है’। राजस्थान के गुर्जर आंदोलन से तुलना लेकिन संदर्भ के साथ
रेलवे ट्रैक और सड़क रोकना आंदोलनों में कई बार हुआ है। गुर्जर आरक्षण आंदोलनों में भी रेलवे यातायात लंबे समय तक प्रभावित हुआ था। लेकिन किसी आंदोलन में रेल रोकना और किसी दूसरे मामले में किसी व्यक्ति द्वारा कथित रूप से रेल या सड़क अवरोध की रणनीति की बात करना कानूनी रूप से स्वतः समान नहीं हो जाता।
‘लोकतंत्र अब सिर्फ सरकार के डंडे से चलता है’
यह एक तीखा राजनीतिक आरोप हो सकता है। लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा सरकार की ताकत से ज्यादा संस्थाओं की स्वतंत्रता में होती है। विधान पालिका कानून बनाती है। कार्यपालिका उसे लागू करती है। पुलिस जांच करती है। अदालतें न्यायिक परीक्षण करती हैं और मीडिया जनता को सूचना देती है। इनमें से किसी एक संस्था के कमजोर होने पर लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ता है। इसलिए सवाल यह नहीं कि सरकार कौन है। सवाल यह है कि सरकार कोई भी हो क्या उसके सामने कानून खड़ा रह सकता है?
* स्वतंत्र भारद्वाज को 15 सितंबर 2026 को पटियाला हाउस कोर्ट से तीन सप्ताह की अंतरिम जमानत मिली।
* मामला जंतर-मंतर पर कथित मारपीट से संबंधित है; आरोपों और बचाव दोनों पक्षों की दलीलें अदालत के सामने हैं।
* उमर खालिद 13 सितंबर 2020 से हिरासत में हैं और 2026 में उनकी छह वर्ष की हिरासत पूरी हुई।
* शरजील इमाम भी करीब छह वर्ष से संबंधित यूएपीए मामले में विचाराधीन कैद में रहे हैं; मार्च 2026 में उन्हें 10 दिन की अंतरिम जमानत मिली थी।
* जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की नियमित जमानत याचिकाएं खारिज की।
* मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट की दूसरी पीठ ने लंबी विचाराधीन कैद और मुकदमे में देरी के संदर्भ में जनवरी के आदेश पर गंभीर आपत्तियां दर्ज की।
* ‘बेल नियम, जेल अपवाद’ महत्वपूर्ण सिद्धांत है, लेकिन यूएपीए में जमानत के लिए विशेष और कठोर वैधानिक प्रावधान लागू होते हैं।




