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मोदी का देश बेचवा किरदार, इनके कुशल संरक्षण में आरबीआई ने देश का सोना बेचा बारम्बार

आजाद भारत में पहली बार- रुपए को बचाने रिजर्व बैंक ने बेचा सोना, मचा बवाल तो बनाया बहाना; फिर भी सच नहीं छिपा सका सरकार का आंकड़ा पुराना

  •  1.14 लाख करोड़ का सोना रिजर्व बैंक ने चोरी-छिपे बेच डाला
  •  आम जनता से इसलिए छिपाया, क्योंकि अमेरिका ने बॉन्ड बेचने से रोक दिया
  •  भारत का चालू खाते का घाटा 6 गुना बढ़ा, तेल संकट ने डाला आग में घी
  •  राहुल गांधी बोले- यह भारत में आर्थिक सुनामी का संकेत
  •  जब भी तेल, महंगाई और चालू खाते का घाटा बढ़ा, सरकार गिर गई

नई दिल्ली। डॉलर के मुकाबले रुपए को 100 का आंकड़ा पार होने से रोकने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक को 1.14 लाख करोड़ का सोना बेचना पड़ा है। इसका खुलासा ब्लूमर्ब नाक की एक विदेशी वेबसाइट ने किया। भारत की आजादी के बाद पहली बार देश में सोना बेचने की नौबत का जैसे ही लोगों को पता चला, बवाल मच गया। इसे संभालने के लिए अगले ही दिन केंद्र की मोदी सरकार के पत्र सूचना विभाग ने ब्लूमबर्ग की जानकारी को झूठा बताया। लेकिन थोड़ी ही देर के बाद रिजर्व बैंक के ही 22 मई को खत्म हुए सप्ताह के आंकड़े सामने आए, जिसमें देश के 880 टन स्वर्ण भंडार में 20 से 30 टन की कमी आंकी गई। इससे पहले पीआईबी ने जो आंकड़ा जारी किया था, वह अप्रैल 2026 का था।

अब सोशल मीडिया पर लोग पीएम नरेंद्र मोदी के उस दावे को सोना बेचने से जोड़ रहे हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि चाहे कुछ भी हो जाए, मैं देश नहीं बिकने दूंगा। इससे पहले 1991 में आए आर्थिक संकट के बाद भारत की तत्कालीन नरसिंह राव सरकार को देश का सोना गिरवी रखना पड़ा था। अब लोग सोशल मीडिया पर कह रहे हैं कि गिरवी रखा सोना तो वापस आ गया, लेकिन भाजपा की केंद्र सरकार ने तो देश का सोना ही बेच दिया। कई लोग इसे भारत की आर्थिक बदहाली से जोड़कर देख रहे हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने तो देश के हालात को आर्थिक सुनामी की आशंका से जोड़ दिया है।

मोदी सरकार ने छिपाया, दुनिया ने दिखाया

ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स की रिपोर्ट 2 जून की है। ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स के वरिष्ठ भारत अर्थशास्त्री अभिषेक गुप्ता के अनुसार, रिजर्व बैंक ने 22 मई को समाप्त हुए दो हफ्तों के भीतर लगभग 12 अरब डॉलर (करीब 1.14 लाख करोड़ रुपये) मूल्य का सोना बेचा है। इसी अवधि के दौरान केंद्रीय बैंक ने 7.5 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां खरीदीं। रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार द्वारा कीमती धातुओं पर आयात शुल्क बढ़ाए जाने के बावजूद सोने के भंडार के मूल्य में यह गिरावट देखी गई। सामान्य परिस्थितियों में आयात शुल्क बढ़ने से बैंक के बुलियन और डॉलर की वैल्यू बढ़नी चाहिए थी। ऐसा न होना इस बात का पुख्ता संकेत है कि रिजर्व बैंक ने सोने की बिक्री की है। रिपोर्ट के अनुसार, मार्च के अंत तक आरबीआई के पास 880.52 मीट्रिक टन सोना था, जिसमें से 77% घरेलू तिजोरियों में रखा गया था। छह महीने पहले तक केवल 66% सोना ही भारत में था। बाकी का विदेशी हिस्सा ‘बैंक ऑफ इंग्लैंड’ और ‘बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स’ के पास सुरक्षित है। हालांकि, रिजर्व बैंक ने सोना बेचने की जानकारी भारत की जनता से इसलिए छिपाई, क्योंकि अमेरिका ने अपने ट्रेजरी में रखे भारत के बॉन्ड्स को बेचने पर रोक लगा रखी है। अमेरिका की इस रोक को भारत के प्रति ब्लैकमेल वाला बर्ताव माना जा सकता है, क्योंकि रिजर्व बैंक के पास सोना बेचने के बजाय अमेरिका के बॉन्ड को बेचने का अच्छा और सुरक्षित विकल्प था।

 

खतरे का संकेत: 6 गुना बढ़ा घाटा

प्रत्यक्ष विदेशी निवेशकों के शेयर बाजार से लगातार निकासी और विदेशी निवेश की कमी के कारण भारत का चालू खाते का घाटा साल 2023-24 के मुकाबले अब 6 गुना बढ़ गया है। यह भारत की इकोनमी के लिए खतरे का संकेत है, क्योंकि 2025-26 में चालू खाते का घाटा अब करीब 31 बिलियन डॉलर के आसपास है। ऊपर से खाड़ी में तेल और गैस के संकट के साथ ही हॉर्मूज के पूरी तरह से नहीं खुलने और सप्लाई लाइन में रुकावट से मामला और ज्यादा बिगड़ गया है। भारत को अब अमेरिका और वेनेजुएला जैसे देशों से महंगा पेट्रोल-डीजल खरीदना पड़ रहा है। इससे देश की विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ा है। यही नहीं, डॉलर के मुकाबले गिरते रुपए ने भी केंद्र सरकार के कान अब जाकर खड़े कर दिए हैं। मशहूर अर्थशास्त्री और आईएमएफ के पूर्व कार्यकारी निदेशक सुरजीत भल्ला ने हाल ही में भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति, जीडीपी ग्रोथ और रुपये की स्थिति को लेकर कई महत्वपूर्ण और बेबाक बातें कही हैं। आमतौर पर माना जा रहा था कि फरवरी 2026 से शुरू हुए पश्चिम एशिया के सैन्य टकराव और तेल की बढ़ती कीमतों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार सुस्त हुई है। लेकिन सुरजीत भल्ला ने इसे खारिज करते हुए कहा: अर्थव्यवस्था में सुस्ती का मुख्य कारण वैश्विक संकट नहीं, बल्कि देश के भीतर निजी निवेश की कमी है। निजी क्षेत्र का निवेश बढ़ने के बजाय नीचे गया है।

सियासी बदलाव लाता है तेल का हर झटका

अंतरराष्ट्रीय बाजार में जब भी तेल की कीमतें बढ़ी हैं, तब-तब आर्थिक संकट पैदा हुआ है। इस आर्थिक संकट से भारत में राजनीतिक बदलाव आए हैं। पहली बार 1973 में यह हुआ, जब कच्चे तेल की कीमत में चौगनी बढ़ोतरी हुई और कीमतें 3 डॉलर से 12 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई थी। इससे भारत में महंगाई का आंकड़ा 30% तक पहुंच गया। विपक्ष ने तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी को बचाव की मुद्रा अपनाने पर मजबूर कर दिया था। तेल के दाम में इस इजाफे ने तत्कालीन कांग्रेस सरकार को भारत में आपातकाल लगाने पर मजबूर कर दिया था। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी शायद केंद्र सरकार की उन्हीं मजबूरियों की तरफ याद दिला रहे हैं। तेल ने दूसरा झटका 1979 में दिया, जब उसकी कीमत दोगुनी बढ़कर 40 डॉलर प्रति बैरल हो गई। सदमे से ग्रस्त भारतीय अर्थव्यवस्था के आकार में 5 फीसदी की सिकुड़न आ गई। नताजा- तत्कालीन मोराराजी देसाई की सरकार गिर गई। इंदिरा गांधी फिर से सत्ता में आ गईं। तेल ने तीसरा झटका 1990 में दिया, जब सद्दाम हुसेन ने कुवैत पर हमला कर दिया था। यह केवल छह महीने तक रहा। फिर भी इसने विदेशी मुद्रा का संकट पैदा कर दिया। इसका असर सकारात्मक रहा। तब की नरसिंहा राव सरकार ने व्यापक आर्थिक सुधार लागू किए। 2012 में लगे झटके ने तेल की कीमत को 125 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंचा दिया और यह 2014 तक 100 डॉलर से ऊपर बनी रही। इसके कारण चालू खाता घाटा तेजी से बढ़ा और रुपया ‘पांच कमजोर मुद्राओं’ में शामिल हो गया। इसने पहले से ही परेशान मनमोहन सिंह सरकार को लगभग डुबे दिया और नरेंद्र मोदी सरकार को सत्ता में बिठा दिया।

महंगाई समस्या नहीं, चाहे डॉलर 100 का हो जाए

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य डॉ. शमिका रवि ने देश की अर्थव्यवस्था, महंगाई और रुपये की कीमत को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। डॉ. शमिका रवि ने कहा कि भारत में फिलहाल महंगाई कोई समस्या नहीं है। इसी के साथ रुपये और डॉलर के समीकरण पर बात करते हुए उन्होंने साफ लहजे में कहा, अगर रुपया एक डॉलर के मुकाबले 100 के स्तर पर भी पहुंच जाए, तो क्या होगा? 100 सिर्फ एक संख्या ही तो है। उनके मुताबिक, बाजार को अपनी गति से चलने देना चाहिए और मुद्रा के उतार-चढ़ाव को सामान्य आर्थिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोगों को 100 के मनोवैज्ञानिक आंकड़े से डरने की जरूरत नहीं है। यह केवल एक संख्या है। उनका मानना है कि वैश्विक बाजार के समीकरणों के तहत करेंसी का ऊपर-नीचे होना स्वाभाविक है और इससे देश की बुनियादी आर्थिक मजबूती पर कोई सीधा नकारात्मक असर नहीं पड़ता।

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