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मोदी स्व.नेहरू पर झूठ बोलते है फटाक हैसियत नही है इनकी छटाक

रिकॉर्ड नहीं, रिपोर्ट कार्ड दिखाइए प्रधानमंत्री जी!

  • नेहरू से आगे निकलने की राजनीति या उपलब्धियों से बचने की रणनीति?
  • लोकतंत्र, मीडिया, रोजगार और विदेश नीति पर उठे तीखे सवाल
  • प्रधानमंत्री के कार्यकाल की अवधि बनाम उपलब्धियों पर नई बहस
  • नेहरू-मोदी तुलना को लेकर तथ्यात्मक और वैचारिक प्रश्न
  • लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर गंभीर चिंताएं
  • प्रेस स्वतंत्रता, रोजगार और शिक्षा व्यवस्था पर सवाल
  • विदेश नीति की प्रभावशीलता को लेकर उठे प्रश्न कितने साल सत्ता में रहे नहीं, देश को क्या दिया हो बहस का आधार

वाराणसी। देश की राजनीति में इन दिनों एक नया विमर्श खड़ा किया जा रहा है। दावा किया जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शीघ्र ही देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के लंबे प्रधानमंत्रित्व काल के रिकॉर्ड के करीब पहुंच जाएंगे या उसे पीछे छोड़ देंगे। इस संभावना को लेकर सत्ता समर्थक हलकों में उत्सव का माहौल बनाया जा रहा है। विभिन्न मंचों पर इसे प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता और राजनीतिक स्वीकार्यता का प्रमाण बताया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी प्रधानमंत्री की महानता का मापदंड केवल यह होना चाहिए कि वह कितने वर्षों तक सत्ता में बना रहा? राजनीतिक विश्लेषकों और लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्षधर बुद्धिजीवियों का मानना है कि किसी भी प्रधानमंत्री का मूल्यांकन उसके कार्यकाल की लंबाई से नहीं बल्कि उसके शासन की गुणवत्ता, नीतिगत उपलब्धियों, लोकतांत्रिक प्रतिबद्धताओं और देश को दी गई दिशा से किया जाना चाहिए। इसी संदर्भ में वरिष्ठ सामाजिक-राजनीतिक चिंतक संजीव शुक्ल ने प्रधानमंत्री मोदी और पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की तुलना को लेकर कई बुनियादी प्रश्न खड़े किए हैं।
शुक्ल का कहना है कि सबसे पहले तथ्यों को स्पष्ट किया जाना चाहिए। जवाहरलाल नेहरू 15 अगस्त 1947 से 27 मई 1964 तक लगभग 16 वर्ष 286 दिन प्रधानमंत्री रहे। वहीं नरेंद्र मोदी 26 मई 2014 से जून 2026 तक लगभग 12 वर्ष से अधिक समय से प्रधानमंत्री पद पर हैं। ऐसे में केवल राजनीतिक प्रचार के लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करना लोकतांत्रिक विमर्श के लिए उचित नहीं कहा जा सकता। वे कहते हैं कि यदि तुलना करनी ही है तो यह देखना चाहिए कि किस प्रधानमंत्री ने देश के आधारभूत ढांचे के निर्माण में कितना योगदान दिया, किसने लोकतांत्रिक संस्थाओं को कितना मजबूत किया, किसने शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान, उद्योग और रोजगार के क्षेत्र में कितनी स्थायी उपलब्धियां हासिल कीं तथा किसके शासनकाल में नागरिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की स्थिति कैसी रही। यही वह बिंदु है जहां बहस सत्ता में बने रहने की अवधि से हटकर शासन की गुणवत्ता पर केंद्रित हो जाती है। क्या लोकतंत्र में असहमति को सम्मान मिला या विरोध की आवाजों को दबाने का प्रयास हुआ? क्या संसद संवाद का मंच बनी या संख्या बल के आधार पर निर्णय थोपे गए? क्या संवैधानिक संस्थाएं स्वतंत्र रहीं या उन पर राजनीतिक प्रभाव बढ़ा? क्या मीडिया सत्ता से सवाल पूछने के लिए स्वतंत्र रहा या उसका बड़ा हिस्सा प्रचार तंत्र में बदल गया?
इन प्रश्नों का उत्तर ही किसी भी प्रधानमंत्री की वास्तविक राजनीतिक विरासत तय करेगा। इतिहास में नेताओं का मूल्यांकन उनकी कुर्सी की अवधि से नहीं बल्कि उनके कार्यों के प्रभाव से होता है। यही कारण है कि अल्पकालिक प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री आज भी अपनी सादगी, ईमानदारी और निर्णायक नेतृत्व के कारण सम्मानपूर्वक याद किए जाते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि सरकार अपनी उपलब्धियों को लेकर आश्वस्त है तो उसे खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस, स्वतंत्र मीडिया और आलोचनात्मक विमर्श से भयभीत नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र में सवालों से बचना नहीं बल्कि उनका जवाब देना ही नेतृत्व की सबसे बड़ी परीक्षा होती है।
यही कारण है कि आज बहस इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि कौन प्रधानमंत्री कितने दिन सत्ता में रहा, बल्कि इस पर होनी चाहिए कि उसके कार्यकाल में लोकतंत्र कितना मजबूत हुआ, समाज कितना संगठित हुआ, युवाओं को कितना रोजगार मिला, शिक्षा और स्वास्थ्य कितने सुलभ हुए, और दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा कितनी बढ़ी। राजनीतिक इतिहास का अंतिम फैसला प्रचार अभियानों से नहीं बल्कि उपलब्धियों, नीतियों और जनता के जीवन पर पड़े प्रभावों से लिखा जाता है। इसलिए रिकॉर्ड बनाने की होड़ से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है वह रिपोर्ट कार्ड, जिसे आने वाली पीढ़ियां इतिहास के पन्नों में पढ़ेंगी।

अवधि नहीं, उपलब्धियां तय करेंगी इतिहास

संजीव शुक्ल का तर्क है कि किसी भी प्रधानमंत्री का मूल्यांकन सत्ता में बिताए वर्षों से नहीं बल्कि उसके शासन के चरित्र से होना चाहिए। उनका कहना है कि यदि केवल अवधि ही महानता का पैमाना होती तो लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेताओं का नाम इतिहास में कहीं पीछे छूट जाता। लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। शास्त्री आज भी अपने संक्षिप्त कार्यकाल के बावजूद राष्ट्रीय स्मृति में सम्मानित हैं।

लोकतंत्र पर सबसे बड़ा सवाल

वर्तमान दौर में लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े हुए हैं। संसद में विपक्षी सांसदों के निलंबन, विधेयकों को सीमित बहस के बीच पारित करने तथा संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर उठते सवालों को लोकतांत्रिक स्वास्थ्य के संकेतक के रूप में देखा जा रहा है।

प्रेस की आजादी पर बहस

किसी भी लोकतंत्र का वास्तविक चेहरा उसकी प्रेस की स्वतंत्रता से पहचाना जाता है। यदि मीडिया सवाल पूछने से कतराने लगे और सत्ता के समक्ष आलोचनात्मक भूमिका निभाने में असफल हो जाए तो लोकतांत्रिक संतुलन कमजोर पड़ता है। उनका तर्क है कि प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का वास्तविक प्रमाण खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस और कठिन सवालों का सामना करने की क्षमता में दिखाई देता है।

रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य का प्रश्न

लेख में बेरोजगारी, शिक्षा के बढ़ते बाजारीकरण तथा स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता को भी प्रमुख मुद्दा बताया गया है। सवाल उठाया गया है कि क्या विकास केवल आंकड़ों और विज्ञापनों में दिखाई दे रहा है या आम नागरिक के जीवन स्तर में भी उसका प्रभाव महसूस हो रहा है।

विदेश नीति पर भी तीखा प्रहार

विदेश नीति के मोर्चे पर भी वर्तमान सरकार की कार्यशैली पर प्रश्न उठाए गए हैं। लेख में दावा किया गया है कि नेहरू काल की गुटनिरपेक्ष नीति विश्व राजनीति में भारत की अलग पहचान बनाती थी, जबकि वर्तमान समय में पड़ोसी देशों के साथ संबंधों और अंतरराष्ट्रीय समर्थन की स्थिति पर बहस हो रही है।

असली सवाल अभी बाकी है

अंततः संजीव शुक्ल का निष्कर्ष स्पष्ट है कि इतिहास इस बात से प्रभावित नहीं होगा कि कोई नेता कितने वर्षों तक प्रधानमंत्री रहा। इतिहास यह देखेगा कि उसके शासनकाल में लोकतंत्र मजबूत हुआ या कमजोर, समाज एकजुट हुआ या विभाजित, संस्थाएं सशक्त हुईं या निर्भर, और देश आगे बढ़ा या केवल प्रचार आगे बढ़ा। राजनीति में रिकॉर्ड बन सकते हैं, लेकिन विरासत केवल काम से बनती है। इसलिए देश के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है सत्ता की अवधि महत्वपूर्ण है या शासन की गुणवत्ता?

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