योगी सरकार ने मेडिकल के छात्रों के साथ किया सौतेला व्यवहार,200 बच्चों का डॉक्टर बनने का सपना तोड़ दिया बरखुरदार

- आरक्षण विवाद में काउंसलिंग रद्द,पिट गयी योगी की भद्द
- आरक्षण का विवाद, डॉक्टर बनने का सपना संकट में चार मेडिकल कॉलेजों के बच्चों पर दोहरी मार
- दाखिला मिला, फीस जमा हुई, प्रमाणपत्र जमा हुए अब फिर काउंसलिंग की चक्की में छात्र
- 190-200 एससी बच्चों की सीट पर संकट, सवाल बच्चों की क्या गलती थी?
- पहले सीट आवंटन रद्द, अब चॉइस फिलिंग भी अटकी अभ्यर्थी अधर में
- सरकारी फैसले की कीमत बच्चे क्यों चुकाएं? कॉलेज, फीस और प्रमाणपत्र को लेकर बढ़ी बेचैनी
- कानून की लड़ाई के बीच पिसता भविष्य सरकार बताए, पहले से दाखिल बच्चों का क्या होगा?
उत्तर प्रदेश के चार सरकारी मेडिकल कॉलेजों की आरक्षण व्यवस्था को लेकर शुरू हुआ कानूनी विवाद अब उन विद्यार्थियों के भविष्य पर भारी पड़ता दिखाई दे रहा है, जिन्होंने नीट में सफलता के बाद मेडिकल कॉलेज में दाखिला पा लिया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अंबेडकरनगर, कन्नौज, जालौन और सहारनपुर मेडिकल कॉलेजों में करीब 91 प्रतिशत आरक्षण व्यवस्था पर रोक लगाते हुए सामान्य सरकारी मेडिकल कॉलेजों में लागू आरक्षण व्यवस्था के अनुसार काउंसलिंग आगे बढ़ाने का निर्देश दिया। अदालत ने एससी के लिए 21, एसटी के लिए 2 और ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण के आधार पर प्रक्रिया जारी रखने की अनुमति दी। इसके बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग ने पहले राउंड में हुए सीट आवंटन को रद्द कर नए सिरे से काउंसलिंग की प्रक्रिया शुरू कर दी। रिपोर्टों के मुताबिक करीब 34 हजार अभ्यर्थियों ने पहले राउंड के लिए पंजीकरण कराया था। अब पहले से मिली सीट दोबारा मिलना सुनिश्चित नहीं है और अभ्यर्थियों को फिर से चॉइस फिलिंग करनी होगी। सवाल उन विद्यार्थियों को लेकर है जिन्हें विवादित चार कॉलेजों में पहले ही सीट मिल चुकी थी। 2025 की न्यायिक कार्यवाही में भी अदालत के सामने यह तथ्य आया था कि इन चार कॉलेजों में करीब 190-200 एससी विद्यार्थियों को प्रवेश मिला था और काउंसलिंग बदलने से उनके सामने गंभीर व्यवधान पैदा हो सकता है। यही वह बिंदु है जहां कानून, आरक्षण व्यवस्था और प्रशासनिक प्रक्रिया के बीच सबसे ज्यादा पिसता हुआ चेहरा विद्यार्थी का नजर आता है। अदालत का आदेश आरक्षण व्यवस्था पर है, लेकिन उसकी प्रशासनिक परिणति बच्चों की पढ़ाई, फीस, मूल प्रमाणपत्र और कॉलेज बदलने की अनिश्चितता के रूप में सामने आ रही है।

आरक्षण विवाद से शुरू हुआ मामला, अब बच्चों के भविष्य पर संकट
चार सरकारी मेडिकल कॉलेज अंबेडकरनगर, कन्नौज, जालौन और सहारनपुर लंबे समय से विशेष आरक्षण व्यवस्था को लेकर कानूनी विवाद में हैं। ये संस्थान अनुसूचित जाति विशेष घटक योजना से जुड़े रहे हैं और इनके लिए अलग सीट व्यवस्था लागू की जाती रही है। 2025 की न्यायिक कार्यवाही में भी इन संस्थानों की आरक्षण व्यवस्था पर सवाल उठा था। 2026-27 के दाखिले में विवाद फिर सामने आया। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि इन कॉलेजों में आरक्षण का कुल अनुपात करीब 91 प्रतिशत तक पहुंच गया, जबकि राज्य के वैधानिक आरक्षण प्रावधानों के अनुरूप यह व्यवस्था नहीं थी। हाईकोर्ट ने 91 प्रतिशत वाली व्यवस्था पर रोक लगा दी। अदालत ने पूरी काउंसलिंग रोकने के बजाय सामान्य सरकारी मेडिकल कॉलेजों में लागू आरक्षण व्यवस्था के अनुसार प्रक्रिया आगे बढ़ाने की अनुमति दी। यानी एससी के लिए 21 प्रतिशत, एसटी के लिए 2 प्रतिशत और ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण के आधार पर प्रवेश प्रक्रिया चलनी थी। कानूनी दृष्टि से यह आदेश आरक्षण व्यवस्था को लेकर है, लेकिन असली परेशानी उन विद्यार्थियों की है जिनकी जिंदगी में अदालत और सरकार के आदेश का अर्थ अचानक कॉलेज बदलना, दोबारा चॉइस भरना और फिर सीट मिलने का इंतजार बन गया।
पहले दाखिला, अब फिर काउंसलिंग बच्चे पूछ रहे, गलती किसकी?
पहले चरण में सीट आवंटन हुआ। बच्चों ने कॉलेज पाया। दस्तावेज जमा किए। फीस और अन्य औपचारिकताएं पूरी की। कई परिवारों ने यह मान लिया कि अब उनके बच्चे का डॉक्टर बनने का रास्ता साफ हो गया है। लेकिन आरक्षण विवाद के बाद पूरा पहला राउंड ही रद्द कर दिया गया। मिली जानकारी के अनुसार 7 सितंबर को जारी पहला सीट आवंटन निरस्त कर दिया गया और अब सभी पात्र अभ्यर्थियों को नई प्रक्रिया में दोबारा शामिल होना होगा। यहीं से छात्रों का सवाल शुरू होता है कि जिस विद्यार्थी को मेरिट और काउंसलिंग के आधार पर कॉलेज मिल चुका था, उसकी गलती क्या थी? यदि सीट मैट्रिक्स में प्रशासनिक या कानूनी समस्या थी तो उसका समाधान प्रक्रिया शुरू होने से पहले क्यों नहीं किया गया? यदि अदालत के आदेश के बाद सीटों का पुनर्विन्यास जरूरी था तो प्रवेश पा चुके विद्यार्थियों के लिए संक्रमण व्यवस्था क्यों नहीं बनाई गई?
190-200 एससी विद्यार्थियों की चिंता का सवाल
यह आंकड़ा हवा में पैदा नहीं हुआ। 2025 की न्यायिक कार्यवाही में राज्य की ओर से यह चिंता स्वयं दर्ज हुई थी कि चार कॉलेजों में करीब 190-200 एससी विद्यार्थी प्रवेश पा चुके थे और यदि व्यवस्था तत्काल बदली गई तो वे दूसरी सीटें छोड़ चुके होने के कारण मुश्किल में पड़ सकते हैं। आज वही आशंका नए रूप में सामने दिखाई दे रही है। विद्यार्थियों का कहना है कि उन्होंने मेडिकल कॉलेज इसलिए चुना क्योंकि उन्हें उस काउंसलिंग में वह सीट मिली थी। कई ने दूसरे विकल्प छोड़े होंगे। कई ने दूसरे कॉलेजों में उपलब्ध अवसर छोड़कर यहां प्रवेश लिया होगा। अब अगर पूरा राउंड ही रद्द हो गया और उन्हें फिर से चॉइस भरनी पड़ी, तो सवाल सिर्फ एक ऑनलाइन फॉर्म भरने का नहीं है।
क्या उन्हें वही कॉलेज मिलेगा, क्या उन्हें वही सीट मिलेगी, क्या उनका मूल दस्तावेज समय पर वापस होगा, क्या फीस की प्रक्रिया फिर से करनी होगी और अगर कॉलेज बदल गया तो दोबारा रिपोर्टिंग के लिए उनके पास पर्याप्त समय होगा। ये सवाल किसी सरकारी फाइल के नोटशीट वाले सवाल नहीं हैं। ये उन परिवारों के सवाल हैं जिन्होंने अपने बच्चों को डॉक्टर बनाने के लिए वर्षों मेहनत की है।
चॉइस फिलिंग रुकी तो बढ़ी बेचैनी
ताजा घटनाक्रम में पहले राउंड की काउंसलिंग को नए सिरे से कराने का निर्णय सामने आया है। आधिकारिक पोर्टल पर भी 2026 की यूजी काउंसलिंग से जुड़े नए नोटिस, सीट मैट्रिक्स और दूसरे चरण की प्रक्रिया संबंधी सूचनाएं लगातार अपडेट की जा रही हैं। मिली जानकारी के अनुसार नई प्रक्रिया में अभ्यर्थियों को फिर से चॉइस फिलिंग और लॉकिंग करनी होगी तथा पहले मिला कॉलेज दोबारा मिलने की कोई गारंटी नहीं होगी।
यानी जिस बच्चे ने पहले कॉलेज चुन लिया था, अब उसे उसी दौड़ में फिर खड़ा कर दिया गया है। यहां प्रशासन को सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि काउंसलिंग फिर होगी।
प्रश्न आरक्षण का ही नहीं, प्रशासनिक न्याय का
इस पूरे विवाद को केवल एससी बनाम सामान्य वर्ग की लड़ाई बनाना आसान है। लेकिन असली मुद्दा इससे बड़ा है। एक तरफ अदालत का आदेश है, जो आरक्षण व्यवस्था को वैधानिक सीमा के अनुरूप करने की बात करता है। दूसरी तरफ सरकार की जिम्मेदारी है कि वह अदालत के आदेश को लागू करते हुए विद्यार्थियों को अनावश्यक नुकसान से बचाए। दोनों बातें एक साथ संभव होनी चाहिए। अदालत ने काउंसलिंग पूरी तरह बंद करने का निर्देश नहीं दिया था। रिपोर्टों के अनुसार उसने संशोधित आरक्षण व्यवस्था के आधार पर प्रक्रिया जारी रखने की अनुमति दी थी। ऐसे में प्रशासन के सामने चुनौती यही थी कि कानूनी व्यवस्था भी लागू हो और पहले से प्रवेश पा चुके बच्चों का शैक्षणिक भविष्य भी सुरक्षित रहे। यही वह जगह है जहां सरकार से संवेदनशील और पारदर्शी व्यवस्था की अपेक्षा होती है।
किसी बच्चे ने आरक्षण नीति नहीं बनाई, किसी बच्चे ने सीट मैट्रिक्स तैयार नहीं किया, किसी बच्चे ने अदालत में याचिका नहीं दाखिल की। फिर उसके भविष्य को प्रशासनिक प्रयोगशाला क्यों बनाया जाए?
बच्चों के मानसिक तनाव का हिसाब कौन देगा?
काउंसलिंग की तारीख बदलना प्रशासन के लिए शायद एक आदेश हो सकता है। लेकिन विद्यार्थी के लिए इसका मतलब है फिर से पोर्टल खोलना, फिर से विकल्प भरना, फिर से कॉलेज की चिंता करना, फिर से परिवार के साथ बैठकर फैसला लेना और फिर से यह डर कि कहीं इस बार पिछली सीट भी हाथ से न निकल जाए। मेडिकल शिक्षा में एक साल का महत्व किसी से छिपा नहीं है। जिस बच्चे ने नीट की तैयारी में दो-तीन साल लगाए, जिस परिवार ने फीस और रहने-खाने की व्यवस्था की, जिस विद्यार्थी ने अपने सपनों का कॉलेज चुना उसे अचानक यह सुनना पड़े कि पहले मिला कॉलेज अब सुनिश्चित नहीं है, तो तनाव होना स्वाभाविक है। यदि किसी छात्र के मूल प्रमाणपत्र किसी संस्थान में जमा हैं तथा उसे दूसरे कॉलेज में रिपोर्ट करना पड़े, तो प्रशासन को स्पष्ट समय सीमा और दस्तावेज वापसी की व्यवस्था भी बतानी चाहिए। सरकार के लिए यह काउंसलिंग है, बच्चे के लिए यह उसका करियर है। यही फर्क प्रशासनिक फैसले लेते समय दिखाई देना चाहिए। आरक्षण व्यवस्था पर अदालत के आदेश का पालन होना चाहिए यह कानूनी प्रक्रिया का विषय है। लेकिन उसके साथ यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि पहले से प्रवेश पा चुके विद्यार्थियों को अनावश्यक शैक्षणिक नुकसान न हो।
सरकार यदि नए सिरे से काउंसलिंग करा रही है तो उसे सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि पहले प्रवेश पा चुके विद्यार्थियों का क्या होगा? उनकी पुरानी सीटों का क्या होगा? क्या उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी, जमा मूल प्रमाणपत्र कब और कैसे लौटाए जाएंगे, फीस वापसी अथवा समायोजन की प्रक्रिया क्या होगी? जिन विद्यार्थियों को नया कॉलेज मिलेगा, उन्हें रिपोर्टिंग के लिए कितना समय मिलेगा।
* चार मेडिकल कॉलेजों की आरक्षण व्यवस्था पर हाईकोर्ट की रोक
* पहले राउंड का सीट आवंटन रद्द, हजारों छात्रों पर असर
* पहले से सीट पा चुके बच्चों के सामने फिर वही काउंसलिंग संकट
* एससी, एसटी छात्रों को करीब 180-200 सीटों के नुकसान की आशंका
* चॉइस फिलिंग और सीट मैट्रिक्स बदलने से छात्रों में असमंजस
* कानूनी विवाद का खामियाजा प्रवेश पा चुके बच्चों को क्यों?




