
* बंगाल- बहुमत के लिए सीटों की संख्या: 148
टीएमसी 80 बीजेपी 207 लेफ़्ट 2 कांग्रेस 2 अन्य 2
* असम- बहुमत के लिए सीटों की संख्या: 64
बीजेपी+ 102 कांग्रेस 21 अन्य 1 एआईयूडीएफ़ 2
* तमिलनाडु – बहुमत के लिए सीटों की संख्या: 118
डीएमके+ 73 एनटीके 0 टीवीके 108 एडीएमके+ 53
अन्य 0
* केरलम- बहुमत के लिए सीटों की संख्या: 71
एनडीए 3 एलडीएफ़ 35 यूडीएफ़ 102 अन्य 0
* पुड्डूचेरी- बहुमत के लिए सीटों की संख्या: 16
कांग्रेस+ 6 एनडीए 18 अन्य 6

कोलकाता/ चेन्नई। सोमवार 4 मई को देश के पांच राज्यों के चुनाव परिणामों ने भाजपा का मनोबल एक बार फिर बढ़ाया है। असम में जहां भाजपा 126 में 51 सीटें लेकर तीसरी बार सत्ता में वापसी करेगी, वहीं पश्चिम बंगाल ने सारे पूर्वानुमानों को गलत साबित करते हुए तृणमूल कांग्रेस के 15 साल के राज का अंत कर दिया और भाजपा को 204 सीटों पर पहुंचा दिया। तृणमूल कांग्रेस केवल 83 सीटों पर खिसक गई।
लेकिन भाजपा के लिए दक्षिण में सत्ता के दरवाजे फिर नहीं खुल सके। तमिलनाडु में अभिनेता से राजनेता बने विजय की पार्टी टीवीके 109 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर चुकी है। राज्य में सत्तारूढ़ डीएमके 66 सीटें लेकर दूसरे नंबर पर है, जबकि एआईएडीएमके को 51 सीटें हासिल हुई हैं। दक्षिण भारत के एक और राज्य केरल की 140 सीटों में से कांग्रेस समर्थित यूडीएफ ने 99 सीटों के साथ वामपंथी एलडीएफ के राज को खत्म कर दिया है। आखिरी राज्य पुड्डुचेरी की 30 सीटों में से एनडीए को 17 और कांग्रेस गठबंधन को 6 सीटें मिली हैं। 7 सीटों पर अन्य दलों के उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है। यानी राज्य में एनडीए को स्पष्ट बहुमत मिला है।

विपक्ष के खात्मे का संकेत
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों ने भारत के प्रमुख विपक्षी दलों को चिंता में डाल दिया है। राजनीतिक मामलों के जानकार इसे देश की लोकतांत्रिक राजनीति से विपक्ष के खात्मे के रूप में भी देख रहे हैं। इसकी कई वजह है। मिसाल के लिए असम को लें। असम में कांग्रेस ने चुनाव जीतने के लिए लड़ा ही नहीं। असम में जिस तरह से परिसीमन के बाद पंचायत स्तर पर मतदाताओं को दो से तीन विधानसभा सीटों में बांट दिया गया, उससे राज्य में भाजपा के लिए एक पूरी जमीन तैयार थी। उसके अलावा भाजपा पर जहां सांप्रदायिकता और घुसपैठियों के मुद्दे को असम की अस्मिता से जोड़ने का आरोप था, वहीं कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण का भी आरोप था। इन मुश्किल हालात में कांग्रेस को चुनाव पूर्व गठबंधन, पार्टी के मुख्यमंत्री चेहरे, सत्ता के खिलाफ जमीनी मुद्दों पर लड़ाई की सटीक रणनीति तैयार करनी थी, जो नहीं की गई। कांग्रेस ने गौरव गोगोई को सीएम का चेहरा बनाकर मैदान में उतारा, क्योंकि वे राज्य के युवाओं में खासे लोकप्रिय हैं। लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में वे असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा के आगे कहीं नहीं टिकते। वे उनके मुकाबले कद्दावर नहीं हैं। कांग्रेस पार्टी के बड़े नेताओं का चुनाव से ठीक पहले पार्टी छोड़कर जाना भी कांग्रेस की एक कमजोरी बन गया। करीब दो दशकों से असम की राजनीति को करीब से देख रहे पत्रकार बिमान बोरदोलोई कहते हैं, ‘असम के हालात काफी-कुछ मध्यप्रदेश से मेल खाते हैं, जहां वोटरों को कांग्रेस पर इसलिए भरोसा नहीं, क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर वे पाला बदलकर भाजपा में चले जाएं तो फिर उनके भरोसे का क्या होगा।’ कांग्रेस ने जिन छोटे दलों से गठजोड़ किया, वे सभी कागजी शेर हैं। खुद गौरव गोगोई जोरहाट से चुनाव हार गए। उन्होंने पार्टी की संगठनात्मक कमजोरी के कारण ही जमीनी मुद्दों को उठाने की जगह हिमंता बिस्वा सरमा के भ्रष्टाचार को टारगेट किया। इससे पार्टी जनता से कट गई। इससे उलट, तमिलनाडु में टीवीके ने मूल रूप से सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म और एक्टर विजय की जेन जी और युवाओं में लोकप्रियता का फायदा उठाकर बिना किसी खास चुनाव प्रचार के भी पहली ही बार में अभूतपूर्व जीत हासिल की। इसके जवाब में डीएमके के अधिकांश बड़े नेता उम्रदराज थे। उनका राज्य के युवाओं से संवाद न के बराबर था। उनकी राजनीति परंपरागत रही। उन्होंने अपनी योजनाओं से लोगों को पैसा ट्रांसफर कर युवाओं को खरीदना चाहा। नतीजा यह हुआ कि डीएमके के खिलाफ 11.5 फीसदी का एंटीइन्कम्बेंसी देखा गया। लेकिन टीवीके ने राज्य के युवाओं को भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, भाई-भतीजावाद और कानून-व्यवस्था के खिलाफ खड़े होने को प्रेरित किया, जिसका उपयोग विजय 2014 से अपनी फिल्मों में भी करते रहे। युवाओं के इसी गुस्से को विजय ने जनादेश में बदला और 34 फीसदी वोट शेयर हासिल किए और डीएमके का वोट शेयर 46 से घटकर 31 प्रतिशत पर आ गिरा। ऐसे में कांग्रेस और डीएमके, दोनों विपक्षी दलों को मुंह की खानी पड़ी।

SIR पर विक्टिम कार्ड खेलना ममता को भारी पड़ा
इसमें कोई दो राय नहीं कि बंगाल में ममता बनर्जी के 15 साल के राज के खिलाफ एक सत्ताविरोधी लहर चल रही थी। लेकिन SIR की प्रक्रिया में 91 लाख वोट काटने और बाद में 27 लाख वोटरों के न्यायिक प्रक्रिया में लंबित रहने पर ही तृणमूल ने ज्यादा फोकस किया और शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के मुद्दे पर कम ध्यान दिया। भाजपा ने इससे उलट तृणमूल कांग्रेस की तोलाबाजी, शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दों पर ममता सरकार की अनदेखी, बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था और तृणमूल कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी को मुद्दा बनाया और 7 फीसदी वोटों की बढ़त हासिल की। राजनीतिक टिप्पणीकार अचल बिस्वास कहते हैं कि अगर ममता ने अपने राज्य में सत्ता विरोधी लहर को मैनेज करने पर ध्यान दिया होता तो भाजपा को एकतरफा जीत दर्ज करने से रोक सकती थीं। ममता ने बेरोजगार युवाओं को रिझाने के लिए इसी साल फरवरी में ही स्नातक बेरोजगार युवाओं के लिए हर महीने 1500 रुपए के भत्ते का ऐलान किया था। लेकिन उसके फौरन बाद चुनाव का ऐलान हो गया। भाजपा ने युवाओं के गुस्से को भुनाने के लिए हर परिवार में दो नौकरी का ऐलान कर दिया, साथ ही महिला वोटरों के लिए 3000 रुपए तक देने की घोषणा की है। भाजपा की दोनों रणनीतियों ने पार्टी को करीब 70 सीटें ज्यादा दी हैं।
थोकबंद हिंदू वोट और मुस्लिम वोटों का बंटवारा
बंगाल में करीब 62 सीटें ऐसी थीं, जिनमें मुस्लिम वोटर्स निर्णायक स्थिति मंल थे। परंपरागत रूप से ये सीटें ममता बनर्जी की तृणमूल पार्टी का मजबूत गढ़ मानी जाती रही हैं। लेकिन भाजपा ने इनमें से करीब 52 सीटों पर कब्जा कर यह दिखा दिया कि इस बार मुस्लिम वोटों का भी भारी बंटवारा कांग्रेस और वाम दलों में हुआ है। 30 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम हिस्सेदारी वाली 83 सीटें पर त्रिकोणीय मुकाबले में तृणमूल को अपनी 25 सीटें गंवानी पड़ीं। भाजपा ने इन इलाकों में 18 सीटें जीतीं। बंगाल में मुस्लिम मतदाताओं की कुल मतों में हिस्सेदारी करीब 28 फीसदी है। मुस्लिम मतदाता कई दशकों से 85 सीटों पर जीत-हार की पटकथा लिखते रहे थे। तृणमूल ने पिछली बार इनमें से 75 सीटें हासिल कर प्रचंड जीत दर्ज की थी। चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी कोई कमाल नहीं दिखा सकी। मालदा, मुर्शिदाबार, उत्तर दिनाजपुर समेत कई क्षेत्रों की मुस्लिम बाहुल्य इन सीटों पर कहीं वाम दल, कहीं हुमायूं कबीर, कहीं एआईएसएफ तो कहीं कद्दावर निर्दलीय उम्मीदवारों ने मुकाबले को त्रिकोणात्मक या बहुकोणीय बना दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि भाजपा 18 सीटें जीतने में कामयाब रही। हुमायूं कबीर दोनों सीटों पर जीते, मगर तीन अन्य सीटों पर तृणमूल की हार का कारण बने। 2021 के चुनाव में भाजपा के पक्ष में 64 फीसदी से अधिक हिंदू वोट पड़े थे, लेकिन इस बार भाजपा को औसतन 7-10 फीसदी ज्यादा हिंदू वोटों का फायदा मिला। इस तरह भाजपा की झोली में करीब 53 सीटें आईं। ममता की सीट भवानीपुर में जैन, बनिया, सिंधी और मारवाड़ी समुदाय ने भाजपा को खुलकर थोकबंद वोट दिए। नतीजा यह रहा कि ममता को 15000 वोटों से हार का सामना करना पड़ा और उसके प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार शुभेंदु अधिकारी ने जीत के बाद मीडिया को दिए बयान में यह बात मानी भी।
युवा, महिलाओं ने भी साथ छोड़ा
स्कूली लड़कियों को साइकिल बांटने की योजना समेत लक्ष्मीर भंडार, कन्याश्री और सबुज साथी जैसी योजनाओं ने महिलाओं के बीच तृणमूल सरकार को काफ़ी लोकप्रिय बनाया था। लेकिन इस बार यह समर्थन टूटता दिखाई दिया। इसकी एक बड़ी वजह महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर पार्टी की कथित नाकामी है। दो साल पहले हुआ आरजी कर आंदोलन इस चुनाव को प्रभावित करता दिखा। इसका बड़ा उदाहरण पानीहाटी है, जिसे पारंपरिक तौर पर तृणमूल का गढ़ माना जाता रहा है। वहां आरजी कर मामले में महिला की मां बीजेपी के टिकट पर चुनावी मैदान में थीं और उन्होंने 28,836 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। हिंदू वोटों की एकजुटता पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाक़ों में बहुत अधिक देखी गई। आरजी कर मामले को ममता सरकार ने ठीक से मैनेज नहीं किया। आंदोलन भाजपा ने चलाया, लेकिन वह काफी लंबा चला, जिससे ममता सरकार को नुकसान उठाना पड़ा। ममता का साथ केवल महिलाओं ने ही नहीं, बल्कि युवाओं ने भी छोड़ा। इसके पीछे कारण राज्य में विकास का ठप रहना और नौकरियों की कमी रही। राज्य के शहरी क्षेत्रों में ममता के खिलाफ युवाओं और महिला वोटरों ने जमकर भाजपा के पक्ष में वोट डाले। कोलकाता साउथ और केंद्रीय कोलकाता में तृणमूल कांग्रेस को इससे करीब 54 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है।
चुनाव आयोग ने इस तरह घटाईं टीएमसी की सीटें
जिन 49 सीटों पर विक्ट्री मार्जिन से ज्यादा एडजुडिकेशन डिलीशन हुआ है, उसमें से 48 सीटों पर टीएमसी 2021 में जीती थी। भाजपा ने केवल एक ही सीट जीती थी। साफ है कि चुनाव आयोग की मेहरबानी से टीएमसी 48 से 21 पर आ गई है, वहीं बीजेपी 1 से 26 पर चली गई। बंगाल में ओवरऑल SIR वोटर डिलीशन (2024 चुनाव की तुलना में घटे वोटर) का विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि ऐसी करीब 145 सीटें हैं, जहां विक्ट्री मार्जिन से ज्यादा डिलीशन हुआ है। इन 145 सीटों में से 2021 में तृणमूल कांग्रेस के पास 130 सीटें थीं, जो 2026 में घटकर केवल 47 रह गईं। इन 145 में से बीजेपी के पास 2021 में केवल 15 सीटें थीं, जो 2026 में बढ़कर 96 हो गईं, जिससे पार्टी को 81 (जहां विक्ट्री मार्जिन से ज्यादा डिलीशन हुआ) सीटों का सीधा फायदा हुआ, तो 81 सीटें महत्वपूर्ण तो मानी जा सकती हैं। पश्चिम बंगाल के इस बार के चुनाव में SIR के जरिए हुई अधिकतम वोटर डिलीशन वाली टॉप-100 सीटों का विश्लेषण किया जाए, तो 100 सीटों में से 2021 में टीएमसी के पास 80 सीटें थीं, जो 2026 में घटकर 31 हो गईं। वहीं इन 100 सीटों में से बीजेपी के पास 2021 में 20 सीटें थीं, जो बढ़कर 68 हो गईं।




