Newspublicई-पेपरचंदौलीशासन प्रशासन

चकिया आंगनबाड़ी भर्ती सूची में नाम,फिर भी पैसे मांगे जा रहे खुलेआम

डीएम चन्दौली एक नजर इधर भी

  • अभ्यर्थियों का आरोप—पैसे की मांग के बाद नियम-कायदे का हवाला देकर रोकी जा रही नियुक्ति
  • ‘कारखास तंत्र’ के जरिए अधिकारियों के नाम पर वसूली का दावा, स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी
  • आय प्रमाणपत्र से लेकर दस्तावेजी जांच तक उठे सवाल, निष्पक्ष जांच की मांग

चकिया/चंदौली। बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग के अंतर्गत आंगनबाड़ी कार्यकत्री एवं सहायिका पदों पर चल रही भर्ती प्रक्रिया में चयन सूची जारी होने के बाद भी कुछ अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र नहीं मिलने की शिकायत ने विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अभ्यर्थियों का आरोप है कि चयन सूची में नाम आने के बाद उन्हें नियुक्ति पत्र मिलने की उम्मीद थी, लेकिन बाद में कथित तौर पर पैसे की मांग किए जाने और भुगतान नहीं करने पर नियुक्ति प्रक्रिया रोकने की बात कही गई।

अभ्यर्थियों का यह भी दावा है कि जब उन्होंने कथित आर्थिक मांग पूरी नहीं की तो बाद में आय प्रमाणपत्र अथवा अन्य दस्तावेजी और तकनीकी आधारों का हवाला देकर उनकी पात्रता पर सवाल उठाए जाने लगे। हालांकि, पैसे की मांग, बिचौलियों के माध्यम से कथित वसूली अथवा किसी अधिकारी के नाम के इस्तेमाल संबंधी आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।

ऐसे में पूरा मामला अब विभागीय दस्तावेजों, चयन समिति की कार्यवाही, पात्रता जांच और नियुक्ति पत्र जारी करने की प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच से ही स्पष्ट हो सकता है।

चयन सूची में नाम आया, फिर नियुक्ति पत्र क्यों रुका?

मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि यदि किसी अभ्यर्थी का नाम विभागीय चयन सूची में शामिल किया गया था, तो उसके बाद नियुक्ति पत्र जारी होने में किन कारणों से रोक लगी? क्या चयन सूची अंतिम थी या किसी स्तर पर उसका पुनः परीक्षण किया जाना था? क्या चयन के बाद दस्तावेजों की सत्यापन प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी अथवा किसी अभ्यर्थी के खिलाफ आपत्ति प्राप्त हुई थी?

अभ्यर्थियों का कहना है कि चयन सूची में नाम आने के बाद उन्हें यह भरोसा था कि अब नियुक्ति की औपचारिक प्रक्रिया पूरी होगी। लेकिन नियुक्ति पत्र जारी नहीं होने से उनके सामने असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है।

उनका कहना है कि यदि कोई अभ्यर्थी निर्धारित मानकों को पूरा नहीं करता था तो चयन सूची जारी करने से पहले अथवा चयन के बाद सत्यापन प्रक्रिया में इसकी स्पष्ट जांच होनी चाहिए थी। यदि किसी कारण से बाद में किसी अभ्यर्थी को अपात्र पाया गया है तो उसे नियम और कारण की स्पष्ट जानकारी लिखित रूप में दी जानी चाहिए।

आय प्रमाणपत्र बना जांच का प्रमुख आधार

पूरे मामले में आय प्रमाणपत्र को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कुछ अभ्यर्थियों का दावा है कि चयन सूची में नाम आने के बाद आय प्रमाणपत्र अथवा उससे संबंधित तकनीकी आधारों को लेकर उनकी पात्रता पर सवाल उठाए गए।

अब सवाल यह है कि भर्ती प्रक्रिया में आय प्रमाणपत्र के संबंध में निर्धारित नियम क्या थे? आवेदन के समय कौन-सा प्रमाणपत्र मान्य था? प्रमाणपत्र किस सक्षम अधिकारी द्वारा जारी होना आवश्यक था? उसकी वैधता किस तारीख तक होनी चाहिए थी और क्या आवेदन के समय उपलब्ध प्रमाणपत्र को बाद में किसी अलग आधार पर अमान्य माना गया?

यदि किसी अभ्यर्थी का प्रमाणपत्र नियमों के अनुरूप नहीं पाया गया है तो विभाग को संबंधित अभ्यर्थी को स्पष्ट कारण बताना चाहिए। इससे यह भी स्पष्ट होगा कि कार्रवाई किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ हुई है या भर्ती में शामिल सभी अभ्यर्थियों के दस्तावेजों की एक समान तरीके से जांच की गई है।

‘पैसा नहीं दिया तो नियुक्ति नहीं’—अभ्यर्थियों का आरोप  

कुछ अभ्यर्थियों ने गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि उनसे कथित रूप से आर्थिक लेन-देन की मांग की गई। आरोप लगाने वालों का कहना है कि पैसे नहीं देने की स्थिति में नियुक्ति पत्र नहीं मिलने की बात कही गई।

यह आरोप यदि सही पाया जाता है तो मामला गंभीर हो सकता है, क्योंकि सरकारी चयन प्रक्रिया में नियुक्ति किसी निर्धारित नियम, पात्रता और चयन प्रक्रिया के आधार पर होनी चाहिए। किसी अभ्यर्थी से नियुक्ति के बदले धन की मांग किए जाने का आरोप केवल व्यक्तिगत शिकायत नहीं बल्कि पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़ा विषय बन जाता है।

हालांकि, समाचार प्रकाशन के स्तर पर यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसलिए यह तय करना जांच एजेंसियों और विभागीय अधिकारियों का विषय है कि वास्तव में किसी स्तर पर पैसे की मांग की गई थी या नहीं।

अधिकारियों के नाम पर कथित ‘कारखास तंत्र’ का दावा

अभ्यर्थियों ने एक कथित ‘कारखास तंत्र’ के सक्रिय होने का भी आरोप लगाया है। उनका दावा है कि कुछ लोगों द्वारा अधिकारियों के नाम का हवाला देकर अभ्यर्थियों से संपर्क किया गया और कथित रूप से पैसे की मांग की गई।

यदि ऐसा कोई मामला सामने आता है तो सबसे पहले यह पता लगाया जाना जरूरी होगा कि संबंधित लोग कौन हैं, उनका विभागीय अधिकारियों से कोई वास्तविक संबंध है या नहीं और उन्होंने किन अभ्यर्थियों से संपर्क किया।

इसके अलावा मोबाइल कॉल, संदेश, भुगतान संबंधी रिकॉर्ड, बैंक या डिजिटल लेन-देन, कथित बिचौलियों की पहचान तथा शिकायतकर्ताओं के बयान जैसे साक्ष्य महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

सिर्फ किसी अधिकारी का नाम लिए जाने से उस अधिकारी की संलिप्तता साबित नहीं होती। इसलिए जांच का दायरा आरोप लगाने वाले व्यक्ति और कथित बिचौलियों के साथ-साथ उन अधिकारियों तक भी दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर सीमित होना चाहिए, जिनका नाम कथित रूप से इस्तेमाल किया गया।

चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता पर उठे सवाल

आंगनबाड़ी भर्ती जैसी प्रक्रिया में पारदर्शिता का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि चयनित अभ्यर्थियों के लिए नियुक्ति उनके रोजगार और भविष्य से जुड़ी होती है।

यदि चयन सूची जारी होने के बाद किसी अभ्यर्थी की पात्रता पर सवाल उठाया जाता है तो विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उस अभ्यर्थी के दस्तावेजों में क्या कमी पाई गई। क्या कोई आपत्ति दर्ज हुई थी? क्या चयन समिति ने दोबारा दस्तावेजों की जांच की? क्या संबंधित अभ्यर्थी को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया?

इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने से भर्ती प्रक्रिया को लेकर पैदा हो रहे भ्रम को दूर किया जा सकता है।

क्या सभी अभ्यर्थियों की जांच एक समान हुई?

अभ्यर्थियों की शिकायतों में सबसे महत्वपूर्ण सवाल समान मानकों से दस्तावेजों की जांच को लेकर है।

यदि आय प्रमाणपत्र, निवास, जाति, शैक्षणिक योग्यता अथवा अन्य दस्तावेजों के आधार पर किसी अभ्यर्थी को अपात्र माना गया है तो यह भी देखना होगा कि उसी प्रकार की स्थिति वाले अन्य अभ्यर्थियों के दस्तावेजों की जांच कैसे की गई।

भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता के लिए जरूरी है कि सभी उम्मीदवारों पर समान नियम लागू हों। किसी एक अभ्यर्थी के दस्तावेज को एक आधार पर स्वीकार और दूसरे के दस्तावेज को उसी आधार पर अस्वीकार किए जाने की स्थिति में विभाग को स्पष्ट कारण देना होगा।

जांच में सामने आने चाहिए ये 10 सवाल

मामले की निष्पक्ष जांच के दौरान निम्न बिंदुओं पर स्पष्ट जानकारी सामने आना जरूरी है—

1. चयन सूची जारी होने के बाद किन-किन अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र नहीं मिला?
2. चयन सूची में शामिल अभ्यर्थियों की दोबारा पात्रता जांच किस नियम या आदेश के तहत की गई?
3. आय प्रमाणपत्र के संबंध में भर्ती प्रक्रिया में लागू स्पष्ट नियम क्या हैं?
4. किसी अभ्यर्थी को अपात्र घोषित किया गया तो उसे लिखित कारण बताया गया या नहीं?
5. क्या सभी अभ्यर्थियों के दस्तावेजों की जांच समान मानकों के आधार पर हुई?
6. नियुक्ति पत्र जारी करने की प्रक्रिया किस अधिकारी अथवा समिति के स्तर पर लंबित है?
7. क्या पैसे की मांग किए जाने संबंधी कोई लिखित शिकायत विभाग को प्राप्त हुई है?
8. शिकायत प्राप्त होने पर विभाग ने क्या जांच या कार्रवाई की?
9. अधिकारियों के नाम पर कथित रूप से धन मांगने वाले लोगों की पहचान के लिए क्या कदम उठाए गए?
10. क्या चयन सूची, आपत्तियों, पात्रता जांच और नियुक्ति प्रक्रिया का स्वतंत्र परीक्षण कराया जाएगा?

दस्तावेजों से साफ हो सकती है पूरी तस्वीर

मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए मौखिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय दस्तावेजों की जांच सबसे महत्वपूर्ण होगी। चयन सूची, आवेदन पत्र, आय प्रमाणपत्र, अन्य प्रमाणपत्र, आपत्तियां, सत्यापन रिपोर्ट, चयन समिति की बैठक की कार्यवाही, पात्रता संबंधी निर्णय और नियुक्ति पत्र जारी करने से संबंधित पत्रावलियों की जांच की जाए तो स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो सकती है।

यदि किसी अभ्यर्थी को अपात्र किया गया है तो उसका नाम, कारण और संबंधित नियम विभागीय रिकॉर्ड में होना चाहिए। इसी तरह चयनित अभ्यर्थियों की सूची और अंतिम नियुक्ति सूची के बीच अंतर है तो उसके कारण भी रिकॉर्ड में दर्ज होने चाहिए।

शिकायतों की स्वतंत्र जांच की मांग

अभ्यर्थियों की शिकायतों के बाद अब निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो गई है। मांग की जा रही है कि जांच ऐसे अधिकारी या समिति से कराई जाए जो भर्ती प्रक्रिया से सीधे तौर पर जुड़े न हों, ताकि शिकायतकर्ताओं को निष्पक्ष जांच का भरोसा मिल सके।

जांच में यदि पैसे की मांग के आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं तो विभाग दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट कर सकता है। वहीं यदि किसी स्तर पर अनियमितता, नियमों की अनदेखी अथवा अवैध आर्थिक मांग के प्रमाण मिलते हैं तो संबंधित लोगों की जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जा सकती है।

विभाग की सफाई का इंतजार

मामले में चकिया बाल विकास परियोजना कार्यालय तथा जिला स्तर के संबंधित अधिकारियों की आधिकारिक स्थिति महत्वपूर्ण होगी। विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि चयन सूची की स्थिति क्या है, कितने अभ्यर्थियों के नियुक्ति पत्र लंबित हैं, किन कारणों से नियुक्ति रोकी गई है और क्या किसी अभ्यर्थी को दस्तावेजी आधार पर अपात्र घोषित किया गया है। साथ ही पैसे की मांग और कथित बिचौलियों से संबंधित शिकायतों पर भी विभाग की ओर से स्पष्ट जवाब सामने आना जरूरी है। फिलहाल मामला आरोपों और सवालों के बीच है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसलिए नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेजों और विभागीय रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच ही यह तय करेगी कि मामला महज दस्तावेजी पात्रता का है या इसके पीछे किसी स्तर पर गंभीर अनियमितता हुई है। अब निगाहें विभागीय सफाई, दस्तावेजी जांच और नियुक्ति प्रक्रिया के अगले कदम पर टिकी हैं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button