Newsअंतरराष्ट्रीयआजमगढ़ई-पेपरउत्तर प्रदेशराजनीतिलखनऊवाराणसीविचार/मुद्दा

योगी को घेरने का अपनो ने ही किया कुत्सित प्रयास,बाबाजी सबको करेंगे फेल,हो जाएंगे पास

योगी को घेरने की साजिश अवमुक्तेश्वरानंद प्रकरण से यूजीसी विवाद तक, हिंदुत्व पर हमला क्यों?

  • योगी को घेरने की साजिश अवमुक्तेश्वरानंद प्रकरण से यूजीसी विवाद तक, हिंदुत्व पर हमला क्यों?
  • योगी आदित्यनाथ आज देश में हिंदुत्व का सबसे सशक्त, जमीनी और कर्मशील चेहरा
  • अविमुक्तेश्वरानंद प्रकरण कोई साधु-संत विवाद नहीं, सुनियोजित राजनीतिक स्क्रिप्ट
  • योगी से हिंदू होने का प्रमाण मांगना हिंदुत्व को कमजोर करने का प्रयास
  • यूजीसी रेगुलेशन के बहाने सवर्ण-दलित-पिछड़ा विभाजन की कोशिश
  • चुनाव से पहले योगी को हिंदुत्व की धुरी से हटाने का खेल
  • विपक्ष के साथ भाजपा के भीतर के असहज तत्व भी सक्रिय
  • अखिलेश यादव और कांग्रेस की त्वरित सक्रियता से साजिश उजागर
  • योगी वही कर रहे हैं जो 2013 से पहले मोदी ने किया, वही रास्ता उन्हें रोकत

लखनऊ/उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आज सिर्फ एक प्रशासक नहीं हैं। वे एक राजनीतिक विचार, एक सांस्कृतिक धुरी और एक हिंदुत्व आधारित सत्ता-मॉडल बन चुके हैं। यही कारण है कि जब भी योगी को कमजोर करने की कोशिश होती है, हमला उनकी कुर्सी पर नहीं उनके हिंदुत्व पर किया जाता है। अवमुक्तेश्वरानंद प्रकरण हो या विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) का विवाद, दोनों घटनाएं सतही तौर पर अलग-अलग दिख सकती हैं, लेकिन भीतर से दोनों की राजनीतिक डीएनए एक ही है। योगी आदित्यनाथ को हिंदू समाज की सर्वमान्य आवाज बनने से रोकना। आज योगी आदित्यनाथ उस मुकाम पर हैं, जहां भाजपा की राजनीति उनके बिना अधूरी और विपक्ष उनके नाम से असहज है। उनकी सबसे बड़ी ताकत है विचार में हिंदुत्व, व्यवहार में हिंदुत्व और शासन में हिंदुत्व। यही वजह है कि योगी को चुनौती देने के लिए न प्रशासन पर सवाल उठाए गए, न कानून-व्यवस्था पर, न भ्रष्टाचार पर
सीधे उनके हिंदू होने पर सवाल खड़ा किया गया। अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा योगी से हिंदू होने का प्रमाण मांगना कोई आध्यात्मिक प्रश्न नहीं था। यह एक राजनीतिक बयान, एक चुनावी औजार और एक सुनियोजित उकसावा था। क्या यह संयोग है कि देश में पहली बार अवैध बूचड़खानों पर प्रतिबंध लगाने वाले,
गौहत्या पर सख्त कानून लागू करने वाले, गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ से हिंदुत्व का सर्टिफिकेट मांगा गया? क्या यह संयोग है कि जैसे ही यह विवाद खड़ा हुआ, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का फोन गया और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय मौके पर पहुंच गए नहीं यह संयोग नहीं, यह राजनीतिक समन्वय था। ठीक इसी समय यूजीसी के एक ऐसे रेगुलेशन को आगे बढ़ाया गया
जो सवर्ण-दलित-पिछड़ा के बीच नई खाई पैदा करने की क्षमता रखता है। जब उत्तर प्रदेश चुनावी मोड में हो और योगी आदित्यनाथ हिंदू समाज को बटोगे तो कटोगे के स्पष्ट संदेश से जोड़ रहे हों तब ऐसा कदम नासमझी नहीं, रणनीति कहलाता है। यह वही रणनीति है जो 2013 से पहले नरेंद्र मोदी के साथ अपनाई गई थी। तब भी सवाल विकास का नहीं, हिंदुत्व का था। तब भी विपक्ष के साथ भाजपा के भीतर के कुछ लोग सक्रिय थे। आज योगी आदित्यनाथ उसी मोड़ पर खड़े हैं।

योगी को घेरने की साजिश अविमुक्तेश्वरानंद प्रकरण से यूजीसी विवाद तक, हिंदुत्व पर हमला

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आज सिर्फ एक प्रशासक नहीं हैं। वे एक राजनीतिक विचार, एक सांस्कृतिक धुरी और एक हिंदुत्व आधारित सत्ता-मॉडल बन चुके हैं। यही वजह है कि जब-जब उन्हें कमजोर करने की कोशिश होती है, हमला उनकी कुर्सी पर नहीं किया जाता, बल्कि उनकी वैचारिक रीढ़ हिंदुत्व पर सीधा वार किया जाता है। अविमुक्तेश्वरानंद प्रकरण हो या विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) का हालिया विवाद ये दोनों घटनाएं सतह पर भले अलग-अलग दिखें, लेकिन भीतर से दोनों का राजनीतिक डीएनए एक ही है। लक्ष्य एक ही है योगी आदित्यनाथ को हिंदू समाज की सर्वमान्य, निर्विवाद आवाज बनने से रोकना। आज योगी उस मुकाम पर खड़े हैं, जहां भारतीय जनता पार्टी की राजनीति उनके बिना अधूरी और विपक्ष उनके नाम से असहज दिखाई देता है। उनकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि उनका हिंदुत्व केवल भाषणों तक सीमित नहीं है विचार में हिंदुत्व, व्यवहार में हिंदुत्व और शासन में हिंदुत्व। यही कारण है कि उन्हें चुनौती देने के लिए न प्रशासन पर सवाल उठाए गए, न कानून-व्यवस्था पर, न भ्रष्टाचार पर सीधे उनके हिंदू होने पर ही सवाल खड़ा कर दिया गया।

अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा योगी से ‘हिंदू होने का प्रमाण’ मांगना साधु-संत विवाद नहीं, राजनीतिक उकसावा

अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा योगी आदित्यनाथ से हिंदू होने का प्रमाण मांगना कोई आध्यात्मिक प्रश्न नहीं था। यह न धर्मसम्मत था, न तार्किक। यह एक राजनीतिक बयान, एक चुनावी औजार और एक सोची-समझी स्क्रिप्ट का हिस्सा था। क्या यह संयोग है कि देश के इतिहास में पहली बार अवैध बूचड़खानों पर प्रतिबंध लगाने वाले, गौहत्या पर सख्त कानून लागू करने वाले, गौ-तस्करी के नेटवर्क को जमीनी स्तर पर तोड़ने वाले, गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ से हिंदुत्व का सर्टिफिकेट मांगा गया। क्या यह संयोग है कि जैसे ही यह विवाद खड़ा हुआ, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अविमुक्तेश्वरानंद से फोन पर बात की और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय मौके पर पहुंच गए। नहीं यह संयोग नहीं था, यह राजनीतिक समन्वय था। इस पूरे प्रकरण का उद्देश्य साफ था हिंदू समाज के भीतर यह भ्रम पैदा करना कि योगी आदित्यनाथ हिंदुत्व के प्रतिनिधि नहीं हैं। यानी हिंदुत्व को ही योगी के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश।

योगी का हिंदुत्व किताबों का नहीं, संघर्ष का इतिहास

यह वही योगी आदित्यनाथ हैं जिन्होंने 2005 में मुख्तार अंसारी के मऊ दंगों के खिलाफ एक सांसद की हैसियत से आवाज उठाई। यह वही योगी हैं जो गोरखपुर से निकलकर मऊ पहुंचे, सत्ता से टकराए और तत्कालीन समाजवादी पार्टी सरकार ने उन्हें 7 दिन के लिए जेल में डाल दिया। यह वही योगी हैं जिन्होंने 2017 के बाद उत्तर प्रदेश को दंगा-मुक्त राज्य की पहचान दिलाई।
यह वही योगी हैं जिनके शासन में कांवड़ यात्रा से लेकर रामनवमी तक बिना भय और अवरोध के संपन्न होती है।
और आज उसी योगी से हिंदुत्व का प्रमाण मांगा जा रहा है।

यूजीसी विवाद शिक्षा के बहाने सामाजिक विभाजन की राजनीति

ठीक उसी समय, जब अविमुक्तेश्वरानंद प्रकरण तूल पकड़ रहा था, यूजीसी का एक ऐसा रेगुलेशन सामने लाया गया, जिसमें सवर्ण-दलित-पिछड़ा के बीच नई खाई पैदा करने की पूरी क्षमता है। जब उत्तर प्रदेश चुनावी मोड में प्रवेश कर चुका हो, योगी आदित्यनाथ बटोगे तो कटोगे जैसे स्पष्ट संदेश से हिंदू समाज को जोड़ रहे हों तब ऐसा फैसला नासमझी नहीं, बल्कि रणनीति माना जाएगा। सामाजिक संतुलन आज योगी आदित्यनाथ की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है। इसी संतुलन को बिगाड़ने का प्रयास यूजीसी विवाद के जरिए किया गया।

विपक्ष ही नहीं, ‘अपने’ भी असहज

इस पूरे घटनाक्रम में एक और तथ्य सामने आता है विपक्ष जितना सक्रिय दिखा, भाजपा के भीतर कुछ चेहरे उतने ही असहज और चुप नजर आए। अखिलेश यादव की तत्परता, कांग्रेस की मौजूदगी, और भाजपा के भीतर की चुप्पी यह संकेत देती है कि यह लड़ाई सिर्फ बाहर की नहीं, भीतर की भी है। यह योगी को डराने की नहीं, उन्हें राजनीतिक रूप से अलग-थलग करने की कोशिश है। इतिहास खुद को दोहरा रहा है। जो कुछ आज योगी आदित्यनाथ के साथ हो रहा है,
वही 2013 से पहले नरेंद्र मोदी के साथ हुआ था।
तब भी सवाल विकास का नहीं था, तब भी हिंदुत्व को ही कठघरे में खड़ा किया गया था। तब भी विपक्ष के साथ भाजपा के भीतर के कुछ लोग सक्रिय थे। आज नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं और योगी आदित्यनाथ उसी रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं।

विपक्ष व अपनों की भूमिका

अखिलेश यादव की त्वरित सक्रियता, कांग्रेस की मौजूदगी, और भाजपा के भीतर कुछ नेताओं की चुप्पी यह सब बताता है कि यह लड़ाई बाहर की नहीं,
भीतर की भी है। योगी को डराने की नहीं, अलग-थलग करने की कोशिश है। योगी आदित्यनाथ के खिलाफ यह पहला हमला नहीं है। लेकिन यह सबसे खतरनाक है क्योंकि यह विचार पर हमला है। इतिहास बताता है कि जो नेता विचारों की लड़ाई जीतता है, वह सत्ता से कहीं आगे निकल जाता है। आज योगी उसी रास्ते पर हैं, जहां कल नरेंद्र मोदी थे।


* योगी आदित्यनाथ हिंदुत्व के प्रतीक नहीं, उसका क्रियान्वयन हैं
* अवमुक्तेश्वरानंद प्रकरण राजनीतिक स्क्रिप्ट का हिस्सा
* यूजीसी विवाद सामाजिक विभाजन की कोशिश
* विपक्ष और भाजपा के भीतर के असहज तत्व एक सुर में
* चुनाव से पहले योगी को कमजोर करने का प्रयास
* इतिहास गवाह है ऐसी साजिशें नेता को बड़ा बनाती हैं

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button