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प्रधानमंत्री पद की गरिमा पर चोट,सदन में मोदी के भाषणों में केवल खोट ही खोट

भाषणों में मर्यादा का पतन और लोकतांत्रिक विमर्श का संकट

  • राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर जवाब बना चुनावी भाषण
  • लोकसभा में गैरहाजिरी और स्पीकर की ‘आशंका’ पर उठे सवाल
  • पूर्व प्रधानमंत्रियों पर व्यक्तिगत हमले, तथ्यों की तोड़-मरोड़
  • नेहरू-इंदिरा के संदर्भों को गलत ढंग से पेश करने का आरोप
  • ‘गांधी’ सरनेम पर टिप्पणी से संसदीय मर्यादा पर बहस
  • विपक्षी मुख्यमंत्रियों से टकराव, केंद्र-राज्य संबंधों में खटास
  • संसद से लेकर विदेश मंचों तक विरोधियों पर कटाक्ष
  • 12 साल बाद भी ‘चुनावी शैली’ से बाहर न आ पाने का आरोप

देश में 2014 से सत्ता में बैठी सरकार के नेतृत्व में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल को 12 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। यह एक लंबा राजनीतिक कालखंड है, जिसमें किसी भी प्रधानमंत्री से यह अपेक्षा की जाती है कि उसका सार्वजनिक विमर्श समय के साथ परिपक्व, संतुलित और संस्थागत गरिमा के अनुरूप होता जाए। लेकिन हालिया घटनाक्रम विशेषकर 5 फरवरी को राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के जवाब में दिया गया भाषण ने फिर से इस बहस को जिंदा कर दिया है कि क्या प्रधानमंत्री का सार्वजनिक भाषण स्तर उस पद की गरिमा के अनुरूप है या नहीं।
संसदीय परंपरा स्पष्ट है जब राष्ट्रपति का अभिभाषण होता है, तो उस पर दोनों सदनों में बहस चलती है और अंत में प्रधानमंत्री सरकार का पक्ष रखते हुए बहस का उत्तर देते हैं। अपेक्षा यह रहती है कि वे अभिभाषण में उल्लिखित नीतियों, कार्यक्रमों और विपक्ष द्वारा उठाए गए मुद्दों पर तथ्यात्मक, संयमित और नीतिगत जवाब देंगे। किंतु इस बार का भाषण राजनीतिक कटाक्ष, विपक्ष पर व्यक्तिगत हमलों और पूर्व प्रधानमंत्रियों के प्रति तिरस्कारपूर्ण टिप्पणियों के कारण चर्चा का विषय बन गया। लोकसभा में 4 फरवरी को प्रधानमंत्री का भाषण न देना और इसे लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की एक कथित ‘आशंका’ से जोड़कर देखे जाने ने भी राजनीतिक हलकों में सवाल खड़े किए। विपक्ष ने इसे संसदीय परंपराओं से विचलन बताया। इसके बाद राज्यसभा में दिए गए भाषण में पूर्व प्रधानमंत्रियों—विशेषकर जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के संदर्भों को जिस तरह प्रस्तुत किया गया, उस पर भी तथ्यात्मकता को लेकर बहस छिड़ी। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि उनसे पहले देश के पास दृष्टि और इच्छाशक्ति का अभाव था। यह बयान अपने आप में राजनीतिक विमर्श का हिस्सा हो सकता है, किंतु सवाल यह है कि क्या इस प्रकार की टिप्पणियां लोकतांत्रिक संस्थाओं और पूर्व प्रधानमंत्रियों की भूमिका को खारिज करने की कोशिश नहीं मानी जाएंगी? इसी क्रम में ‘गांधी’ सरनेम को लेकर की गई टिप्पणी ने भी सदन के स्तर को लेकर नई बहस छेड़ दी। क्या प्रधानमंत्री के भाषणों में लगातार चुनावी तेवर और आक्रामक शैली लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर कर रही है? क्या केंद्र-राज्य संबंधों में बढ़ती तल्खी की एक वजह राजनीतिक भाषा का गिरता स्तर भी है? और क्या 12 वर्षों के बाद भी प्रधानमंत्री पद की अपेक्षित गरिमा भाषणों में परिलक्षित नहीं हो पा रही है?

संसदीय परंपरा और उसका वर्तमान रूप

भारत की संसदीय परंपरा ब्रिटिश मॉडल से विकसित हुई है, जिसमें राष्ट्रपति के अभिभाषण को सरकार की नीति-घोषणा माना जाता है। बहस का उत्तर देते समय प्रधानमंत्री सामान्यतः नीति-आधारित प्रतिक्रिया देते हैं। इतिहास में देखें तो अटल बिहारी बाजपेई और मनमोहन सिंह ने तीखी आलोचनाओं के बीच भी संयमित और तथ्य प्रधान भाषण दिए। विपक्ष का आरोप है कि मौजूदा प्रधानमंत्री ने इस अवसर को भी राजनीतिक विरोधियों पर हमला बोलने के मंच में बदल दिया। भाषण में सरकार की उपलब्धियों का उल्लेख था, परंतु विपक्ष के सवालों का क्रमवार उत्तर कम दिखाई दिया।

लोकसभा में अनुपस्थिति और ‘आशंका’ का विवाद

4 फरवरी को लोकसभा में प्रधानमंत्री का भाषण न होना असामान्य माना गया। यह कहा गया कि स्पीकर ने सुरक्षा कारणों से यह निर्णय लिया। विपक्ष ने इसे संसदीय गरिमा के विरुद्ध बताया। लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रधानमंत्री का सदन से संवाद सर्वोपरि माना जाता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह घटना प्रतीकात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण थी—क्योंकि इससे यह संदेश गया कि सदन में संवाद की परंपरा कमजोर हो रही है।

नेहरू और इंदिरा के संदर्भ तथ्य या व्याख्या?

राज्यसभा में प्रधानमंत्री ने कहा कि नेहरू के समय 35 करोड़ और इंदिरा गांधी के समय 57 करोड़ समस्याएं थीं। आलोचकों का कहना है कि यह कथन मूल संदर्भ से अलग था। नेहरू का कथन देशवासियों की समस्याओं को अपनी समस्या मानने के भाव में था, न कि समस्याओं की संख्या गिनाने के लिए। ऐतिहासिक संदर्भों को राजनीतिक भाषण में इस्तेमाल करना असामान्य नहीं, परंतु जब उसे संदर्भविहीन किया जाता है तो विवाद स्वाभाविक है। संसद के भीतर ऐसे संदर्भों की तथ्यात्मक शुद्धता पर विशेष ध्यान अपेक्षित होता है।

‘गांधी’ सरनेम पर टिप्पणी

प्रधानमंत्री ने कहा कि नेहरू-गांधी परिवार ने एक गुजराती महात्मा गांधी का सरनेम चुरा लिया। यह टिप्पणी तुरंत राजनीतिक विवाद का कारण बनी। संसद में व्यक्तिगत टिप्पणियों की मर्यादा पर फिर सवाल उठा।
भारतीय समाज में सरनेम का संबंध केवल एक जाति या समुदाय से नहीं होता। इतिहासकारों के अनुसार ‘गांधी’ शब्द मूलतः व्यापारिक पेशे से जुड़ा था और विभिन्न समुदायों में पाया जाता है। ऐसे में इसे ‘चोरी’ बताना राजनीतिक व्यंग्य हो सकता है, किंतु संसदीय स्तर पर इसे कई लोग असंगत मानते हैं।

चुनावी शैली बनाम प्रधानमंत्री की भाषा

प्रधानमंत्री की शैली हमेशा से आक्रामक और जनसभा-उन्मुख रही है। 2014 और 2019 के चुनावों में इसी शैली ने उन्हें व्यापक समर्थन दिलाया। किंतु प्रश्न यह है कि क्या वही शैली संसद में भी जारी रहनी चाहिए? राजनीतिक संचार के विशेषज्ञ मानते हैं कि चुनावी मंच और संसद का मंच अलग-अलग प्रकृति के होते हैं। संसद में भाषा अधिक संतुलित और संस्थागत अपेक्षाओं के अनुरूप होनी चाहिए।

केंद्र-राज्य संबंधों में तल्खी

विपक्षी शासित राज्यों के साथ केंद्र के संबंधों में तनाव के कई उदाहरण सामने आए हैं। कई मौकों पर मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री की आगवानी के लिए उपस्थित नहीं हुए। इसे राजनीतिक असहमति का संकेत माना गया। विश्लेषकों का तर्क है कि राजनीतिक भाषा की तल्खी संस्थागत संवाद को भी प्रभावित करती है। जब विपक्ष को ‘देशविरोधी’ या ‘भ्रष्ट’ जैसे विशेषणों से नवाजा जाता है, तो संवाद की संभावना कम होती है।

विदेशी मंचों पर भी तीखी भाषा

प्रधानमंत्री ने कई बार विदेशों में भी घरेलू विपक्ष पर टिप्पणी की है। आलोचकों का कहना है कि इससे आंतरिक राजनीतिक विवाद अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहुंच जाते हैं। समर्थकों का तर्क है कि वे वैश्विक मंचों पर भारत की उपलब्धियां गिनाते हैं और आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है।

12 वर्षों का मूल्यांकन

12 वर्षों का कार्यकाल किसी भी नेता के लिए लंबी अवधि है। इस दौरान उपलब्धियां, नीतिगत बदलाव और अंतरराष्ट्रीय छवि में परिवर्तन जैसे कई पहलू सामने आए हैं। किंतु लोकतांत्रिक विमर्श की गुणवत्ता भी किसी सरकार के मूल्यांकन का महत्वपूर्ण पैमाना होती है।
‘अचूक संघर्ष’ का मानना है कि प्रधानमंत्री पद केवल राजनीतिक नेतृत्व का पद नहीं, बल्कि संवैधानिक संतुलन का प्रतीक है। इस पद की भाषा, आचरण और शैली देश के राजनीतिक संस्कार को प्रभावित करती है।
यदि संसद में संवाद की जगह कटाक्ष ले लें, यदि नीति-बहस की जगह व्यक्तिगत टिप्पणियां हावी हो जाएं, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होती है।
प्रधानमंत्री को अपने समर्थकों के उत्साह से आगे बढ़कर यह भी देखना होगा कि वे 140 करोड़ लोगों के प्रतिनिधि हैं, सिर्फ अपनी पार्टी के नहीं। आलोचना लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है, उसका जवाब तथ्यों और तर्कों से दिया जाना चाहिए, न कि व्यंग्य और तंज से।

* 12 वर्षों बाद भी प्रधानमंत्री की शैली पर सवाल
* राज्यसभा भाषण में पूर्व प्रधानमंत्रियों पर तीखी टिप्पणी
* ‘गांधी’ सरनेम विवाद से संसदीय मर्यादा पर बहस
* लोकसभा में गैरहाजिरी से परंपरा पर प्रश्न
* केंद्र-राज्य संबंधों में बढ़ती दूरी
* चुनावी भाषा और संवैधानिक पद की अपेक्षाओं के बीच टकराव
* विपक्ष के साथ संवादहीनता की स्थिति
* लोकतांत्रिक विमर्श की गुणवत्ता पर व्यापक चिंता

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