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आईएएस रिंकू सिंह 7 गोलियां खाकर भी जिंदा बच गए,योगी सरकार के दमन से कुंठित हो इस्तीफा दे दिए

सिस्टम की 7 गोलियां खाकर भी जिंदा रिंकू सिंह ने आखिर आईएएस से दिया इस्तीफा, यूपी में एक दलित अफसर को इमानदारी का मिला ऐसा तोहफा

  •  2001 बैच के आईएएस थे रिंकू, 8 महीने से काम नहीं मिला था
  •  हारकर राष्ट्रपति को भेजा इस्तीफा, कहा- आईएएस की चल रही समानांतर सरकार
  •  लिखा: दलित होने की मिली सजा, जातिवाद फैला रखा है नौकरशाही ने
  •  समाज कल्याण अफसर रहते हुए रिंकू ने किया था करीब 90 करोड़ के घोटाले का पर्दाफाश
  •  बदले में खाई थी 7 गोलियां, चेहरे पर अब भी हैं जख्मों के गहरे निशान

लखनऊ। दीवारों से प्लास्टर झड़ रहे हैं। बिजली की तारें खुली दिख रही हैं। मकान की छत सीलन से भरी है। लेकिन अगर कहें कि यह एक आईएएस का घर है तो लोग कहेंगे कि जरूर इमानदार होगा, वरना पहले घर को आलीशान बना लेता और बाहर एक शानदार गाड़ी खड़ी होती। देश के सभी प्रशासनिक और पुलिस अफसरों के प्रति लोगों का यही नजरिया है। यूपी कैडर के आईएएस रिंकू सिंह राही इससे अछूते नहीं हैं।

बुधवार को जब रिंकू सिंह के अपने पद से इस्तीफा देने के बाद मीडिया बात करने जब उनके घर पहुंची तो नजारा यही था। सामने रिंकू सिंह के पिता खड़े थे। वे बता रहे थे कि उनके बेटे को किस तरह इमानदारी की सजा दी गई। रिंकू सिंह ने 2009 में मुजफ्फरनगर में समाज कल्याण अधिकारी रहते हुए करीब 890 करोड़ रुपए के घोटाले को उजागर किया था। उसके बाद उन्हें 7 गोलियां मारी गई। उनकी आंख और जबड़े को गंभीर नुकसान हुआ। फिर भी आईएएस बनने की लगन ने उनमें जान फूंक दी और इसी पद पर रहते हुए वे आईएएस बन गए। एसडीएम के पद पर रहते हुए उन्होंने वकीलों के एक प्रदर्शन में खुद उठक-बैठक लगाई। प्रशासन को यह बात इस कदर नागवार गुजरी कि उन्होंने रिंकू को नई पोस्टिंग नहीं दी और अटैच कर रखा। इसी हताशा के कारण रिंकू ने मंगलवार को राष्ट्रपति के समझ इस्तीफे का पत्र लिख दिया।

क्या लिखा रिंकू ने अपने इस्तीफे में

2021 बैच के आईएएस रिंकू सिंह शाहजहांपुर में एसडीएम के रूप में पदस्थ थे। वकीलों के आंदोलन में उठक-बैठक का अंजाम यह हुआ कि आला अफसरों ने उन्हें बीते 8 महीने से कोई काम नहीं दिया, लेकिन उन्हें सैलरी बराबर मिल रही थी। लेकिन रिंकू सिंह केवल सैलरी लेने के लिए नहीं, बल्कि काम करने के लिए आईएएस बने थे। उहें यह अपमान मंजूर नहीं था। अपने इस्तीफे में रिंकू सिंह ने आरोप लगाया है कि यूपी में संवैधानिक व्यवस्था के इतर एक और समानातंर व्यवस्था चल रही है। रिंकू सिंह शायद यह कहना चाहते थे कि इसी समानांतर व्यवस्था ने उन्हें शिकार बनाया, क्योंकि वे दलित समुदाय से आते हैं, जो एक जाति विशेष के अफसरों को कतई पसंद नहीं है। राष्ट्रपति को भेजे अपने इस्तीफे में उन्होंने कहा है कि एसडीएम रहते हुए की गई कार्रवाई के बाद उन्हें साइडलाइन कर दिया गया। उनका कहना है कि उन्हें वेतन तो मिल रहा था, लेकिन जनसेवा का मौका नहीं मिल पा रहा था। उन्होंने अपने इस्तीफे को नैतिक निर्णय बताया है। उन्होंने अपने तकनीकी त्याग पत्र में लिखा है कि मुझे पहले की तरह समाज कल्याण विभाग की सेवा में भेजने की कृपा करें।

आईएएस एसोसिएशन से डिमोशन की इच्छा जताई

रिंकू सिंह ने यूपी के आईएएस एसोसिएशन ने अपना डिमोशन करने का अनुरोध किया है। उन्होंने एक पत्र में लिखा, यह अनुरोध मैं इस कारण कर रहा हूं कि एसोसिएशन द्वारा मेरे जैसे कनिष्ठ अधिकारियों के नैतिक एवं कर्तव्यनिष्ठ चिंताओं के प्रति लगातार उदासीनता प्रदर्शित की गई है, जो संस्थागत विवेक के क्रमिक क्षरण को दर्शाती है तथा उस संवैधानिक नैतिकता को कमजोर करती है जिसे यह सेवा बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। इसका मनोबल पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, विशेषकर उन अधिकारियों पर जो निकट भविष्य में इस सेवा में प्रवेश करने वाले हैं।

पिता आटा चक्की चलाते थे

रिंकू सिंह राही का जन्म 20 मई, 1982 को हाथरस में एक दलित परिवार में हुआ था। वह थाना सासनी के गांव ऊसवा के रहने वाले हैं। दो भाइयों में बड़े रिंकू के पिता सौदान सिंह राही आटा चक्की से परिवार पाल रहे थे। रिंकू ने सरकारी स्कूल से अच्छे नंबरों से 12वीं पास करने पर उन्हें स्कॉलरशिप ली थी। इसकी मदद से उन्होंने जमशेदपुर के टाटा इंस्टीट्यूट से बीटेक किया था। 2004 में रिंकू सिंह ने पीसीएस परीक्षा पास की थी। नौकरी के दौरान उन्होंने दिव्यांग कोटे से यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा दी। 2021 में उन्हें 683वीं रैंक मिली और वे आईएएस बने थे। परिवार में पत्नी सुलेखा योगा टीचर रही हैं। 10 साल का एक बेटा ध्रुव राही है। ताऊ रघुवीर सिंह राही बसपा शासनकाल में जिलाध्यक्ष रहे हैं।

पिता बोले- हमारी हालत देख लीजिए

रिंकू सिंह के पिता सौदान सिंह राही ने मीडिया से कहा- मेरा बेटा ईमानदार और मेहनती है, लेकिन उसे काम नहीं दिया जा रहा है। आप हमारा मकान देख लीजिए, आटा चक्की की मेहनत से ही प्लास्टर हुआ है। 2009 में जब रिंकू को गोली लगी थी, उसी समय मुजफ्फरनगर आने-जाने और इलाज में हमारे सारे पैसे खत्म हो गए। हमारे पास कुछ नहीं है। आप हमारा बैंक बैलेंस भी देख सकते हैं। जो लोग ईमानदार और मेहनती होते हैं, उनके पास बैंक बैलेंस नहीं होता। अब आगे आयोग सही निर्णय लेगा। रिंकू सिंह ने इस्तीफा नहीं दिया है। उन्हें काम नहीं दिया जा रहा है, इसी को लेकर उन्होंने राष्ट्रपति को पत्र लिखा है।

अलीगढ़ में हलचल, परिजन भावुक

आईएएस अधिकारी रिंकू सिंह राही के इस्तीफे की खबर ने उनके गृह जनपद अलीगढ़ में हलचल पैदा कर दी है। इससे परिजन स्तब्ध हैं। अलीगढ़ के नौरंगाबाद डोरी नगर स्थित उनके आवास पर जब इस्तीफे की सूचना पहुंची, तो परिवार के सदस्य भावुक और निराश हो गए। पिता सौदान सिंह राही का कहना है कि रिंकू ने सदैव ईमानदारी की राह चुनी, लेकिन सरकार की ओर से उन्हें वह सम्मान और स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। परिजनों का आरोप है कि सरकार ने रिंकू की योग्यता और ईमानदारी को नजरअंदाज किया। ताऊ रघुवीर सिंह उसवा ने कहा, जिस प्रकार अन्य आईएएस अधिकारियों को उचित और महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियां दी जाती हैं, वैसी नियुक्ति रिंकू को भी मिलनी चाहिए थी।

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