
– भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर ने सात दशक खपा दिए थोरियम को ईंधन बनाने में, नाकाम रहस
– अनिल काकोडकर पर थी प्रोजेक्ट की पूरी जिम्मेदारी
– वही प्रोजेक्ट से अलग होकर प्राइवेट कंपनी में सलाहकार बन गए
– वहां जादू की छड़ी घुमाई और मिली आश्चर्यजनक कामयाबी
नई दिल्ली। यह कहानी उस रिलायंस कंपनी की याद दिलाती है, जिसने भारत को पेट्रोलियम और गैस के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए ओएनजीसी को कमजोर किया, केजी बेसिन में गैस के कुंए खोदे और एक-तिहाई गैस निकाले बिना ही गायब हो गया।
ठीक इसी तरह भारत ने 70 साल थोरियम को एक शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा सामग्री बनाने की दिशा में रिसर्च किया। करोड़ों रुपए फूंके, लेकिन हाथ कुछ नहीं लगा। बल्कि एक प्राइवेट कंपनी ने उसी रिसर्च को चोरी कर थोरियम को एक व्यावसायिक ईंधन बनाकर दुनिया के सामने पेश किया। इस तरह भारत की 70 साल की मेहनत को 8 साल पहले बनी एक प्राइवेट कंपनी ने चुरा लिया और अब भारत थोरियम ईंधन के लिए आयात पर निर्भर है।
इस प्राइवेट कंपनी का नाम है एडवांस्ड न्यूक्लियर एनर्जी फॉर एनरिच्ड लाइफ या अनील। इसने जिस सरकारी कंपनी से 70 साल की मेहनत चुराई है, उसका नाम है भाभा अटॉमिक रिसर्च सेंटर, यानी बार्क। और इन सबके केंद्र में हैं भारत के पूर्व एटॉमिक एनर्जी आयोग के प्रमुख डॉ. अनिल काकोडकर।

अनिल के पीछे है अमेरिकी कंपनी
अनील एक स्टार्टअप कंपनी है, जिसकी स्थापना 8 साल पहले ही हुई थी। यह एक अमेरिकी स्टार्टअप है, जिसके पीछे क्लीन कोर नाम एक अमेरिकी कंपनी का पैसा लगा है। यह अभी रहस्यमय है कि इस अमेरिकी स्टार्टअप कंपनी तक भारत का 70 साल पुरान थोरियम रिसर्च का राज कैसे पहुंचा, लेकिन यह बात इतिहास में लिखी जा चुकी है कि जब से डॉ. अनिल काकोडकर अनील के सलाहकार बने, तभी से कंपनी ने थोरियम को ईंधन बनाने की दिशा में तकनीक पर काम शुरू किया। भारत ने थोरियम को एक क्लीन फ्यूल बनाने की दिशा में 70 साल पहले काम करना शुरू किया था। लेकिन दो दशक बाद इस पर शोध धीमा पड़ गया। फिर 50 साल तक थोरियम को ईंधन बनाने की दिशा में कोई काम नहीं हुआ और यह काफी हद तक मान लिया गया कि यह एक निरर्थक प्रयास है। लेकिन इसके बाद डॉ. काकोडकर इस प्रोजेक्ट के सर्वेसर्वा हो गए। भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर में काम करते हुए डॉ. काकोडकर ने देश के थोरियम कार्यक्रम को नई बुलंदियों तक पहुंचाया, लेकिन वे भी इस पदार्थ को व्यावसायिक ईंधन बनाने में नाकाम रहे।
इस तरह बनी प्राइवेट कंपनी
अनिल काकोडकर भाभा में रहकर थोरियम को वाणिज्यिक ईंधन बनाने में नाकाम रहने के बाद सीसीटीई नाम की एक प्राइवेट कंपनी में सलाहकार बन गए। सीसीटीई, यानी क्लीन कोर थोरियम टेक्नॉलॉजी। इसी सीसीटीई का नाम बाद मं अनील पड़ा, जो कि भाभा के रिसर्च की याद दिलाता है। कंपनी ने बाद में इस पूरे प्रोग्राम का नाम ही अनिल काकोडकर थोरियम प्रोग्राम रख दिया। सीसीटीई की स्थापना मेहुल शाह ने 2017 में की थी। वे ही कंपनी के सीईओ रहे। री-न्यू के संस्थापक सुमंत सिन्हा, जो कि भारत के पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा के बेटे भी है, उन्होंने भी इस कंपनी में पैसा लगाया। उनके अलावा कॉग्निजेंट के ूर्व सीईओ लक्ष्मी नारायण, एचडीएफसी बैंक के पूर्व चेयरमैन दीपक पारीख का पैसा भी इसी सीसीटीई में लगा हुआ है। कंपनी के सलाहकार बोर्ड में भारत के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणम भी रहे थे। इससे पता चलता है कि कंपनी ने पहले ही रसूखदारों को बोर्ड में रखकर अपने इरादे जता दिए थे। हालांकि, इनमें से ऐसा कोई भी नहीं था, जो डॉ. अनिल काकोडकर के बराबर परमाणु तकनीक में क्षमता रखता हो। यही कारण है कि डॉ. काकोडकर ने कंपनी का सलाहकार बनने के बाद अपने स्तर पर पूरा थोरियम कार्यक्रम संचालित किया।
काकोडकर ने आते ही जादू कर दिया
बार्क के प्रमुख रहते हुए काकोडकर को भारत सरकार ने पूरी सुविधा दी हुई थी। करोड़ों रुपए का उनका बजट, उनके नीचे काम करने वाले सैंकड़ों परमाणु वैज्ञानिक और फैसला लेने की पूरी आजादी। काकोडकर खुद प्रोजेक्ट के मुखिया थे। उन्होंने आगे आकर प्रेशराइज्ड हेवी वॉटर रिएक्टर्स की संख्या बढ़ाई। उनकी टीम ने थोरियम को ईंघन बनाने के सिद्धांत पर लंबा काम किया और एडवांस हैवी वॉटर रिएक्टर को लेकर काम किया, ताकि आखिर में थोरियम को ईंधन के रूप में उपयोग में लाया जा सके। भारत सरकार ने भी कामयाबी की उम्मीद में इस पूरे प्रोजेक्ट को आम लोगों के छिपाए रखा और इस पर खामोशी से शोध होने दिया। लेकिन आखिरकार भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर को निराशा ही हाथ लगी और डॉ. काकोडकर प्रोजेक्ट से अलग हो गए। उन्होंने 8 साल पुरानी सीसीटीई कंपनी ज्वॉइन कर ली और वहां सलाहकार बनते हुए कुछ ऐसा जादू कर दिया कि कंपनी ने इतने कम समय में वह काम कर दिखाया, जो भाभा सेंटर 70 साल में नहीं कर पाया। उसने थोरियम को दुनिया का पहला व्यावसायिक ईंधन बना दिया, जो परमाणु बिजली बनाने के काम आता है।
आधे से ज्यादा काम भाभा में कर दिया था
डॉ. काकोडकर के अधीन भाभा सेंटर की टीम ने थोरियम को ईंधन के रूप में ढालने के लिए उनके बंडल बनाए और उन्हें प्रेशराइज्ड हैवी वॉटर रिएक्टर्स में लोड किया। काकोडकर की टीम ने थोरियम ऑक्साइड को इन रिएक्टर्स के कोर में जमाया। टीम ने इसके लिए साइरस और ध्रुव नाम के रिएक्टरों का इस्तेमाल किया। इसके बाद बार्क ने थोरियम के ईंधन के रूप में एक संतुलित चक्र प्रणाली को कामिनी नाम के एक और रिएक्टर में रखकर प्रयोग को कामयाबी से अंजाम भी दिया। यानी डॉ. काकोडकर थोरियम को ईंधन बनाने से जुड़े सारे प्रयोग भाभा में ही कर चुके थे। उन्हें तो बस, अपने निष्कर्षों को एक सिरे से पिरोकर परोसना ही था, जो उन्होंने भाभा सेंटर में करने की जगह, सीसीटीई में आकर किया। जानकारों का कहना है कि सीसीटीई के पास न तो ऐसे उपकरण थे और न ही महंगे रिएक्टर्स, जिसमें किसी परमाणु सामग्री को रखकर प्रयोग किए जाते हैं। उन्हें तो नतीजों की दरकार थी और वह उन्हें काकोडकर से मिल गई। अभी यह पता नहीं है कि काकोडकर के नतीजों को सीसीटीई ने आगे अमेरिका में ले जाकर परखा और थोरियम को व्यावसायिक रूप से बेचने के लिए ईंधन में बदला या नहीं, लेकिन यह तो तय है कि भारत आज परमाणु ईंधन के लिए थोरियम का मोहताज हो गया है। इससे पता चलता है कि भारत का टैलेंट किसी तरह प्राइवेट कंपनियों द्वारा अपने फायदे के लिए इस्तेमाल हो रहा है।




