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उड़ीसा उच्च न्यायालय ने अमानवीय व्यवहार, दलितों को जमानत देने का थाने के शौचालय को साफ करने को बनाया आधार

कोर्ट ने जमानत में 2 महीने तक थाने का शौचालय साफ करने की सजा भी दे डाली, सुप्रीम कोर्ट में मामला दर्ज, सुनवाई शुरू

– मामला ओडिशा के रायगढ़ा जिले का, ट्रायल और हाईकोर्ट पर जातिवाद के गंभीर आरोप
– जमानत में सजा देने वाले जज सवर्ण और अन्य पिछड़ा वर्ग के
– जमानत की शर्त- दो महीने के लिए पुलिस थाने और टॉयलेट की सफाई करो
– वेदांता की माइनिंग के कारण विस्थापित होने वाले हैं पीड़ित दलित और आदिवासी
– विरोध करने पर पुलिस ने उन पर लगाया दंगा भड़काने और हमले का आरोप

नई दिल्ली। भारत में किसी मल्टीनेशनल खनन कंपनी की कारगुजारियों के खिलाफ बोलने पर पुलिस डंडे मारती है, कोर्ट जेल भेज देती है। वहीं, अगर ऐसी किसी भी कंपनी के खिलाफ अगर देश के दलित आदिवासी आवाज उठाएं तो भारत की अदालतें उन्हें जमानत दें तो वह भी सजा के रूप में।

ऐसा ही एक मामला ओडिशा में सामने आया है, जहां ट्रायल कोर्ट ही नहीं, बल्कि हाईकोर्ट तक ने जमानत के 8 मामलों में दलित और आदिवासी समुदाय के 6 आवेदकों को इस शर्त पर जमानत दी कि वे दो महीने तक रोज सुबह 6 से 9 बजे तक पुलिस थाने की गंदगी साफ करेंगे। अब सुप्रीम कोर्ट ने एक मीडिया रिपोर्ट के बाद इस बात का स्वत: संज्ञान लेते हुए इस मामले में केस दर्ज किया है।

गोदी मीडिया ने खबर ही उड़ा दी

भारत में सबसे विश्वसनीय और समानतामूलक समाज बनाने का दावा करने वाले गोदी मीडिया ने इस खबर को कचरे में फेंक दिया। यह इसलिए किया गया, क्योंकि खबर उस बड़े कॉर्पोरेट समूह वेदांता के खिलाफ थी, जो इन्हीं मीडिया चैनलों और अखबारों में करोड़ों के विज्ञापन देता है। इस खबर को सबसे पहले आर्टिकल 14 नाम की वेबसाइट में प्रकाशित किया गया। वेबसाइट की रिपोर्ट के अनुसार, रिपोर्ट में ओडिशा हाईकोर्ट द्वारा 28 मई, 2025 को पारित एक आदेश का जिक्र किया गया था, जिसमें कुमेश्वर नाइक नामक एक व्यक्ति को “दो महीने तक हर सुबह 6 बजे से 9 बजे के बीच काशीपुर पुलिस स्टेशन परिसर की सफाई करने” का निर्देश दिया गया था। रिपोर्ट में बताया गया कि जिन आरोपियों पर ये शर्तें लागू की गई थीं, वे दलित और आदिवासी समुदायों से थे। यही नहीं, ये सभी ओडिशा में वेदांता के हवाले की गई बॉक्साइट की खदानों के लिए हो रहे खनन में विस्थापित होने वाले लोग थे। अब चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की बेंच ने जमानत की अमानवीय शर्तों का विरोध करते हुए मामले पर खुद संज्ञान लेते हुए सुनवाई शुरू की है।

8 अपमानजनक आदेश, लेकिन कोई विरोध नहीं

‘आर्टिकल 14’ की रिपोर्ट के अनुसार, मई 2025 और जनवरी 2026 के बीच ऐसे आठ आदेश पारित किए गए थे। इनमें से सात आदेश रायगढ़ जिले की अदालतों से और एक आदेश हाईकोर्ट से पारित हुए थे। इन आदेशों पर स्थानीय ओडिया मीडिया ने कोई ध्यान नहीं दिया और न ही उनका विरोध किया। ऐसा इसलिए, क्योंकि वेदांता लिमिटेड मुंबई की एक 50 साल पुरानी बहुराष्ट्रीय खनन कंपनी है, जिसके गोवा, कर्नाटक, ओडिशा, आयरलैंड, नामीबिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई देशों और राज्यों में प्रोजेक्ट चल रहे हैं। वेदांता को बॉक्साइट माइनिंग का ठेका ओडिशा की पिछली बीजू जनता दल की सरकार ने दिया था। बाद में जून 2022024 में भाजपा ने पहली बार बीजू जनता दल को हराकर राज्य की सत्ता पर कब्जा किया। हालांकि, उसके बाद भी विस्थापितों के विरोध को सख्ती से दबाने की कोशिश की गई। इस मामले में गोदी मीडिया की बेरुखी से यह बात एक बार फिर साबित हुई है कि भारत में कॉर्पोरेट कंपनियों की मनमानी के खिलाफ आवाज उठाने वालों का साथ मीडिया नहीं दे रहा है, क्योंकि इसमें पैसे के लेन-देन का ब वेदांता लिमिटेड मुंबई की एक 50 साल पुरानी बहुराष्ट्रीय खनन कंपनी है, जिसके गोवा, कर्नाटक, ओडिशा, आयरलैंड, नामीबिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई देशों और राज्यों में प्रोजेक्ट चल रहे हैं। गोदी मीडिया ने इस मामले से इसलिए भी पल्ला झाड़ा, क्योंकि विरोध करने वाले दलित और आदिवासी समुदाय के थे, जिनकी गोदी मीडिया में कोई नुमाइंदगी नहीं है। मीडिया में उनकी आवाज पर साथ देने वाला कोई नहीं है।

अदालतों का फैसला जातिवादी

ओडिशा के दक्षिणी जिले रायगड़ा में खनन-विरोधी प्रदर्शनों को 2023 में अपराध के तौर पर देखा जाने लगा था। चौरतफा मीडिया में वेदांता के प्रोजेक्ट का विरोध करने वाले दलित-आदिवासियों को विकास विरोधी और नक्सली कहकर संबोधित किया गया। नतीजा यह हुआ कि व्यापक समाज के गुस्से को देखते हुए पुलिस ने दलित और आदिवासी ग्रामीणों को दंगा फैलाने का आरोप लगाते हुए गिरफ्तार कर लिया। अभी तक इस मामले में कम से कम 40 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। ट्रायल से लेकर ओडिशा हाईकोर्ट तक विभिन्न अदालतों ने प्रदर्शनकारियों के 8 मामलों में जमानत का आदेश देते हुए आरोपियों को पुलिस के शौचालय धोने की सजा दी है। आर्टिकल-14 ने ऐसे सात आदेशों की समीक्षा की और दो प्रभावित प्रदर्शनकारियों से बात की। कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्रभावशाली और ओबीसी जातियों के जजों के ये फैसले जातिवादी हैं। आर्टिकल-14 के अनुसार, “ जमानत की शर्तें यह थी कि याचिकाकर्ता हर सुबह 6 बजे से 9 बजे के बीच काशीपुर पुलिस थाने के परिसर की सफाई करेगा।” यह उन जमानत शर्तों में से एक थी, जो ओडिशा हाईकोर्ट ने 28 मई 2025 को 26 वर्षीय दलित, खनन-विरोधी प्रदर्शनकारी कुमेश्वर नाइक को जमानत देते समय लगाई थीं। नाइक दक्षिणी ओडिशा के रायगड़ा जिले के रहने वाले हैं।

सवर्ण और ओबीसी जजों का विवादित फैसला

यह मई 2025 से जनवरी 2026 के बीच जारी किए गए ऐसे आठ आदेशों में से एक है, जिनकी जानकारी ‘आर्टिकल 14’ को मिली है—इनमें से सात आदेश रायगड़ा जिला अदालत के दो जजों ने दिए थे। एक जज सवर्ण जाति के थे और दूसरे अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी से। हाईकोर्ट का विवादित फैसला सुनाने वाले जज भी सवर्ण जाति के थे। इन शर्तों पर जमानत पाने वाले आठ लोगों में से—जिन्हें ज्यादातर दलित और आदिवासी प्रदर्शनकारी जातिवादी मानते हैं—छह दलित हैं और दो आदिवासी हैं। अपने मोहल्ले में छोटी सी किराने की दुदकान चलाने वाले नाइक रायगड़ा जिले के अन्य दलित और आदिवासी लोगों के साथ मिलकर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। ये सभी लोग खनन की वजह से विस्थापित होने वाले थे। वे 2023 में नवीन पटनायक के नेतृत्व वाली बीजू जनता दल सरकार द्वारा वेदांता लिमिटेड को बॉक्साइट खनन का ठेका दिए जाने का विरोध कर रहे थे।

मजबूरन करना पड़ा यह गंदा काम

भाजपा पहली बार जून 2024 में ओडिशा की सत्ता में आई और इसके साथ ही राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर नवीन पटनायक का 24 साल का कार्यकाल समाप्त हो गया। कुमेश्वर नाइक को जून से अगस्त 2025 तक लगभग दो महीने जमानत की शर्त के रूप में रायगड़ा जिले के काशीपुर पुलिस थाने की सफाई का गंदा काम मजबूरन करना पड़ा। इससे पहले कुमेश्वर ने जेल में पांच महीने बिताए थे। काशीपुर ही वह थाना था, जहां उन्हें कभी हिरासत में रखा गया था। पुलिस ने कुमेश्वर को थाने और शौचालय की सफाई के लिए झाड़ू, फिनाइल और अन्य सामान उपलब्ध कराया गया था। जेल में महीनों बिताने के बाद जिस जमानत से कुमेश्वर को राहत मिलनी चाहिए थी, उसके बजाय वह उनके लिए एक अपमानजनक स्थिति में बदल गया।

कोर्ट ने सोचने पर मजबूर किया कि हम कहां खड़े हैं

नाइक ने कहा, “यह जानते हुए भी कि हमें यह अपमानजनक काम करना पड़ेगा, जब मैं पुलिस थाने की ओर जा रहा था, तो मैंने अपने दिल से कहा कि हमारा मकसद इस मामूली आदेश से कहीं ज्यादा बड़ा है।” उन्होंने आगे कहा, “लेकिन मैं यह जरूर कहना चाहूंगा कि यह जातिवादी आदेश खुद न्यायपालिका ने ही दिया था, जिससे मुझे यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि हम कहां खड़े हैं।” नाइक रायगड़ा जिले के काशीपुर ब्लॉक के कांतमाल गांव के रहने वाले हैं। यह जगह काशीपुर पुलिस स्टेशन से लगभग 20 किलोमीटर दूर है। पुलिस ने उन्हें 6 जनवरी 2025 को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने ‘आर्टिकल 14’ को मिली एक प्रथम सूचना रिपोर्ट के अनुसार यह आरोप लगाया कि सितंबर 2024 में पुलिस स्टेशन के बाहर हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान कुमेश्वर ने और लगभग 100 अन्य लोगों के साथ मिलकर दंगा किया, अधिकारियों के काम में रुकावट डाली, संपत्ति को नुकसान पहुंचाया और सरकारी कर्मचारियों पर हमला किया। जब 28 मई 2025 को ओडिशा हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत दी, तो उनके परिवार और गांव वाले खुश थे। इसके बजाय, जमानत के आदेश ने उन्हें हैरान कर दिया। रिपोर्ट में ओडिशा हाईकोर्ट द्वारा 28 मई, 2025 को पारित आदेश का ज़िक्र किया गया, जिसमें कुमेश्वर नायक नामक व्यक्ति को “दो महीने तक हर सुबह 6:00 बजे से 9:00 बजे के बीच काशीपुर पुलिस स्टेशन परिसर की सफ़ाई करने” का निर्देश दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार, मई 2025 और जनवरी 2026 के बीच ऐसे आठ आदेश पारित किए गए। इनमें से सात आदेश रायगड़ा ज़िला कोर्ट्स द्वारा, जबकि एक आदेश हाईकोर्ट द्वारा पारित किया गया। इन आठ मामलों में से छह आवेदक दलित समुदाय से और दो आदिवासी समुदाय से संबंधित हैं।

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