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ओ ग्रोव चिल्ड्रेन्स एकेडमी और ओ ग्रोव पब्लिक स्कूल के संचालन पर गम्भीर सवाल,स्कूल प्रबंधन कर रहा बच्चों के जान से खिलवाड़

लखनऊ अग्निकांड के बाद वाराणसी में बड़ा सवाल क्या बच्चों की जान से हो रहा खिलवाड़?

  • लखनऊ की आग ने खोली शिक्षा व्यवस्था की परतें, अब वाराणसी की बारी!
  • क्या बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं शिक्षण संस्थान?
  • ओ ग्रोव चिल्ड्रेन्स एकेडमी और ओ ग्रोव पब्लिक स्कूल के संचालन पर उठे गंभीर सवाल
  • सुरक्षा मानकों और दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच की मांग
  • ओ ग्रोव चिल्ड्रेन्स एकेडमी एवं ओ ग्रोव पब्लिक स्कूल के संचालन को लेकर कई वैधानिक सवाल
  • पंजीकृत पते और वास्तविक संचालन स्थल में अंतर होने के संकेत
  • भवन मानचित्र, फायर एनओसी और अन्य अनुमतियों की निष्पक्ष जांच की मांग
  • बच्चों की सुरक्षा को लेकर प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न

वाराणसी। लखनऊ के अलीगंज में हुई भयावह अग्निकांड की घटना ने केवल एक इमारत को नहीं जलाया, बल्कि पूरे प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था और सुरक्षा तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब भी किसी स्कूल, कोचिंग या शिक्षण संस्थान में हादसा होता है, प्रशासन जांच के आदेश देता है, अधिकारी मौके पर पहुंचते हैं, बयान जारी होते हैं और कुछ दिनों बाद सब कुछ फिर सामान्य मान लिया जाता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल वहीं का वहीं रह जाता है—क्या अगला हादसा रोकने के लिए वास्तव में कोई ठोस कदम उठाए गए? हादसों के बाद कार्रवाई करना प्रशासनिक मजबूरी हो सकती है, लेकिन हादसे होने से पहले सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासनिक जिम्मेदारी है। यदि समय रहते भवनों, अग्नि सुरक्षा उपकरणों, वैधानिक अनुमतियों और संचालन व्यवस्था की निष्पक्ष जांच होती रहे, तो शायद कई परिवार उजड़ने से बच सकते हैं। इसी सोच के साथ अचूक संघर्ष की टीम ने वाराणसी के कई शिक्षण संस्थानों से जुड़े उपलब्ध सार्वजनिक अभिलेखों, दस्तावेजों और स्थानीय स्तर पर प्राप्त सूचनाओं का अध्ययन किया। इस पड़ताल के दौरान कुछ ऐसे तथ्य सामने आए, जिन्होंने कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए। यह रिपोर्ट किसी संस्था को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि संबंधित विभागों से निष्पक्ष जांच और जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग के उद्देश्य से प्रस्तुत की जा रही है।

 

लखनऊ की आग का धुआं अभी छंटा भी नहीं, वाराणसी में उठने लगे सवाल

लखनऊ की घटना ने यह साबित कर दिया कि जब सुरक्षा मानकों की अनदेखी होती है, तो चंद मिनटों में एक शिक्षण संस्थान मौत के जाल में बदल सकता है। सवाल यह है कि क्या वाराणसी के स्कूल और कोचिंग संस्थान इस खतरे से पूरी तरह सुरक्षित हैं? क्या प्रत्येक विद्यालय के पास वैध अग्निशमन अनापत्ति प्रमाणपत्र है? क्या बहुमंजिला भवनों में आपातकालीन निकास उपलब्ध हैं? क्या फायर अलार्म और अग्निशमन यंत्र केवल दिखावे के लिए लगे हैं या वास्तव में कार्यशील हैं?
क्या भवनों का निर्माण स्वीकृत मानचित्र के अनुरूप हुआ है? क्या संबंधित विभाग समय-समय पर इन संस्थानों का निरीक्षण करते हैं? इन सवालों का उत्तर केवल संबंधित संस्थानों के पास ही नहीं, बल्कि प्रशासन के पास भी होना चाहिए।

दस्तावेजों में दिखा अंतर

अचूक संघर्ष की जांच के दौरान ओ ग्रोव चिल्ड्रेन्स एकेडमी और ओ ग्रोव पब्लिक स्कूल से जुड़े सार्वजनिक अभिलेखों का परीक्षण किया गया। प्रारंभिक स्तर पर उपलब्ध जानकारी में यह संकेत मिला कि विद्यालय के पंजीकरण से जुड़े पते और सार्वजनिक व्यापारिक निर्देशिकाओं में दर्शाए गए संचालन स्थल के बीच अंतर दिखाई देता है। यदि किसी विद्यालय का पंजीकरण एक स्थान पर है और उसका वास्तविक संचालन किसी अन्य स्थान से हो रहा है, तो यह आवश्यक है कि संबंधित नियामक संस्थाएं इस स्थिति को स्पष्ट करें। यदि सभी आवश्यक अनुमतियां और रिकॉर्ड अद्यतन हैं, तो उन्हें सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए। यदि नहीं, तो इसकी जांच आवश्यक है।

बच्चों की सुरक्षा बनाम कागजी औपचारिकताएं

शिक्षा के क्षेत्र में भवन केवल ईंट और सीमेंट का ढांचा नहीं होता। वह हजारों बच्चों की सुरक्षा, भविष्य और अभिभावकों के विश्वास का केंद्र होता है। जब कोई अभिभावक अपने बच्चे को विद्यालय भेजता है, तो वह यह मानकर चलता है कि वहां सुरक्षा के सभी मानकों का पालन किया गया होगा। लेकिन यदि भवन की वैधानिक स्थिति, अग्नि सुरक्षा या अन्य अनिवार्य व्यवस्थाओं पर प्रश्नचिह्न खड़े होने लगें, तो यह केवल प्रशासनिक मामला नहीं रह जाता यह सार्वजनिक चिंता का विषय बन जाता है। लखनऊ की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि छोटी-सी लापरवाही भी बड़े हादसे का कारण बन सकती है। इसलिए अब सवाल केवल किसी एक विद्यालय का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की जवाबदेही का है।

क्या समय रहते जागेगा प्रशासन?

हर बड़ी दुर्घटना के बाद अधिकारी यह कहते हैं कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। दुर्घटना होने के बाद कार्रवाई क्यों? दुर्घटना होने से पहले निरीक्षण क्यों नहीं? यदि नियमित जांच होती, यदि सुरक्षा मानकों का ईमानदारी से पालन कराया जाता और यदि प्रत्येक विद्यालय का समय-समय पर भौतिक सत्यापन होता, तो शायद ऐसी घटनाओं की आशंका काफी हद तक कम हो सकती थी। वाराणसी विकास प्राधिकरण, नगर निगम, अग्निशमन विभाग, शिक्षा विभाग और संबद्ध नियामक संस्थाएं उपलब्ध तथ्यों के आधार पर पूरे मामले की स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच क्यों नहीं करते।

पंजीकरण, सीबीएसई रिकॉर्ड, भवन और फायर सुरक्षा पर उठे सवाल

दस्तावेजों और सार्वजनिक अभिलेखों के आधार पर किसी भी शिक्षण संस्थान की वैधानिक स्थिति का आकलन किया जा सकता है। उपलब्ध रिकॉर्ड, सार्वजनिक सूचनाओं और स्थानीय स्तर पर प्राप्त जानकारियों के आधार पर कई ऐसे प्रश्न सामने आए हैं, जिनका उत्तर संबंधित संस्थान और सक्षम विभागों को देना चाहिए। यह रिपोर्ट किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचती, बल्कि स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग करती है।

सीबीएसई रिकॉर्ड और वास्तविक संचालन स्थल पर सवाल

उपलब्ध जानकारी के अनुसार सीबीएसई संबद्धता संख्या 213325 से संबंधित रिकॉर्ड में विद्यालय का पता बेटावर, बच्छांव प्रदर्शित होता है। वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक व्यापारिक निर्देशिकाओं और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सूचनाओं में विद्यालय का संचालन भवन संख्या बी-21/108ए, विनायका-कमच्छा रोड, वाराणसी से दर्शाया गया है। यदि विद्यालय वास्तव में कमच्छा स्थित भवन से संचालित हो रहा है, तो पहला और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या सीबीएसई के रिकॉर्ड में यह परिवर्तन विधिवत दर्ज कराया गया है, यदि दर्ज कराया गया है तो संबंधित आदेश और अनुमति क्या हैं? यदि नहीं, तो दोनों पतों में अंतर क्यों दिखाई दे रहा है? इन प्रश्नों का उत्तर केवल संबंधित संस्थान ही नहीं, बल्कि संबद्ध नियामक संस्थाओं को भी स्पष्ट करना चाहिए। क्या भवन विद्यालय संचालन के लिए अधिकृत है? किसी भी भवन का निर्माण एक स्वीकृत मानचित्र के अनुसार होता है। निर्माण के बाद उसका उपयोग भी उसी उद्देश्य के अनुरूप किया जाना चाहिए जिसके लिए अनुमति प्राप्त हुई हो। यदि किसी भवन का उपयोग विद्यालय या शिक्षण संस्थान के रूप में किया जा रहा है, तो सामान्यतः यह आवश्यक होता है कि संबंधित भवन के पास आवश्यक स्वीकृतियां, उपयोग संबंधी वैधानिक अनुमतियां तथा अधिभोग प्रमाणपत्र (Occupancy Certificate) उपलब्ध हों।

संबंधित विभाग सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट करें

क्या संबंधित भवन विद्यालय संचालन के लिए अधिकृत है? क्या उसका निर्माण स्वीकृत मानचित्र के अनुरूप हुआ? क्या अधिभोग प्रमाणपत्र जारी किया गया? क्या भवन का उपयोग नियमानुसार है? यदि सभी दस्तावेज उपलब्ध हैं तो उन्हें सार्वजनिक करने में किसी प्रकार की आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

फायर एनओसी सबसे अहम सवाल

लखनऊ की घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि आग लगने के बाद फायर ब्रिगेड की गाड़ियां नहीं, बल्कि पहले से मौजूद सुरक्षा व्यवस्था बच्चों की जान बचाती है। इसीलिए किसी भी बहुमंजिला शिक्षण संस्थान के लिए अग्निशमन विभाग की अनापत्ति प्रमाणपत्र अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। क्या संबंधित भवन के लिए वैध फायर एनओसी जारी है? यदि जारी है तो उसकी वैधता अवधि क्या है? क्या उसका समय-समय पर नवीनीकरण कराया गया? क्या फायर सेफ्टी ऑडिट कराया गया? क्या अग्निशमन विभाग ने भौतिक निरीक्षण किया? यदि इन सभी प्रश्नों का उत्तर हां है, तो संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक किए जाने चाहिए ताकि किसी प्रकार का भ्रम न रहे।

क्या केवल फायर एनओसी ही पर्याप्त है?

सुरक्षा केवल एक कागजी एनओसी से पूरी नहीं होती। क्या भवन में पर्याप्त संख्या में अग्निशमन यंत्र लगे हैं?
क्या वे कार्यशील स्थिति में हैं? क्या उनका समय-समय पर रिफिल कराया जाता है? क्या प्रत्येक मंजिल पर अग्निशमन व्यवस्था उपलब्ध है? क्या फायर अलार्म सिस्टम लगाया गया है? क्या धुआं पहचानने वाले सेंसर मौजूद हैं? क्या बच्चों और शिक्षकों को मॉक ड्रिल कराई जाती है? यदि इनमें से किसी भी व्यवस्था का अभाव है, तो किसी भी आपात स्थिति में गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं।

आकस्मिक निकास भी उतना ही जरूरी

लखनऊ सहित देशभर में हुई अनेक दुर्घटनाओं की जांच रिपोर्टों में एक बात बार-बार सामने आई है कि अधिकांश लोगों की जान आग से नहीं, बल्कि बाहर निकलने का रास्ता न मिलने के कारण गई। इसलिए यह भी आवश्यक है कि संबंधित भवन में पर्याप्त चौड़ाई वाले सीढ़ी मार्ग हों। इमरजेंसी एग्जिट उपलब्ध हो। निकास मार्ग पर किसी प्रकार का अवरोध न हो। आपातकालीन संकेतक लगाए गए हों। बिजली जाने की स्थिति में इमरजेंसी लाइटिंग उपलब्ध हो। इन व्यवस्थाओं का सत्यापन केवल दस्तावेजों से नहीं बल्कि भौतिक निरीक्षण से ही संभव है।

नगर निगम और विकास प्राधिकरण की भूमिका भी जांच के दायरे में

यदि किसी भवन का उपयोग उसके स्वीकृत उद्देश्य से अलग किया जा रहा है, तो संबंधित स्थानीय निकायों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। भवन की वर्तमान श्रेणी क्या है? क्या विद्यालय संचालन की अनुमति उपलब्ध है? क्या निर्माण स्वीकृत मानचित्र के अनुरूप है? क्या किसी प्रकार का अवैध निर्माण या परिवर्तन हुआ है? क्या संबंधित भवन का निरीक्षण किया गया? यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप है तो विभागों को इसकी आधिकारिक पुष्टि करनी चाहिए। यदि कहीं कमी है तो नियमानुसार कार्रवाई भी होनी चाहिए।

अभिभावकों का सबसे बड़ा सवाल बच्चे सुरक्षित हैं या नहीं?

किसी भी अभिभावक के लिए सबसे बड़ी चिंता यह नहीं होती कि विद्यालय कितना बड़ा है या उसकी इमारत कितनी आकर्षक है। सबसे बड़ा प्रश्न यह होता है कि उसका बच्चा वहां सुरक्षित है या नहीं। अभिभावक यह जानने का अधिकार रखते हैं कि विद्यालय की सुरक्षा व्यवस्था क्या है? अग्निशमन उपकरण कब जांचे गए?
भवन की वैधानिक स्थिति क्या है? आपदा की स्थिति में बच्चों को बाहर निकालने की क्या योजना है? यह जानकारी छिपाने की नहीं बल्कि सार्वजनिक करने की होनी चाहिए।

वर्ष 2018 में दर्ज हुआ था मुकदमा

विदित हो कि विद्यालय के निदेशक समृद्ध गुप्ता पर उपलब्ध न्यायिक अभिलेखों के अनुसार, वर्ष 2018 में थाना फूलपुर में भारतीय दंड संहिता की तत्कालीन धारा 376 (बलात्कार), 328 (नशीला पदार्थ देकर अपराध करना), 504 (जानबूझकर अपमान) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। शिकायतकर्ता महिला ने न्यायालय में धारा 156(3) के तहत प्रार्थना पत्र देकर आरोप लगाया था कि वर्ष 2017 में उसकी पहचान समृद्ध गुप्ता से हुई। शिकायत में कहा गया कि आरोपी ने स्वयं को एक शिक्षण संस्थान का निदेशक बताते हुए विश्वास में लिया और रोजगार संबंधी सहायता का आश्वासन दिया। शिकायत में आगे आरोप लगाए गए कि होटल में बुलाकर उसके पेय पदार्थ में नशीला पदार्थ मिलाया गया और उसकी इच्छा के विरुद्ध शारीरिक संबंध बनाए गए। शिकायत में यह भी आरोप था कि बाद में अश्लील फोटो एवं वीडियो वायरल करने की धमकी देकर उसका शोषण किया गया। ये आरोप अत्यंत गंभीर थे और इन्हीं के आधार पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर विवेचना की। विवेचना के दौरान न्यायालय के समक्ष मुख्य शिकायतकर्ता अपने पूर्व कथनों से मुकर गई। उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर अभियोजन आरोपों को संदेह से परे सिद्ध नहीं कर सका। फलस्वरूप 31 जनवरी 2024 को संबंधित न्यायालय ने साक्ष्यों के अभाव और मुख्य गवाह के मुकर जाने के कारण समृद्ध गुप्ता को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। अतः इस प्रकरण का उल्लेख केवल न्यायिक रिकॉर्ड के रूप में किया जा रहा है। वर्तमान में उन्हें इस मामले में दोषी नहीं माना जा सकता।

* लखनऊ अग्निकांड के बाद वाराणसी के शिक्षण संस्थानों की पड़ताल।
* विद्यालय के पंजीकृत पते और वास्तविक संचालन स्थल में अंतर होने के संकेत।
* सीबीएसई रिकॉर्ड और सार्वजनिक व्यापारिक निर्देशिकाओं में अलग-अलग पते का उल्लेख।
* भवन मानचित्र, अधिभोग प्रमाणपत्र और उपयोग परिवर्तन की वैधानिक स्थिति पर सवाल।
* अग्निशमन विभाग की एनओसी और फायर सेफ्टी व्यवस्था की जांच की मांग।
* आकस्मिक निकास, फायर अलार्म और अग्निशमन यंत्रों की उपलब्धता पर प्रश्न।
* सक्षम अधिकारियों से स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराने की मांग।
* संचालक के विरुद्ध दर्ज आपराधिक मुकदमे का न्यायालय द्वारा साक्ष्यों के अभाव में बरी किया गया।

 

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