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सुप्रीम कोर्ट बताए आखिर भारत के नागरिकता का क्या है आधार या सभी सरकारी प्रपत्र है बेकार

शीर्ष न्यायालय व विदेश मंत्रालय दे रहे है कुतर्क,भारत के हर सिस्टम का हो गया है बेड़ा कर्क

भारत का नागरिक कौन हो सकता है, क्या जिन लोगों के पास आधार कार्ड, राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, पैन कार्ड और इन सबके साथ-साथ पासपोर्ट भी है, उन्हें भी भारत का नागरिक माना जाए या नहीं, यह एक गंभीर सवाल विदेश मंत्रालय के एक बयान के बाद उठ रहा है। विगत सप्ताह विदेश मंत्रालय ने 14वें पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर देश में पासपोर्ट सेवाओं के विस्तार और उपलब्धियों की जानकारी साझा की। इसी दौरान मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि पासपोर्ट अंतरराष्ट्रीय यात्रा को सुगम बनाने के लिए जारी किया जाने वाला सरकारी दस्तावेज है, लेकिन यह अपने आप में नागरिकता का ठोस प्रमाण नहीं है। इसके बाद सवाल उठने लगे कि आखिर मोदी सरकार अब कोई नयी खिचड़ी पका रही है। क्योंकि कुछ समय पहले एसआईआर पर जब सुनवाई हो रही थी तो आधार कार्ड को नागरिकता का सबूत नहीं माना गया।

जबकि आधार बनवाना हो या पासपोर्ट, इन सबके लिए कई घर के पते से लेकर बिजली या टेलिफोन बिल और मैट्रिक के प्रमाणपत्र तक कई तरह के दस्तावेज मांगे जाते हैं, पुलिस जांच की प्रक्रिया होती है, ताकि संदिग्ध व्यक्ति के हाथ में ऐसे महत्वपूर्ण पहचान पत्र न चले जाएं। जब हर तरफ से जांच पूरी होती है, तभी आधार और पासपोर्ट जैसे दस्तावेज जारी होते हैं। लेकिन विदेश मंत्रालय के बयान के बाद सवाल पूछा जाने लगा है कि पैन कार्ड केवल आय से जुड़े कामों के लिए हैं, पासपोर्ट सफर के लिए, मतदाता कार्ड वोट डालने और आधार बैंक खाता खोलने आदि के लिए है, तो फिर नागरिकता और किस तरह से साबित की जा सकती है।

बता दें कि भारतीय नागरिकता कानून के अनुसार 26 जनवरी 1950 से 1 जुलाई 1987 के बीच भारत में जन्म लेने वाला व्यक्ति जन्म से भारतीय नागरिक माना जाता है। इस दौरान माता-पिता की राष्ट्रीयता कोई मायने नहीं रखती थी। यानी माता-पिता विदेशी भी हों, तो भी बच्चा भारत में जन्म लेने पर भारतीय नागरिक होता था। लेकिन 1 जुलाई 1987 के बाद जन्मे व्यक्ति को नागरिकता तभी मिलेगी जब उसके माता-पिता में से कम से कम एक भारतीय नागरिक हो। 3 दिसंबर 2004 के बाद जन्मे व्यक्ति को तभी नागरिक माना जाएगा जब दोनों माता-पिता भारतीय हों या एक भारतीय नागरिक हो और दूसरा अवैध प्रवासी न हो।

अब विदेश मंत्रालय के एक अविचारित बयान के कारण अनावश्यक विवाद खड़ा हो गया है। पासपोर्ट एक्ट के तहत पासपोर्ट जारी किया जाता है, और नागरिकता एक्ट, 1955 के तहत नागरिकता तय होती है। पासपोर्ट कानून दस्तावेज़ की पुष्टि करता है; नागरिकता कानून नागरिक की कानूनी स्थिति को। इसमें कोई कानूनी विवाद अब तक खड़ा नहीं हुआ है। ध्यान दें कि पासपोर्ट पर ‘रिपब्लिक ऑफ़ इंडिया’ लिखा होता है, यानी यह भारतीय गणराज्य का दस्तावेज है, इसे रखने वाले की पहचान इस पर लिखी होती है। विदेश यात्रा के लिए इसकी अनिवार्यता है, क्योंकि इसी पर दूसरे देश की सरकारें प्रवेश की अनुमति यानी वीज़ा चस्पां करती हैं, क्योंकि उन्हें यकीन है कि भारत सरकार ने इसे जारी करने से पहले धारक की नागरिकता की पुष्टि कर ली है। सरकारी अधिकारियों, सांसदों आदि के लिए सरकारी पासपोर्ट बनता है और जब वे आम व्यक्ति की श्रेणी में आते हैं, तो उनके पासपोर्ट का दर्जा भी बदल जाता है। भारतीय नागरिक भारत के साथ किसी अन्य देश का पासपोर्ट नहीं रख सकते हैं, याद कीजिए असम के मुख्यमंत्री हिमंताबिस्वा सरमा की पत्नी पर पवन खेड़ा ने तीन पासपोर्ट रखने के ही आरोप लगाए थे। ऐसे में यह सवाल जायज है कि अगर पासपोर्ट नागरिकता का सबूत नहीं है, तो फिर क्या है?

कानूनी तौर पर पासपोर्ट से नागरिकता नहीं मिलती। और न ही यह वह कानूनी दस्तावेज़ है जो अदालत में नागरिकता पर सवाल उठने पर उसे तय करता है। धोखाधड़ी, माता-पिता के बारे में विवाद या गैर-कानूनी तरीके से नागरिकता हासिल करने जैसे दुर्लभ मामलों में, नागरिकता को ‘नागरिकता अधिनियम’ के प्रावधानों और सहायक सबूतों के ज़रिए साबित करना पड़ सकता है। इसीलिए कानून की नज़र में पासपोर्ट को हर स्थिति में पक्का सबूत नहीं माना जाता। मगर फिर भी यह तो तय है कि भारत का पासपोर्ट भारतीय नागरिक को ही जारी हो सकता है, किसी और को नहीं, इसलिए इसका व्यावहारिक महत्व अनदेखा नहीं किया जा सकता।

भारत 1947 में आजाद हुआ और 1950 में संविधान लागू हुआ तो इसे गणतंत्र का दर्जा मिला और उसके बाद नागरिकों के पंजीकरण का काम धीरे-धीरे अलग-अलग तरीकों से शुरु हुआ। ऐसे में इस तथ्य को नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि लाखों बुजुर्ग भारतीयों का जन्म तब हुआ था जब जन्म प्रमाणपत्र या जन्म के पंजीकरण जैसे काम नहीं होते थे। स्कूली प्रमाणपत्र, ज़मीन के रिकॉर्ड और वोटर लिस्ट में नाम अलग-अलग तरह से दर्ज थे। असम में हुई एनआरसी में देश ने देखा है कि जब नागरिकता ही कानूनी जांच का विषय बन जाती है, तो कागज़ात में कमियां कितनी बड़ी मुश्किल खड़ी कर सकती हैं। इसके शिकार अक्सर गरीब, महिलाएं और मुस्लिम अल्पसंख्यक बनते हैं। अभी एसआईआर में भी यही तबका सबसे ज्यादा प्रताड़ित हुआ। इसलिए पासपोर्ट या आधार आदि पर बयान देने से बेहतर यह है कि सरकार सुविधाजनक, मज़बूत और व्यापक नागरिक पंजीकरण की व्यवस्था बनाए, ताकि हाड़-मांस के इंसानों पर यह तलवार न लटके कि वे कभी भी अपनी ही जमीन से गैर नागरिक कहकर हटाए जा सकते हैं। सरकार को इसमें भारतीय उपमहाद्वीप के हालिया इतिहास की त्रासदियों को भी संवेदनशीलता के साथ ध्यान में रखना चाहिए, जिसमें दो-दो बार हुए बंटवारे ने लाखों जिंदगियों के अस्तित्व पर सवाल खड़े कर दिए।

सरकार बेशक नागरिकता और पासपोर्ट दोनों कानूनों को कमज़ोर न करे, लेकिन देश के सबसे अहम दस्तावेज़ों में से एक पर लोगों का भरोसा भी कम नहीं होना चाहिए।

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