मोहित अग्रवाल ने लिया दृढ़ संकल्प,जिले के थानों का करेंगे कायाकल्प
पुलिस कमिश्नर की नई पहल

* थानों को गोद लेकर बदलेगी वाराणसी की पुलिसिंग
* मोहित अग्रवाल का नया प्रयोग: एडीजी से सीओ तक संभालेंगे एक-एक थाने की जिम्मेदारी,
* सूरत के साथ सीरत और कार्यशैली बदलने पर जोर
* सड़क से थाना तक जवाबदेही तय करने की पहल,
* वरिष्ठ पुलिस अधिकारी खुद चेक करेंगे जमीनी हकीकत,बदलेगी जिले के पुलिसिंग की सुरत
* जनता का विश्वास जीतना और अपराध पर अंकुश होगा प्राथमिकता

वाराणसी। पुलिसिंग में बदलाव केवल आदेशों और बैठकों से नहीं, बल्कि अधिकारियों की सीधी भागीदारी से आता है। इसी सोच के साथ वाराणसी के पुलिस कमिश्नर मोहित अग्रवाल ने कमिश्नरेट पुलिसिंग में एक नया प्रयोग शुरू किया है। अब अधिकारी केवल अपने अधीनस्थ थानों की समीक्षा नहीं करेंगे, बल्कि एक-एक थाना गोद लेकर उसकी सूरत, सीरत और कार्यप्रणाली बदलने की जिम्मेदारी भी उठाएंगे।
कैंप कार्यालय में हुई बैठक में पुलिस कमिश्नर ने अधिकारियों के सामने इस अभिनव प्रयोग का प्रस्ताव रखा। सीपी की पहल पर कमिश्नरेट में तैनात एडीजी से लेकर सीओ स्तर तक के अधिकारियों ने अपने-अपने कार्यक्षेत्र के एक-एक थाने को गोद लेने पर सहमति जताई। इसके साथ ही थानों में व्यवस्था सुधारने, पुलिसिंग को जनोन्मुख बनाने और अपराध नियंत्रण की रणनीति को और प्रभावी करने की दिशा में नई कवायद शुरू हो गई है।
सबसे खास बात यह है कि इस प्रयोग की शुरुआत खुद पुलिस कमिश्नर मोहित अग्रवाल ने की है। उन्होंने थाना चौक को अपने लिए चुना है, जबकि डीआईजी ने कैंट थाने की जिम्मेदारी ली है।

सीपी खुद संभालेंगे चौक की जिम्मेदारी
वरिष्ठ अधिकारी जब खुद थाने की कमान संभालेंगे तो नीचे तक जवाबदेही का संदेश स्वतः चला जायेगा।
पुलिस कमिश्नर मोहित अग्रवाल द्वारा खुद थाना चौक को गोद लेना इस पूरी योजना का सबसे महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है। आमतौर पर वरिष्ठ अधिकारी थानों की समीक्षा करते हैं, निर्देश देते हैं और रिपोर्ट लेते हैं। लेकिन यहां मॉडल कुछ अलग है—अधिकारी को खुद उस थाने की व्यवस्था में सुधार का भागीदार बनाया जा रहा है।
इसका असर थानेदार से लेकर निचले स्तर तक दिखाई देने की उम्मीद है। अधिकारी को अपने थाने की वास्तविक समस्याओं को समझना होगा और उनके समाधान के लिए खुद पहल करनी होगी।
सिर्फ सूरत नहीं, सीरत भी बदलने का लक्ष्य
थाना भवन से लेकर पुलिसकर्मियों की कार्यशैली पर मोहित अग्रवाल की नजर रहेगी
पुलिस कमिश्नर की यह पहल केवल थाने की दीवारों को चमकाने अथवा परिसर को साफ रखने तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य थानों की कार्य संस्कृति में बदलाव लाना है।
थाने में आने वाला आम नागरिक किस माहौल का सामना करता है, उसकी शिकायत कितनी गंभीरता से सुनी जाती है, उसे कार्रवाई की जानकारी मिलती है या नहीं, पुलिसकर्मियों का व्यवहार कैसा है और लंबित मामलों की स्थिति क्या है—इन तमाम पहलुओं पर ध्यान दिया जाएगा।
थानों की साफ-सफाई, कार्यालय व्यवस्था, अभिलेखों का रखरखाव और पुलिसकर्मियों के लिए मेस की बेहतर व्यवस्था भी इस योजना का हिस्सा होगी।
सीपी की मंशा साफ है कि अच्छी पुलिसिंग का मतलब केवल अपराधी पकड़ना नहीं, बल्कि आम आदमी को सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल उपलब्ध कराना भी है।
यातायात व्यवस्था में फेल अफसरों की भी तय होगी जिम्मेदारी
चौराहों और सड़कों की समस्या का स्थानीय स्तर पर समाधान पुलिस अधिकारी तलाशेंगे।
वाराणसी की यातायात व्यवस्था पुलिस के सामने हमेशा बड़ी चुनौती रही है। शहर के प्रमुख बाजार, धार्मिक स्थल, संकरी सड़कें और लगातार बढ़ता वाहनों का दबाव व्यवस्था को प्रभावित करते हैं। ऐसे में सिर्फ ट्रैफिक प्लान बनाने से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।
नई व्यवस्था में उन स्थानों पर भी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने पर जोर दिया जाएगा, जहां यातायात व्यवस्था लगातार प्रभावित होती है। उद्देश्य यह है कि अधिकारी समस्या को केवल रिपोर्ट में दर्ज न करें, बल्कि मौके पर पहुंचकर उसका समाधान खोजें।
यही जवाबदेही थानों की पुलिसिंग में भी लागू होगी। किसी इलाके में अपराध, विवाद, अतिक्रमण, यातायात या जनशिकायत की समस्या बार-बार सामने आती है तो संबंधित अधिकारी उसके स्थायी समाधान के लिए योजना बनाएंगे।
“जल्द दिखाई देगा बदलाव”
सीपी मोहित अग्रवाल ने कहा कि जनता का विश्वास जीतने के साथ अपराध पर अंकुश हमारी प्राथमिकता होगी
पुलिस कमिश्नर ने अधिकारियों को स्पष्ट संदेश दिया है कि इस प्रयोग का असर जल्द दिखाई देना चाहिए। थानों की कार्यप्रणाली में बदलाव केवल कागजों में नहीं, बल्कि जमीन पर नजर आना चाहिए।
सीपी के मुताबिक थानों में पुलिसकर्मियों के कामकाज को बेहतर बनाने के साथ जनता का विश्वास जीतना और अपराध पर अंकुश लगाना इस रणनीति का प्रमुख उद्देश्य है। थानेदारों के साथ वरिष्ठ अधिकारी भी अपराध नियंत्रण और जनसमस्याओं के समाधान में भागीदारी निभाएंगे।
यह मॉडल पुलिसिंग को “आदेश आधारित व्यवस्था” से “भागीदारी आधारित व्यवस्था” की ओर ले जाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
अफसरों के बीच शुरू होगी स्वस्थ प्रतिस्पर्धा
एक थाने का सफल प्रयोग दूसरे थाने का मॉडल बनेगा
इस प्रयोग का एक महत्वपूर्ण पहलू अधिकारियों के बीच बेहतर करने की प्रतिस्पर्धा भी है। अलग-अलग अधिकारी जब अलग-अलग थानों की जिम्मेदारी संभालेंगे तो स्वाभाविक रूप से हर अधिकारी अपने थाने को बेहतर बनाने के लिए नए प्रयोग करेगा।
कहीं बीट पुलिसिंग को मजबूत करने का प्रयोग होगा तो कहीं व्यापारी और पुलिस के बीच संवाद बढ़ाने की कोशिश होगी। किसी थाने में महिला फरियादियों के लिए बेहतर व्यवस्था तैयार की जा सकती है तो किसी थाने में शिकायतों के त्वरित निस्तारण के लिए नई व्यवस्था विकसित की जा सकती है।
यदि किसी अधिकारी का प्रयोग सफल रहता है तो उसे दूसरे थानों में भी लागू किया जा सकेगा।
आईपीएस से पीपीएस तक जिम्मेदारी
मोहित अग्रवाल द्वारा ऊपर से नीचे तक जवाबदेही तय करने का प्रयास किया जा रहा है,जो कि बेहद सराहनीय है।
इस योजना में वरिष्ठता की पूरी श्रृंखला को शामिल किया गया है। एडीजी, डीआईजी, एसपी, एएसपी और डीएसपी स्तर के अधिकारियों की भागीदारी से यह सुनिश्चित करने की कोशिश है कि थाना स्तर की समस्या केवल थानेदार की समस्या बनकर न रह जाए।
वरिष्ठ अधिकारी जब नियमित रूप से अपने गोद लिए थाने की स्थिति की समीक्षा करेंगे तो वहां की कमियों को नजरअंदाज करना मुश्किल होगा। इससे थानेदारों और अधीनस्थ अधिकारियों पर भी बेहतर काम करने का दबाव बनेगा।
यानी इस व्यवस्था में जिम्मेदारी भी ऊपर तक जाएगी और जवाबदेही भी तय होगी।
जनता और व्यापारियों को महसूस होना चाहिए बदलाव
पुलिसिंग का असली रिपोर्ट कार्ड थाने आने वाले नागरिक से मिलेगा
किसी भी पुलिस सुधार की सफलता का सबसे बड़ा पैमाना सरकारी आंकड़े नहीं, बल्कि जनता का अनुभव होता है। थाने में पहुंचने वाला पीड़ित यदि बिना डर अपनी बात रख सके, उसकी शिकायत सुनी जाए और उसे समयबद्ध तरीके से कार्रवाई का भरोसा मिले, तभी पुलिसिंग में वास्तविक बदलाव माना जाएगा।
इसीलिए इस योजना में जनता, व्यापारी और स्थानीय नागरिकों के साथ बेहतर संवाद पर भी जोर दिया जा सकता है। क्षेत्र की स्थानीय समस्याओं को समझकर उनका समाधान करने से पुलिस और जनता के बीच दूरी कम होगी।
मोहित अग्रवाल की इस पहल की सफलता भी इसी बात पर निर्भर करेगी कि इसका असर थाने की फाइलों से निकलकर सड़क, बाजार और आम आदमी के अनुभव में कितना दिखाई देता है।
वाराणसी मॉडल बन सकता है उत्तर प्रदेश में मिशाल
नवाचार और जवाबदेही का प्रयोग सफल हुआ तो दूसरे कमिश्नरेट भी इस मॉडल को अपना सकते हैं।
वाराणसी जैसे महत्वपूर्ण शहर में पुलिसिंग को बेहतर बनाने के लिए शुरू किया गया यह प्रयोग सफल होता है तो इसे दूसरे जिलों और कमिश्नरेट में भी अपनाया जा सकता है।
इस मॉडल की खासियत यह है कि इसमें अतिरिक्त रूप से केवल संसाधन बढ़ाने की बात नहीं की जा रही, बल्कि उपलब्ध मानव संसाधन की जवाबदेही और नेतृत्व क्षमता का बेहतर इस्तेमाल करने पर जोर है।
वरिष्ठ अधिकारी यदि अपने-अपने थानों को बेहतर बनाने के लिए नए प्रयोग करते हैं और उनके परिणामों का निष्पक्ष मूल्यांकन होता है तो पुलिसिंग के क्षेत्र में कई प्रभावी मॉडल सामने आ सकते हैं।
मोहित अग्रवाल की पहल ने पुलिसिंग में प्रयोग और जवाबदेही का नया रास्ता जरूर खोल दिया है।
अब चुनौती इस प्रयोग को जमीन पर उतारने की है। यदि वरिष्ठ अधिकारियों की सीधी भागीदारी, थानों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा, नवाचार और जनता से बेहतर संवाद का यह मॉडल सफल रहा तो वाराणसी कमिश्नरेट में पुलिसिंग की तस्वीर बदल सकती है।
इस बदलाव का सबसे बड़ा प्रमाण तब माना जाएगा, जब थाने में पहुंचने वाला आम नागरिक खुद कहे कि पुलिस की कार्यप्रणाली पहले से बेहतर हुई है।
यही इस प्रयोग की असली सफलता होगी और यही मोहित अग्रवाल की पहल का सबसे बड़ा रिपोर्ट कार्ड साबित होगी।
– एडीजी से सीओ तक अधिकारी गोद लेंगे थाने।
– सीपी मोहित अग्रवाल ने चुना थाना चौक।
– डीआईजी ने संभाली कैंट थाने की जिम्मेदारी।
– अपराध नियंत्रण के साथ जनसुनवाई पर जोर।
– थाना परिसर की साफ-सफाई और मेस व्यवस्था होगी बेहतर।
– सफल प्रयोगों को दूसरे थानों में भी लागू किया जाएगा।



