डीजीपी राजीव कृष्ण की रणनीति से यूपी में अपराधियों पर शिकंजा,क्राइम पर चलेगा इनका “पंजा”
ऑपरेशन कनविक्शन हिट

- नाबालिग बेटी से दुष्कर्म के दोषी पिता को 114 दिनों में सजा
- क्राइम के खिलाफ योगी सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति को जमीन पर उतार रहा ऑपरेशन कनविक्शन
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अपराध के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति अब केवल गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि गंभीर अपराधों के मामलों में दोषियों को अदालत से जल्द से जल्द सजा दिलाने की दिशा में भी तेजी से काम हो रहा है। इसी उद्देश्य के साथ प्रदेश में चलाया जा रहा ऑपरेशन कनविक्शन अब कानून-व्यवस्था की तस्वीर बदलने वाली प्रभावी पुलिसिंग के रूप में सामने आ रहा है।
प्रदेश के पुलिस महानिदेशक राजीव कृष्ण के नेतृत्व में ऑपरेशन कनविक्शन का जोर केवल अपराधी को पकड़ने पर नहीं, बल्कि मजबूत विवेचना, वैज्ञानिक साक्ष्य, समयबद्ध चार्जशीट और प्रभावी अभियोजन के जरिए अदालत में दोष सिद्ध कराने पर है। सीतापुर का हालिया मामला इसी रणनीति की सफलता का एक उल्लेखनीय उदाहरण है।

114 दिनों में मिला न्याय, 10 दिन में दाखिल हुआ आरोप-पत्र
सीतापुर में नाबालिग बेटी से दुष्कर्म के दोषी पिता को मामला दर्ज होने के महज 114 दिनों के भीतर अदालत से सजा मिलना बताता है कि यदि पुलिस जांच और अभियोजन के बीच बेहतर तालमेल हो तो गंभीर अपराधों के मामलों में न्याय की प्रक्रिया को प्रभावी ढंग से गति दी जा सकती है।
इस मामले में पुलिस ने घटना के बाद तेजी से कार्रवाई करते हुए महज 10 दिनों में न्यायालय में आरोप-पत्र दाखिल कर दिया। इसके बाद वैज्ञानिक साक्ष्यों को मजबूती से अदालत के सामने रखा गया। मामले में टूटे हुए बटन, बाल और कपड़ों से मिले महत्वपूर्ण साक्ष्यों की एफएसएल जांच कराई गई। इसके साथ ही मेडिकल रिपोर्ट को भी विवेचना का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया।
यही वह पुलिसिंग मॉडल है जिस पर डीजीपी राजीव कृष्ण के नेतृत्व में ऑपरेशन कनविक्शन का जोर दिखाई देता है—जांच में जल्दबाजी नहीं, बल्कि वैज्ञानिकता; अभियोजन में औपचारिकता नहीं, बल्कि मजबूती; और अदालत में केवल दावा नहीं, बल्कि ठोस साक्ष्य जिससे अपराधी बचने न पाए।
डीजीपी राजीव कृष्ण की रणनीति का केंद्र—‘सजा दिलाना’
अपराध नियंत्रण की पारंपरिक व्यवस्था में पुलिस की सफलता अक्सर गिरफ्तारी तक मानी जाती रही है। लेकिन ऑपरेशन कनविक्शन इस सोच को आगे बढ़ाते हुए पुलिस की सफलता का एक और महत्वपूर्ण पैमाना सामने रखता है,दोषी को अदालत से सजा दिलाना है
डीजीपी राजीव कृष्ण के नेतृत्व में पुलिस और अभियोजन के बीच समन्वय को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। गंभीर अपराधों में विवेचना की गुणवत्ता, साक्ष्यों का वैज्ञानिक परीक्षण, समय से आरोप-पत्र दाखिल करना और अदालत में प्रभावी पैरवी, इन सभी कड़ियों को एक साथ जोड़कर कार्रवाई को अंजाम दिया जा रहा है।
सीतापुर का मामला इसी सोच की तस्वीर पेश करता है। घटना के बाद पुलिस ने केवल आरोपी को गिरफ्तार करने तक अपनी जिम्मेदारी सीमित नहीं रखी, बल्कि साक्ष्यों को सुरक्षित किया, उनकी वैज्ञानिक जांच कराई और न्यायालय के समक्ष मामले को मजबूती से रखा।
सीतापुर की घटना ने झकझोरा, पुलिस की कार्रवाई ने दिया जवाब
सीतापुर के कमलापुर थाना क्षेत्र में 17 मई 2026 को एक नाबालिग पीड़िता की मां ने अपने पति के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। आरोप था कि आरोपी ने अपनी 13 वर्षीय बेटी के साथ दुष्कर्म किया।
बताया गया कि आरोपी पिता अपनी बेटी को उसकी बुआ के घर से वापस लेकर आ रहा था। रास्ते में उसने बेटी को डराया-धमकाया और गन्ने के खेत के पास उसके साथ दुष्कर्म किया।
शिकायत सामने आते ही पुलिस ने मामले को गंभीरता से लिया। आरोपी के खिलाफ पॉक्सो एक्ट समेत संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया और जांच को तेजी से आगे बढ़ाया गया।
इस तरह के मामलों में सबसे बड़ी चुनौती होती है कि पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए उपलब्ध साक्ष्यों को समय रहते सुरक्षित किया जाए और वैज्ञानिक तरीके से उनकी जांच कराई जाए। सीतापुर पुलिस ने इसी दिशा में काम किया।
टूटे बटन, बाल और कपड़े बने अहम वैज्ञानिक साक्ष्य
इस मामले की विवेचना में घटनास्थल और संबंधित सामग्री से मिले साक्ष्यों को महत्वपूर्ण माना गया। टूटे बटन, बाल और कपड़ों से जुड़े साक्ष्यों की एफएसएल जांच कराई गई। मेडिकल रिपोर्ट को भी जांच का हिस्सा बनाया गया।
यही वैज्ञानिक साक्ष्य आगे अदालत में अभियोजन के लिए महत्वपूर्ण आधार बने।
यह पहल बताती है कि आधुनिक पुलिसिंग में केवल प्रत्यक्ष बयान या परिस्थितिजन्य तथ्यों पर निर्भर रहने के बजाय फॉरेंसिक और वैज्ञानिक साक्ष्यों का इस्तेमाल कितना महत्वपूर्ण हो चुका है।
डीजीपी राजीव कृष्ण के नेतृत्व में पुलिसिंग की यही दिशा ऑपरेशन कनविक्शन को सामान्य अभियान से अलग पहचान देती है।
पुलिस-अभियोजन के बेहतर तालमेल का परिणाम
किसी भी गंभीर आपराधिक मामले में पुलिस द्वारा की गई जांच तभी प्रभावी साबित होती है, जब अभियोजन पक्ष उसे अदालत में सही तरीके से प्रस्तुत करे। सीतापुर मामले में पुलिस की विवेचना और अभियोजन की पैरवी के बीच बेहतर समन्वय दिखाई दिया।
मामला दर्ज होने के बाद केवल 10 दिनों में आरोप-पत्र दाखिल किया गया। इसके बाद अदालत में साक्ष्यों और मेडिकल रिपोर्ट को प्रभावी तरीके से रखा गया।
नतीजा यह हुआ कि 8 सितंबर को विशेष पॉक्सो अदालत ने आरोपी को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास तथा 20 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई।
यह फैसला केवल एक मामले में सजा नहीं है, बल्कि उन अपराधियों के लिए भी स्पष्ट संदेश है जो कानून की कमजोरी का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं।
ऑपरेशन कनविक्शन की असली ताकत क्या है?
ऑपरेशन कनविक्शन का मूल उद्देश्य गंभीर अपराधों में कार्रवाई को केवल एफआईआर और गिरफ्तारी तक सीमित न रखना है। इसके तहत पुलिस की कोशिश होती है कि—
– गंभीर अपराधों में तत्काल कार्रवाई हो।
– विवेचना समयबद्ध और गुणवत्तापूर्ण हो।
– वैज्ञानिक और फॉरेंसिक साक्ष्यों को प्राथमिकता मिले।
– समय से आरोप-पत्र अदालत में दाखिल किया जाए।
– पुलिस और अभियोजन के बीच बेहतर तालमेल रहे।
– अदालत में मजबूत पैरवी की जाए।
– दोषियों को जल्द से जल्द सजा दिलाने की दिशा में प्रभावी प्रयास हों।
यानी ऑपरेशन कनविक्शन का संदेश साफ है—अपराध करो और कानून की प्रक्रिया को वर्षों तक चुनौती देते रहो, यह व्यवस्था अब स्वीकार्य नहीं है।
डीजीपी राजीव कृष्ण के नेतृत्व में बदलती पुलिसिंग की तस्वीर
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में पुलिसिंग आसान काम नहीं है। यहां अपराध की प्रकृति, भौगोलिक परिस्थितियां और सामाजिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं। ऐसे में प्रदेशभर में एक समान प्रभावी पुलिसिंग व्यवस्था तैयार करना अपने आप में बड़ी चुनौती है।
डीजीपी राजीव कृष्ण के नेतृत्व में ऑपरेशन कनविक्शन इसी चुनौती का जवाब देने की कोशिश है।
इस मॉडल में पुलिस अधिकारी से अपेक्षा केवल अपराधी को गिरफ्तार करने की नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि जांच ऐसी हो जो अदालत में टिक सके। साक्ष्य ऐसे हों जिन्हें वैज्ञानिक जांच का समर्थन प्राप्त हो और अभियोजन पक्ष के पास अदालत में दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हो।
यही कारण है कि सीतापुर जैसे मामलों में कम समय के भीतर फैसला आने को ऑपरेशन कनविक्शन की प्रभावशीलता से जोड़कर देखा जा रहा है।
महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध पर विशेष फोकस
महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराध समाज के लिए सबसे गंभीर चुनौतियों में शामिल हैं। ऐसे मामलों में पीड़ित परिवार को सबसे अधिक आवश्यकता होती है कि पुलिस संवेदनशीलता के साथ कार्रवाई करे और न्याय प्रक्रिया अनावश्यक रूप से लंबी न खिंचे।
नाबालिग पीड़िता से जुड़े सीतापुर मामले में तेज विवेचना और मजबूत अभियोजन ने यही संदेश दिया कि ऐसे अपराधों में कानून का शिकंजा कमजोर नहीं है।
पॉक्सो मामलों में वैज्ञानिक जांच और समयबद्ध कार्रवाई न केवल दोषियों को सजा दिलाने में मदद करती है, बल्कि पीड़ितों और उनके परिवारों के भीतर न्याय व्यवस्था के प्रति भरोसा भी मजबूत करती है।
‘जांच में बारीकी, पैरवी में मजबूती, न्याय में तेजी’
सीतापुर मामले की पूरी कार्रवाई को तीन शब्दों में समझा जा सकता है—जांच में बारीकी, पैरवी में मजबूती और न्याय में तेजी।
यही ऑपरेशन कनविक्शन की कार्यशैली का सार भी बनता दिखाई देता है।
डीजीपी राजीव कृष्ण के नेतृत्व में यदि पुलिस इसी तरह वैज्ञानिक जांच और मजबूत अभियोजन को प्राथमिकता देती रही तो आने वाले समय में गंभीर अपराधों के मामलों में दोषसिद्धि की प्रक्रिया और अधिक प्रभावी हो सकती है।
एनकाउंटर से आगे की पुलिसिंग
उत्तर प्रदेश में अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की चर्चा अक्सर एनकाउंटर और गिरफ्तारी के संदर्भ में होती है। लेकिन ऑपरेशन कनविक्शन पुलिसिंग के एक दूसरे महत्वपूर्ण पक्ष को सामने लाता है।
किसी अपराधी को गिरफ्तार करना पुलिस की कार्रवाई का पहला चरण है। वास्तविक सफलता तब मानी जाती है जब पर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर अदालत में उसका अपराध साबित हो और उसे कानून के मुताबिक सजा मिले।




