संजय कुशवाहा अवैध बस पार्किंग करवा रहा लगातार,नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल व आदमपुर थाना “मनीमलाई”के आगे लाचार
बसों का अड्डा बनी कॉलोनी, खाकी और नगर निगम की खामोशी पर सवाल

- पुलिस की नाक के नीचे सड़क पर भारी बसों का कथित कब्जा, बच्चों की सुरक्षा दांव पर
- स्कूल के सामने बसों का जमावड़ा, दीवार तोड़ने के आरोप ने खोली व्यवस्था की पोल
- सार्वजनिक सड़क से कथित कमाई का खेल, प्रति बस से वसूली का आरोप
- शिकायतकर्ता को जान से मारने की धमकी का दावा, फिर भी कार्रवाई पर सवाल
- नगर निगम, परिवहन विभाग और पुलिस की जिम्मेदारी के बीच फंसी गंगानगर कॉलोनी
- बड़ा हादसा होने का इंतजार या उससे पहले जागेगी खाकी?
वाराणसी। आदमपुर थाना क्षेत्र की गंगानगर कॉलोनी में सड़क, स्कूल और भारी वाहनों से जुड़ा विवाद अब केवल स्थानीय असुविधा का मामला नहीं रह गया है। स्थानीय लोगों के आरोप सही हैं तो यह मामला सीधे बच्चों की सुरक्षा, सार्वजनिक सड़क के इस्तेमाल, कथित अवैध पार्किंग, कथित वसूली और शिकायतकर्ता को धमकी तक पहुंचता है। सवाल इसलिए भी गंभीर है कि जिस स्थान पर भारी पर्यटक बसों की आवाजाही और पार्किंग का आरोप लगाया जा रहा है, उसके आसपास प्राथमिक विद्यालय भी है। यानी एक तरफ रोजाना स्कूल पहुंचने वाले छोटे बच्चे और दूसरी तरफ सड़क पर आने-जाने वाली भारी बसें। स्थानीय लोगों का आरोप है कि ए-16/1 गंगानगर कॉलोनी की सड़क को लंबे समय से बसों की पार्किंग के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। संजय कुशवाहा के संबंध में स्थानीय स्तर पर यह आरोप लगाया गया कि उनके माध्यम से बड़ी पर्यटक बसों और अन्य वाहनों को सड़क पर खड़ा कराया जाता है। सबसे सनसनीखेज दावा यह है कि इसके बदले प्रति बस 1000 से 1500 रुपये तक लिए जाते हैं। सवाल सिर्फ पार्किंग की वैधता का नहीं, बल्कि सार्वजनिक सड़क के कथित व्यावसायिक इस्तेमाल का है। सबसे चिंताजनक पक्ष स्कूल के बच्चों की सुरक्षा है। स्थानीय लोगों का दावा है कि पूर्व में दो बच्चों के पैरों पर बस का पहिया चढ़ने जैसी घटनाएं हो चुकी हैं। बावजूद प्रशासन ने आज तक कोई कार्रवाई नहीं की।

सड़क किसकी, कमाई किसकी!
सार्वजनिक सड़क किसी व्यक्ति या कारोबारी गतिविधि का निजी पार्किंग परिसर नहीं हो सकती। यही इस पूरे मामले का सबसे सीधा सवाल है। स्थानीय लोगों के अनुसार गंगानगर कॉलोनी की सड़क पर बड़ी बसें खड़ी होती हैं और उनके आवागमन से रास्ता प्रभावित होता है। अगर बसों को सड़क पर खड़ा करने के बदले वास्तव में पैसे लिए जा रहे हैं तो प्रशासन को सबसे पहले यह पता करना चाहिए कि पार्किंग की अनुमति किसने दी। क्या किसी विभाग से वैध अनुमति ली गई है? सड़क का स्वामित्व और अधिकार क्षेत्र किसका है? वहां व्यावसायिक पार्किंग की अनुमति है या नहीं? और यदि अनुमति नहीं है तो इतने समय से गतिविधि कैसे चल रही है? स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रति बस 1000 से 1500 रुपये लिया जाता है। जो माह में लगभग 10 लाख तक होने का अनुमान है। इसलिए प्रशासन को तत्काल मौके की जांच और आर्थिक लेन-देन की पड़ताल करनी चाहिए।
बच्चों के सामने भारी बसें, सुरक्षा व्यवस्था कहां?
गंगानगर कॉलोनी प्रकरण का सबसे संवेदनशील पहलू किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति का विवाद नहीं, बल्कि स्कूल जाने वाले बच्चे हैं। छोटे बच्चों के सामने भारी पर्यटक बसों का आना-जाना अपने आप में जोखिम पैदा करता है। बच्चों की अचानक सड़क पर आ जाने की स्थिति में भारी वाहन के चालक के पास प्रतिक्रिया का समय भी कम हो सकता है। स्कूल खुलने और छुट्टी के समय स्थिति और गंभीर हो सकती है। स्थानीय लोगों का दावा है कि दो बच्चों के पैरों पर पहले बस का पहिया चढ़ चुका है। इसके बाद भी यदि उसी स्थान पर भारी वाहनों की पार्किंग की जा रही तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि संभावित दुर्घटना को नजर अंदाज करने का मामला है। नगर निगम, स्थानीय थाना और यातायात पुलिस को यह देखना चाहिए कि स्कूल के सामने स्कूल के समय भारी वाहनों के प्रवेश को नियंत्रित करने के लिए व्यवस्था की गई है या नहीं।
बसों के लिए स्कूल की दीवार तक…
मामले में स्कूल की करीब चार फुट ऊंची दीवार को कथित रूप से तोड़कर छोटा किए जाने का आरोप भी स्थानीय लोगों द्वारा लगाया गया है। उनका दावा है कि बसों को आसानी से निकालने के लिए दीवार के हिस्से में बदलाव किया गया है। यह पता लगाना जरूरी है कि दीवार किसकी संपत्ति है, उसे हटाने या छोटा करने की अनुमति किस विभाग ने दी और निर्माण संबंधी रिकॉर्ड में इसका क्या उल्लेख है। विद्यालय परिसर से जुड़ी संपत्ति में बदलाव कोई मामूली विषय नहीं है। शिक्षा विभाग, नगर निगम और संबंधित भवन प्राधिकरण को मौके का निरीक्षण कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए। यही पारदर्शिता प्रशासन के प्रति जनता का भरोसा बचा सकती है।
‘शिकायत कर लो, कुछ नहीं होगा’
स्थानीय लोगों ने संजय कुशवाहा पर दबंगई का आरोप लगाते हुए कहा कि आरोपी द्वारा कोई कार्रवाई न होने की बात कहकर लोगों को कथित तौर पर डराया जाता है। इससे भी गंभीर आरोप शिकायतकर्ता अरविंद कुमार को कथित जान से मारने की धमकी का है। आरोप है कि राम जनम ने शिकायत करने अथवा शिकायत की जानकारी सामने आने के बाद उन्हें धमकी दी है कि यदि कहीं शिकायत की तो जान से हाथ धोना पड़ेगा। जिसका सबूत अरविंद ने होने का दावा किया है।शिकायतकर्ता ने लिखित शिकायत दी बावजूद इसके कोई कार्रवाई न होना राम जनम द्वारा शिकायतकर्ता को धमकी दिए जाने और उसका कुछ नहीं होगा इसकी अपने आप में पुष्टि करता है। यदि ऐसा नहीं है तो वाराणसी कमिश्नरेट की पुलिस यह स्पष्ट करे कि उसने शिकायत मिलने के बाद किन धाराओं में मुकदमा पंजीकृत किया और जांच में क्या मिला। क्योंकि शिकायत करने के बाद शिकायतकर्ता को भय में जीना पड़े तो यह कानून के इकबाल को चुनौती देता नजर आता है।
नगर निगम और परिवहन विभाग जवाब दें
पूरे प्रकरण में सवाल सिर्फ आदमपुर पुलिस से नहीं है। नगर निगम और परिवहन विभाग की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। सड़क सार्वजनिक है तो उसके अतिक्रमण और उपयोग की निगरानी नगर निकाय की जिम्मेदारी से जुड़ती है। भारी वाहनों की पार्किंग और संचालन का मामला है तो परिवहन विभाग और यातायात व्यवस्था के जांच के दायरे में आता है। यदि किसी निजी परिसर के बजाय कॉलोनी की सड़क को बस अड्डे जैसा इस्तेमाल किया जा रहा है तो संबंधित विभागों को मौके पर पहुंचकर स्थिति देखनी चाहिए। शिकायत मिलने के बाद क्या किसी अधिकारी ने मौके पर जाकर देखा है कि वहां कितनी बसें खड़ी होती हैं, कितने समय के लिए खड़ी होती हैं और किस अनुमति के आधार पर खड़ी होती हैं और क्या कार्रवाई हुई।
स्कूल की आड़ में व्यावसायिक गतिविधि का आरोप
स्थानीय लोगों ने जेपीएम इंग्लिश स्कूल के संचालन से जुड़े राम जनम पर स्कूल की आड़ में मीटिंग हाल के नाम पर लॉन और लॉज संचालित किए जाने का आरोप भी लगाया है। यह आरोप भी जांच का विषय है। प्रशासन को भवन का स्वीकृत मानचित्र, वास्तविक उपयोग, अग्निशमन अनुमति, पार्किंग व्यवस्था, व्यापारिक अनुमति और अन्य वैधानिक दस्तावेजों की जांच करनी चाहिए। दस्तावेजों के आधार पर स्थिति साफ हो जाएगी। यदि व्यावसायिक गतिविधियां बिना अनुमति चल रही हैं तो जिम्मेदारी तय करना प्रशासन का काम है।
खाकी की चुप्पी सबसे बड़ा सवाल
किसी इलाके में कभी-कभार बस खड़ी हो जाना अलग बात है। लेकिन यदि स्थानीय लोगों के दावे के अनुसार लंबे समय से बड़ी संख्या में भारी बसें नियमित रूप से आ-जा रही हैं तो यह पुलिस की नजर से छिपने वाली गतिविधि नहीं हो सकती। यही कारण है कि वाराणसी कमिश्नरेट की ईमानदार पुलिस पर लूट खसोट का तमगा लगता जा रहा है। आदमपुर पुलिस को यदि जानकारी थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई। यदि जानकारी नहीं थी तो नियमित गश्त और स्थानीय निगरानी के दौरान वाराणसी कमिश्नरेट की पुलिस ईमानदारी का तमगा ओढ़ने में मशगूल रहती है
हादसे के बाद नहीं, पहले जागना होगा
गंगानगर कॉलोनी का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें हादसे की आशंका को लेकर पहले से चेतावनी मौजूद होने का दावा किया जा रहा है। स्कूल सामने है, भारी बसों की आवाजाही का आरोप है, बच्चों के साथ कथित दुर्घटनाओं की बात कही जा रही है और शिकायतकर्ता को धमकी दिए जाने का भी आरोप है।
प्रशासन के पास बहाने की गुंजाइश कम है
पुलिस को धमकी के आरोप की निष्पक्ष जांच करनी चाहिए। यातायात पुलिस को स्कूल के आसपास भारी वाहनों की स्थिति देखनी चाहिए। नगर निगम को सड़क के इस्तेमाल और कथित अतिक्रमण की जांच करनी चाहिए। परिवहन विभाग को बसों की वैधता और संचालन संबंधी दस्तावेज देखने चाहिए। शिक्षा विभाग को स्कूल की दीवार से जुड़े आरोपों की जांच करनी चाहिए।
* ए-16/1 गंगानगर कॉलोनी में भारी पर्यटक बसों की कथित अवैध पार्किंग का आरोप
* प्राथमिक विद्यालय के सामने बसों की आवाजाही से बच्चों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल
* दो बच्चों के पैरों पर बस का पहिया चढ़ने का स्थानीय लोगों का दावा
* बसों की सुविधा के लिए स्कूल की दीवार तोड़ने का भी आरोप
* प्रति बस 1000-1500 रुपये वसूली का दावा, महीने में लाखों की कथित कमाई पर सवाल
* शिकायतकर्ता अरविंद को जान से मारने की धमकी के आरोप की जांच की मांग
* पुलिस, नगर निगम और परिवहन विभाग की कथित निष्क्रियता पर स्थानीय लोगों में आक्रोश




