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बलात्कार : स्त्री की देह में ‘मजा’ और ‘सजा’ की संस्कृति,बड़ी गन्दी है पुरुषों की मनोवृत्ति

जब स्त्री की इच्छा से ज्यादा पुरुष का अधिकार महत्वपूर्ण मान लिया जाए, वहीं से हिंसा की शुरुआत होती है

  • ‘मर्दानगी’ को देहबल और स्त्री पर नियंत्रण से जोड़ने वाली सोच आखिर कब बदलेगी?
  • स्त्री को ‘इज्जत’ का प्रतीक बनाकर उसकी देह पर मालिकाना हक जताने की परंपरा कितनी खतरनाक
  • कानून बराबरी की बात करता है, लेकिन सामाजिक संस्कार अब भी स्त्री को ‘मजा’ और ‘सजा’ की वस्तु बनाते हैं
  • सिनेमा और साहित्य की घोषित संवेदनशीलता के बावजूद स्त्री देह का प्रदर्शन क्यों बना रहता है?
  • बलात्कार रोकना है तो सिर्फ अपराधी को सजा नहीं, मानसिकता को भी बदलना होगा

बलात्कार को केवल एक व्यक्ति के विकृत अपराध के रूप में देखकर क्या समाज अपनी जिम्मेदारी से बच सकता है? अपराधी निश्चित रूप से दोषी है, लेकिन वह मानसिकता कहां से आती है जिसमें स्त्री की इच्छा, उसकी स्वतंत्रता और उसकी असहमति को पुरुष की कामना से कमतर मान लिया जाता है? जब तक यौन अपराधों के साथ स्त्री की देह के ‘मजा’ और ‘सजा’ से जुड़ाव को खत्म नहीं किया जाएगा, तब तक कानून की कठोरता के बावजूद समस्या की जड़ बनी रहेगी। सदियों से पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने पुरुषत्व को देहबल, अधिकार और नियंत्रण से जोड़ा और स्त्री को कोमलता, त्याग, मर्यादा और ‘इज्जत’ के घेरे में कैद किया। पुरुष को बाहर की दुनिया का स्वामी और स्त्री को घर की मर्यादा मानने वाली सोच ने धीरे-धीरे स्त्री की देह को पुरुष के अधिकार और परिवार की प्रतिष्ठा से जोड़ दिया। परिणाम यह हुआ कि स्त्री की अपनी इच्छा भी गौण कर दी गई। साहित्य, सिनेमा, लोकभाषा, कहावतों और सामाजिक व्यवहार में इस सोच के अनेक रूप दिखाई देते हैं। स्त्री आकर्षक है तो ‘भोग’ की वस्तु, असहमति जताती है तो ‘सजा’ की पात्र और स्वतंत्र निर्णय लेती है तो ‘चरित्र’ पर सवाल। यह मानसिकता सिर्फ अपराधी पैदा नहीं करती, बल्कि ऐसे सामाजिक संस्कार भी तैयार करती है जो स्त्री के खिलाफ हिंसा को सामान्य बनाने लगते हैं। इसलिए बलात्कार के खिलाफ लड़ाई केवल पुलिस, अदालत और कानून की लड़ाई नहीं है। यह भाषा, परिवार, शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक चेतना के भीतर चलने वाली लड़ाई भी है।

स्त्री की देह : ‘मजा’ और ‘सजा’ के बीच क्यों?  

यौन अपराधों के साथ जब तक ‘मजा’ और ‘सजा’ का रिश्ता बना रहेगा, तब तक केवल कानून के भरोसे इस हिंसा को समाप्त करना मुश्किल होगा। जिसने बलात्कार किया, वह अपराधी है और उसे कानून के अनुसार कठोर दंड मिलना चाहिए। लेकिन अपराधी मानसिकता पैदा करने वाली सामाजिक जमीन पर भी सवाल उठाना होगा। पुरुषों के लिए ‘मर्दानगी’ का अर्थ लंबे समय से केवल जिम्मेदारी, संवेदनशीलता और समानता नहीं, बल्कि यौन क्षमता और स्त्री पर नियंत्रण से भी जोड़ा गया है। जैसे पुरुष होने की पहली शर्त ही यह हो कि वह अपनी देह और ताकत के बल पर स्त्री को प्रभावित, नियंत्रित या ‘काबू’ में रख सके। यह सोच सामंती समाज की देन है, जहां संबंध बराबरी पर नहीं, शक्ति के आधार पर तय होते हैं। यही कारण है कि पुरुष की उम्र, शारीरिक क्षमता और यौन वर्चस्व को लेकर समाज में अनेक धारणाएं प्रचलित हैं। वहीं स्त्री को उसकी देह, उम्र और सौंदर्य के आधार पर परिभाषित किया जाता है। यहां से स्त्री-पुरुष संबंधों का एक खतरनाक सरलीकरण शुरू होता है। मानो संबंध का केंद्र व्यक्ति नहीं, केवल देह हो।

घर की ‘अन्नपूर्णा’ और बाहर का ‘मर्द’

समाज ने स्त्री और पुरुष के लिए अलग-अलग भूमिकाएं निर्धारित कीं। पुरुष बाहर जाएगा, कमाएगा, दुनिया देखेगा और निर्णय लेगा। स्त्री घर संभालेगी, परिवार का पालन-पोषण करेगी और त्याग करेगी। फिर इसी व्यवस्था ने यह भी तय कर दिया कि बाहर का काम ज्यादा कठिन है, इसलिए पुरुष को अधिक पौष्टिक भोजन चाहिए। स्त्री घर की ‘अन्नपूर्णा’ है, इसलिए उसका काम दूसरों को खिलाना है। लेकिन स्त्री का शरीर भी लगातार जैविक और हार्मोनल बदलावों से गुजरता है। माहवारी, गर्भधारण, प्रसव और उससे जुड़ी शारीरिक प्रक्रियाएं उसके शरीर पर लगातार प्रभाव डालती हैं। इसके बावजूद त्याग को उसका स्वभाव और दूसरों की सेवा को उसका धर्म बना दिया गया। यानी जिस शरीर को समाज ने कमजोर बनाए रखने की व्यवस्था की, उसी शरीर से बाद में ‘कमजोरी’ का तर्क भी गढ़ लिया। स्त्री को बाहर की दुनिया से दूर रखकर उसकी स्वतंत्रता सीमित की गई और फिर उसी सीमित अनुभव को उसकी क्षमता का पैमाना बना दिया गया।

‘सुंदर’ स्त्री चाहिए, स्वतंत्र नहीं

स्त्री को ‘सुकोमल’, ‘सुंदर’, ‘कमनीय’ और ‘रमणीय’ बनाए रखने की सामाजिक अपेक्षा सिर्फ सौंदर्य की पसंद नहीं है। इसके पीछे स्त्री को एक ऐसे रूप में स्वीकार करने की मानसिकता भी है जिसमें वह देखने, चाहने और भोगने की वस्तु बनी रहे। स्त्री की बुद्धि, श्रम, प्रतिभा और स्वतंत्र इच्छा के बजाय उसकी देह को केंद्र में रख दिया जाए तो उसके व्यक्तित्व का एक बड़ा हिस्सा अदृश्य हो जाता है। फिर वही स्त्री यदि अपनी इच्छा व्यक्त करे, अपने शरीर पर अपना अधिकार जताए या अपनी जिंदगी का फैसला खुद करे तो वह स्थापित व्यवस्था के लिए चुनौती बन जाती है। यहीं ‘मजा’ की संस्कृति ‘सजा’ की संस्कृति में बदल जाती है। जो स्त्री पुरुष की इच्छा के अनुरूप है, वह स्वीकार्य है। जो असहमति जताती है, वह सवालों के घेरे में है।

सिनेमा और साहित्य की भूमिका पर सवाल

सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां समाज की सोच को केवल प्रतिबिंबित नहीं करतीं, कई बार उसे गढ़ती भी हैं। साहित्य और मनोरंजन में स्त्री की देह को किस तरह प्रस्तुत किया जाता है, इसका असर सामाजिक चेतना पर पड़ता है। पुराने हिंदी सिनेमा में बलात्कार का दृश्य अक्सर खलनायक की हिंसा और नायक की मर्दानगी के बीच स्थापित किया जाता था। नायिका की देह संकट में होती और नायक उसे बचाकर अपनी ‘रक्षक’ भूमिका स्थापित करता। कहानी भले स्त्री की पीड़ा के पक्ष में होने का दावा करती रही हो, लेकिन कई बार कैमरा भी उसी देह पर केंद्रित रहता था जिसे हिंसा का शिकार बताया जा रहा था। आज स्वरूप बदल गया है, लेकिन सवाल पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। स्त्री की देह को आकर्षण, संघर्ष, प्रतिशोध या मनोरंजन का केंद्र बनाने की प्रवृत्ति पर सवाल उठना जरूरी है। सिर्फ यह घोषित कर देना पर्याप्त नहीं कि फिल्म या साहित्य स्त्री के पक्ष में है। यह भी देखना होगा कि उसकी भाषा, दृश्य और कथानक स्त्री को व्यक्ति मानते हैं या वस्तु।

‘इज्जत’ किसकी और देह किसकी?

स्त्री की देह से जुड़े सबसे खतरनाक सामाजिक मूल्यों में एक है ‘इज्जत’। लेकिन यह इज्जत अक्सर स्त्री की अपनी नहीं होती। वह परिवार, पति या पुरुष की इज्जत बना दी जाती है। यही कारण है कि यौन हिंसा के बाद भी समाज कई बार अपराधी से ज्यादा पीड़िता के चरित्र पर सवाल खड़े करता है। वह कहां गई थी, कपड़े कैसे थे, किससे बात करती थी, रात में बाहर क्यों निकली, उसके पुरुष मित्र क्यों थे? इन सवालों में अपराधी की जिम्मेदारी गायब हो जाती है और स्त्री कटघरे में खड़ी हो जाती है। यही मानसिकता बलात्कार को सिर्फ शारीरिक अपराध नहीं रहने देती। वह पीड़िता के खिलाफ सामाजिक हिंसा में बदल जाता है। स्त्री की देह को परिवार की प्रतिष्ठा मानने वाली सोच आखिरकार उसी देह पर नियंत्रण को वैधता देती है।

नियंत्रण से इनकार की ‘सजा’

पितृसत्ता का सबसे बड़ा आग्रह नियंत्रण है। स्त्री कहां जाएगी, किससे मिलेगी, क्या पहनेगी, कब घर लौटेगी, किससे विवाह करेगी, नौकरी करेगी या नहीं इन तमाम सवालों पर निर्णय का अधिकार अक्सर परिवार और समाज अपने पास रखना चाहता है। जो स्त्री इस नियंत्रण को स्वीकार करती है, उसे ‘संस्कारी’ कहा जाता है। जो विरोध करती है, उसके लिए शब्दों की पूरी फौज तैयार है ‘चरित्रहीन’, ‘कुलटा’, ‘कुलच्छिनी’ और न जाने क्या-क्या। यह सिर्फ भाषा नहीं है। यह सामाजिक दंड है और जब सामाजिक दंड से भी स्त्री को नियंत्रित नहीं किया जा सकता तो हिंसा का सहारा लिया जाता है। इसलिए बलात्कार को केवल यौन इच्छा का परिणाम मानना अधूरा विश्लेषण है। उसमें सत्ता, नियंत्रण, वर्चस्व और स्त्री की स्वायत्तता को कुचलने की मानसिकता भी शामिल हो सकती है।

धर्म, परंपरा और स्त्री की स्वायत्तता

धर्म और परंपरा के नाम पर स्त्री से त्याग की अपेक्षा करना भी लंबे समय से सामाजिक संस्कार का हिस्सा रहा है। पति की लंबी उम्र के लिए व्रत, परिवार के लिए उपवास, पति को सर्वोच्च मानने की परंपरा और ‘पातिव्रत्य’ की आदर्श छवि ने स्त्री के जीवन को कर्तव्यों के घेरे में बांधा। यह सवाल उठना चाहिए कि यदि आध्यात्मिक मुक्ति और आत्मिक उन्नति सभी मनुष्यों के लिए समान है तो स्त्री के लिए अलग-अलग धार्मिक अनुशासन क्यों? पति को स्त्री का ‘परम’ मानना और पुरुष को स्वतंत्र धार्मिक-सामाजिक व्यक्ति मानना बराबरी नहीं, सत्ता-संबंध है। आधुनिक समाज में इन धारणाओं को नए रूपों में दोहराया जाता है। भाषा बदल गई, प्रस्तुति बदल गई, लेकिन कई बार मूल विचार वही रहता है स्त्री का जीवन किसी दूसरे के लिए है।

शिक्षा और रोजगार में भी देह का पीछा

स्त्री जब घर से बाहर निकलती है तो पितृसत्तात्मक सोच का एक नया रूप सामने आता है। वह नौकरी करती है तो सवाल, वह देर तक काम करती है तो सवाल, वह सफल होती है तो सवाल, वह पुरुषों के साथ काम करती है तो सवाल। कई बार उसकी सफलता को उसकी योग्यता से नहीं, उसकी देह या पुरुषों को प्रभावित करने की कथित क्षमता से जोड़ दिया जाता है।
यह मानसिकता महिलाओं के श्रम और प्रतिभा दोनों का अपमान है। ‘पुरुष बेरोजगार’ शब्द सहजता से स्वीकार कर लिया जाता है, लेकिन घर में बिना वेतन किए जाने वाले स्त्री के श्रम को रोजगार की श्रेणी में ही नहीं रखा जाता। फिर जब वही स्त्री रोजगार के लिए बाहर निकलती है तो उसे पुरुषों के अवसर छीनने वाली तक कहा जाता है। यह विरोधाभास बताता है कि समस्या केवल कानून में नहीं, सामाजिक चेतना में भी है।

बलात्कार रोकना है तो मानसिकता बदलनी होगी

बलात्कार के खिलाफ कठोर कानून जरूरी हैं। पुलिस की जवाबदेही जरूरी है। त्वरित न्याय जरूरी है। पीड़ितों की सुरक्षा और सम्मान जरूरी है। लेकिन इससे आगे भी बहुत कुछ जरूरी है। बच्चों को बचपन से सहमति का अर्थ समझाना होगा। लड़कों को यह सिखाना होगा कि ‘न’ का अर्थ ‘न’ ही है। लड़कियों को केवल बचने की शिक्षा नहीं, लड़कों को सम्मान करना भी सिखाना होगा। परिवारों को स्त्री की स्वतंत्रता को खतरे के रूप में देखना बंद करना होगा। स्कूलों और कॉलेजों में लैंगिक समानता पर गंभीर संवाद होना चाहिए। मीडिया को भी तय करना होगा कि वह अपराध की खबर देते समय पीड़िता की गरिमा बचा रहा है या अनजाने में हिंसा को तमाशे में बदल रहा है। सिनेमा और साहित्य को सेंसर करने से ज्यादा जरूरी है कि समाज उनके भीतर मौजूद दृष्टि पर सवाल करे। क्योंकि समस्या सिर्फ उस व्यक्ति में नहीं है जिसने अपराध किया। समस्या उस वातावरण में भी है जिसने उसे स्त्री को बराबर इंसान के बजाय अधिकार की वस्तु समझने का संस्कार दिया। कलम और समाज दोनों को आईना देखना होगा। बलात्कार के खिलाफ लड़ाई केवल अपराधी को सजा दिलाने की लड़ाई नहीं है। यह उस सोच के खिलाफ संघर्ष है जो स्त्री की देह को कभी ‘मजा’ और कभी ‘सजा’ का माध्यम मानती है। जब तक स्त्री को उसके शरीर से आगे एक पूर्ण मनुष्य के रूप में नहीं देखा जाएगा, तब तक बराबरी अधूरी रहेगी। स्त्री की देह उसकी अपनी है, उसकी इच्छा उसकी अपनी है, उसका जीवन उसका अपना है, उसकी असहमति को सम्मान मिलना चाहिए।
उसकी स्वतंत्रता किसी की कृपा नहीं, उसका अधिकार है और पुरुष की मर्दानगी स्त्री को दबाने में नहीं, उसकी बराबरी स्वीकार करने में है। बलात्कार की संस्कृति तब टूटेगी जब स्त्री की ‘इज्जत’ को परिवार की संपत्ति नहीं, स्त्री की गरिमा माना जाएगा। जब ‘न’ को चुनौती नहीं, अंतिम उत्तर समझा जाएगा। जब स्त्री के कपड़े, चाल-ढाल और स्वतंत्रता को अपराध का कारण बताने के बजाय अपराधी से सवाल किया जाएगा और जब समाज यह समझ लेगा कि स्त्री कोई देह नहीं, एक स्वतंत्र मनुष्य है। तभी ‘मजा’ और ‘सजा’ की वह संस्कृति टूटेगी, जिसमें सदियों से स्त्री की देह को पुरुष सत्ता के संघर्ष का मैदान बनाया जाता रहा है। बलात्कार रोकने के लिए सिर्फ अपराधी को बदलना पर्याप्त नहीं। उस समाज को भी बदलना होगा जो अपराध से पहले मानसिकता तैयार करता है।

* यौन अपराध सिर्फ अपराधी की मानसिकता नहीं, पितृसत्तात्मक सामाजिक संस्कारों का भी परिणाम
* स्त्री की देह को ‘भोग’ और ‘इज्जत’ से जोड़ने वाली सोच हिंसा की जमीन तैयार करती है
* ‘मर्दानगी’ को देहबल और यौन प्रभुत्व से जोड़ना समाज के लिए खतरनाक
* साहित्य, सिनेमा और लोकप्रिय संस्कृति में स्त्री की वस्तुकरण वाली छवि पर गंभीर सवाल जरूरी
* स्त्री की इच्छा-अनिच्छा को गौण मानने वाली मानसिकता बलात्कार की संस्कृति को पोषित करती है
* कानून बदलने के बावजूद सामाजिक चेतना में स्त्री को नियंत्रित करने की प्रवृत्ति कायम

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