जी राम जी योजना में गोलमाल जरूरतमंद मजदूरों के हक पर सवाल!
चन्दौली में महाघोटाला

- सरकार का पारदर्शिता का फरमान धरातल पर बेअसर? बीडीओ अनिल कुमार राय , सचिव, एपीओ मनरेगा रंजीत कुमार और प्रधानों की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल
- कागजों में दर्ज हो रही मजदूरों की हाजिरी, रोजगार के लिए भटक रहे जरूरतमंद ग्रामीण
- बार-बार शिकायत के बाद भी कार्रवाई नहीं होने का आरोप, रोजगार सेवकों के भी हाथ खड़े करने की चर्चा

चकिया/चंदौली। ग्रामीण परिवारों को गांव में ही रोजगार उपलब्ध कराने और सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए शासन स्तर से लगातार दिशा-निर्देश जारी किए जाते रहे हैं। लेकिन चकिया विकासखंड क्षेत्र में जी राम जी योजना के क्रियान्वयन को लेकर सामने आ रही शिकायतों ने इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों और योजना से जुड़े लोगों की ओर से लगाए जा रहे आरोपों के अनुसार कई गांवों में वास्तविक जरूरतमंद मजदूरों को काम नहीं मिल पा रहा है, जबकि कागजी अभिलेखों में मजदूरों की संख्या और उनकी हाजिरी दर्ज किए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि कुछ स्थानों पर ग्राम प्रधान, पंचायत स्तर के कर्मचारियों और योजना से जुड़े जिम्मेदार कर्मचारियों के स्तर पर कथित तौर पर ऐसा तंत्र सक्रिय है, जिसके चलते वास्तविक मजदूरों की जगह कथित रूप से प्रधान के करीबी लोगों अथवा ऐसे लोगों के नाम कागजों में दर्ज किए जा रहे हैं, जिन्होंने मौके पर काम ही नहीं किया।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। बावजूद इसके, यदि शिकायतों की व्यापकता को देखते हुए निष्पक्ष जांच कराई जाए तो योजना के अभिलेखों और धरातल की वास्तविक स्थिति के बीच अंतर की तस्वीर साफ हो सकती है।

सरकारी योजना का उद्देश्य रोजगार, लेकिन ग्रामीणों को काम के लिए भटकना पड़ रहा
ग्रामीण रोजगार योजनाओं का मूल उद्देश्य गांव के जरूरतमंद परिवारों को स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराना है। इसके माध्यम से मजदूरों को गांव में ही काम मिलने की उम्मीद रहती है और उन्हें रोजगार की तलाश में दूसरे शहरों की ओर पलायन नहीं करना पड़ता।
लेकिन चकिया ब्लॉक क्षेत्र से सामने आ रही शिकायतों में आरोप लगाया जा रहा है कि वास्तविक मजदूरों को योजना के तहत पर्याप्त रोजगार उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि जब गांव में योजना के तहत कार्य स्वीकृत होने की जानकारी मिलती है तो जरूरतमंद मजदूर काम की उम्मीद लेकर संबंधित जिम्मेदारों से संपर्क करते हैं। इसके बावजूद कई बार उन्हें काम नहीं मिलने की शिकायत रहती है।
दूसरी ओर, शिकायतकर्ताओं का दावा है कि सरकारी रिकॉर्ड में मजदूरों की संख्या और उपस्थिति दर्ज रहती है। यही विरोधाभास अब जांच का विषय बन गया है कि यदि वास्तव में इतने मजदूर कार्यरत थे तो मौके पर उनकी उपस्थिति और किए गए कार्य का भौतिक सत्यापन क्या कहता है।
‘जरूरतमंद मजदूरों की जगह कागजों में फर्जी हाजिरी’ का आरोप
शिकायतकर्ताओं का सबसे गंभीर आरोप कथित फर्जी हाजिरी को लेकर है।
ग्रामीणों का दावा है कि कुछ कार्यों में ऐसे लोगों के नाम भी मजदूरों के रूप में दर्ज किए जा रहे हैं, जिनके मौके पर काम करने को लेकर सवाल हैं। आरोप है कि वास्तविक श्रमिकों के स्थान पर कुछ कथित रूप से प्रभावशाली अथवा ग्राम प्रधान के करीबी लोगों के नामों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
यदि यह आरोप सही पाया जाता है तो यह केवल मजदूरों को रोजगार से वंचित करने का मामला नहीं होगा, बल्कि सरकारी धन के उपयोग, मस्टर रोल और कार्य की वास्तविकता की भी गंभीर जांच आवश्यक होगी।
जांच में यह देखना होगा कि संबंधित कार्यों पर कितने मजदूरों की उपस्थिति दर्ज की गई, उनमें से कितने मजदूर वास्तव में मौके पर मौजूद थे और दर्ज मजदूरों को भुगतान किस माध्यम से हुआ।

कागज और धरातल के बीच कितना अंतर?
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज आंकड़े और गांव में दिखाई देने वाली वास्तविक स्थिति में कितना अंतर है।
किसी भी रोजगार योजना में केवल ऑनलाइन या कागजी रिकॉर्ड पर्याप्त नहीं माना जा सकता। कार्यस्थल का भौतिक सत्यापन, मजदूरों की वास्तविक उपस्थिति, कार्य की मात्रा, भुगतान का रिकॉर्ड और संबंधित अभिलेखों का मिलान महत्वपूर्ण होता है।
चकिया ब्लॉक के विभिन्न गांवों से शिकायतें आने का दावा किया जा रहा है। ऐसे में प्रशासन यदि वास्तव में पारदर्शिता सुनिश्चित करना चाहता है तो एक साथ कई गांवों में औचक जांच कराई जा सकती है।
जांच के दौरान मस्टर रोल में दर्ज मजदूरों को मौके पर बुलाकर उनके बयान लिए जाएं तो यह पता लगाया जा सकता है कि किसने काम किया और किसके नाम पर हाजिरी दर्ज हुई।
बार-बार सूचना के बाद भी कार्रवाई नहीं होने का आरोप
ग्रामीणों का कहना है कि योजना में कथित अनियमितताओं की जानकारी संबंधित स्तर पर कई बार दी गई। इसके बावजूद अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने से शिकायतकर्ताओं में नाराजगी है।
आरोप है कि गांव स्तर पर जिम्मेदार कर्मचारी और ब्लॉक स्तर के अधिकारी शिकायतों पर गंभीरता से संज्ञान नहीं ले रहे हैं।
हालांकि, इन आरोपों पर संबंधित अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी बाकी है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि विभाग को अब तक कितनी शिकायतें मिलीं, उनमें कितनी लिखित थीं और किन मामलों में जांच कराई गई।
यदि शिकायतें वास्तव में प्राप्त हुई हैं तो उनके निस्तारण की स्थिति भी सार्वजनिक की जानी चाहिए।

बीडीओ और ब्लॉक स्तर की निगरानी पर उठे सवाल
योजना के संचालन में ब्लॉक स्तर की निगरानी व्यवस्था की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में चकिया खंड विकास अधिकारी के स्तर पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि ब्लॉक क्षेत्र में लगातार शिकायतों के बावजूद प्रभावी निगरानी नहीं हो रही है। कुछ लोगों की ओर से तो यह तक दावा किया जा रहा है कि योजना से संबंधित कथित अनियमितताओं की शिकायतों पर जिम्मेदार अधिकारी मौन बने हुए हैं।
यह आरोप भी स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं है। लेकिन यदि अलग-अलग गांवों से एक जैसे आरोप सामने आते हैं तो प्रशासन के लिए इसकी निष्पक्ष जांच कराना आवश्यक हो जाता है।
विशेष रूप से यह जांच जरूरी होगी कि क्या ब्लॉक स्तर पर मस्टर रोल, भुगतान और कार्यस्थल का नियमित निरीक्षण किया गया या केवल अभिलेखों के आधार पर कार्यवाही पूरी की जाती रही।
सचिव और एपीओ मनरेगा की भूमिका भी जांच के घेरे में
शिकायतों में ग्राम पंचायत स्तर के सचिव तथा एपीओ मनरेगा रंजीत कुमार की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि योजना के संचालन, मजदूरों की उपस्थिति, कार्यों के रिकॉर्ड और भुगतान से जुड़े मामलों में संबंधित कर्मचारियों की भूमिका की जांच होनी चाहिए।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ आरोप लगना अपने आप में दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है। इसलिए निष्पक्ष जांच में यह देखा जाना चाहिए कि संबंधित अधिकारी की जिम्मेदारी क्या थी, किस स्तर पर कौन-सा रिकॉर्ड तैयार हुआ और किस अधिकारी ने उसे सत्यापित किया।
यदि रिकॉर्ड में गड़बड़ी पाई जाती है तो जिम्मेदारी तय करने के लिए पूरी प्रक्रिया की कड़ी-दर-कड़ी जांच आवश्यक होगी।
ग्राम प्रधानों की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल
गांव में योजना के कार्यों के क्रियान्वयन को लेकर ग्राम प्रधानों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। इसी कारण शिकायतकर्ताओं ने कुछ ग्राम प्रधानों पर अपने करीबियों को लाभ पहुंचाने और वास्तविक जरूरतमंद मजदूरों की जगह कथित रूप से अन्य लोगों की हाजिरी दर्ज कराने के आरोप लगाए हैं।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
जांच में यह देखा जाना चाहिए कि कार्य की मांग किसने की, मजदूरों का चयन कैसे हुआ, मस्टर रोल किसने तैयार किया, उपस्थिति किसने प्रमाणित की और मजदूरों के खाते में भुगतान किस आधार पर हुआ।
यदि इन सभी दस्तावेजों का मिलान किया जाए तो किसी भी कथित फर्जीवाड़े की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।
रोजगार सेवकों के ‘हाथ खड़े’ करने की चर्चा
सूत्रों के हवाले से यह भी दावा किया जा रहा है कि गांवों में योजना से संबंधित कथित अनियमितताओं से परेशान होकर कुछ रोजगार सेवक भी असहज स्थिति में हैं।
यदि वास्तव में रोजगार सेवकों की ओर से ऐसी कोई शिकायत या आपत्ति की गई है तो प्रशासन को उनके बयान दर्ज करने चाहिए।
यह पता लगाना भी जरूरी होगा कि क्या किसी रोजगार सेवक ने लिखित रूप से किसी कार्य, मस्टर रोल अथवा मजदूरों की उपस्थिति पर आपत्ति दर्ज की है।
क्योंकि रोजगार सेवक सीधे गांव के स्तर पर कार्यों की स्थिति से परिचित होते हैं। उनके रिकॉर्ड और बयान को भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जा सकता है।
किन-किन गांवों को लेकर उठे सवाल?
शिकायतकर्ताओं की ओर से चकिया विकासखंड के बड़ी संख्या में गांवों में योजना के संचालन को लेकर सवाल उठाए गए हैं। इनमें—
अमरा दक्षिणी, बसनिया, बीकापुर, भाभौरा, भटावारा कला, भीषमपुर, बोदलपुर, डाबरीकला, धनावल कला, दुबेपुर, गरला, गढ़वा सेमरौर, इंद्रपुरवा, इसहुल, जामुआ, करवाड़िया, केराडीह, कुशही, लालपुर, लठिया कला, महादेवपुर कला, मैनपुर, मवैया, मुजफ्फरपुर, नौडीहा, नेवाजगंज, पचवनिया, परसियाकला, रघुनाथपुर, राम लक्ष्मनपुर, रामपुर कला, तिलौरी और विजयपुरवा शामिल बताए जा रहे हैं।
यह सूची शिकायतकर्ताओं की ओर से उपलब्ध कराई गई है। इसका अर्थ यह नहीं है कि इन सभी गांवों में अनियमितता प्रमाणित हो चुकी है। प्रत्येक गांव की स्थिति अलग-अलग अभिलेखों और मौके की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है।
मस्टर रोल की जांच से खुल सकता है राज
कथित फर्जी हाजिरी की शिकायतों की जांच में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज मस्टर रोल हो सकते हैं।
प्रशासन यदि शिकायतों को गंभीरता से लेता है तो प्रत्येक संबंधित गांव में चयनित कार्यों के मस्टर रोल निकाले जा सकते हैं। उसमें दर्ज मजदूरों के नाम, कार्य दिवस, उपस्थिति और भुगतान का मिलान वास्तविक मजदूरों से कराया जा सकता है।
इसके साथ ही मजदूरों के बैंक खाते में हुए भुगतान की जांच, कार्यस्थल की फोटो, ऑनलाइन उपस्थिति, जियो-टैगिंग, कार्य की माप पुस्तिका तथा संबंधित तकनीकी अभिलेखों का मिलान किया जाना चाहिए।
यदि कागजों में दर्ज मजदूर मौके पर मौजूद ही नहीं मिले तो यह जांच का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।
जरूरतमंद मजदूरों के रोजगार के अधिकार का सवाल
योजना में कथित फर्जीवाड़े का सबसे बड़ा असर उन ग्रामीण परिवारों पर पड़ता है जिन्हें वास्तव में रोजगार की जरूरत है।
गरीब परिवारों के लिए कुछ दिनों का स्थानीय रोजगार भी घरेलू आय का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। यदि वास्तविक मजदूरों के स्थान पर कागजों में किसी अन्य व्यक्ति की उपस्थिति दर्ज कर दी जाए तो जरूरतमंद परिवार रोजगार के अवसर से वंचित हो सकता है।
इसलिए शिकायत केवल सरकारी रिकॉर्ड में गड़बड़ी तक सीमित नहीं है। यह ग्रामीण श्रमिकों के रोजगार और उनके हिस्से के अवसर से भी जुड़ा गंभीर विषय है।
निष्पक्ष जांच हुई तो कई स्तरों की जिम्मेदारी हो सकती है तय
मामले में यदि प्रशासन निष्पक्ष जांच कराता है तो केवल ग्राम प्रधान स्तर पर ही नहीं बल्कि पूरी प्रक्रिया की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
जांच में यह देखा जाए कि—
– कार्य का प्रस्ताव किस स्तर से आया?
– कार्य की स्वीकृति किसने दी?
– मजदूरों की मांग कैसे दर्ज हुई?
– मस्टर रोल किसने तैयार किया?
– उपस्थिति किसने प्रमाणित की?
– तकनीकी माप किसने की?
– भुगतान किस आधार पर किया गया?
– ऑनलाइन रिकॉर्ड किस स्तर पर अपडेट हुआ?
– मौके पर कार्य की वास्तविक स्थिति क्या है?
– दर्ज मजदूरों में कितने वास्तव में कार्यस्थल पर मौजूद थे?
इन सवालों के जवाब मिलने के बाद ही किसी व्यक्ति की जिम्मेदारी तय की जा सकती है।
शिकायतों की जांच के लिए औचक सत्यापन जरूरी
यदि विभाग वास्तव में पारदर्शिता सुनिश्चित करना चाहता है तो केवल कार्यालय में बैठकर रिकॉर्ड की जांच पर्याप्त नहीं होगी।
अधिकारियों की अलग-अलग टीमें बनाकर संबंधित गांवों में औचक निरीक्षण कराया जा सकता है। मस्टर रोल में दर्ज मजदूरों को बिना पूर्व सूचना के मौके पर बुलाया जाए। ग्रामीणों के बयान लिए जाएं और कार्यस्थल की वास्तविक स्थिति का रिकॉर्ड तैयार किया जाए।
ऐसी जांच से यह भी पता चलेगा कि सरकारी अभिलेख और धरातल पर कितना अंतर है।
शिकायतकर्ताओं से भी लिए जाएं साक्ष्य
जिन ग्रामीणों या मजदूरों ने फर्जी हाजिरी का आरोप लगाया है, उनसे केवल मौखिक बयान लेने के बजाय उपलब्ध साक्ष्य भी लिए जाने चाहिए।
यदि किसी मजदूर का नाम मस्टर रोल में दर्ज है लेकिन उसने काम नहीं किया, तो उसका बयान महत्वपूर्ण होगा। इसी तरह जिस मजदूर ने काम किया लेकिन उसका नाम दर्ज नहीं हुआ, उसका बयान भी जांच का आधार बन सकता है।
इससे आरोपों की वास्तविकता को दस्तावेजी आधार पर परखा जा सकेगा।
अधिकारियों का पक्ष भी सामने आना जरूरी
मामले में चकिया के खंड विकास अधिकारी, संबंधित ग्राम पंचायत सचिव, एपीओ मनरेगा रंजीत कुमार तथा संबंधित ग्राम प्रधानों का आधिकारिक पक्ष बेहद महत्वपूर्ण है।
यदि विभाग का कहना है कि योजना के तहत सभी कार्य नियमानुसार कराए गए हैं तो उसे संबंधित रिकॉर्ड के आधार पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
वहीं यदि किसी गांव में शिकायत प्राप्त हुई है तो उसकी जांच और कार्रवाई की जानकारी भी सार्वजनिक की जानी चाहिए।
समाचार प्रकाशन के समय संबंधित अधिकारियों का पक्ष उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में विभाग को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाना चाहिए।
प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती—रिकॉर्ड और धरातल का मिलान
चकिया ब्लॉक में बड़ी संख्या में गांवों से शिकायतों का दावा सामने आने के बाद अब प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह रिकॉर्ड और धरातल का निष्पक्ष मिलान कराए।
यदि रिकॉर्ड सही हैं तो जांच के बाद शिकायतों पर विराम लग सकता है। लेकिन यदि रिकॉर्ड और वास्तविकता में अंतर मिलता है तो जिम्मेदारी तय करने की कार्रवाई भी जरूरी होगी।
सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता का अर्थ केवल ऑनलाइन रिकॉर्ड उपलब्ध होना नहीं है। असली पारदर्शिता तब मानी जाएगी जब रिकॉर्ड में दर्ज हर कार्य और मजदूर की स्थिति मौके पर भी सही पाई जाए।
अब कार्रवाई पर टिकी निगाहें
जी राम जी योजना को लेकर लगाए जा रहे आरोपों ने चकिया ब्लॉक की निगरानी व्यवस्था को सवालों के घेरे में ला दिया है। ग्रामीणों का आरोप है कि जरूरतमंद मजदूरों को रोजगार नहीं मिल रहा, जबकि कथित रूप से कागजों में मजदूरों की हाजिरी दर्ज की जा रही है।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और किसी अधिकारी, कर्मचारी अथवा ग्राम प्रधान की व्यक्तिगत जिम्मेदारी जांच के बिना तय नहीं की जा सकती।
फिर भी शिकायतों की प्रकृति और बताई गई गांवों की संख्या को देखते हुए मामले की ब्लॉक स्तर से ऊपर के अधिकारी द्वारा स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराना आवश्यक प्रतीत होता है।
जांच में मस्टर रोल, ऑनलाइन उपस्थिति, मजदूरों के भुगतान, कार्यस्थल का भौतिक सत्यापन, तकनीकी अभिलेख, ग्राम पंचायत के रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों के बयान शामिल किए जाने चाहिए।
यदि जांच में सब कुछ नियमानुसार मिलता है तो विभाग पारदर्शी तरीके से स्थिति स्पष्ट कर सकता है। लेकिन यदि फर्जी हाजिरी, कागजी मजदूर, गलत भुगतान अथवा वास्तविक श्रमिकों को रोजगार से वंचित करने के प्रमाण मिलते हैं तो जिम्मेदार लोगों पर नियमानुसार कार्रवाई भी सुनिश्चित करनी होगी।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या चकिया ब्लॉक में जी राम जी योजना का रिकॉर्ड वास्तव में धरातल की सच्चाई बता रहा है, या कागजों पर दर्ज हाजिरी के पीछे जरूरतमंद मजदूरों के हक की अनदेखी हो रही है? इसका जवाब निष्पक्ष जांच और मौके के सत्यापन से ही सामने आएगा।




