IDBI बैंक का सौदा और 52,878 करोड़ रुपये का सवाल,नरेन्द्र मोदी का गोलमाल
IDBI बैंक का सौदा: बिकने वाले बैंक के पैसे से ही खरीदार की जेब भरेगी?

- मोदी सरकार का निजीकरण मॉडल, कारोबारी दोस्त और जनता के पैसों पर उठते गंभीर सवाल!
- बैंक खरीदने आओ, बैंक से ही अपनी दूसरी कंपनियां बिकवाओ और वादा करो कि देश का भला हो रहा है!

एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नारा है—“मैं देश नहीं बिकने दूँगा।” दूसरी तरफ सरकारी हिस्सेदारी वाले बैंक बिक रहे हैं, सरकारी संस्थानों की संपत्तियां निजी हाथों में जा रही हैं और अब IDBI बैंक के प्रस्तावित सौदे में ऐसा सवाल सामने आया है, जो पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
अगर किसी बैंक को खरीदने वाला कारोबारी समूह उसी बैंक से अपनी दूसरी कंपनियों की हिस्सेदारी खरीदवाने की योजना बनाए, तो क्या इसे सामान्य व्यावसायिक सौदा मानकर नजरअंदाज कर देना चाहिए? या फिर यह पूछना जरूरी है कि आखिर इस व्यवस्था में फायदा किसका होगा—बैंक का, उसके छोटे शेयरधारकों का या बैंक का नियंत्रण हासिल करने वाले कारोबारी समूह का? यही वह सवाल है, जिसका जवाब देश को चाहिए।

IDBI बैंक का सौदा और 52,878 करोड़ रुपये का सवाल
IDBI बैंक में सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की कुल 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदने के लिए कनाडा के फेयरफैक्स समूह को चुने जाने की खबर सामने आई है। प्रस्तावित सौदे की कीमत लगभग 52,878 करोड़ रुपये बताई गई है।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
दिए गए विवरण के मुताबिक, फेयरफैक्स की योजना अपने समूह से जुड़ी Go Digit की दो बीमा कंपनियों और IIFL Capital में अपनी हिस्सेदारियां IDBI बैंक को बेचने की भी है। इन हिस्सेदारियों की अनुमानित कीमत करीब तीन अरब डॉलर बताई गई है, जो बैंक खरीदने की प्रस्तावित रकम का लगभग 54 प्रतिशत बैठती है।
यानी एक तरफ बैंक का नियंत्रण खरीदने की तैयारी और दूसरी तरफ उसी बैंक से अपनी दूसरी संपत्तियां खरीदवाने की योजना!
सवाल यह नहीं कि ऐसा सौदा कानूनन संभव है या नहीं। असली सवाल है कि क्या इसकी शर्तें निष्पक्ष होंगी और क्या इससे बैंक के हितों की पूरी रक्षा होगी?
बैंक खरीदेगा कौन और पैसा आएगा कहां से?
फेयरफैक्स के प्रमुख प्रेम वत्स के हवाले से कहा गया है कि IDBI बैंक के पास अतिरिक्त पूंजी है और वह इन हिस्सेदारियों के लिए नकद भुगतान कर सकता है।
यहीं से इस सौदे का सबसे दिलचस्प पहलू सामने आता है।
फेयरफैक्स बैंक खरीदने के लिए पैसा देगा, लेकिन बाद में वही बैंक फेयरफैक्स समूह की दूसरी कंपनियों में उसकी हिस्सेदारी खरीदने के लिए भुगतान कर सकता है। अगर यह योजना आगे बढ़ती है, तो खरीदार और विक्रेता के बीच कारोबारी संबंधों का ऐसा जटिल ढांचा बनेगा, जिसकी स्वतंत्र जांच और पारदर्शी मूल्यांकन बेहद जरूरी होगा।
क्या बैंक के पास मौजूद अतिरिक्त पूंजी का इस्तेमाल उसके कारोबार को मजबूत करने, कर्ज देने और ग्राहकों के हितों की रक्षा करने में नहीं होना चाहिए?
क्या किसी नए नियंत्रक मालिक से जुड़ी कंपनियों में निवेश करने से पहले बैंक को यह साबित नहीं करना चाहिए कि सौदा व्यावसायिक रूप से उचित है?
बैंक की तिजोरी में पैसा होना और उस पैसे को किसी खास सौदे में खर्च करना—दो अलग बातें हैं।
मोदी सरकार से सवाल: पारदर्शिता का पैमाना सबके लिए एक क्यों नहीं?
निजीकरण का समर्थन करने वालों का तर्क होता है कि निजी प्रबंधन से संस्थानों की कार्यक्षमता बढ़ती है और सरकार पर वित्तीय बोझ कम होता है। लेकिन निजीकरण अपने आप में किसी सौदे के निष्पक्ष होने की गारंटी नहीं है।
जब सरकारी हिस्सेदारी बेची जाती है, तब सरकार की जिम्मेदारी सिर्फ अच्छी कीमत हासिल करने तक सीमित नहीं रहती। उसे यह भी सुनिश्चित करना होता है कि सार्वजनिक हितों की अनदेखी न हो और खरीदार को अनुचित लाभ पहुंचाने की गुंजाइश न बने।
इसलिए मोदी सरकार से सीधे सवाल पूछे जाने चाहिए:
– क्या IDBI बैंक द्वारा खरीदी जाने वाली हिस्सेदारियों का स्वतंत्र मूल्यांकन कराया जाएगा?
– क्या संबंधित कंपनियों की वित्तीय स्थिति, भविष्य की संभावनाओं और जोखिमों का पूरा आकलन सार्वजनिक होगा?
– क्या बैंक के छोटे शेयरधारकों के हितों की रक्षा के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय होंगे?
– क्या नियामक यह सुनिश्चित करेंगे कि बैंक और उसके नए नियंत्रक मालिक के बीच हितों का टकराव न हो?
– क्या इस प्रस्ताव की सभी महत्वपूर्ण शर्तें सार्वजनिक की जाएंगी?
इन सवालों के जवाब देना सरकार और संबंधित संस्थाओं की जिम्मेदारी है।
प्रेम वत्स, मोदी सरकार और कारोबारी नजदीकियों का सवाल
फेयरफैक्स के प्रमुख प्रेम वत्स को 2020 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। इसे लेकर राजनीतिक बहस हो सकती है, लेकिन किसी व्यक्ति को पुरस्कार मिलने या प्रधानमंत्री के प्रति उसके विचारों के आधार पर किसी कारोबारी सौदे को गलत घोषित नहीं किया जा सकता।
फिर भी, जब इतने बड़े सार्वजनिक महत्व के बैंक का सौदा हो रहा हो, तब कारोबारी रिश्तों से जुड़े सवालों का जवाब तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर दिया जाना चाहिए।
लोकतंत्र में किसी कारोबारी की सरकार से निकटता अपने आप में अपराध नहीं है। लेकिन किसी भी कारोबारी को उसकी पहचान या राजनीतिक संबंधों के कारण विशेष लाभ नहीं मिलना चाहिए।
मोदी सरकार को बताना चाहिए कि इस सौदे में निर्णायक आधार सार्वजनिक हित है या केवल कारोबारी दक्षता का दावा?
अडानी का नाम क्यों आता है निजीकरण की बहस में?
भारत में जब भी सरकारी संपत्तियों, सार्वजनिक संस्थानों और बड़े कारोबारी समूहों के बीच संबंधों पर चर्चा होती है, तब अडानी समूह को लेकर भी राजनीतिक सवाल उठते हैं।
विपक्ष लंबे समय से मोदी सरकार पर आरोप लगाता रहा है कि उसकी आर्थिक नीतियों से कुछ बड़े कारोबारी समूहों को फायदा पहुंचता है। सरकार और संबंधित कारोबारी समूहों का पक्ष भी इस बहस का हिस्सा है। इसलिए आरोपों की जांच तथ्यों, नीतियों और दस्तावेजों के आधार पर होनी चाहिए।
लेकिन एक बुनियादी सिद्धांत पर कोई समझौता नहीं हो सकता: सरकारी संपत्ति हो, बैंक हो, बंदरगाह हो या ऊर्जा क्षेत्र—किसी भी सार्वजनिक संसाधन के इस्तेमाल में पारदर्शिता और जवाबदेही सर्वोपरि होनी चाहिए।
IDBI सौदे पर उठ रहे सवाल इसी व्यापक बहस को फिर सामने लाते हैं। क्या भारत की आर्थिक नीति प्रतिस्पर्धा और निष्पक्ष अवसरों को मजबूत कर रही है? क्या छोटे निवेशकों और आम नागरिकों के हित बड़े कारोबारी सौदों में सुरक्षित हैं? क्या सरकार सार्वजनिक संपत्तियों की बिक्री के साथ-साथ उनकी भविष्य की जवाबदेही भी सुनिश्चित कर रही है?
इन सवालों को अडानी या किसी दूसरे कारोबारी का नाम लेकर राजनीतिक नारेबाजी तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। असली कसौटी यह है कि नियम सबके लिए समान हों और किसी को भी अनुचित लाभ न मिले।
अभी सौदा अंतिम नहीं, लेकिन सवाल पूछना जरूरी है
फेयरफैक्स की 14 अक्टूबर की घोषणा के मुताबिक, संबंधित हिस्सेदारियों की खरीद के लिए बाध्यकारी समझौते नहीं हुए थे और आवश्यक नियामकीय मंजूरियां भी बाकी थीं।
इसलिए प्रस्तावित व्यवस्था को अंतिम सौदा बताना सही नहीं होगा। बैंक वास्तव में कितनी रकम देगा, मूल्यांकन कैसे होगा और किन शर्तों पर लेन-देन आगे बढ़ेगा—इनका स्पष्ट विवरण सामने आना अभी जरूरी है।
लेकिन किसी सौदे के अंतिम होने का इंतजार करके सवाल पूछना बंद नहीं किया जा सकता। सार्वजनिक महत्व के संस्थानों से जुड़े प्रस्तावों की जांच शुरुआत से ही होनी चाहिए, ताकि बाद में किसी नुकसान या विवाद की स्थिति में केवल सफाई देने की नौबत न आए।
सरकार और नियामकों को इन सवालों का जवाब देना चाहिए
– IDBI बैंक की संपत्ति और पूंजी का इस्तेमाल किस व्यावसायिक आधार पर होगा?
– फेयरफैक्स से जुड़ी कंपनियों की हिस्सेदारी का स्वतंत्र मूल्यांकन कौन करेगा?
– क्या संभावित हितों के टकराव को रोकने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय लागू होंगे?
– क्या सौदे की सभी महत्वपूर्ण शर्तें आम निवेशकों के सामने रखी जाएंगी?
– क्या सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि निजीकरण से सार्वजनिक हितों को नुकसान न पहुंचे?नारा नहीं, जवाबदेही चाहिए!
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल पूछना किसी कारोबारी के खिलाफ फैसला सुनाना नहीं है। यह उस सरकार से जवाब मांगना है, जो सार्वजनिक संपत्तियों और आर्थिक नीतियों के बारे में निर्णय लेती है।
अगर IDBI बैंक और फेयरफैक्स के बीच प्रस्तावित हिस्सेदारी खरीद का सौदा निष्पक्ष है, तो उसकी शर्तें, स्वतंत्र मूल्यांकन और नियामकीय सुरक्षा सार्वजनिक जांच का सामना क्यों नहीं कर सकते?
देश को निजी निवेश से समस्या नहीं है। समस्या तब पैदा होती है, जब सार्वजनिक हित से जुड़े बड़े फैसलों में पारदर्शिता को पर्याप्त महत्व नहीं मिलता।
“मैं देश नहीं बिकने दूँगा”—यह नारा तभी सार्थक होगा, जब देश की संपत्तियों से जुड़े हर बड़े सौदे में जनता के हितों की रक्षा हो, हर कारोबारी के लिए नियम समान हों और सरकार हर सवाल का जवाब देने को तैयार हो।
क्योंकि देश सिर्फ जमीन का नाम नहीं है। देश के बैंक, सार्वजनिक संस्थान, नागरिकों की बचत और लोकतांत्रिक जवाबदेही भी देश की संपत्ति हैं।
और इन संपत्तियों के बारे में सवाल पूछना देशहित के खिलाफ नहीं, बल्कि लोकतंत्र के पक्ष में खड़ा होना है।




