एबीपी न्यूज ने महिला अस्मिता को किया तार-तार,नेहा सिंह राठौड़ के चरित्र पर किया निंदनीय प्रहार
एबीपी न्यूज़ की चूक या पत्रकारिता के चेहरे पर कालिख? रजनीश आहूजा के लिए तीखे सवाल!

- खबर झूठी निकली, माफी जारी हुई, लेकिन इज्जत पर लगे दाग का हिसाब कौन देगा?
- पत्रकारिता में पहले फैसला, बाद में पड़ताल!
- नेहा सिंह राठौर ने पूछा सवाल, तो संपादक के पास जवाब नहीं, अकड़ जरूर थी!
- गलत खबर पर खेद काफी नहीं, जिम्मेदारी तय होनी चाहिए!
- जब मीडिया ही कटघरे में हो, तो न्याय के दरवाजे पर दस्तक कौन देगा?
- खबर के नाम पर चरित्रहनन का गंभीर मामला
लोकगीतों के जरिए सत्ता से सवाल पूछने वाली नेहा सिंह राठौर आज खुद एक गंभीर सवाल के साथ खड़ी हैं। सवाल है कि क्या किसी समाचार संस्थान को बिना पर्याप्त तथ्य-जांच के किसी महिला की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाली खबर प्रसारित करने का अधिकार मिल जाता है?
एबीपी न्यूज़ के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर शीर्षक चलाया गया— ‘नेहा सिंह राठौर वाले हॉस्टल में सेक्स रैकेट? पुलिस ने मारा छापा!’ खबर के साथ नेहा की तस्वीर भी लगाई गई। ऐसा शीर्षक और तस्वीर देखकर आम पाठक के मन में क्या धारणा बनेगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
अगर संबंधित हॉस्टल और नेहा के बीच कोई संबंध ही नहीं था, तो फिर ऐसा शीर्षक किस आधार पर तैयार किया गया? सवाल सिर्फ एक गलत खबर का नहीं, बल्कि उस संपादकीय विवेक का है, जिसके बिना पत्रकारिता महज सनसनी फैलाने का औजार बन सकती है।

रजनीश आहूजा की अकड़ और सवालों से बचने का अंदाज
खबर सामने आने के बाद नेहा सिंह राठौर ने एबीपी न्यूज़ के संपादक रजनीश आहूजा से फोन पर बात की। सोशल मीडिया पर साझा बातचीत के वीडियो के अनुसार, नेहा ने साफ कहा कि उनका कोई हॉस्टल नहीं है और न ही उनका किसी सेक्स रैकेट से संबंध है।
बातचीत में जिस तरह खबर के आधार और जिम्मेदारी को लेकर सवाल-जवाब हुए, उसने संपादकीय जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े किए।
नेहा ने जब पूछा कि उनके नाम और तस्वीर के साथ ऐसी खबर क्यों चलाई गई, तो आहूजा की ओर से यह पूछना कि खबर किसने लिखी और कौन गया था, अपने आप में असहज करने वाला है।
सवाल सीधा है—जिस संस्थान के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर खबर प्रकाशित हुई, उसके संपादकीय तंत्र को ही यह पता नहीं कि खबर किस आधार पर चलाई गई?
अगर संपादक को जानकारी नहीं थी, तो यह संस्थान की आंतरिक निगरानी पर सवाल है। और यदि जानकारी थी, तो फिर तथ्य-जांच और जवाबदेही का प्रश्न और भी गंभीर हो जाता है।
किसी संपादक की असली परीक्षा अपनी कुर्सी की अकड़ दिखाने में नहीं, बल्कि गलती सामने आने पर जिम्मेदारी स्वीकार करने में होती है। पत्रकारिता में पद बड़ा हो सकता है, लेकिन तथ्यों से बड़ा कोई पद नहीं होता।
माफी आ गई, मगर नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
विवाद बढ़ने के बाद एबीपी नेटवर्क ने स्पष्टीकरण जारी करते हुए स्वीकार किया कि नेहा सिंह राठौर से संबंधित प्रसारित खबर तथ्यों के आधार पर गलत पाई गई। नेटवर्क ने त्रुटिपूर्ण प्रसारण के लिए खेद जताते हुए माफी भी मांगी।
यह स्वीकारोक्ति महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ एक बुनियादी सवाल जुड़ा है—जिस खबर को हजारों लोगों ने देखा, उसके कारण बनी गलत धारणा को मिटाने की जिम्मेदारी कौन उठाएगा?
डिजिटल मीडिया में गलत खबर कुछ ही समय में दूर-दूर तक पहुंच जाती है। लेकिन उसका खंडन अक्सर उतने लोगों तक नहीं पहुंचता। सनसनीखेज शीर्षक तेजी से फैलता है, जबकि माफी छोटी-सी सूचना बनकर रह जाती है।
गलत खबर को जितनी प्रमुखता मिली, क्या माफी को भी उतनी ही प्रमुखता दी गई?
क्या संबंधित खबर के साथ स्पष्ट सुधार प्रकाशित किया गया? क्या दर्शकों को बताया गया कि खबर तथ्यात्मक रूप से गलत थी? और क्या यह जांच होगी कि ऐसी चूक हुई कैसे?
माफी एक शुरुआत है, जवाबदेही का विकल्प नहीं।
नेहा से सवाल, लेकिन सत्ता के करीब मीडिया से कौन पूछेगा?
नेहा सिंह राठौर ने अपने गीतों के माध्यम से बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक असमानता और सत्ता की जवाबदेही जैसे मुद्दों को उठाया है। उनके विचारों से असहमति हो सकती है, लेकिन किसी कलाकार की आलोचना का जवाब तथ्यहीन आरोपों से देना पत्रकारिता नहीं हो सकता।
उनके राजनीतिक विचारों या राहुल गांधी के साथ किसी कार्यक्रम में शामिल होने को लेकर जो भी मत हों, उनका किसी अपुष्ट आरोप को सही ठहराने से कोई संबंध नहीं है।
लोकतंत्र में पत्रकार का काम सत्ता से सवाल पूछना है, न कि किसी महिला की प्रतिष्ठा को दांव पर लगाकर दर्शकों का ध्यान खींचना। यदि कोई पत्रकार या संस्थान गलती करता है, तो उससे सवाल पूछना भी उतना ही जरूरी है।
रजनीश आहूजा से सवाल इसलिए नहीं कि वे किसी खास विचारधारा के समर्थक हैं या विरोधी, बल्कि इसलिए कि जिस पद पर वे हैं, वहां तथ्य-जांच और संपादकीय जवाबदेही की अपेक्षा की जाती है।
उमा खुराना प्रकरण की याद क्यों जरूरी है?
वर्ष 2007 का उमा खुराना प्रकरण मीडिया की गैर-जिम्मेदार रिपोर्टिंग के खतरों की गंभीर याद दिलाता है। एक स्टिंग ऑपरेशन के प्रसारण के बाद दिल्ली की शिक्षिका उमा खुराना पर गंभीर आरोप लगे और उन्हें सार्वजनिक आक्रोश का सामना करना पड़ा। बाद में स्टिंग की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठे और मामला अदालत तक पहुंचा।
उस प्रकरण ने यह स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति पर गंभीर आरोप प्रसारित करना केवल खबर चलाने का मामला नहीं है। इसका असर उसके रोजगार, सामाजिक प्रतिष्ठा, सुरक्षा और पूरे जीवन पर पड़ सकता है।
पत्रकारिता की स्वतंत्रता लोकतंत्र का महत्वपूर्ण आधार है, लेकिन स्वतंत्रता के साथ सत्यनिष्ठा और जिम्मेदारी भी जुड़ी है। यही कारण है कि किसी भी व्यक्ति के बारे में गंभीर आरोप प्रकाशित करने से पहले तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित पक्ष का जवाब लेना जरूरी है।
महिला की गरिमा कोई टीआरपी का खिलौना नहीं
किसी महिला का नाम और तस्वीर किसी कथित सेक्स रैकेट जैसी खबर के साथ जोड़ना बेहद संवेदनशील मामला है। ऐसी खबरों में थोड़ी-सी लापरवाही भी उसके चरित्र पर ऐसा दाग लगा सकती है, जिसे मिटाने में वर्षों लग जाएं।
कल्पना कीजिए, यदि यही खबर किसी ऐसी सामान्य महिला के बारे में चलाई जाती, जिसकी आवाज लाखों लोगों तक नहीं पहुंचती, तो वह अपनी सफाई कहां देती? क्या उसके पास संपादक तक पहुंचने का अवसर होता? क्या उसका खंडन भी उसी तेजी से प्रसारित होता?
यही वजह है कि मीडिया संस्थानों की जिम्मेदारी केवल प्रभावशाली व्यक्तियों के प्रति नहीं, बल्कि हर नागरिक के प्रति है।
किसी महिला की गरिमा खबर की कीमत नहीं हो सकती और न ही सनसनी पत्रकारिता का प्रमाणपत्र है।
अब अदालत और पत्रकार संगठनों की परीक्षा
इस प्रकरण ने पत्रकार संगठनों, प्रेस क्लबों, महिला आयोग और संबंधित संस्थाओं के सामने भी सवाल खड़े किए हैं। क्या वे गलत खबर के खिलाफ स्पष्ट रुख अपनाएंगे? क्या वे इस बात पर जोर देंगे कि डिजिटल मीडिया में तथ्य-जांच की जवाबदेही सुनिश्चित हो?
सुप्रीम कोर्ट और अन्य संवैधानिक संस्थाओं से भी व्यापक सवाल पूछा जाना चाहिए कि गलत और अपुष्ट खबरों से नागरिकों की प्रतिष्ठा को होने वाले नुकसान से बचाने के लिए प्रभावी व्यवस्था कैसे मजबूत की जाए। किसी विशेष मामले में स्वतः संज्ञान लिया जाए या नहीं, यह अदालत का निर्णय है; लेकिन नागरिक गरिमा और निष्पक्ष पत्रकारिता पर बहस जरूरी है।
नेहा सिंह राठौर के सवाल का उत्तर केवल एक माफी से पूरा नहीं होता। उत्तर उस व्यवस्था में छिपा है, जहां खबर चलाने वाले की जवाबदेही तय हो और पीड़ित व्यक्ति को न्याय पाने के लिए अकेले संघर्ष न करना पड़े।
आखिरी सवाल—अदालत में कौन बा ?
नेहा के गीतों ने कभी पूछा था—’यूपी में का बा?’ आज उनके सामने एक नया सवाल है—’अदालत में कौन बा?’
यह सवाल सिर्फ नेहा सिंह राठौर का नहीं है। यह हर उस नागरिक का सवाल है, जिसकी प्रतिष्ठा किसी गलत खबर, अधूरी जानकारी या सनसनीखेज शीर्षक के कारण दांव पर लग सकती है।
एबीपी नेटवर्क ने गलती स्वीकार कर माफी मांगी है, लेकिन अब जरूरत है कि खबर के प्रकाशन की प्रक्रिया की समीक्षा हो, सुधार को पर्याप्त प्रमुखता मिले और जिम्मेदारी तय करने के लिए पारदर्शी कदम उठाए जाएं।
रजनीश आहूजा हों या कोई अन्य संपादक—पत्रकारिता में कुर्सी की ऊंचाई से ज्यादा महत्व सत्य की ऊंचाई का है। सवाल पूछना पत्रकार का अधिकार है, लेकिन अपने काम पर उठे सवालों का जवाब देना भी उसकी जिम्मेदारी है।
क्योंकि लोकतंत्र में खबर चलाने वाला न्यायाधीश नहीं होता, और किसी की प्रतिष्ठा को सजा सुनाने का अधिकार किसी सनसनीखेज शीर्षक को नहीं दिया जा सकता।
अब देखना यह है कि नेहा के सवालों का जवाब केवल माफी से दिया जाएगा, या पत्रकारिता अपनी जिम्मेदारी भी निभाएगी।
सवाल वही है—पूछेंगी नेहा, अदालत में कौन बा?




