पत्रकारिता पर कानून का शिकंजा, मोदी-शाह देश के चौथे स्तम्भ पर मार रहे पंजा
जब खबर की जांच से पहले आरोपी की सहमति जरूरी हो जाए, तो लोकतंत्र में सच का पोस्टमार्टम कौन करेगा?

मोदी और शाह के राज में खबर लिखना या बोलना पड़ेगा भारी,इन दोनों का तानाशाही से है, यारी
बोफोर्स से पनामा पेपर्स तक, तहलका से 2G और राफेल तक—देश में कई बड़े विवादों की परतें पत्रकारिता ने ही खोली हैं। लेकिन अगर खोजी पत्रकारिता करने वाले मीडिया संस्थानों को अपने सूत्रों की गोपनीयता, खबरों की सुरक्षा और कानूनी अधिकारों को लेकर ही आशंकाएं सताने लगें, तो सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत में पत्रकारिता का भविष्य सुरक्षित है?
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून के कुछ प्रावधानों को लेकर 21 बड़े मीडिया संस्थानों का सुप्रीम कोर्ट पहुंचना इसी चिंता की ओर इशारा करता है। नेटवर्क18, एनडीटीवी, इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स इंटरनेट जैसे संस्थानों की याचिका में आशंका जताई गई है कि कानून के कुछ प्रावधान खोजी पत्रकारिता को प्रभावित कर सकते हैं और पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर होने का जोखिम बढ़ा सकते हैं।
यह मामला केवल मीडिया संस्थानों और सरकार के बीच कानूनी विवाद नहीं है। यह उस लोकतांत्रिक व्यवस्था की परीक्षा भी है, जिसमें जनता को सत्ता से सवाल पूछने का अधिकार है और पत्रकारों को उन सवालों के जवाब तलाशने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।

मोदी-शाह का मजबूत शासन या मजबूत सवालों से परहेज?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार से सवाल पूछा जाना चाहिए कि नागरिकों की निजता की रक्षा करने वाले कानून में खोजी पत्रकारिता के लिए पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित करना इतना महत्वपूर्ण क्यों नहीं माना जाए?
निजता का अधिकार बुनियादी अधिकार है। किसी की निजी जानकारी को बिना उचित कारण सार्वजनिक करना पत्रकारिता नहीं कहा जा सकता। लेकिन जब मामला भ्रष्टाचार, सरकारी खरीद में अनियमितता, सार्वजनिक धन के दुरुपयोग या सत्ता के प्रभाव का हो, तब जनहित की पड़ताल को भी पर्याप्त कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए।
विडंबना देखिए—सत्ता खुद को पारदर्शी और जवाबदेह बताती है, लेकिन यदि कानून के किसी प्रावधान से सत्ता की जवाबदेही तय करने वाली पत्रकारिता पर ही दबाव बढ़ने की आशंका पैदा हो, तो सरकार को उसका स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
लोकतंत्र में सरकार का मजबूत होना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि जनता के सवालों के सामने सरकार जवाबदेह बनी रहे।
जिस पर आरोप, उसी से जांच की अनुमति?
कल्पना कीजिए कि किसी पत्रकार को सरकारी ठेके में भ्रष्टाचार के दस्तावेज मिलते हैं। कोई अधिकारी या कर्मचारी गोपनीय तरीके से उसे जानकारी देता है। पत्रकार दस्तावेजों की जांच करता है, संबंधित लोगों का पक्ष लेता है और तथ्यों की पुष्टि करने के बाद खबर प्रकाशित करना चाहता है।
यदि उसे यह डर सताने लगे कि उसके स्रोत की पहचान उजागर हो सकती है या निजी डेटा से जुड़े प्रावधानों का इस्तेमाल खबर को बाधित करने के लिए किया जा सकता है, तो क्या वह उसी स्वतंत्रता के साथ काम कर पाएगा?
पत्रकारिता में संबंधित पक्ष का जवाब लेना जरूरी है। निष्पक्षता के लिए आरोपों की पुष्टि और दूसरे पक्ष को अपना पक्ष रखने का अवसर देना भी आवश्यक है। लेकिन जवाब मांगना और जांच के लिए आरोपी की अनुमति लेना दो बिल्कुल अलग बातें हैं।
अगर किसी व्यक्ति की सहमति को ही सार्वजनिक हित की पड़ताल की शर्त बना दिया जाए, तो ताकतवर लोगों के खिलाफ खबरें प्रकाशित करना मुश्किल हो सकता है।
यही वह बिंदु है, जहां कानून की व्याख्या और उसके क्रियान्वयन में स्पष्ट सुरक्षा की जरूरत सामने आती है।
बोफोर्स से पनामा पेपर्स तक, क्या अब सिर्फ प्रेस रिलीज पढ़ेंगे पत्रकार?
भारत में खोजी पत्रकारिता का इतिहास बताता है कि सत्ता और प्रभावशाली लोगों से जुड़े कई विवादों पर सवाल दस्तावेजों, गुप्त सूत्रों और लंबी पड़ताल के जरिए सामने आए।
बोफोर्स सौदे से जुड़े कथित कमीशन के आरोप, तहलका का ऑपरेशन वेस्ट एंड, 2G स्पेक्ट्रम आवंटन पर विवाद, कोयला ब्लॉक आवंटन की जांच, पनामा पेपर्स में सामने आए विदेशी कंपनियों के रिकॉर्ड और राफेल सौदे पर दस्तावेज आधारित रिपोर्टिंग—इन सभी मामलों ने सार्वजनिक बहस को प्रभावित किया।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इन सभी मामलों में आरोपों की कानूनी स्थिति एक जैसी नहीं रही। किसी आरोप को केवल खबर में सामने आने के आधार पर सिद्ध अपराध नहीं माना जा सकता।
लेकिन सवाल यह है कि अगर पत्रकारों को दस्तावेजों की पड़ताल करने, सूत्रों की पहचान सुरक्षित रखने और सत्ता से जुड़े मामलों में सवाल पूछने की पर्याप्त स्वतंत्रता ही नहीं मिलेगी, तो ऐसे विवादों की सच्चाई जनता तक कौन पहुंचाएगा?
क्या लोकतंत्र में पत्रकार का काम केवल सरकारी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कही गई बातों को लिखना और जारी किए गए बयानों को खबर बनाना रह जाएगा?
यदि ऐसा हुआ, तो पत्रकारिता और सरकारी प्रचार के बीच की रेखा धुंधली पड़ने लगेगी।
निजता की आड़ में जवाबदेही कमजोर नहीं होनी चाहिए
डिजिटल युग में नागरिकों की निजी जानकारी की सुरक्षा बेहद जरूरी है। किसी भी सरकार को डेटा के दुरुपयोग को रोकने के लिए प्रभावी कानून बनाने का अधिकार है।
लेकिन कानून बनाना जितना जरूरी है, उसके दुरुपयोग की आशंकाओं को दूर करना भी उतना ही जरूरी है।
सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि जनहित में काम करने वाले पत्रकारों, स्वतंत्र डिजिटल मीडिया, स्थानीय संवाददाताओं और खोजी खबरों के लिए जानकारी जुटाने वाले लोगों को किस तरह की कानूनी सुरक्षा उपलब्ध होगी।
यह सुरक्षा असीमित छूट नहीं होनी चाहिए। पत्रकारिता के नाम पर किसी की निजी जिंदगी में अनुचित हस्तक्षेप भी स्वीकार्य नहीं है। मगर सार्वजनिक पद पर बैठे लोगों के कामकाज, सरकारी खर्च और सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों की पड़ताल को केवल निजता का हवाला देकर बाधित भी नहीं किया जाना चाहिए।
निजता नागरिकों की ढाल होनी चाहिए, लेकिन सार्वजनिक जवाबदेही से बचने का सार्वभौमिक हथियार नहीं।
पत्रकार का स्रोत उजागर हुआ, तो अगली बार सच कौन बताएगा?
खोजी पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत उसके स्रोत होते हैं। कई बार सरकारी विभागों में काम करने वाले ईमानदार अधिकारी, कर्मचारी या अन्य जानकार लोग अनियमितताओं के दस्तावेज सामने लाते हैं।
यदि उन्हें यह आशंका हो कि जानकारी देने के कारण उनकी पहचान उजागर हो सकती है, तो वे पीछे हट सकते हैं। इसका नुकसान सिर्फ पत्रकार को नहीं, बल्कि उस जनता को होगा, जिसे भ्रष्टाचार और सरकारी अनियमितताओं की जानकारी मिलनी चाहिए।
मोदी और शाह की सरकार को यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने, बहुमत हासिल करने और मजबूत नेतृत्व के दावे करने से नहीं चलता। लोकतंत्र की असली ताकत संस्थाओं की स्वतंत्रता और सरकार से जवाब मांगने की नागरिकों की क्षमता में होती है।
सरकार की आलोचना को दुश्मनी समझना और सवाल पूछने वालों को संदेह की नजर से देखना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट की परीक्षा, लोकतंत्र के भविष्य का सवाल
अब सुप्रीम कोर्ट के सामने महत्वपूर्ण सवाल यह है कि नागरिकों की निजता और संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत संरक्षित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए।
अदालत को यह सुनिश्चित करने की चुनौती का सामना करना होगा कि डेटा संरक्षण के उद्देश्य सुरक्षित रहें, लेकिन जनहित में काम करने वाले पत्रकारों के सामने अनावश्यक कानूनी बाधाएं भी न खड़ी हों।
यह बहस किसी एक मीडिया संस्थान या किसी एक सरकार तक सीमित नहीं है। आज जो सुरक्षा पत्रकारों के लिए जरूरी है, वही भविष्य में किसी भी दल की सरकार के दौरान जनता के अधिकारों की रक्षा कर सकती है।
सवाल पूछने वाला पत्रकार बचेगा, तभी लोकतंत्र जवाब मांग पाएगा
बोफोर्स से लेकर पनामा पेपर्स तक की पड़ताल हमें याद दिलाती है कि सत्ता से जुड़े हर महत्वपूर्ण सवाल का जवाब आधिकारिक बयानों में नहीं मिलता। कई बार सच तक पहुंचने के लिए दस्तावेज खंगालने पड़ते हैं, गोपनीय सूत्रों की रक्षा करनी पड़ती है और ताकतवर लोगों के सामने असुविधाजनक सवाल रखने पड़ते हैं।
मोदी जी और शाह जी से सवाल है—क्या आप ऐसा भारत चाहते हैं, जहां पत्रकार सरकार के हर दावे की जांच कर सकें, या ऐसा माहौल जिसमें खबर प्रकाशित करने से पहले पत्रकार को कानून, मुकदमे और अपने सूत्रों की सुरक्षा को लेकर सौ बार सोचना पड़े?
पत्रकारिता सरकार की विरोधी नहीं, लेकिन उसका काम सरकार का प्रवक्ता बनना भी नहीं है। उसका दायित्व जनता के प्रति है।
क्योंकि जिस दिन पत्रकार सवाल पूछने से डरने लगेगा, उस दिन सत्ता से जवाब मांगने वाली आवाज कमजोर पड़ जाएगी। और जब सवाल कमजोर होते हैं, तो लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण प्रहरी भी कमजोर होने लगता है।
याद रखिए—सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन स्वतंत्र पत्रकारिता की रक्षा करना पूरे लोकतंत्र की जिम्मेदारी है।




