चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल ज्ञानेश कुमार की बेईमानी पर क्यो न हो बवाल
जब दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियाँ सामने हों, तो सिर्फ सर्वसम्मति का दावा लोकतंत्र के सवालों का जवाब नहीं हो सकता!

लोकतंत्र के प्रहरी पर ही उठने लगे सवाल
भारत का चुनाव आयोग लोकतंत्र की उस बुनियाद का संरक्षक है, जिस पर देश के करोड़ों नागरिकों का भरोसा टिका हुआ है। चुनाव आयोग का काम केवल चुनाव कराना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और संदेह से परे हो। लेकिन जब इसी संवैधानिक संस्था के कामकाज को लेकर सवाल उठने लगें, जब उसके भीतर दर्ज आपत्तियों की खबरें सामने आएँ और जब उन सवालों का स्पष्ट जवाब देने के बजाय प्रक्रियागत दलीलों का सहारा लिया जाए, तो लोकतंत्र के भविष्य को लेकर चिंता होना स्वाभाविक है।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेईमानी वाले चुनाव आयोग को आज इन्हीं सवालों का सामना करना पड़ रहा है। इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकार रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट में आयोग के भीतर कथित मतभेदों और निर्णय प्रक्रिया को लेकर जो तथ्य सामने रखे गए हैं, वे केवल किसी अधिकारी या पत्रकार का मामला नहीं हैं। ये सवाल चुनाव आयोग की संस्थागत पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़े हैं।

ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व पर सवाल क्यों?
रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने दस महीनों के दौरान 14 बार आपत्तियाँ दर्ज की थीं। इन आपत्तियों का मूल सवाल यह था कि आयोग के नाम पर लिए जा रहे कुछ फैसलों की जानकारी संबंधित चुनाव आयुक्तों को समय पर क्यों नहीं मिल रही थी।
यदि यह विवरण सही है, तो सवाल बेहद गंभीर है। तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था में निर्णय किस प्रक्रिया से लिए जा रहे थे? क्या सभी सदस्यों को महत्वपूर्ण फैसलों की जानकारी समय पर दी जा रही थी? क्या निर्णय लेने की प्रक्रिया में आवश्यक संस्थागत समन्वय मौजूद था?
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को इन सवालों का स्पष्ट जवाब देना चाहिए। केवल यह कहना कि आयोग के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए, उन परिस्थितियों की व्याख्या नहीं करता जिनमें आयोग के भीतर आपत्तियाँ दर्ज हुईं।
सर्वसम्मति का दावा और निर्णय प्रक्रिया की पारदर्शिता दो अलग-अलग प्रश्न हैं।
3. हलफनामे में स्वीकारोक्ति, लेकिन सवालों पर चुप्पी!
रितिका चोपड़ा के विश्लेषण के मुताबिक, चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने 27 पन्नों के हलफनामे में कई घटनाओं का उल्लेख किया है, लेकिन उन घटनाओं से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों का स्पष्ट उत्तर नहीं दिया है।
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या किसी घटना के घटित होने की पुष्टि कर देना ही पर्याप्त है, या उसके पीछे की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए?
यदि किसी ऑनलाइन फॉर्म में ऐसा बदलाव हुआ, जिससे मतदाताओं को भ्रम हो सकता था, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि बदलाव किसने किया, किसके निर्देश पर किया और उसकी निगरानी किस स्तर पर हुई।
यदि किसी अधिकारी के स्तर पर प्रक्रिया संबंधी गलती हुई, तो यह भी बताया जाना चाहिए कि सुधारात्मक कार्रवाई क्या की गई।
यदि आयोग के भीतर किसी निर्णय को लेकर असहमति थी, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि असहमति के बावजूद निर्णय किस प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ा।
लोकतंत्र में जवाबदेही का अर्थ केवल घटना स्वीकार करना नहीं, बल्कि यह बताना भी है कि गलती कहाँ हुई और उसके लिए जिम्मेदार कौन था।
फॉर्म-6 का विवाद: जिम्मेदारी किसकी?
रिपोर्ट के अनुसार, विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से संबंधित घोषणा-पत्र को ऑनलाइन फॉर्म-6 में जिस तरह प्रदर्शित किया गया, उससे यह भ्रम पैदा हो सकता था कि वैधानिक फॉर्म में संशोधन किया गया है।
चुनाव आयोग ने कथित तौर पर स्वीकार किया कि ऑनलाइन प्रस्तुति से ऐसा आभास हो सकता था और बाद में फॉर्म को दो अलग-अलग हिस्सों में बाँटा गया।
लेकिन यहाँ मूल सवाल अपनी जगह कायम है—जब इस प्रक्रिया पर पहले ही आपत्तियाँ दर्ज की जा चुकी थीं, तब ऑनलाइन फॉर्म में बदलाव कैसे हुआ? इसे लागू करने से पहले आवश्यक जाँच क्यों नहीं की गई? और यदि बाद में सुधार करना पड़ा, तो इसके लिए जिम्मेदारी किसकी थी?
मतदाता सूची से जुड़ा कोई भी फॉर्म सामान्य प्रशासनिक कागज नहीं है। उसका संबंध नागरिक के मताधिकार से है। इसलिए उसमें होने वाला बदलाव पूरी सावधानी, स्पष्टता और वैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप होना चाहिए।
पश्चिम बंगाल और गोवा के मामलों में भी जवाब जरूरी
रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल और गोवा से जुड़े मामलों का भी उल्लेख है। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने के खिलाफ दाखिल अपीलों को लेकर आयोग के हलफनामे में कहा गया कि संबंधित मामले आयोग के सामने नहीं लाए गए थे।
लेकिन यदि किसी चुनाव आयुक्त की पूर्व टिप्पणी में इस प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए थे, तो दोनों विवरणों के बीच संबंध स्पष्ट किया जाना चाहिए।
इसी तरह गोवा में मतदाता सूची से बाहर रह गए 97 मतदाताओं में से 88 के बाद में फॉर्म-6 के माध्यम से आवेदन करने की बात सामने आई। लेकिन इससे यह सवाल अपने आप समाप्त नहीं हो जाता कि पहले संबंधित अधिकारियों के निर्णयों को सॉफ्टवेयर के माध्यम से लागू करने में बाधा क्यों आई थी।
यदि तकनीकी व्यवस्था किसी वैधानिक प्रक्रिया को रोक रही थी, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी थी? क्या समस्या की पहचान समय रहते की गई? क्या मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए तत्काल कदम उठाए गए?
इन सवालों का जवाब तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर दिया जाना चाहिए।
पत्रकारिता पर आरोप लगाने से सवाल खत्म नहीं होते
जब कोई पत्रकार किसी संवैधानिक संस्था के कामकाज पर सवाल उठाता है, तो उसका जवाब व्यक्तिगत आरोपों या राजनीतिक कटाक्षों से नहीं, बल्कि दस्तावेजों और तथ्यों से दिया जाना चाहिए।
रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट पर यदि किसी को आपत्ति है, तो उसका खंडन संबंधित दस्तावेजों और प्रमाणों के साथ किया जा सकता है। लेकिन किसी पत्रकार की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना उस रिपोर्ट में उठाए गए प्रत्येक प्रश्न का उत्तर नहीं है।
लोकतंत्र में पत्रकारिता का दायित्व सत्ता और संस्थाओं से जवाब माँगना है। इसी तरह पत्रकारिता की भी जिम्मेदारी है कि वह तथ्यों की पुष्टि करे और निष्कर्षों को प्रमाणों के आधार पर प्रस्तुत करे।
इसलिए इस मामले में न तो पत्रकार की हर बात को बिना जाँच अंतिम सत्य मानना उचित होगा और न ही सवाल उठाने मात्र से उसकी रिपोर्ट को खारिज करना।
सही रास्ता है—दस्तावेज सामने रखिए, सवालों के जवाब दीजिए और तथ्यों को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनने दीजिए।
मुख्य चुनाव आयुक्त को देश के सामने जवाब देना चाहिए
ज्ञानेश कुमार देश के मुख्य चुनाव आयुक्त हैं। इस पद की गरिमा केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही से बनती है।
यदि आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे हैं, तो उनका स्पष्ट उत्तर देना किसी व्यक्ति पर एहसान नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी है।
देश यह जानना चाहता है कि आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों का वास्तविक आधार क्या था। क्या उन आपत्तियों पर विचार किया गया? क्या निर्णय प्रक्रिया में आवश्यक सुधार किए गए? क्या ऑनलाइन फॉर्म और तकनीकी व्यवस्थाओं से संबंधित समस्याओं की जिम्मेदारी निर्धारित हुई?
इन प्रश्नों का उत्तर देने से चुनाव आयोग कमजोर नहीं होगा। इसके उलट, पारदर्शिता से उसकी विश्वसनीयता मजबूत होगी।
चुनाव आयोग किसी व्यक्ति की निजी संस्था नहीं
भारत का चुनाव आयोग किसी सरकार, किसी राजनीतिक दल या किसी पदाधिकारी की निजी संस्था नहीं है। वह संविधान और जनता के प्रति जवाबदेह संस्था है।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में पद की प्रतिष्ठा आलोचना से बचने में नहीं, बल्कि आलोचना का तथ्यपूर्ण उत्तर देने में है।
यदि आयोग का हर निर्णय उचित प्रक्रिया के तहत लिया गया है, तो दस्तावेजों के आधार पर यह स्पष्ट किया जाना चाहिए। यदि कहीं प्रक्रियागत त्रुटि हुई है, तो उसे स्वीकार कर सुधार किया जाना चाहिए। और यदि किसी स्तर पर जिम्मेदारी तय होती है, तो उसके बारे में भी पारदर्शी जानकारी दी जानी चाहिए।
चुनाव आयोग की निष्पक्षता केवल उसके अपने दावों से प्रमाणित नहीं होगी। उसका प्रमाण उसकी कार्यप्रणाली, निर्णयों की पारदर्शिता और जनता के विश्वास में दिखाई देना चाहिए।
ज्ञानेश कुमार से सवाल पूछना चुनाव आयोग का अपमान नहीं है। सवालों का जवाब न मिलना ही उस संस्था की विश्वसनीयता के लिए चुनौती बन सकता है, जिस पर भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी जिम्मेदारियों में से एक है।
लोकतंत्र में चुनाव केवल वोट डालने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ यह भी है कि वोट की रक्षा करने वाली संस्था से जनता सवाल पूछ सके—और उस संस्था को उन सवालों का जवाब देना पड़े।




