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रिजीम चेंज की आहट,नरेंद्र मोदी व अमित शाह की छटपटाहट

मोदी-शाह की सत्ता को जनता के सवालों का जवाब देना होगा!

लोकतंत्र में सत्ता किसी नेता की जागीर नहीं होती और न ही प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने का मतलब यह है कि जनता अगले चुनाव तक सवाल पूछना छोड़ दे। सत्ता का असली मालिक नागरिक है, नेता नहीं। जनता जब महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और चुनावी पारदर्शिता पर सवाल उठाती है, तो सरकार का कर्तव्य जवाब देना होता है, न कि सवाल पूछने वालों को ही कटघरे में खड़ा करना।

आज देश में ‘रिजीम चेंज’ यानी सत्ता परिवर्तन की चर्चा से राजनीतिक गलियारों में बेचैनी दिखाई देती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की सरकार को यह समझना होगा कि सत्ता बदलने की मांग लोकतंत्र के खिलाफ नहीं, बल्कि लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा है। अगर जनता को सरकार का काम पसंद नहीं आता, तो उसे सत्ता से हटाने की मांग करने का पूरा अधिकार है।
सवाल सीधा है—अगर सरकार को अपने काम पर भरोसा है, तो उसे जनता की आवाज से डर क्यों लगता है?

‘रिजीम चेंज’ कोई देशद्रोह नहीं!

सत्ता परिवर्तन की मांग करना कोई अपराध नहीं है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना, सरकार की नीतियों की आलोचना करना और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाना नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार हैं। बशर्ते आंदोलन कानून के दायरे में रहे और हिंसा या दूसरे गैरकानूनी कृत्यों का सहारा न लिया जाए।

लेकिन जब सरकार के विरोध को देशविरोध से जोड़कर पेश किया जाने लगे, तब सवाल केवल किसी राजनीतिक दल का नहीं रह जाता, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों का हो जाता है।

प्रधानमंत्री मोदी को याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना देश की आलोचना करना नहीं है। सरकार बदल सकती है, प्रधानमंत्री बदल सकता है, लेकिन देश और लोकतंत्र किसी एक व्यक्ति से बड़े हैं।

देशभक्ति का प्रमाण सरकार की तारीफ करना नहीं, बल्कि देश के भविष्य के लिए सवाल पूछने का साहस भी है।

मोदी जी! लोकप्रियता का मतलब असीमित अधिकार नहीं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय से देश की राजनीति के केंद्र में हैं। उनकी चुनावी सफलता अपनी जगह है, लेकिन चुनाव जीतने से सरकार को मनमानी करने का अधिकार नहीं मिल जाता।

जनता ने सरकार चुनी है, उसे सवालों से छूट देने के लिए नहीं, बल्कि देश चलाने की जिम्मेदारी सौंपने के लिए। बेरोजगार युवा नौकरी मांगे, किसान अपनी समस्याएं उठाए, छात्र शिक्षा व्यवस्था पर सवाल करे या नागरिक चुनावी पारदर्शिता की मांग करें—इन सबको लोकतंत्र का सामान्य हिस्सा माना जाना चाहिए।

अगर हर विरोध को राजनीतिक साजिश बताकर खारिज कर दिया जाए, तो फिर जनता अपनी शिकायत लेकर कहां जाएगी?

मोदी सरकार को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में समर्थन जितना महत्वपूर्ण है, असहमति के लिए जगह बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।

कुर्सी की ताकत से सरकार चलाई जा सकती है, लेकिन जनता का विश्वास केवल जवाबदेही से जीता जाता है।

अमित शाह से सवाल—पुलिस की कार्रवाई पर जवाब कौन देगा?

देश के गृहमंत्री अमित शाह के सामने भी लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की भूमिका और कानून-व्यवस्था के संचालन को लेकर सवाल उठते हैं। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ यदि कहीं अनावश्यक बल प्रयोग हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

पुलिस का काम कानून लागू करना है, नागरिकों की आवाज दबाना नहीं। जहां हिंसा या कानून का उल्लंघन हो, वहां नियमानुसार कार्रवाई जरूरी है; लेकिन शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों के साथ भी कानून और गरिमा के अनुरूप व्यवहार होना चाहिए।

सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि प्रदर्शनकारियों के अधिकारों की रक्षा कैसे होगी और पुलिस की जवाबदेही किस तरह सुनिश्चित की जाएगी।

अमित शाह को यह भी समझना होगा कि गृहमंत्री का पद केवल सख्त बयान देने के लिए नहीं, बल्कि कानून के निष्पक्ष पालन की जिम्मेदारी निभाने के लिए है।

विपक्ष से सवाल पूछना आसान है, लेकिन सत्ता में बैठे लोगों को भी अपने फैसलों का हिसाब देना पड़ता है।

 चुनाव पर सवाल हैं, तो जवाब से परहेज क्यों?

चुनाव लोकतंत्र की बुनियाद हैं। इसलिए मतदाता सूची, वोटों की गिनती और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर उठने वाले सवालों का जवाब तथ्यों के आधार पर दिया जाना चाहिए।

विपक्ष यदि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) या चुनावी व्यवस्था में कथित अनियमितताओं पर सवाल उठाता है, तो उन सवालों की जांच संबंधित तथ्यों और कानून के अनुसार होनी चाहिए। आरोप अपने आप में अपराध साबित नहीं करते, लेकिन आरोपों को बिना जांच के खारिज कर देना भी उचित नहीं है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति, चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता जैसे विषयों पर भी पारदर्शी चर्चा होनी चाहिए। यदि किसी व्यवस्था में सुधार की जरूरत है, तो सरकार को उस पर विचार करने से पीछे नहीं हटना चाहिए।

वोट जनता का अधिकार है, किसी राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं।

विपक्ष को उपदेश, सत्ता को सवालों से छूट?

लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका सरकार का विरोध करना भर नहीं, बल्कि उसकी नीतियों की समीक्षा करना और जनता की समस्याओं को सामने लाना भी है। विपक्ष से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह अपने आरोपों के समर्थन में प्रमाण प्रस्तुत करे और आंदोलन शांतिपूर्ण रखे।

लेकिन सरकार से भी यही अपेक्षा है कि वह आलोचना का जवाब तर्क, तथ्यों और संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर दे।

यदि विपक्ष की हर मांग को साजिश और हर आंदोलन को अराजकता बताकर खारिज कर दिया जाए, तो संवाद का रास्ता बंद हो जाएगा। संसद बहस का मंच है और सड़क जनता की आवाज उठाने का लोकतांत्रिक माध्यम। दोनों की अपनी अहमियत है।

प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह को समझना चाहिए कि मजबूत सरकार वह नहीं जो विरोध की आवाज सुनना बंद कर दे, बल्कि वह है जो कठिन सवालों का जवाब देने का साहस रखती हो।

गांधी का रास्ता और आज का लोकतंत्र

महात्मा गांधी ने सत्याग्रह और अहिंसक प्रतिरोध के माध्यम से अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की परंपरा को मजबूत किया। उनका संदेश था कि सत्ता के सामने सत्य और नैतिकता के साथ खड़ा होना नागरिकों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी हो सकती है।

आज भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन, जनसभाएं, सवाल-जवाब और लोकतांत्रिक आंदोलन नागरिकों को अपनी बात रखने का अवसर देते हैं। सरकार को इन आवाजों को सुनना चाहिए और प्रदर्शनकारियों को भी कानून तथा अहिंसा का पालन करना चाहिए।

लोकतंत्र केवल चुनाव के दिन वोट डालने तक सीमित नहीं है। यह चुनावों के बीच भी जवाबदेही, पारदर्शिता और नागरिक स्वतंत्रता की मांग करता है।

आखिरी सवाल—जनता से डर या जनता पर भरोसा?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को यह तय करना होगा कि वे असहमति को लोकतंत्र की ताकत मानते हैं या सत्ता के लिए खतरा।

जनता को सरकार की तारीफ करने का अधिकार है, तो उसकी आलोचना करने का भी। सत्ता परिवर्तन की मांग करना संवैधानिक लोकतंत्र में राजनीतिक अभिव्यक्ति का हिस्सा है, बशर्ते उसके लिए हिंसा या गैरकानूनी तरीकों का सहारा न लिया जाए।

आज जरूरत नारों से डरने की नहीं, बल्कि उन सवालों के जवाब देने की है जिनके कारण जनता सड़कों पर उतरती है। महंगाई पर जवाब, रोजगार पर जवाब, चुनावी पारदर्शिता पर जवाब और पुलिस की कार्रवाई पर जवाब—यही लोकतांत्रिक सरकार की असली परीक्षा है।

याद रखिए, प्रधानमंत्री जनता से बड़ा नहीं होता, गृहमंत्री संविधान से ऊपर नहीं होता और कोई भी सरकार हमेशा के लिए नहीं होती।

लोकतंत्र में कुर्सी स्थायी नहीं, जनता का अधिकार स्थायी है। ‘रिजीम चेंज’ से डरने के बजाय सरकार को अपने काम से जनता का विश्वास जीतना चाहिए—क्योंकि अंततः सत्ता का फैसला नारों से नहीं, जनता के जनादेश से होता है।

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