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अडानी के चरणों मे नरेन्द्र मोदी लहालोट, यात्रियों के जेब पर तगड़ी चोट

  • मुंबई एयरपोर्ट का खेल: मोदी राज में अडानी की सुविधा, जनता की जेब पर चोट!
  • हेडिंग क्रशर: एक ही महानगर के दोनों एयरपोर्ट पर अडानी का दबदबा, उड़ान कहीं से भी भरिए, महंगाई का बोझ उठाइए!

देश में निजीकरण के नाम पर जनता को बेहतर सुविधाएं देने के दावे किए जाते हैं। सरकार कहती है कि निजी क्षेत्र आएगा तो प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, सेवाएं सुधरेंगी और यात्रियों को राहत मिलेगी। लेकिन मुंबई के दोनों हवाई अड्डों से जुड़ा विवाद एक बड़ा सवाल खड़ा करता है—जब एक ही कारोबारी समूह का दो बड़े एयरपोर्ट पर दबदबा हो, तो प्रतिस्पर्धा का फायदा आखिर किसे मिलेगा और इसकी कीमत कौन चुकाएगा?
नरेन्द्र मोदी की असीम कृपा से मुंबई में अडानी समूह के पास छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे में 73 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जबकि नवी मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे में उसकी हिस्सेदारी 74 प्रतिशत है। यानी देश की आर्थिक राजधानी के दोनों बड़े एयरपोर्ट एक ही कारोबारी समूह के नियंत्रण में हैं।
यह महज कारोबारी विस्तार की कहानी नहीं है। यह उस आर्थिक व्यवस्था पर सवाल है, जिसमें सरकार की नीतियों, निजी कंपनियों के हितों और आम आदमी की जेब के बीच टकराव दिखाई देने लगता है।

 

एक ही शहर, दो एयरपोर्ट और एक ही कारोबारी का दबदबा!

मुंबई का मौजूदा एयरपोर्ट देश के सबसे व्यस्त हवाई अड्डों में शामिल है। एयरलाइंस ने यहां अपना नेटवर्क, यात्रियों की सुविधा और परिचालन व्यवस्था विकसित की है। दूसरी ओर, नवी मुंबई में नया एयरपोर्ट तैयार हुआ है, जहां पर्याप्त उड़ानें और यात्री पहुंचाना उसके व्यावसायिक संचालन के लिए जरूरी है।
सवाल यह है कि यदि दोनों एयरपोर्ट एक ही समूह के नियंत्रण में हों, तो क्या उनके बीच वास्तविक प्रतिस्पर्धा संभव है?
सरकार चाहती तो नीतिगत स्तर पर ऐसी व्यवस्था विकसित करने पर विचार कर सकती थी, जिससे दोनों हवाई अड्डों के बीच स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहन मिलता। लेकिन अब विवाद इस बात पर है कि नवी मुंबई एयरपोर्ट पर उड़ानें बढ़ाने के लिए एयरलाइंस को किस हद तक बाध्य किया जा सकता है।
निजी कंपनी का कारोबार बढ़ाना उसका व्यावसायिक हित हो सकता है, लेकिन उस हित की कीमत यात्रियों को क्यों चुकानी चाहिए?

टर्मिनल के पुनर्विकास की आड़ में उड़ानों का स्थानांतरण?

विवाद की जड़ मुंबई एयरपोर्ट के टर्मिनल-1 के पुनर्विकास की योजना है। अदाणी एयरपोर्ट्स का तर्क है कि पुनर्विकास के दौरान घरेलू उड़ानों के लिए टर्मिनल-2 में जगह बनानी होगी। इसके लिए लगभग 50 लाख यात्रियों के बराबर सालाना क्षमता को नवी मुंबई की ओर स्थानांतरित करने की जरूरत बताई जा रही है।
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य है: मुंबई एयरपोर्ट पर नियमित अंतरराष्ट्रीय यात्री उड़ानें टर्मिनल-2 से संचालित होती हैं। ऐसे में टर्मिनल-1 के पुनर्विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को नवी मुंबई भेजने की योजना पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
रिपोर्ट किए गए विवाद के मुताबिक, एयरलाइंस को 25 अक्टूबर 2026 तक अपनी अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का 33 प्रतिशत हिस्सा नवी मुंबई स्थानांतरित करने का निर्देश दिया गया। इससे लगभग 265 साप्ताहिक अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के स्थानांतरण का सवाल पैदा होता है।
इतनी बड़ी परिचालन व्यवस्था बदलना कोई छोटा निर्णय नहीं है। इसमें यात्रियों की सुविधा, कनेक्टिंग फ्लाइट, एयरलाइंस के नेटवर्क, कर्मचारियों और परिचालन लागत जैसे अनेक पहलू शामिल हैं।

एयरलाइंस का सवाल: बातचीत का रिकॉर्ड कहां है?

अदाणी एयरपोर्ट्स की ओर से कथित तौर पर कहा गया कि एयरलाइंस के साथ 2020 से इस विषय पर बातचीत चल रही थी। लेकिन एयरलाइन ऑपरेटर्स कमिटी ने इस दावे के समर्थन में दस्तावेज और पत्राचार का रिकॉर्ड मांगा है।
कमिटी ने यह भी सवाल उठाया कि अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का 33 प्रतिशत हिस्सा स्थानांतरित करने का आंकड़ा किस आधार पर तय किया गया।
यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू है।
अगर एयरलाइंस को वर्षों से इस योजना की जानकारी थी, तो बातचीत का रिकॉर्ड सामने आना चाहिए। अगर फैसला पर्याप्त विचार-विमर्श के बिना लिया गया, तो इतने बड़े बदलाव की प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
निजी कंपनी का आदेश अपने आप में सार्वजनिक हित का प्रमाण नहीं हो सकता।
इंडिगो और एयर इंडिया जैसी भारतीय एयरलाइंस के रुख और एमिरेट्स तथा एयर फ्रांस जैसी विदेशी कंपनियों की आपत्तियों को भी तथ्यों के आधार पर समझना होगा। किसी कंपनी की सहमति या विरोध को बिना दस्तावेजों के दबाव अथवा मिलीभगत का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
लेकिन इतना तय है कि विवाद का जवाब पारदर्शिता से ही मिलेगा।

असली चोट यात्रियों की जेब पर: यूडीएफ का अंतर

अब इस पूरे मामले का वह पहलू समझिए, जिसका सीधा संबंध आम यात्रियों से है।
एयरपोर्ट पर यात्रियों से लिया जाने वाला यूजर डेवलपमेंट फीस यानी यूडीएफ उनकी यात्रा की लागत का हिस्सा होता है। यदि दो एयरपोर्ट पर यह शुल्क काफी अलग है, तो उड़ानों का स्थानांतरण यात्रियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल सकता है।
दिए गए शुल्क के आंकड़ों के अनुसार, नवी मुंबई एयरपोर्ट पर अंतरराष्ट्रीय प्रस्थान करने वाले यात्री का यूडीएफ ₹1,225 है, जबकि मुंबई एयरपोर्ट पर यह ₹615 है।
यानी अंतर ₹610 प्रति यात्री है।
घरेलू यात्रियों के मामले में भी दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, नवी मुंबई का यूडीएफ मुंबई एयरपोर्ट से लगभग 3.5 गुना बताया जा रहा है। यदि संबंधित श्रेणी में शुल्क का अंतर ₹445 है, तो नवी मुंबई से उड़ान भरने वाले यात्री को केवल इस मद में इतना अतिरिक्त भुगतान करना पड़ सकता है।
हालांकि, वास्तविक शुल्क यात्री की श्रेणी, लागू दरों और संबंधित नियामकीय आदेशों पर निर्भर करेंगे। इसलिए इन आंकड़ों की आधिकारिक शुल्क-सूची से पुष्टि जरूरी है।
फिर भी मूल सवाल अपनी जगह कायम है: यदि उड़ानें ऐसे एयरपोर्ट पर स्थानांतरित होती हैं जहां यात्रियों पर अधिक शुल्क लगता है, तो इस बदलाव का आर्थिक लाभ किसे और अतिरिक्त बोझ किसे मिलेगा?

मोदी सरकार से सवाल: कारोबारी हित बड़ा या जनता का हित ?

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के सामने यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि एयरपोर्ट जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे में प्रतिस्पर्धा, पारदर्शिता और यात्रियों के हितों की रक्षा कैसे सुनिश्चित की जा रही है।
अडानी समूह का कारोबार बढ़ना अपने आप में कोई अपराध नहीं है। किसी कंपनी को निवेश करने, नया एयरपोर्ट विकसित करने और मुनाफा कमाने का अधिकार है। लेकिन जब एक ही समूह एक महानगर के दोनों प्रमुख एयरपोर्ट पर बड़ा नियंत्रण रखता हो, तब नियामकों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
यह देखना जरूरी है कि उड़ानों के आवंटन और स्थानांतरण के फैसले निष्पक्ष प्रक्रिया से लिए गए हैं या नहीं। यात्रियों पर पड़ने वाले अतिरिक्त शुल्क का आकलन किया गया है या नहीं। और एयरलाइंस की आपत्तियों पर स्वतंत्र रूप से विचार हुआ है या नहीं।
सरकार की परीक्षा यही है कि वह किसी कारोबारी समूह के व्यावसायिक हित और जनता के हितों के बीच संतुलन कैसे कायम करती है।

 

इस पूरे विवाद के पांच बड़े सवाल

  • दोनों एयरपोर्ट पर एक ही समूह का दबदबा: क्या प्रतिस्पर्धा और यात्रियों के विकल्पों पर पड़ने वाले प्रभाव का पर्याप्त आकलन किया गया है?
  •  उड़ानों के स्थानांतरण का आधार: 33 प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को स्थानांतरित करने का आंकड़ा किस अध्ययन और किस नियामकीय प्रक्रिया के आधार पर तय हुआ?
  • बातचीत के दस्तावेज: यदि 2020 से एयरलाइंस के साथ चर्चा हो रही थी, तो उसका रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों न किया जाए?
  • यात्रियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ: अधिक यूडीएफ वाले एयरपोर्ट पर उड़ानें स्थानांतरित होने से यात्रियों की कुल लागत कितनी बढ़ सकती है?
  • सरकार और नियामकों की भूमिका: क्या उन्होंने एयरलाइंस, यात्रियों और सार्वजनिक हितों को ध्यान में रखते हुए स्वतंत्र समीक्षा की है?

एयरपोर्ट जनता की सुविधा के लिए हैं, किसी की कारोबारी मजबूरी के लिए नहीं!

मुंबई एयरपोर्ट का यह विवाद केवल टर्मिनल के पुनर्विकास या उड़ानों के स्थानांतरण का मामला नहीं है। यह उस बड़े सवाल से जुड़ा है कि भारत के महत्वपूर्ण सार्वजनिक बुनियादी ढांचे का संचालन किस तरह हो रहा है और उसके फैसलों का वास्तविक लाभ किसे मिल रहा है।
अगर नवी मुंबई एयरपोर्ट को सफल बनाना है, तो बेहतर सुविधाएं, प्रभावी कनेक्टिविटी, उचित शुल्क और यात्रियों का भरोसा विकसित करना होगा। यदि एयरलाइंस और यात्रियों को पर्याप्त विकल्प दिए बिना उड़ानों के स्थानांतरण का दबाव बनाया जाता है, तो विवाद और गहरा सकता है।
मोदी सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि इस मामले में यात्रियों के हितों की रक्षा के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। अदाणी समूह को भी उड़ानों के स्थानांतरण से जुड़े अपने फैसलों का आधार और संबंधित दस्तावेज सामने रखने चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र में कारोबारी समूहों को मुनाफा कमाने का अधिकार जरूर है, लेकिन जनता को सवाल पूछने का अधिकार उससे भी बड़ा है।
आखिर सवाल यही है—नया एयरपोर्ट चलाना कारोबारी की जिम्मेदारी है, लेकिन उसकी व्यावसायिक सफलता का अतिरिक्त बोझ यात्रियों की जेब पर डालना किसकी जिम्मेदारी है?

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