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नरेन्द्र मोदी को भाई बताने वाला “स्वतंत्र” का वहशियाना किरदार,पीएम साहब क्या ऐसे ही विकसित भारत की नींव रखेंगे बरखुरदार

स्वतंत्र के बयानों से पूरा देश सकते में, नफरत की भाषा से हिंसा तक का खतरनाक सफर

  • नरेंद्र मोदी ने देश के युवाओ को जाम्बी बना दिया है ,न जाने कितने स्वतंत्र घूम रहे है देश मे
  • देश को गृह युद्व में झोंकना चाहती है मोदी एंड कम्पनी

इन दिनों स्वतंत्र भारद्वाज नामक एक 21 वर्षीय युवक से जुड़ा कथित वीडियो और उसमें किए गए दावे सोशल मीडिया तथा सार्वजनिक विमर्श में चर्चा का विषय बने हुए हैं। बिहार के दरभंगा के ग्रामीण परिवेश से आने वाले और दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े रहे इस युवक ने स्वयं को कट्टर हिंदुत्ववादी विचारधारा से प्रभावित बताया है। वह विभिन्न हिंदू संगठनों और गोरक्षा से जुड़े समूहों के साथ सक्रिय रहने का भी दावा करता रहा है।

मामला तब गंभीर हो गया जब एक पॉडकास्ट में उसके द्वारा कथित रूप से किए गए कुछ दावे सामने आए। वीडियो में उसने जंतर-मंतर पर एक राजनीतिक प्रदर्शन के दौरान निशु आज़ाद के पिता संजय कुमार पर हमला करने और उनके सिर में गंभीर चोट पहुंचाने की बात कथित तौर पर स्वीकार की। उसके अनुसार घायल व्यक्ति को अस्पताल ले जाना पड़ा और उसे कई टांके आए।

इन दावों की वास्तविकता और उनसे जुड़े कानूनी पहलुओं का निर्धारण जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया का विषय है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति कैमरे के सामने किसी गंभीर हिंसक घटना में अपनी भूमिका को गर्व के साथ बताता है, तो यह सवाल जरूर उठता है कि समाज में हिंसा और राजनीतिक संरक्षण को लेकर उसकी मानसिकता आखिर किस दिशा में जा रही है।

‘बड़े भाई’ और सत्ता के संरक्षण का दावा

इस कथित पॉडकास्ट का सबसे गंभीर हिस्सा वह है जिसमें स्वतंत्र भारद्वाज ने कुछ बड़े राजनीतिक नेताओं से अपने कथित संबंधों का जिक्र किया। मीडिया में सामने आए विवरणों के अनुसार उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा नेता कपिल मिश्रा और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान जैसे नेताओं को अपने ‘बड़े भाई’ जैसा बताया और दावा किया कि उनके फोन आने तथा कथित राजनीतिक दबाव के कारण पुलिस कार्रवाई से उसे राहत मिली।

ऐसे दावों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच आवश्यक है। किसी भी व्यक्ति द्वारा किसी प्रभावशाली नेता का नाम लेकर यह कहना कि उसके प्रभाव से कानून की कार्रवाई प्रभावित हुई, अपने आप में बेहद गंभीर आरोप है। यदि दावा गलत है तो संबंधित लोगों को इसे स्पष्ट रूप से खारिज करना चाहिए और यदि इसमें कोई सच्चाई है तो कानून की निष्पक्षता पर उठने वाले सवालों का जवाब भी सामने आना चाहिए।

लोकतंत्र में किसी व्यक्ति का राजनीतिक संपर्क उसे कानून से ऊपर नहीं बना सकता। संविधान का मूल सिद्धांत यही है कि अपराध का निर्धारण व्यक्ति की राजनीतिक पहचान देखकर नहीं, बल्कि कानून और साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए।

निशु आज़ाद को कथित धमकी ने बढ़ाई चिंता

कथित वीडियो में छात्रा और एक्टिविस्ट निशु आज़ाद के बारे में भी धमकी भरी भाषा इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है। ‘अगला टारगेट’ जैसे शब्द यदि वास्तव में कहे गए हैं तो इन्हें सामान्य राजनीतिक बयान या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में नहीं रखा जा सकता।

राजनीतिक असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन किसी व्यक्ति को निशाना बनाने, डराने या हिंसा की धमकी देने का अधिकार किसी को नहीं है। विशेषकर तब, जब सोशल मीडिया के माध्यम से ऐसे बयान हजारों-लाखों लोगों तक पहुंच सकते हों।

मुस्लिम समुदाय के प्रति नफरत का सवाल

कथित इंटरव्यू में मुस्लिम समुदाय के प्रति आपत्तिजनक और नफरत भरी टिप्पणियां किए जाने की भी चर्चा है। किसी पूरे समुदाय को उसकी धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बनाना न तो राष्ट्रवाद है और न ही धर्म की रक्षा।

भारत की ताकत उसकी विविधता में है। यहां हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और अनेक समुदाय सदियों से साथ रहते आए हैं। किसी व्यक्ति का अपराध पूरे समुदाय का अपराध नहीं हो सकता और किसी समुदाय के प्रति सामूहिक घृणा लोकतांत्रिक समाज के लिए बेहद खतरनाक है।

नफरत की भाषा धीरे-धीरे सामान्य होती है और जब समाज उसे स्वीकार करने लगता है तो उसके बाद हिंसा के लिए मानसिक जमीन तैयार होती है। इसलिए ऐसे बयानों को केवल सोशल मीडिया की सनसनी मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा।

यह पहली घटना नहीं है

दक्षिणपंथी राजनीति से जुड़े कुछ लोगों के विवादित और हिंसक बयानों का इतिहास नया नहीं है। गुजरात दंगों के संदर्भ में 2007 में तहलका द्वारा किए गए ‘ऑपरेशन कलंक’ स्टिंग ऑपरेशन का उदाहरण आज भी चर्चा में आता है।

इस स्टिंग में बजरंग दल से जुड़े बाबू बजरंगी के कथित बयान सामने आए थे, जिनमें उसने 2002 के नरोदा पाटिया हिंसा में अपनी भूमिका और हिंसक गतिविधियों से जुड़े कई गंभीर दावे किए थे। उसके बयानों में हिंसा को लेकर कथित तौर पर गर्व और उत्तेजना भी दिखाई गई थी।

बाद में नरोदा पाटिया मामले में अदालत ने बाबू बजरंगी समेत कई आरोपियों को दोषी ठहराया। हालांकि गुजरात हाई कोर्ट के बाद इस मामले की न्यायिक प्रक्रिया में आगे भी महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुए और बाबू बजरंगी को स्वास्थ्य संबंधी आधार पर जमानत मिली। 2023 में नरोदा गांव मामले में वह अन्य आरोपियों के साथ बरी भी हुआ। इसलिए अलग-अलग मामलों के कानूनी परिणामों को एक-दूसरे से अलग समझना जरूरी है।

नफरत और न्याय के बीच सबसे बड़ा सवाल

इन घटनाओं से एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है—क्या भारत में राजनीतिक या वैचारिक पहचान किसी व्यक्ति को कानून की सामान्य प्रक्रिया से बाहर कर सकती है?

यदि कोई व्यक्ति हिंसा का दावा करता है, किसी समुदाय के खिलाफ घृणा फैलाता है या किसी विरोधी को धमकी देता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई का आधार उसकी विचारधारा नहीं बल्कि उसके कृत्य होने चाहिए। यही सिद्धांत हर व्यक्ति पर समान रूप से लागू होना चाहिए।

कानून का शासन तभी मजबूत होगा जब सत्ता के करीब रहने वाला व्यक्ति भी उसी कानून के सामने जवाबदेह होगा जिसके सामने एक सामान्य नागरिक होता है।

गुजरात दंगों की विरासत से सबक

गुजरात दंगों से जुड़े मामलों ने भारतीय लोकतंत्र के सामने अनेक कठिन सवाल खड़े किए। नरोदा पाटिया, नरोदा गांव, बेस्ट बेकरी और अन्य मामलों की लंबी न्यायिक प्रक्रिया ने यह दिखाया कि सामूहिक हिंसा के मामलों में न्याय हासिल करना कितना जटिल हो सकता है।

माया कोडनानी और बाबू बजरंगी जैसे नाम इन मामलों की वजह से लंबे समय तक सार्वजनिक बहस में रहे। कई मामलों में अदालतों ने दोष सिद्ध किए, कई आरोपियों को बरी किया और कई मामलों में अपील तथा अन्य कानूनी प्रक्रियाएं चलीं।

इसीलिए किसी भी राजनीतिक समूह के प्रति अंध समर्थन या अंध विरोध के बजाय अदालतों के फैसलों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष निष्कर्ष निकालना जरूरी है।

बिलकिस बानो मामले ने भी उठाए गंभीर सवाल

बिलकिस बानो मामले में सामूहिक बलात्कार और हत्या के दोषियों की समयपूर्व रिहाई ने पूरे देश में तीखी बहस पैदा की थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रिहाई के आदेश को रद्द करते हुए दोषियों को वापस जेल भेजने का निर्देश दिया।

यह घटना इस बात का महत्वपूर्ण उदाहरण बनी कि गंभीर अपराधों में सजा, दया, रिहाई और राज्य की नीतियों को लेकर जनता के बीच कितने गहरे सवाल पैदा हो सकते हैं।

न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा तभी कायम रह सकता है जब लोगों को यह विश्वास हो कि अपराधी की पहचान, राजनीतिक संबंध, धर्म या सामाजिक प्रभाव उसके लिए अलग कानून नहीं बना सकते।

‘नफरती गिरोह’ को खाद-पानी कौन देता है?

आज असली चिंता केवल स्वतंत्र भारद्वाज जैसे किसी एक व्यक्ति को लेकर नहीं होनी चाहिए। चिंता उस वातावरण को लेकर होनी चाहिए जिसमें युवा अपने भीतर नफरत को राजनीतिक पहचान समझने लगते हैं और हिंसक भाषा को बहादुरी मानने लगते हैं।

सोशल मीडिया ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। उत्तेजक बयान, आधे-अधूरे वीडियो और धार्मिक ध्रुवीकरण से जुड़ी सामग्री बहुत तेजी से फैलती है। कुछ लोग लोकप्रियता और राजनीतिक पहचान के लिए जानबूझकर विवादित भाषा का इस्तेमाल करते हैं।

यहां राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, मीडिया और नागरिक समाज की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। नफरत फैलाने वाले बयान चाहे किसी भी विचारधारा या समुदाय की ओर से आएं, उनका विरोध समान रूप से होना चाहिए।

युवाओं को तय करना होगा कि वे किस भारत के साथ खड़े हैं

भारत के युवाओं के सामने आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि वे अपने राजनीतिक मतभेदों के बावजूद किस तरह का समाज बनाना चाहते हैं।

क्या ऐसा भारत जहां असहमति का जवाब तर्क से दिया जाए या ऐसा भारत जहां विरोधी को धमकाना राजनीतिक बहादुरी माना जाए?

क्या ऐसा भारत जहां धार्मिक पहचान व्यक्तिगत आस्था का विषय हो या ऐसा भारत जहां धर्म के नाम पर पूरे समुदाय को दुश्मन बना दिया जाए?

महात्मा गांधी का भारत अहिंसा, सह-अस्तित्व और संवाद का भारत था। संविधान ने भी समानता, स्वतंत्रता और भाईचारे को लोकतंत्र के मूल आधार के रूप में स्वीकार किया है। इसलिए किसी भी विचारधारा के नाम पर हिंसा और नफरत को सामान्य बनाना संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है।

नफरत का जवाब भीड़ नहीं, कानून और नागरिक चेतना है

ऐसे मामलों में प्रतिक्रिया भी कानून के दायरे में होनी चाहिए। किसी कथित अपराध का जवाब दूसरी हिंसा नहीं हो सकता। किसी नफरत फैलाने वाले व्यक्ति का विरोध करते हुए भी हमें कानून, संविधान और लोकतांत्रिक मर्यादाओं को नहीं छोड़ना चाहिए।

जरूरत इस बात की है कि हिंसा या घृणा फैलाने वाले बयानों की निष्पक्ष जांच हो, यदि अपराध बनता है तो कानून के अनुसार कार्रवाई हो और यदि आरोप गलत साबित होते हैं तो संबंधित व्यक्ति को भी न्याय मिले।

लोकतंत्र में यही संतुलन हमारी सबसे बड़ी ताकत है।

एक ‘स्वतंत्र’ नहीं, मानसिकता से लड़ने की जरूरत

स्वतंत्र भारद्वाज से जुड़े कथित बयानों पर बहस कुछ समय बाद खत्म हो सकती है, लेकिन उससे पैदा हुआ बड़ा सवाल बना रहेगा—क्या हम ऐसा समाज बनने देंगे जहां नफरत, धमकी और हिंसा को युवाओं के लिए गौरव का विषय बना दिया जाए?

यदि जवाब ‘नहीं’ है तो लड़ाई किसी एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि उस मानसिकता के खिलाफ होनी चाहिए जो धर्म के नाम पर घृणा, राजनीति के नाम पर हिंसा और प्रभाव के नाम पर कानून से बच निकलने को उचित ठहराती है।

भारत की बहुलवादी परंपरा किसी एक धर्म, जाति या विचारधारा की संपत्ति नहीं है। इसे बचाने की जिम्मेदारी हर नागरिक की है।

आज जरूरत ऐसे नागरिक समाज की है जो वैचारिक रूप से सजग, नैतिक रूप से मजबूत और संविधान के प्रति प्रतिबद्ध हो। छात्रों और युवाओं को इस अभियान की अगुवाई करनी होगी। उन्हें तय करना होगा कि वे नफरत के वायरल वीडियो का हिस्सा बनेंगे या तर्क, संवाद और सद्भाव की संस्कृति को मजबूत करेंगे।

क्योंकि समस्या केवल एक ‘स्वतंत्र’ की नहीं है। असली चुनौती उस मानसिकता की है जो नफरत को स्वतंत्रता, हिंसा को बहादुरी और दूसरों के अधिकारों को कुचलने को राष्ट्रवाद समझने लगती है।

और यदि हम गांधी, आंबेडकर और संविधान के सपनों वाला भारत चाहते हैं, तो ऐसी मानसिकता का जवाब हिंसा से नहीं, बल्कि सत्य, कानून, संविधान और जागरूक नागरिक चेतना से देना होगा।

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