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मोदी ने छात्रों के मंच पर किया राजनैतिक संवाद,देश के कर्णधारों के हित की नही किया कोई बात

  • मोदी के भाषण में छात्र गायब, चुनावी एजेंडा हावी
  • एसआरसीसी में युवाओं से संवाद के नाम पर विपक्ष पर प्रहार
  • रोजगार, शिक्षा, महंगाई और छात्रों के सवाल भाषण से नदारद

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दिल्ली विश्वविद्यालय के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के शताब्दी समारोह में छात्रों के बीच पहुंचे, लेकिन जिस मंच से देश के भविष्य, शिक्षा, रोजगार, तकनीक और युवाओं की आकांक्षाओं पर गंभीर संवाद की उम्मीद थी, वहां राजनीतिक वार और विपक्ष पर हमले ज्यादा मुखर दिखाई दिए। प्रधानमंत्री ने युवाओं से जुड़ने के लिए जेन-जी की शब्दावली का सहारा लिया, पूर्व छात्रों को ‘ओजी’ बताया और राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम पर भी निशाना साधा। सवाल यही है कि जिस देश की सबसे बड़ी युवा आबादी अपने भविष्य को लेकर शिक्षा, रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं, महंगाई और अवसरों के सवालों से जूझ रही है, उसके बीच प्रधानमंत्री के भाषण का केंद्र आखिर छात्र क्यों नहीं बने? एसआरसीसी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में युवाओं के सामने राष्ट्रीय चुनौतियों पर विचार रखने के बजाय यदि भाषण का बड़ा हिस्सा कांग्रेस और विपक्ष को घेरने में चला जाए तो यह संवाद कम और राजनीतिक संदेश ज्यादा नजर आता है। प्रधानमंत्री ने पिछली सरकारों की नाकामियों का उल्लेख तो किया, लेकिन मौजूदा दौर में छात्रों के सामने खड़ी चुनौतियों और सरकार से उनकी अपेक्षाओं पर अपेक्षाकृत कम बात हुई। यही वजह है कि प्रधानमंत्री के इस संबोधन के बाद सवाल उठ रहा है। जिस मंच पर छात्रों की आवाज सबसे ज्यादा सुनाई देनी चाहिए थी, वहां छात्र आखिर गायब क्यों थे।

जेन-जी को साधने की कोशिश या संवाद का नया अंदाज

प्रधानमंत्री मोदी ने एसआरसीसी में युवाओं को संबोधित करते हुए जेन-जी की लोकप्रिय शब्दावली ‘ओजी’ यानी ‘ओरिजनल गैंग्स्टर’ का इस्तेमाल किया। संस्थान के पूर्व छात्रों की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने उन्हें इस अंदाज में संबोधित किया। राजनीतिक मंचों पर प्रधानमंत्री की भाषा आमतौर पर गंभीर व औपचारिक रही। ऐसे में छात्रों के बीच पहुंचकर सोशल मीडिया वाली शब्दावली का इस्तेमाल चर्चा का विषय बनना स्वाभाविक है। सवाल शब्द के इस्तेमाल का नहीं, बल्कि संवाद की दिशा का है। युवा पीढ़ी केवल लोकप्रिय शब्द सुनकर प्रभावित नहीं होती। वह रोजगार के अवसर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता, फीस, छात्रवृत्ति, कैंपस सुरक्षा, शोध और तकनीकी अवसरों को लेकर ठोस जवाब चाहती है। युवाओं को यदि केवल सोशल मीडिया की भाषा में संबोधित किया जाए, लेकिन उनके वास्तविक सवालों को राजनीतिक हमलों के नीचे दबा दिया जाए तो संवाद का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ पर भी निशाना

प्रधानमंत्री ने राहुल गांधी के छात्र संवाद अभियान ‘छात्रों की गूंज’ पर भी टिप्पणी की। उन्होंने इसे ‘झूठ की गूंज’ करार देते हुए कहा कि ‘सच की हुंकार’ के सामने झूठ की गूंज टिक नहीं सकती। यहीं से सवाल और बड़ा हो जाता है। आखिर छात्रों के बीच संवाद का जवाब संवाद से दिया जाना चाहिए या राजनीतिक कटाक्ष से? यदि किसी विपक्षी नेता का अभियान छात्रों की समस्याओं को लेकर है तो सरकार के पास उससे बेहतर रास्ता यही है कि वह उन्हीं सवालों पर अपना रिपोर्ट कार्ड युवाओं के सामने रखे। रोजगार के कितने अवसर पैदा हुए? कितनी प्रतियोगी परीक्षाएं बिना विवाद के संपन्न हुईं? पेपर लीक की समस्या पर क्या स्थायी व्यवस्था बनी? उच्च शिक्षा की लागत कितनी बढ़ी? ग्रामीण और गरीब परिवारों के विद्यार्थियों के लिए अवसर कितने बढ़े? इन सवालों के जवाब युवाओं के लिए किसी भी राजनीतिक नारे से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

‘दिमागी नक्सल’ से लेकर कांग्रेस तक, भाषण का रुख साफ

प्रधानमंत्री ने अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन में इस्तेमाल किए गए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को भी दोहराया। उन्होंने कहा कि लाल किले से इस नाम की ‘होम्योपैथी की गोली’ देने के बाद देश में मौजूद ‘दिमागी नक्सल’ सामने आने लगे। प्रधानमंत्री की इस भाषा पर राजनीतिक बहस होना तय है। लेकिन छात्रों के बीच इस तरह के राजनीतिक रूपकों की जरूरत पर भी सवाल उठेंगे। विश्वविद्यालय और कॉलेज ऐसे स्थान हैं जहां असहमति, बहस और सवाल लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा होते हैं। युवा यदि सरकार से सवाल पूछते हैं तो उन्हें राजनीतिक खांचे में बांटने के बजाय उनके सवालों का उत्तर देना अधिक प्रभावी लोकतांत्रिक रास्ता माना जाता है। एसआरसीसी के मंच से प्रधानमंत्री ने 2008 के मुंबई आतंकी हमले, पूर्वोत्तर की अशांति और वैश्विक मंदी जैसे मुद्दों का उल्लेख करते हुए कांग्रेस की पिछली सरकारों पर निशाना साधा। इससे भाषण का राजनीतिक स्वर और स्पष्ट हो गया।

भारत के सवालों पर खामोशी क्यों

पिछली सरकारों की गलतियों का हिसाब लोकतंत्र में लिया जाना चाहिए, लेकिन सवाल यह भी है कि वर्तमान सरकार अपने कार्यकाल का हिसाब कब देगी। युवाओं के लिए अतीत से ज्यादा महत्वपूर्ण वर्तमान और भविष्य है। बेरोजगारी, महंगाई, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं की शिकायतें, पेपर लीक, शिक्षा की बढ़ती लागत और सीमित रोजगार अवसर ऐसे मुद्दे हैं जिन पर छात्र लगातार सवाल उठाते रहे हैं। इन मुद्दों पर प्रधानमंत्री यदि सीधे छात्रों से संवाद करते तो यह संबोधन कहीं ज्यादा सार्थक हो सकता था। सरकार अपनी उपलब्धियों का दावा करती है तो युवाओं को उसका आंकड़ों सहित हिसाब भी सुनना चाहिए। कितनी नौकरियां आईं, कितने नए संस्थान बने, शोध पर कितना निवेश हुआ, कितने स्टार्टअप टिकाऊ रोजगार दे रहे हैं और कितने विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा का वास्तविक लाभ मिला। युवाओं के सामने इन सवालों का जवाब जरूरी है।

छात्र आंदोलन बढ़े तो ‘छात्रों की गूंज’ क्यों जरूरी?

राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ अभियान को इसी संदर्भ में देखना होगा। कोटा से शुरू हुआ यह अभियान देहरादून, प्रयागराज और पुणे तक पहुंच चुका है। 19 सितंबर को इंदौर में भी कार्यक्रम प्रस्तावित है। इस अभियान का राजनीतिक प्रभाव कितना है, यह अलग बहस का विषय हो सकता है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि छात्र मुद्दे राजनीतिक विमर्श में जगह बना रहे हैं।
यदि विपक्ष छात्रों के बीच जा रहा है तो सत्ता पक्ष के सामने भी चुनौती है कि वह युवाओं के बीच जाकर अपने काम का रिपोर्ट कार्ड रखे। लोकतंत्र में किसी अभियान को केवल ‘झूठ की गूंज’ कह देने से वह समाप्त नहीं होता। उसे तथ्यों और बेहतर संवाद से चुनौती देनी होती है। महाराष्ट्र के आदिवासी छात्रों से मुलाकात और बिहार में छात्र प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर राहुल गांधी की टिप्पणियां भी इसी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा हैं। छात्रों के आंदोलनों में यदि शिक्षा, रोजगार और जवाबदेही की मांग उठ रही है तो इन मांगों का समाधान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, प्रशासनिक कार्रवाई से होगा।

सत्य निकेतन हादसे ने उठाए युवा सुरक्षा के सवाल

विडंबना यह भी है कि प्रधानमंत्री ने दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच देश को खुशहाल और विकसित बनाने की दिशा में सरकार के प्रयास गिनाए और अगले ही दिन दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के निकट सत्य निकेतन में जर्जर पांच मंजिला इमारत गिरने की घटना सामने आई। घटना में छात्रों के दबे होने की खबर ने राजधानी में किराये के कमरों और छात्र आवासों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए।
यह घटना केवल एक इमारत के गिरने तक सीमित नहीं मानी जा सकती। देश के बड़े शहरों में पढ़ने वाले हजारों छात्र छोटे, महंगे और कई बार असुरक्षित कमरों में रहने को मजबूर हैं। किराये, सुरक्षा, बुनियादी सुविधाओं और भवनों की गुणवत्ता को लेकर जिम्मेदारी किसकी है—यह सवाल भी सरकार और स्थानीय प्रशासन से पूछा जाना चाहिए। छात्रों को देश का भविष्य बताने भर से भविष्य सुरक्षित नहीं होता। उन्हें सुरक्षित आवास, बेहतर शिक्षा, रोजगार और सम्मानजनक जीवन के अवसर भी देने पड़ते हैं।

जंतर-मंतर से कैंपस तक उठते सवाल

छात्रों के आंदोलनों का इतिहास बताता है कि जब युवा सड़कों पर उतरते हैं तो उसके पीछे केवल राजनीतिक साजिश नहीं होती। कई बार वे व्यवस्था की ऐसी कमियों को सामने लाते हैं जिन्हें सरकारी फाइलों में दबा दिया जाता है। यदि छात्रों को अपनी बात रखने के लिए जंतर-मंतर जाना पड़ रहा है, प्रदर्शन करना पड़ रहा है और पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है तो सरकार को पहले यह देखना चाहिए कि असंतोष की जड़ क्या है। युवाओं से संवाद का सबसे प्रभावी तरीका मंच से भाषण देना नहीं, बल्कि उनके बीच बैठकर सुनना है। उनकी फीस, छात्रवृत्ति, परीक्षा, नौकरी और भविष्य की चिंता को समझना है। उन्हें यह भरोसा देना है कि सवाल पूछना अपराध नहीं है।

मनमोहन की अर्थव्यवस्था, अटल की भाषा और राजीव की दृष्टि

आज के राजनीतिक संवाद की तुलना पूर्व प्रधानमंत्रियों की कार्यशैली से भी की जा रही है। डॉ. मनमोहन सिंह छात्रों के बीच अर्थव्यवस्था की जटिलताओं और उसके भविष्य पर बात करते थे। अटल बिहारी वाजपेयी की पहचान ही उनकी संयत और गरिमापूर्ण भाषा के लिए थी। राजीव गांधी ने तकनीक और कंप्यूटर को भारत के भविष्य से जोड़ने की कोशिश की थी। आज की युवा पीढ़ी के सामने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन, रोबोटिक्स, सेमीकंडक्टर, ग्रीन एनर्जी, स्टार्टअप और वैश्विक रोजगार बाजार जैसी नई चुनौतियां हैं। उसे यह जानना है कि भारत इन क्षेत्रों में दुनिया का नेतृत्व कैसे करेगा। लेकिन यदि छात्र सम्मेलन भी चुनावी भाषण का मंच बन जाए और युवाओं के सवाल विपक्ष पर हमले के शोर में दब जाएं तो यह चिंता का विषय है।

 

छात्रों को भाषण नहीं, भविष्य चाहिए

प्रधानमंत्री का पद केवल सत्ता का पद नहीं, बल्कि देश के करोड़ों युवाओं की उम्मीदों का केंद्र भी है। इसलिए प्रधानमंत्री जब विश्वविद्यालय के मंच पर जाते हैं तो उनसे विपक्ष पर राजनीतिक प्रहार से अधिक अपेक्षा की जाती है। युवा यह जानना चाहता है कि उसे नौकरी कहां मिलेगी, उसकी शिक्षा कितनी सुलभ होगी, प्रतियोगी परीक्षा कितनी पारदर्शी होगी, उसका शोध दुनिया में कैसे पहुंचेगा और उसके सपनों को पंख देने के लिए सरकार क्या करेगी। एसआरसीसी का मंच इन सवालों के जवाब देने का शानदार अवसर था। लेकिन यदि वहां भी कांग्रेस, राहुल गांधी और पिछली सरकारों की चर्चा हावी हो जाए तो स्वाभाविक सवाल उठेगा। प्रधानमंत्री के भाषण में छात्र आखिर कहां थे? देश के युवाओं को राजनीतिक नारों से ज्यादा भविष्य की स्पष्ट दिशा चाहिए। उन्हें ‘ओजी’ कहकर संबोधित करने से ज्यादा जरूरी है कि उन्हें अवसर दिया जाए। उन्हें ‘जेन-जी’ कहकर पुकारने से ज्यादा जरूरी है कि उनकी पीढ़ी की बेचैनी सुनी जाए। और उन्हें विपक्ष के आरोपों के बीच खड़ा करने से ज्यादा जरूरी है कि सरकार अपने काम का जवाब उनके सामने रखे। क्योंकि छात्र किसी दल के नहीं होते वे देश के भविष्य होते हैं और भविष्य को भाषण नहीं, भरोसा चाहिए।

* एसआरसीसी में युवाओं के बीच पहुंचे मोदी, मगर छात्र समस्याओं पर खामोशी
* जेन-जी की भाषा में ‘ओजी’ और ‘दिमागी नक्सल’ पर जोर
* राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ अभियान पर प्रधानमंत्री का तंज
* शिक्षा-रोजगार के सवालों से ज्यादा कांग्रेस और विपक्ष पर निशाना
* जंतर-मंतर से लेकर बिहार तक छात्र आंदोलनों के सवाल अनुत्तरित
* एक दिन पूर्व भाषण, दूसरे दिन सत्य निकेतन हादसा युवा सुरक्षा पर भी सवाल
*!मनमोहन, अटल और राजीव के संदर्भ में नेतृत्व की भाषा और दृष्टि पर बहस

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