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मलबे में दबे सात शव,मचा बवाल, सत्ता के चेहरे पर संवेदनहीनता का सवाल!

सत्य निकेतन हादसा

  • सत्य निकेतन हादसे ने खोली दिल्ली की ‘चमक’ की पोल, छात्रों के लिए सुरक्षित हॉस्टल नहीं, जर्जर इमारतों का जाल
  • मलबे में दबे सात शव,मचा बवाल, सत्ता के चेहरे पर संवेदनहीनता का सवाल!
  • सत्य निकेतन हादसे ने खोली दिल्ली की ‘चमक’ की पोल, छात्रों के लिए सुरक्षित हॉस्टल नहीं, जर्जर इमारतों का जाल
  • रेस्क्यू के बीच सियासत का शोर, सोशल मीडिया पर संवेदना और जमीन पर व्यवस्था की सुस्ती
  • एनएसयूआई ने उठाया हेल्पलाइन व राहत का बीड़ा, भाजपा सरकार से पूछे जवाबदेही के सवाल
  • बेसमेंट में निर्माण से कमजोर हुई इमारत या प्रशासनिक निगरानी की नाकामी? जांच के घेरे में पूरी व्यवस्था
  • भव्य कार्यालय बनते रहे, छात्र सुरक्षित आवास के लिए तरसते रहे सत्य निकेतन ने दिखाया विकास का दूसरा चेहरा
  • हादसे के बाद एमसीडी ने अवैध चार मंजिल से अधिक निर्माणों पर सीलिंग की कार्रवाई के निर्देश दिए

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली की चमक-दमक के पीछे छिपी बदहाली का एक और भयावह चेहरा सत्य निकेतन में सामने आया, जहां छात्रों के रहने के लिए इस्तेमाल की जा रही पांच मंजिला इमारत देखते ही देखते मलबे के ढेर में बदल गई। रविवार दोपहर करीब 1:30 बजे हुए इस हादसे ने सात जिंदगियां निगल लीं। हादसे के बाद कई लोग मलबे में फंसे रहे और राहत-बचाव एजेंसियां घंटों तक जिंदगी तलाशती रहीं। करीब 27 घंटे चले अभियान के बाद मलबा पूरी तरह हटाया जा सका। यह महज एक इमारत के ढहने की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ने वाले हजारों छात्रों के लिए पर्याप्त और सुरक्षित हॉस्टल नहीं हैं। मजबूर होकर विद्यार्थी निजी पीजी और कमरों का रुख करते हैं, जहां किराये की मार के साथ भवनों की सुरक्षा भी बड़ा सवाल बनी रहती है। सत्य निकेतन हादसे ने इसी व्यवस्था पर सवालों की पूरी दीवार खड़ी कर दी है। रिपोर्टों के अनुसार हादसे के वक्त इमारत के बेसमेंट में निर्माण या मरम्मत का काम चल रहा था। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने भी कहा कि बेसमेंट में खुदाई के दौरान एक पिलर खिसकने के बाद इमारत गिरी। हादसे के बाद सरकार ने जांच और कार्रवाई की बात कही, लेकिन सवाल यही है क्या हर बार मौतों के बाद ही प्रशासन को जर्जर इमारतें दिखाई देंगी। क्या छात्रों की जिंदगी सुरक्षित आवास से कम कीमत रखती है और क्या जवाबदेही केवल निलंबन तक सीमित रह जाएगी?

ढही इमारत ने दिल्ली की व्यवस्था को कटघरे में खड़ा किया

सत्य निकेतन में ढही इमारत ने दिल्ली की उस व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है, जिसके पोस्टरों और भाषणों में राजधानी को विश्वस्तरीय शहर बनाने के दावे किए जाते हैं। दक्षिण-पश्चिम दिल्ली में दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के समीप स्थित यह इलाका वर्षों से छात्रों के पीजी और किराये के कमरों के लिए जाना जाता है। हादसे के बाद सामने आया कि जिस इमारत में छात्र रह रहे थे, वहां निर्माण, मरम्मत का काम भी चल रहा था। प्रारंभिक जानकारी में बेसमेंट में खुदाई और निर्माण को हादसे की संभावित वजहों में गिना गया। पिछले दिनों दोपहर करीब 1:30 बजे इमारत अचानक भरभराकर गिर गई। कुछ ही पलों में कई मंजिलों की इमारत मलबे में बदल गई और अंदर मौजूद लोगों की चीख-पुकार के बीच बचाव अभियान शुरू हुआ। शुरुआत में पांच लोगों की मौत की सूचना थी, लेकिन बाद में मृतकों की संख्या बढ़ती गई और ताजा रिपोर्टों में सात लोगों की मौत की पुष्टि हुई। मलबे में दबे लोगों को निकालने के लिए दिल्ली पुलिस, अग्निशमन विभाग, एनडीआरएफ समेत विभिन्न एजेंसियां जुटीं। बचाव अभियान आसान नहीं था। संकरी गलियों, भारी मलबे और संभावित रूप से अस्थिर हिस्सों के बीच रेस्क्यू टीमों को बेहद सावधानी से काम करना पड़ा। देर तक यह आशंका बनी रही कि कहीं और लोग मलबे में न दबे हों। आखिरकार करीब 27 घंटे बाद अभियान समाप्त हुआ।

हादसा या व्यवस्था की बनाई हुई त्रासदी?

सबसे बड़ा सवाल इमारत गिरने के कारण को लेकर है। यदि निर्माण अथवा मरम्मत के दौरान बेसमेंट में खुदाई हो रही थी तो भवन की संरचनात्मक सुरक्षा की जांच किसने की, यदि इमारत छात्रावास अथवा पीजी के तौर पर इस्तेमाल हो रही थी तो उसके उपयोग की अनुमति, अग्नि सुरक्षा, संरचनात्मक मजबूती और अन्य मानकों की निगरानी किस विभाग की जिम्मेदारी थी। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि बेसमेंट में निर्माण कार्य के दौरान पिलर खिसकने से इमारत गिरी और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन जनता का सवाल इससे आगे जाता है। दोषी केवल वह व्यक्ति है जिसने निर्माण कराया, या वह पूरा तंत्र भी जिम्मेदार है जिसने निर्माण होते देखा और समय रहते रोकने की कोशिश नहीं की? हादसे के बाद एमसीडी ने चार मंजिल से अधिक के अवैध निर्माणों को सील करने के निर्देश दिए। यह कदम जरूरी है, लेकिन सवाल यह है कि ऐसी कार्रवाई हादसे से पहले क्यों नहीं हुई?

छात्रों की मजबूरी बनी मौत का रास्ता

सत्य निकेतन की त्रासदी को केवल अवैध निर्माण का मामला मानकर खत्म कर देना सबसे आसान रास्ता होगा। असली समस्या इससे कहीं बड़ी है। दिल्ली विश्वविद्यालय के हजारों विद्यार्थी दूसरे शहरों और राज्यों से राजधानी आते हैं। विश्वविद्यालय और उसके कॉलेजों में उपलब्ध हॉस्टल सीटें छात्रों की कुल संख्या की तुलना में बेहद सीमित हैं। नतीजा यह कि विद्यार्थियों को निजी पीजी, किराये के मकानों और छोटे-छोटे कमरों में रहने को मजबूर होना पड़ता है। यही वजह है कि सत्य निकेतन जैसे इलाकों में छात्रों के लिए आवास का बड़ा बाजार खड़ा हो गया है। यहां मकान मालिकों और पीजी संचालकों के सामने मुनाफा प्राथमिकता बन सकता है, जबकि भवन की संरचनात्मक सुरक्षा पीछे छूट सकती है। हादसे ने इसी असंतुलन को उजागर कर दिया है। देश के भविष्य कहे जाने वाले छात्रों के लिए सुरक्षित छत तक सुनिश्चित नहीं, लेकिन उनके नाम पर बड़े-बड़े दावे जरूर। इस मुद्दे को लेकर एनएसयूआई अध्यक्ष विनोद जाखड़ ने दिल्ली हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की है। हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और दिल्ली विश्वविद्यालय को नोटिस जारी किया है। याचिका में प्रत्येक डीयू कॉलेज में हॉस्टल की व्यवस्था तथा छात्र आवास के लिए समयबद्ध नीति की मांग की गई है।

मलबे के बीच सियासत आमने-सामने

हादसे के बाद राहत-बचाव के साथ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी शुरू हो गए। एनएसयूआई ने मौके पर पहुंचकर राहत गतिविधियों में जुटने और छात्रों के परिजनों की सहायता के लिए हेल्पलाइन चलाने का दावा किया। बाद में संगठन ने सुरक्षित हॉस्टल, मलबे में दबे छात्रों की संख्या सार्वजनिक करने, मृतकों के परिजनों को मुआवजा और दिल्ली की जर्जर इमारतों की तत्काल जांच की मांग भी उठाई। दूसरी ओर, मौके पर एनएसयूआई और एबीवीपी कार्यकर्ताओं के बीच कहासुनी की खबरें भी सामने आईं। एनएसयूआई की ओर से इमारत के राजनीतिक संबंधों को लेकर आरोप लगाए गए, हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जांच के बिना नहीं की जा सकती। यहीं से सवाल और गंभीर हो जाता है। जब मलबे के नीचे जिंदगी तलाशने का काम चल रहा हो, तब राजनीति को प्राथमिकता कौन दे रहा है और राहत को कौन इसका फैसला जनता करेगी।

अमित शाह ने गोवा कार्यक्रम रोका, लेकिन सवाल फिर भी कायम

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का गोवा में भाजपा कार्यालय के उद्घाटन का कार्यक्रम हादसे की सूचना के बाद छोटा कर दिया गया। रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने कार्यक्रम में राजनीतिक हिस्सा समाप्त किया और हादसे के संबंध में दिल्ली के मुख्यमंत्री, पुलिस आयुक्त तथा एनडीआरएफ महानिदेशक से स्थिति की जानकारी ली।
इससे एक अलग राजनीतिक बहस भी छिड़ी। एक ओर भाजपा के नए कार्यालयों का विस्तार और दूसरी ओर छात्रों के लिए सुरक्षित हॉस्टल का अभाव यह तुलना अब राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गई है। भाजपा के संगठन विस्तार को लेकर जेपी नड्डा के पुराने बयान में 290 कार्यालय बन जाने, 115 निर्माणाधीन होने और 123 के लिए जमीन हासिल किए जाने की बात सामने आई है। यह आंकड़ा अपने आप में किसी अपराध का प्रमाण नहीं, लेकिन सवाल जरूर पैदा करता है कि क्या राजनीतिक दलों के पास संगठनात्मक ढांचे के विस्तार के लिए संसाधन हैं, तो छात्र आवास जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए सरकारों के पास इच्छाशक्ति क्यों नहीं।

मुआवजा नहीं, जवाब चाहिए 

सत्य निकेतन हादसे के बाद जांच बैठाना और कुछ अधिकारियों पर कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरत इस बात की है कि राजधानी के सभी छात्र पीजी, हॉस्टल और किराये की इमारतों का स्वतंत्र संरचनात्मक ऑडिट कराया जाए। बेसमेंट में हो रहे निर्माण, अनधिकृत बदलाव और अतिरिक्त मंजिलों की जांच हो। यह भी तय होना चाहिए कि किसी भवन को पीजी में बदलने से पहले कौन-कौन से सुरक्षा मानक अनिवार्य होंगे और उनका पालन कौन सुनिश्चित करेगा।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल विश्वविद्यालय व्यवस्था से है। यदि हजारों छात्र हॉस्टल के अभाव में निजी और असुरक्षित भवनों में रहने को मजबूर हैं तो यह केवल मकान मालिकों की समस्या नहीं है। यह शिक्षा व्यवस्था और शहरी नियोजन की भी विफलता है। सत्य निकेतन में सात लोगों की मौत केवल एक हादसे का आंकड़ा नहीं है। यह उन तमाम परिवारों का दर्द है जिन्होंने अपने बच्चों को दिल्ली पढ़ने भेजा था। वे बच्चे बेहतर भविष्य बनाने आए थे, लेकिन उनके हिस्से में एक असुरक्षित इमारत की छत आई और अब सरकार से सवाल सिर्फ इतना नहीं होना चाहिए कि दोषी कौन है। खतरे में खड़ी इमारतों को समय रहते किसने नहीं देखा? छात्रों को सुरक्षित हॉस्टल क्यों नहीं मिले?पीजी व्यवस्था की निगरानी कौन करता है और अगली इमारत गिरने से पहले सरकार क्या करेगी? दिल्ली को सजाने के लिए पर्दे लगाए जा सकते हैं। कैमरों के सामने चमकदार तस्वीरें भी दिखाई जा सकती हैं। लेकिन मलबे में दबे सवालों को पर्दे के पीछे नहीं रखा जा सकता। सत्य निकेतन ने राजधानी को आईना दिखा दिया है। अब सरकार की जिम्मेदारी है कि वह आईना तोड़ने के बजाय उसमें दिखाई दे रही दरारें भरे।

* सत्य निकेतन में पांच मंजिला पीजी इमारत ढही, मौत का आंकड़ा सात तक पहुंचा
* 27 घंटे चला बचाव अभियान, मलबा हटने के बाद सामने आई हादसे की भयावह तस्वीर
* इमारत में बेसमेंट का निर्माण, मरम्मत कार्य चलने की बात सामने आई
* छात्रों के लिए सुरक्षित हॉस्टल व्यवस्था पर दिल्ली सरकार और डीयू से गंभीर सवाल
* एनएसयूआई अध्यक्ष विनोद जाखड़ ने सुरक्षित हॉस्टल और स्वतंत्र जांच की मांग उठाई
* दिल्ली हाईकोर्ट ने भी छात्र हॉस्टल व्यवस्था को लेकर केंद्र, दिल्ली सरकार और डीयू को नोटिस दिया
* मलबे के बीच राजनीतिक बयानबाजी ने संवेदनशीलता बनाम सियासत की बहस को जन्म दिया

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