कैसा मान कैसी हानि जीएसटी चोर आकाश के राजदरी वाटरपार्क की अजीबोगरीब कहानी
राजदरी-देवदरी में पर्यटन कारोबार पर सवाल: शुल्क, भूमि और सुरक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता की मांग

पर्यटकों की बढ़ती आवाजाही के बीच व्यवस्था पर उठे सवाल
अचूक संघर्ष चकिया, चंदौली। चोरी भी सीनाजोरी भी ये कहावत जनपद चंदौली राजदरी-देवदरी वाटरपार्क के मालिक आकाश यादव पर सटीक बैठ रही है।आप को बताते चले कि इस वाटरपार्क का मालिक एक नम्बर का चोट्टा द ग्रेट है ये अपने यहां आने वाले ग्राहकों को कच्चा बिल देता है और बड़े पैमाने पर जीएसटी चोरी को अंजाम देता है। जब अचूक संघर्ष ने इसके कुकर्मो को प्रकाशित किया तो खुन्नस में इसने मानहानि का नोटिस दिया,”अरे अकशवा चोरवा ई जान ले कि मानहानि अखबार के प्रमाण पत्र होला”। अपनी प्राकृतिक सुंदरता और राजदरी व देवदरी जलप्रपात के कारण पूर्वांचल के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शुमार है। यहां प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं। पर्यटन गतिविधियों के बढ़ने के साथ आसपास के क्षेत्र में निजी स्तर पर संचालित विभिन्न व्यावसायिक गतिविधियां भी बढ़ी हैं।
इसी क्रम में राजदरी-देवदरी पर्यटन क्षेत्र के निकट संचालित एक निजी वाटर पार्क को लेकर स्थानीय ग्रामीणों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और कुछ लोगों द्वारा कई सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ताओं ने पार्किंग शुल्क, भूमि के उपयोग, पर्यटकों से लिए जाने वाले शुल्क, कर व्यवस्था, सुरक्षा और आवश्यक अनुमतियों की जांच की मांग की है।

विवाद का केंद्र पार्किंग शुल्क क्यों?
शिकायतकर्ताओं का सबसे प्रमुख सवाल पार्किंग शुल्क को लेकर है। उनका कहना है कि यदि किसी निजी संस्था या संचालक को पर्यटकों से पार्किंग शुल्क वसूलने का अधिकार दिया गया है, तो इसकी वैधता और प्रक्रिया सार्वजनिक होनी चाहिए।
शिकायतकर्ताओं ने यह भी मांग उठाई है कि पर्यटकों को प्रत्येक भुगतान की विधिवत रसीद अथवा वैध बिल उपलब्ध कराया जाए। यदि किसी कर या जीएसटी का प्रावधान लागू होता है तो उसकी अनुपालना भी संबंधित विभागों द्वारा सत्यापित की जानी चाहिए।
टिकट और बिलिंग व्यवस्था की हो जांच
स्थानीय लोगों का कहना है कि पर्यटन क्षेत्र में किसी भी प्रकार की शुल्क वसूली में पारदर्शिता सबसे महत्वपूर्ण है। उनका सुझाव है कि जितने पर्यटकों से टिकट अथवा प्रवेश शुल्क लिया जाता है, उसका डिजिटल अथवा विधिवत रिकॉर्ड रखा जाए।
यदि संबंधित गतिविधि पर जीएसटी अथवा अन्य कर लागू होते हैं तो नियमानुसार बिल जारी किया जाना चाहिए। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि इससे न केवल पर्यटकों को भुगतान का प्रमाण मिलेगा बल्कि सरकारी राजस्व की पारदर्शिता भी सुनिश्चित होगी।
इस संबंध में वास्तविक स्थिति संबंधित कर विभाग और अन्य सक्षम अधिकारियों द्वारा दस्तावेजों की जांच के बाद ही स्पष्ट की जा सकती है।
सरकारी भूमि के उपयोग पर भी सवाल
वाटर पार्क को लेकर दूसरा बड़ा सवाल भूमि के स्वामित्व और उपयोग से जुड़ा है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि जिस भूमि पर अथवा उसके आसपास पार्क की गतिविधियां संचालित हो रही हैं, उसका स्वामित्व किस विभाग या व्यक्ति के नाम दर्ज है।
यदि भूमि सरकारी विभाग की है तो उसके उपयोग के लिए किस प्रकार की अनुमति दी गई है, क्या कोई लीज, अनुबंध, एनओसी अथवा अन्य वैधानिक स्वीकृति जारी हुई है—इन सभी बिंदुओं की जांच जरूरी है।
ग्रामीणों ने राजस्व, सिंचाई, लोक निर्माण विभाग और अन्य संबंधित विभागों से अभिलेखों का संयुक्त सत्यापन कराने की मांग की है।
सड़क किनारे लगे बोर्ड और अतिक्रमण की शिकायत
शिकायतकर्ताओं की ओर से यह भी सवाल उठाया गया है कि पर्यटन क्षेत्र की ओर जाने वाले मार्गों के आसपास लगाए गए प्रचारात्मक बोर्ड और अन्य संरचनाएं किस अनुमति के तहत स्थापित हैं।
यदि कोई संरचना सरकारी या लोक निर्माण विभाग की भूमि की सीमा में आती है तो संबंधित विभाग को मौके पर सीमांकन कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सरकारी भूमि पर बिना अनुमति कोई निर्माण या कब्जा पाया जाता है तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं यदि सभी गतिविधियां वैध अनुमति के आधार पर संचालित हो रही हैं तो प्रशासन को संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
राजदरी-देवदरी के नाम के इस्तेमाल पर भी चर्चा
कुछ शिकायतकर्ताओं ने यह सवाल भी उठाया है कि निजी वाटर पार्क के प्रचार में राजदरी-देवदरी जैसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थल के नाम का किस प्रकार इस्तेमाल किया जा रहा है।
उनका कहना है कि बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए यह स्पष्ट होना चाहिए कि वे प्राकृतिक राजदरी-देवदरी जलप्रपात क्षेत्र में जा रहे हैं या किसी निजी व्यावसायिक प्रतिष्ठान में।
पर्यटन विभाग और जिला प्रशासन यदि इस संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी कर दें तो पर्यटकों में भ्रम की स्थिति समाप्त हो सकती है।
दुर्घटनाओं को लेकर भी उठी चिंता
स्थानीय लोगों ने वाटर पार्क और आसपास के क्षेत्र में यातायात तथा सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि पर्यटन सीजन और छुट्टियों के दौरान क्षेत्र में वाहनों तथा पर्यटकों की संख्या बढ़ जाती है।
ऐसी स्थिति में सड़क किनारे पार्किंग, वाहनों की आवाजाही, पैदल पर्यटकों की सुरक्षा और आपातकालीन व्यवस्था का प्रभावी प्रबंधन आवश्यक है।
यदि किसी निजी व्यावसायिक गतिविधि के कारण सड़क अथवा आसपास के क्षेत्र में यातायात का दबाव बढ़ रहा है तो प्रशासन को उसका भी आकलन करना चाहिए।
क्या सभी वैधानिक अनुमतियां मौजूद हैं?
स्थानीय लोगों की मुख्य मांग यह भी है कि वाटर पार्क के संचालन से संबंधित सभी दस्तावेजों की जांच की जाए।
इनमें भूमि उपयोग की अनुमति, स्थानीय निकाय की अनुमति, अग्नि सुरक्षा संबंधी प्रबंध, विद्युत सुरक्षा, जल उपयोग, स्वच्छता, पर्यावरण संबंधी आवश्यकताएं तथा अन्य लागू विभागीय अनुमतियां शामिल हो सकती हैं।
यह भी देखा जाना चाहिए कि पार्क में बनाए गए निर्माण और सुविधाएं स्वीकृत मानकों के अनुरूप हैं या नहीं।
पर्यटन के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था का भी सवाल
राजदरी-देवदरी क्षेत्र में पर्यटन बढ़ने से स्थानीय दुकानदारों, वाहन चालकों, छोटे कारोबारियों और ग्रामीणों को रोजगार एवं आय के अवसर मिलते हैं।
ऐसे में किसी भी निजी व्यावसायिक गतिविधि का संचालन स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। यदि गतिविधियां नियमों के अनुसार संचालित हों तो पर्यटन को बढ़ावा मिल सकता है, लेकिन यदि अव्यवस्था या अनधिकृत गतिविधियों की शिकायतें हों तो उनका समाधान जरूरी है।
प्रशासन के सामने जांच की चुनौती
अब सबसे बड़ा सवाल जिला प्रशासन के सामने है। शिकायतों के बाद यदि जांच कराई जाती है तो वह केवल मौके का निरीक्षण भर न होकर अभिलेखों की विस्तृत जांच पर आधारित होनी चाहिए।
प्रशासन को यह देखना होगा कि भूमि का वास्तविक स्वामित्व क्या है, किसके नाम दर्ज है, उसका वर्तमान उपयोग क्या है और किसी निजी संस्था को उसका उपयोग करने की अनुमति दी गई है या नहीं।
इसी प्रकार पार्किंग शुल्क और अन्य शुल्कों की वसूली का रिकॉर्ड, टिकट, रसीद, बैंक लेनदेन तथा लागू करों का अनुपालन भी जांच के दायरे में लाई जा सकती है।
सिंचाई और लोक निर्माण विभाग की भूमिका भी महत्वपूर्ण
यदि शिकायतों में सिंचाई विभाग अथवा लोक निर्माण विभाग की भूमि के उपयोग की बात कही जा रही है तो संबंधित विभागों को अपने अभिलेखों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
भूमि की पैमाइश और सीमांकन कराया जाए तो यह आसानी से पता लगाया जा सकता है कि कोई निर्माण अथवा व्यावसायिक गतिविधि सरकारी भूमि की सीमा में है या निजी भूमि पर।
इसी प्रकार सड़क किनारे लगे बोर्ड, पार्किंग और अन्य संरचनाओं की वैधता भी संबंधित विभागों द्वारा स्पष्ट की जा सकती है।
निष्पक्ष जांच से ही साफ होगी तस्वीर
पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता निष्पक्ष जांच की है। आरोपों को अंतिम सत्य मान लेना भी उचित नहीं है और शिकायतों को बिना जांच के खारिज कर देना भी जनहित में नहीं होगा।
यदि जांच में सभी गतिविधियां नियमों के अनुरूप पाई जाती हैं तो प्रशासन को सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। इससे वाटर पार्क प्रबंधन और पर्यटकों के बीच भ्रम समाप्त होगा।
वहीं यदि भूमि उपयोग, शुल्क वसूली, कर, सुरक्षा अथवा अन्य किसी मामले में नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए।
प्रशासन से स्थानीय लोगों की प्रमुख मांगें
स्थानीय लोगों और शिकायतकर्ताओं की मांग है कि—
1. पार्किंग शुल्क वसूली की वैधता की जांच की जाए।
2. संबंधित भूमि के स्वामित्व और उपयोग का सत्यापन कराया जाए।
3. सरकारी भूमि के उपयोग अथवा कब्जे की शिकायत की जांच की जाए।
4. वाटर पार्क के निर्माण और संचालन की वैधानिक अनुमतियों की जांच हो।
5. पर्यटकों की सुरक्षा और यातायात व्यवस्था का निरीक्षण कराया जाए।
6. टिकट, रसीद और लागू करों की व्यवस्था की जांच की जाए।
7. सड़क किनारे लगाए गए बोर्ड एवं अन्य संरचनाओं की वैधता जांची जाए।
8. संबंधित विभागों की संयुक्त टीम से मौके का निरीक्षण कराया जाए।
9. जांच रिपोर्ट के प्रमुख तथ्यों को सार्वजनिक किया जाए।
10. यदि कोई अनियमितता मिले तो जिम्मेदार व्यक्ति अथवा संस्था के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
फिलहाल यह मामला स्थानीय लोगों और शिकायतकर्ताओं द्वारा उठाए गए आरोपों एवं मांगों पर आधारित है। आरोपों की स्वतंत्र प्रशासनिक पुष्टि अभी बाकी है। संबंधित वाटर पार्क प्रबंधन, विभागीय अधिकारियों अथवा अन्य पक्षों का आधिकारिक पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी समाचार में शामिल किया जाना आवश्यक होगा।




