योगी की बाते बस हवा हवाई,जिले के अफसरों की नालायकियत ने सीएम की इज्जत डुबाई
सख्त सरकार, ढीला प्रशासन! जनता के दरबार तक पहुंचते-पहुंचते क्यों बेअसर हो जाता है मुख्यमंत्री का आदेश?

- मुख्यमंत्री की सख्ती का असर निचले स्तर तक पहुंचा या अफसरशाही के गलियारों में अटका
- जनता के लिए सरकार का चेहरा मुख्यमंत्री नहीं, लेखपाल से लेकर थानेदार तक का रवैया
- आईजीआरएस में ‘निस्तारण’ और जमीन पर समाधान के बीच कितना अंतर
- अधिकारी पर शिकायत, उसी के पास जांच निष्पक्षता पर उठते गंभीर सवाल
- जनप्रतिनिधियों की सुनवाई नहीं होने से सरकार की राजनीतिक जमीन पर पड़ सकता है असर
- चुनाव में वोट मांगने अधिकारी नहीं, भाजपा के नेता और कार्यकर्ता ही जनता के बीच जाएंगे

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पहचान सख्त और निर्णायक प्रशासक की रही है। मुख्यमंत्री लगातार अधिकारियों को स्पष्ट संदेश देते रहे हैं कि जनता की शिकायतों की अनदेखी, लापरवाही और भ्रष्ट कार्यप्रणाली बर्दाश्त नहीं की जाएगी। लेकिन अब असली सवाल मुख्यमंत्री की सख्ती का नहीं, बल्कि उस सख्ती के असर का है। आखिर मुख्यमंत्री के स्तर से जारी होने वाले आदेश जिलों, तहसीलों, थानों और सरकारी कार्यालयों तक पहुंचते-पहुंचते कमजोर क्यों पड़ जाते हैं? आम आदमी का सामना मुख्यमंत्री से नहीं, बल्कि लेखपाल, कानूनगो, तहसीलदार, थानेदार, बाबू, एसडीएम, सीओ और जिला स्तर के अधिकारियों से होता है। यही अधिकारी उसके लिए सरकार का वास्तविक चेहरा बनते हैं। सरकार भले ही जनसुनवाई, ऑनलाइन शिकायत और समयबद्ध निस्तारण की व्यवस्था को सुशासन का माध्यम बताए, लेकिन नागरिक के लिए कसौटी सरकारी पोर्टल पर शिकायत का ‘निस्तारित’ होना नहीं, बल्कि उसकी समस्या का वास्तव में समाप्त होना है। आरोप लगते रहे हैं कि कई मामलों में शिकायत उसी अधिकारी अथवा उसी तंत्र के पास पहुंच जाती है जिसके खिलाफ शिकायत की गई होती है। ऐसे में शिकायत के निष्पक्ष परीक्षण पर सवाल उठना स्वाभाविक है। सबसे गंभीर राजनीतिक पहलू यह है कि प्रशासनिक अधिकारी की कथित लापरवाही का नुकसान अधिकारी को नहीं, सरकार और उसके जनप्रतिनिधियों को उठाना पड़ता है। जनता चुनाव में अधिकारी से हिसाब नहीं मांगती, वह सरकार और उसके नेताओं से सवाल करती है। इसलिए मुख्यमंत्री के सामने चुनौती केवल अफसरों पर नियंत्रण की नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही को जमीन पर उतारने की भी है।

सख्त सरकार की असली परीक्षा तहसील और थाने में
योगी सरकार की कार्यशैली का प्रमुख संदेश रहा है लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। मुख्यमंत्री समय-समय पर अधिकारियों को जनता की समस्याओं के त्वरित और गुणवत्तापूर्ण निस्तारण के निर्देश देते रहे हैं। जनसुनवाई को लेकर भी शासन स्तर से लगातार दिशा-निर्देश जारी होते रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि इन निर्देशों का वास्तविक असर कितना हुआ। किसी गरीब की जमीन का विवाद तहसील में वर्षों तक लंबित रहता है। कोई व्यक्ति एफआईआर दर्ज कराने के लिए थाने के चक्कर लगाता है। किसी की फाइल लाइसेंस या अनुमति के लिए महीनों आगे नहीं बढ़ती। किसी सरकारी कार्यालय में प्रमाणपत्र के लिए नागरिक को बार-बार दौड़ना पड़ता है। ऐसे मामलों में पीड़ित नागरिक यह नहीं देखता कि गलती किस अधिकारी की है। उसकी सीधी धारणा बनती है सरकार काम नहीं कर रही। यही वह बिंदु है जहां प्रशासनिक लापरवाही सीधे राजनीतिक नुकसान में बदल जाती है।
मुख्यमंत्री कार्यालय को निगरानी करनी पड़े तो सवाल उठना स्वाभाविक
वर्ष 2022 में भी जिलाधिकारियों और पुलिस अधिकारियों को नियमित जनसुनवाई तथा शिकायतों के त्वरित निस्तारण के निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद फरवरी 2026 में जिलाधिकारियों और एसएसपी की जनसुनवाई की निगरानी मुख्यमंत्री कार्यालय से किए जाने की खबर सामने आई। निगरानी की व्यवस्था अपने आप में गलत नहीं है। बल्कि यदि इससे जनता को राहत मिलती है तो यह स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन इसके साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है क्या प्रशासनिक तंत्र में नीचे तक जवाबदेही इतनी मजबूत नहीं है कि मुख्यमंत्री कार्यालय को भी अधिकारियों की जनसुनवाई की निगरानी करनी पड़े? यदि मुख्यमंत्री को बार-बार अधिकारियों को जनता के बीच बैठने का निर्देश देना पड़े, तो इसका अर्थ है कि आदेश जारी करने और उसे जमीन पर लागू करने के बीच कहीं गंभीर खाई मौजूद है।
आईजीआरएस में ‘निस्तारण’ ही समाधान नहीं
उत्तर प्रदेश का जनसुनवाई-समाधान यानी आईजीआरएस पोर्टल नागरिकों को ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराने, उसकी स्थिति देखने, निर्धारित समय में कार्रवाई न होने पर अनुस्मारक भेजने और निस्तारण के बाद फीडबैक देने जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराता है। यह व्यवस्था पारदर्शी प्रशासन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन डिजिटल व्यवस्था की सफलता केवल आंकड़ों से नहीं मापी जा सकती। कितनी शिकायतें दर्ज हुईं? कितनी शिकायतें निस्तारित हुईं। इन सवालों से आगे बढ़कर सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है कि कितनी शिकायतों का वास्तविक समाधान हुआ। यहीं सरकारी रिकॉर्ड और नागरिक के अनुभव के बीच अंतर दिखाई देता है। आरोप हैं कि कई बार शिकायत पर केवल रिपोर्ट लगाकर उसे बंद कर दिया जाता है, जबकि शिकायतकर्ता की मूल समस्या जस की तस बनी रहती है। सरकारी रिकॉर्ड में शिकायत ‘निस्तारित’ हो जाती है, लेकिन नागरिक के लिए समस्या समाप्त नहीं होती। यह स्थिति बेहद व्यापक है जो केवल तकनीकी खामी नहीं, बल्कि सुशासन की अवधारणा के लिए गंभीर चुनौती है।
जिसके खिलाफ शिकायत, उसी के पास समाधान की जिम्मेदारी?
आईजीआरएस की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक शिकायतों की निष्पक्ष जांच का सवाल है। यदि किसी अधिकारी या विभाग के कामकाज को लेकर शिकायत है और वही शिकायत उसी अधिकारी अथवा उसी अधीनस्थ तंत्र के पास जांच के लिए चली जाती है, तो शिकायतकर्ता के मन में निष्पक्षता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। शिकायतकर्ता चाहता है समाधान, जबकि व्यवस्था कई बार रिपोर्ट चाहती दिखाई देती है।
दोनों के बीच यही अंतर प्रशासनिक विश्वास को कमजोर करता है। जरूरत इस बात की है कि संवेदनशील और गंभीर शिकायतों की जांच उसी अधिकारी या विभाग से न कराई जाए जिसके खिलाफ शिकायत दर्ज हुई है। स्वतंत्र स्तर पर परीक्षण की व्यवस्था हो और शिकायतकर्ता से भी यह पूछा जाए कि क्या वह निस्तारण से संतुष्ट है।
अधिकारी आज यहां हैं, कल कहीं और होंगे राजनीतिक जवाबदेही किसकी
यह सवाल राजनीतिक रूप से और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। सरकारी अधिकारी प्रशासनिक सेवा में होते हैं। आज वे एक जिले में हैं, कल दूसरे जिले में होंगे। आज किसी एक सरकार के साथ काम कर रहे हैं, भविष्य में सरकार बदलने पर भी उनका प्रशासनिक दायित्व बना रहेगा। लेकिन चुनाव में जनता के बीच कौन जाएगा?
अधिकारी नहीं वोट मांगने मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक, पार्टी पदाधिकारी और कार्यकर्ता जाएंगे। यदि किसी क्षेत्र का नागरिक यह कहता है कि उसकी जमीन का मामला वर्षों से लंबित है, थाने में सुनवाई नहीं हुई, प्रमाणपत्र नहीं मिला या उसकी शिकायत पर कार्रवाई नहीं हुई तो वह अधिकारी का नाम लेकर चुनावी सवाल नहीं पूछेगा। वह सीधे पूछेगा कि आपकी सरकार में यह क्यों नहीं हुआ। यही कारण है कि किसी अधिकारी की लापरवाही का राजनीतिक बोझ अंततः सरकार को उठाना पड़ता है।
जनप्रतिनिधियों की अनदेखी भी सरकार के लिए खतरे की घंटी
योगी सरकार के सामने एक और चुनौती जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच समन्वय की है। समय-समय पर जनप्रतिनिधियों की ओर से यह शिकायत सामने आती रही है कि अधिकारी उनकी बात नहीं सुनते या उनके द्वारा उठाए गए जनहित के मामलों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं होती। यह स्थिति किसी भी सरकार के लिए चिंताजनक हो सकती है।
जनप्रतिनिधि जनता और सरकार के बीच राजनीतिक पुल होते हैं। जनता अपनी समस्या लेकर विधायक, सांसद या पार्टी के स्थानीय नेताओं के पास पहुंचती है। जनप्रतिनिधि उस समस्या को प्रशासन तक ले जाते हैं।
यदि वहां सुनवाई नहीं होती तो समस्या केवल नागरिक की नहीं रहती। वह जनप्रतिनिधि की राजनीतिक विश्वसनीयता का सवाल बन जाती है और जब जनप्रतिनिधि की बात उसकी ही सरकार में नहीं सुनी जाती दिखाई देती है, तो संदेश जनता तक बहुत तेजी से पहुंचता है।
लालफीताशाही पर लगाम के लिए जवाबदेही जरूरी
उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक सुधारों की चर्चा लंबे समय से होती रही है। ऑनलाइन सेवाएं, जनसुनवाई, आईजीआरएस और समयबद्ध निस्तारण जैसी व्यवस्थाओं का उद्देश्य यही है कि आम नागरिक को सरकारी कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें। लेकिन तकनीक तभी सफल होगी जब उसके पीछे जिम्मेदारी तय हो। जरूरत है कि केवल शिकायतों की संख्या और निस्तारण प्रतिशत को उपलब्धि न माना जाए। यह भी जांच हो कि निस्तारण के बाद वास्तव में समस्या खत्म हुई या नहीं। खराब प्रदर्शन वाले जिलों और विभागों की नियमित समीक्षा हो। बार-बार शिकायतों के बावजूद सुधार नहीं करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय हो। गंभीर मामलों में प्रशासनिक कार्रवाई भी हो। क्योंकि कागज पर निस्तारण और जमीन पर समाधान दोनों एक चीज नहीं हैं।
मुख्यमंत्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सख्त छवि उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक ताकतों में से एक है। लेकिन यही छवि प्रशासनिक तंत्र से जनता की अपेक्षाएं भी बढ़ाती है। यदि मुख्यमंत्री कहते हैं कि लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी तो जनता यह देखना चाहेगी कि लापरवाही करने वाले अधिकारी के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई। यदि जनसुनवाई का निर्देश है तो उसकी सुनवाई हुई या नहीं। आईजीआरएस पर शिकायत निस्तारित है तो वह जानना होगा कि उसका वास्तविक समाधान हुआ या सिर्फ फाइल बंद हुई। यही मुख्यमंत्री के लिए सबसे बड़ी परीक्षा है।
* मुख्यमंत्री की सख्ती बनाम निचले स्तर पर उसका असर
* जनता के लिए अधिकारी ही सरकार का चेहरा
* आईजीआरएस के ‘निस्तारण’ की गुणवत्ता पर सवाल
* शिकायतकर्ता को निष्पक्ष जांच का अधिकार
* जिसके खिलाफ शिकायत, उसी से जांच की व्यवस्था पर पुनर्विचार जरूरी
* जनसुनवाई की मुख्यमंत्री कार्यालय से निगरानी जवाबदेही की जरूरत दर्शाती है
* जनप्रतिनिधियों की अनदेखी सरकार के लिए राजनीतिक जोखिम
* अधिकारी की लापरवाही का नुकसान सरकार को
* कागजी निस्तारण नहीं वास्तविक समाधान हो
* खराब प्रदर्शन वाले जिलों में जिम्मेदारी तय करने की जरूरत
* लालफीताशाही पर कार्रवाई के बिना सुशासन का दावा अधूरा




