विश्वगुरु का सपना, 2047 में कैसे विकसित भारत बनेगा अपना ?
स्कूलों की बदहाली, शिक्षा के बिना कैसे बनेगा भारत?

- एक दशक में करीब 94 हजार सरकारी स्कूल बंद या विलय किए जाने का दावा
- यू-डायस के आंकड़ों के अनुसार एक वर्ष में 4,791 स्कूल हुए बंद
- सरकारी शिक्षा से गरीब और ग्रामीण बच्चों की दूरी बढ़ने का सवाल
- ‘मिशन स्कूल्स ऑफ एक्सीलेंस’ के मॉडल क्लासरूम से निकला बड़ा सवाल
- सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले ने शिक्षा बजट को लेकर जताई चिंता
- स्कूलों की बदहाली उजागर करने वालों पर कार्रवाई को लेकर भी उठे सवाल
- स्कूल बंद हो रहे हैं, विश्वगुरु बनने का शोर जारी

लखनऊ/वाराणसी/ पिछले एक दशक से देश को विश्वगुरु बनाने का राजनीतिक और सार्वजनिक विमर्श लगातार तेज किया जा रहा है। देश की प्राचीन ज्ञान परंपरा, संस्कृति और वैश्विक प्रभाव का हवाला देकर भारत को विश्वगुरु के रूप में स्थापित करने की बात कही जाती है। लेकिन इसी दावे के समानांतर देश की बुनियादी शिक्षा व्यवस्था जिस सवाल के सामने खड़ी है, वह इससे कहीं अधिक गंभीर है। क्या शिक्षित नागरिकों और मजबूत सरकारी शिक्षा व्यवस्था के बिना कोई देश वास्तव में विश्वगुरु बन सकता है। नीति आयोग और शिक्षा मंत्रालय से संबंधित रिपोर्टों तथा यू-डायस के आंकड़ों का हवाला देते हुए सरकारी स्कूलों के बंद होने और विलय की तस्वीर सामने आती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार पिछले एक दशक में करीब 94 हजार सरकारी स्कूल या तो बंद हुए अथवा दूसरे स्कूलों में विलय कर दिए गए। नवीनतम आंकड़ों में एक वर्ष के भीतर 4,791 स्कूलों के बंद होने की बात भी सामने आई है। दूसरी ओर निजी स्कूलों का विस्तार लगातार जारी है। इसका सीधा असर गरीब, ग्रामीण और निम्न आय वर्ग के बच्चों की शिक्षा पर पड़ रहा है। सवाल यह भी है कि जब सरकारी स्कूल ही कमजोर होते जाएंगे तो शिक्षा का अधिकार आखिर किसके लिए और किस व्यवस्था के भरोसे बचेगा। जिस देश में कहीं शिक्षक नहीं हैं, कहीं बिजली-पानी नहीं, कहीं शौचालय नहीं और कहीं बच्चे जर्जर भवनों में पढ़ने को मजबूर हैं, वहां विश्वगुरु का सपना जमीन पर शिक्षा की हकीकत से टकराता दिखाई देता है।

94 हजार स्कूलों पर सवाल, शिक्षा व्यवस्था किस दिशा में
सरकारी शिक्षा व्यवस्था किसी भी लोकतांत्रिक और कल्याणकारी राष्ट्र की रीढ़ मानी जाती है। गरीब और मध्यम वर्ग के करोड़ों बच्चों के लिए सरकारी स्कूल ही शिक्षा का सबसे सुलभ माध्यम हैं। ऐसे में यदि बड़ी संख्या में सरकारी स्कूल बंद अथवा विलय किए जा रहे हैं तो इसका असर केवल स्कूलों की संख्या पर नहीं, बल्कि शिक्षा की पहुंच पर भी पड़ता है। नीति आयोग और शिक्षा मंत्रालय की रिपोर्टों का हवाला देते हुए करीब 94 हजार सरकारी स्कूलों के बंद या विलय होने की बात सामने आई है। यू-डायस के नवीनतम आंकड़ों में भी एक वर्ष में 4,791 स्कूलों के बंद होने का उल्लेख है। सवाल है कि इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का क्या हुआ? क्या उन्हें समान सुविधाओं वाले दूसरे स्कूलों में पहुंचाने की पर्याप्त व्यवस्था हुई? क्या दूरी बढ़ने से ग्रामीण और गरीब परिवारों के बच्चों की पढ़ाई प्रभावित नहीं हुई? एक तरफ सरकारी स्कूलों की संख्या घट रही है, दूसरी तरफ निजी स्कूलों का विस्तार हो रहा है। निजी शिक्षा की बढ़ती लागत ऐसे परिवारों के सामने नई चुनौती पैदा करती है जिनकी आय सीमित है। शिक्षा यदि अधिकार के बजाय आर्थिक क्षमता पर निर्भर होने लगे तो सामाजिक असमानता और गहरी हो सकती है।
मॉडल क्लासरूम की चमक से असली स्कूलों तक
अक्टूबर 2022 में गुजरात के गांधीनगर में ‘मिशन स्कूल्स ऑफ एक्सीलेंस’ के शुभारंभ के दौरान पीएम मोदी बच्चों के साथ एक मॉडल क्लास रूम में बैठे दिखाई दिए थे।
दिल्ली की मिसाल, बाकी राज्यों में क्यों नहीं
25 फरवरी 2020 को अमेरिका की तत्कालीन प्रथम महिला मेलानिया ट्रम्प ने दिल्ली के मोतीबाग स्थित सर्वोदय सह-शिक्षा वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय का दौरा किया था। दिल्ली की सरकारी शिक्षा व्यवस्था को लेकर विदेशी प्रतिनिधिमंडलों और शिक्षाविदों की दिलचस्पी भी समय-समय पर सामने आती रही है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि सरकारी स्कूलों को आधुनिक बुनियादी ढांचे, बेहतर कक्षाओं, प्रयोगशालाओं और शैक्षणिक वातावरण के साथ विकसित किया जा सकता है तो ऐसी व्यवस्था देश के अन्य राज्यों में क्यों नहीं दिखाई देती। देश के अनेक हिस्सों से आज भी सरकारी स्कूलों की बदहाली की तस्वीरें सामने आती रहती हैं। कहीं भवन जर्जर हैं, कहीं कक्षाओं का अभाव है, कहीं शिक्षक पर्याप्त संख्या में नहीं हैं। कहीं बिजली और पेयजल की समस्या है तो कहीं शौचालय तक की सुविधा नहीं। कुछ स्थानों पर बच्चों को नदी पार कर स्कूल पहुंचना पड़ता है तो कई ग्रामीण इलाकों में कीचड़ और खराब रास्ते शिक्षा की राह में बाधा बनते हैं। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था का सवाल केवल पाठ्यक्रम या परीक्षा तक सीमित नहीं रह जाता। स्कूल तक पहुंचने की सड़क से लेकर कक्षा की छत तक, हर व्यवस्था शिक्षा की गुणवत्ता का हिस्सा है।
बजट बनाम शिक्षा, प्राथमिकता किसकी
शिक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की टिप्पणियां भी इस बहस को गंभीर बनाती हैं। महाराष्ट्र में शिक्षा पर घटते बजट और सरकारी मराठी माध्यम के स्कूलों के बंद होने पर चिंता जताते हुए उन्होंने नासिक कुंभ मेले के लिए प्रस्तावित करीब 32 हजार करोड़ रुपये के बजट का उल्लेख किया। उनके अनुसार यदि इसका महज 0.1 प्रतिशत यानी करीब 32 करोड़ रुपये भी शिक्षा पर खर्च किया जाए तो 100 से 125 बंद हो रहे मराठी स्कूलों को बचाया जा सकता था। न्यायमूर्ति वराले ने शिक्षा बजट को लेकर भी चिंता जताई और कहा कि छात्रों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन शिक्षा के बजट में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई है। उन्होंने गढ़चिरौली की उस घटना का उदाहरण दिया जिसमें जरूरी सुविधाओं के अभाव में फर्श पर सोने वाली तीन छात्राओं की सांप के काटने से मौत हो गई थी। न्यायमूर्ति वराले ने अपने व्यक्तिगत अनुभव का हवाला देते हुए बताया कि उन्होंने दसवीं कक्षा तक जिला परिषद के मराठी माध्यम स्कूल में शिक्षा प्राप्त की। इस शिक्षा ने उनके करियर में बाधा नहीं डाली बल्कि दृष्टिकोण को व्यापक बनाया।
युवा सड़क पर, सत्ता को अब शिक्षा याद आ रही
बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितता, पेपर लीक, शिक्षण संस्थानों की कमी और शिक्षा व्यवस्था की बदहाली जैसे मुद्दे लंबे समय से युवाओं की चिंता के केंद्र में हैं। अलग-अलग राज्यों में छात्रों और युवाओं के आंदोलन इसका संकेत देते रहे हैं। विडंबना यह है कि व्यवस्था की कमियों को उजागर करने के बजाय कई बार उन लोगों पर ही सवाल उठते हैं जो सरकारी स्कूलों की वास्तविक तस्वीर सामने लाते हैं। कहीं स्कूलों की वीडियोग्राफी को लेकर रोक-टोक की खबरें आती हैं तो कहीं अव्यवस्थाओं को सोशल मीडिया पर दिखाने वालों पर कार्रवाई के आरोप लगते हैं। कुछ मामलों में शिक्षण संस्थानों की स्थिति उजागर करने वालों पर हमले के आरोप भी सामने आए हैं। लेकिन सवाल दबाने से समस्या खत्म नहीं होगी। यदि किसी स्कूल में शिक्षक नहीं है, भवन जर्जर है, बच्चे खुले आसमान के नीचे पढ़ रहे हैं या पीने का पानी उपलब्ध नहीं है तो कैमरा बंद कराने से वह समस्या खत्म नहीं हो जाती।
अब असली परीक्षा सरकारों की
भारत को विश्वगुरु बनाने की बात केवल नारों, समारोहों और राजनीतिक भाषणों से पूरी नहीं होगी। विश्वगुरु बनने का अर्थ केवल दुनिया को अपनी प्राचीन उपलब्धियों की याद दिलाना नहीं, बल्कि ऐसा आधुनिक और शिक्षित समाज बनाना भी है जो ज्ञान, विज्ञान, अनुसंधान और मानवीय मूल्यों में दुनिया का नेतृत्व कर सके। इसके लिए पहले स्कूल बचाने होंगे, शिक्षक, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, डिजिटल सुविधाएं, सुरक्षित भवन, बिजली, पानी और शौचालय चाहिए। सबसे बढ़कर गरीब बच्चे के लिए ऐसी सार्वजनिक शिक्षा चाहिए जिसमें उसकी आर्थिक स्थिति उसके भविष्य का फैसला न करे। यदि देश में सरकारी स्कूल बंद होते रहें, शिक्षा महंगी होती जाए और युवा रोजगार व परीक्षाओं के संकट से जूझते रहें, तो ‘विश्वगुरु’ का दावा सवालों के घेरे में रहेगा।




