सत्ता, चुनाव और न्याय के बीच उठते सवाल, ज्ञानेश कुमार के बेईमानी पर बवाल ही बवाल
‘सुरक्षा कवच’ के आरोपों ने व्यवस्था को कठघरे में खड़ा किया

- चुनावी निष्पक्षता के प्रहरी पर ही राजनीतिक निकटता के आरोप सवाल सिर्फ व्यक्ति का नहीं
- पूर्व मुख्य सचिव का दावा 2016 में भाजपा टिकट पर चुनाव लड़ने का सुझाव मिला, ज्ञानेश कुमार पर उठे नए सवाल
- न्यायिक नियुक्तियों से लेकर चुनावी मामलों तक क्या फैसलों और प्रभाव के बीच कोई अनकहा रिश्ता था?
- अनुच्छेद 142 ‘पूर्ण न्याय’ के लिए है या उसके इस्तेमाल पर भी जनता को जवाब चाहिए?
- आरोप गंभीर हैं तो जांच भी उतनी ही निष्पक्ष हो, लोकतंत्र में किसी को स्थायी ‘सुरक्षा कवच’ नहीं मिल सकता
- चुनाव आयोग और न्यायपालिका पर भरोसा बचाना है तो बंद दरवाजों के सवालों के जवाब सार्वजनिक करने होंगे

नई दिल्ली। भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट दो ऐसी संवैधानिक संस्थाएं हैं जिनकी निष्पक्षता पर जनता का भरोसा लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है। ऐसे में जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की पूर्व भूमिका, कथित राजनीतिक संपर्कों और न्यायिक नियुक्तियों से जुड़े घटनाक्रमों को लेकर गंभीर सवाल उठते हैं तो मामला किसी एक अधिकारी या न्यायाधीश तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी संस्थागत व्यवस्था की विश्वसनीयता के कटघरे तक पहुंच जाता है। हाल में केरल के पूर्व मुख्य सचिव जिजी थॉमसन ने दावा किया कि 2016 में तत्कालीन आईएएस अधिकारी ज्ञानेश कुमार ने उन्हें 2019 लोकसभा चुनाव भाजपा के टिकट पर लड़ने का सुझाव दिया था। थॉमसन के मुताबिक उनसे पथनमथिट्टा सीट से चुनाव लड़ने और जीतने पर केंद्रीय मंत्री बनने की संभावना तक बताई गई थी। ज्ञानेश कुमार की ओर से इस आरोप का सार्वजनिक खंडन उपलब्ध रिपोर्टों में सामने नहीं आया है। इसी पृष्ठभूमि में उनके चुनाव आयोग के शीर्ष पद पर रहते हुए लिए जा रहे फैसलों और चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर राजनीतिक तथा कानूनी बहस तेज हुई है। दूसरी ओर, न्यायमूर्ति सूर्यकांत के न्यायिक उत्थान और कुछ महत्वपूर्ण मामलों में उनकी बेंच की भूमिका को लेकर भी कई आरोप और सवाल सार्वजनिक विमर्श में उठाए जा रहे हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अलग विषय है, लेकिन लोकतंत्र का तकाजा यही है कि इतने गंभीर सवालों को न तो राजनीतिक शोर कहकर खारिज किया जाए और न ही बिना प्रमाण सत्य मान लिया जाए। सवाल साफ है संवैधानिक संस्थाओं की ताकत जितनी बड़ी है, उनकी जवाबदेही उतनी ही पारदर्शी क्यों नहीं होनी चाहिए?

पूर्व मुख्य सचिव के आरोप से उठी राजनीतिक निष्पक्षता की बहस
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इस समय सबसे चर्चित आरोप पूर्व केरल मुख्य सचिव जिजी थॉमसन का है। थॉमसन के अनुसार 2016 में दिल्ली की उड़ान के दौरान ज्ञानेश कुमार ने उनसे भाजपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ने के बारे में पूछा था। उनका दावा है कि उन्हें पथनमथिट्टा से चुनाव लड़ने का सुझाव दिया गया और जीतने पर केंद्रीय मंत्री बनने की संभावना भी बताई गई। यह आरोप इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बातचीत जिस समय की बताई जा रही है, उस समय दोनों सरकारी सेवा में थे। थॉमसन ने कहा कि उन्होंने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। आरोप सही है या नहीं, इसका निर्धारण जांच के बिना नहीं किया जा सकता। लेकिन यदि किसी संवैधानिक पद पर बैठे अधिकारी के बारे में ऐसी बात कही जाती है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि उनकी राजनीतिक निष्पक्षता को लेकर संदेह दूर करने का संस्थागत तरीका क्या है। यही लोकतंत्र की असली कसौटी है। सिर्फ निष्पक्ष होना पर्याप्त नहीं, निष्पक्ष दिखाई देना भी जरूरी है।
चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल क्यों गंभीर?
चुनाव आयोग का काम किसी दल के पक्ष या विपक्ष में खड़ा होना नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता की रक्षा करना है। इसलिए आयोग के मुखिया के बारे में राजनीतिक निकटता का आरोप महज व्यक्तिगत आरोप नहीं रह जाता। उसका सीधा असर संस्था पर पड़ता है। ताजा विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर से जुड़े एक मामले की सुनवाई स्वीकार की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया और सामूहिकता के संवैधानिक सिद्धांतों का पालन नहीं हुआ। इससे यह सवाल और बड़ा हो जाता है कि चुनाव आयोग में निर्णय प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है और क्या जनता को उसके महत्वपूर्ण निर्णयों के पीछे का तर्क पर्याप्त रूप से बताया जाता है।
सूर्यकांत के न्यायिक सफर को लेकर उठाए जा रहे सवाल
न्यायमूर्ति सूर्यकांत के आधिकारिक न्यायिक प्रोफाइल के अनुसार उन्होंने 5 अक्टूबर 2018 को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्यभार संभाला, 24 मई 2019 को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बने और 24 नवंबर 2025 को भारत के मुख्य न्यायाधीश पद की शपथ ली। उनके न्यायिक सफर से जुड़े कुछ पुराने फैसलों और नियुक्ति संबंधी प्रक्रियाओं को लेकर आलोचनात्मक दावे सार्वजनिक विमर्श में सामने आए हैं। इनमें यह आरोप भी शामिल है कि कुछ नियुक्ति संबंधी प्रक्रियाओं में फाइलों की गति अचानक तेज हुई। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर बनाए रखना जरूरी है। फाइल आगे बढ़ना अपने आप में किसी साठगांठ का प्रमाण नहीं है। यदि किसी अधिकारी या न्यायिक व्यक्ति पर प्रभाव डालने, रिपोर्ट रोकने या संस्थागत प्रक्रिया को प्रभावित करने का आरोप है तो उसके समर्थन में दस्तावेज, आधिकारिक रिकॉर्ड और स्वतंत्र जांच जरूरी है। यही पत्रकारिता का भी धर्म है आरोप को खबर बनाना, लेकिन आरोप को फैसला न बना देना।
आईबी रिपोर्ट और नियुक्ति प्रक्रिया सवाल हो तो दस्तावेज सामने आएं
ज्ञानेश कुमार पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने गृह मंत्रालय और खुफिया तंत्र के स्तर पर किसी प्रतिकूल रिपोर्ट को आगे बढ़ने से रोका। यह भी दावा किया गया है कि इससे न्यायिक नियुक्ति की प्रक्रिया प्रभावित हुई।
ऐसे आरोप बेहद गंभीर हैं। लेकिन किसी आईबी रिपोर्ट के बारे में अनुमान लगाना और यह कहना कि उसे जानबूझकर रोका गया दो अलग बातें हैं। यदि संबंधित फाइलों, नोटशीट, पत्राचार या आधिकारिक रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण है तो उसे सार्वजनिक जांच के दायरे में लाया जाना चाहिए। लोकतंत्र में संस्थाओं की ताकत बंद कमरों में नहीं, पारदर्शी प्रक्रियाओं में होती है।
अनुच्छेद 142 और ‘पूर्ण न्याय’ पर बहस
सुप्रीम कोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत व्यापक अधिकार प्राप्त हैं। इसका उद्देश्य न्यायालय को ऐसे मामलों में पूर्ण न्याय करने की क्षमता देना है जहां सामान्य कानूनी प्रावधान पर्याप्त न हों। लेकिन यही व्यापक शक्ति सवाल भी पैदा करती है। क्या इस शक्ति का इस्तेमाल न्याय को पूरा करने के लिए हुआ? क्या किसी आदेश से किसी पक्ष को असाधारण लाभ मिला?
क्या चुनाव प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा पार हुई? इन प्रश्नों पर असहमति संभव है और न्यायिक फैसलों की आलोचना लोकतंत्र में असंवैधानिक नहीं है।
लेकिन किसी फैसले को ‘पूर्ण अन्याय’ कहना भी तभी उचित होगा जब उसके पीछे ठोस कानूनी और तथ्यात्मक आधार प्रस्तुत किया जाए।
चुनाव प्रक्रिया पर अदालत के हस्तक्षेप का सवाल
चुनावी मामलों में न्यायपालिका की भूमिका बेहद संवेदनशील है। चुनाव प्रक्रिया एक बार शुरू होने के बाद उसमें न्यायिक हस्तक्षेप का असर लाखों मतदाताओं पर पड़ सकता है। इसीलिए चुनावी विवादों में हर अंतरिम आदेश, हर पुनरीक्षण और हर सत्यापन प्रक्रिया का असर सिर्फ अदालत में मौजूद पक्षकारों तक सीमित नहीं रहता। मतदाता सूची से नाम जुड़ना या हटना किसी नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ा विषय है। यदि किसी राज्य में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम प्रभावित हुए हैं तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि प्रक्रिया कितनी पारदर्शी थी, सत्यापन का आधार क्या था और प्रभावित नागरिकों को पर्याप्त अवसर मिला या नहीं। इन सवालों का जवाब आरोपों से नहीं, दस्तावेजों और न्यायिक रिकॉर्ड से मिलेगा।
कॉलेजियम पारदर्शिता का सवाल अब भी जिंदा
न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर कॉलेजियम व्यवस्था लंबे समय से बहस का विषय रही है। चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता कितनी है? नामों के चयन के आधार क्या हैं?
किसे क्यों चुना गया? किस नाम को क्यों रोका गया, सिफारिशों के पीछे ठोस कारण कितने सार्वजनिक हैं?
ये सवाल केवल सरकार से नहीं, न्यायपालिका से भी पूछे जाने चाहिए। न्यायपालिका लोकतंत्र की प्रहरी है तो उसके भीतर की प्रक्रियाएं भी जनता के विश्वास के योग्य होनी चाहिए।
संपत्ति संबंधी आरोप जांच का विषय, फैसला नहीं
ग्रेटर कैलाश की एक संपत्ति को लेकर भी गंभीर आरोपों का उल्लेख किया गया है। दावा है कि संपत्ति का मूल्य और कथित भुगतान अलग-अलग बताए गए तथा दस्तावेजों में नाम और पैन संबंधी विसंगतियां हैं।
ऐसे आरोपों को लेकर सबसे उचित रास्ता स्वतंत्र दस्तावेजी जांच है। रजिस्ट्री रिकॉर्ड क्या कहते हैं?
भुगतान का प्रमाण क्या है? पैन और संपत्ति दस्तावेजों में अंतर क्यों है? स्वामित्व किसके नाम है, कर रिकॉर्ड क्या कहते हैं? जब तक इन सवालों के आधिकारिक दस्तावेज सामने नहीं आते, तब तक किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना पत्रकारिता नहीं होगा। लेकिन सवाल उठाना भी जरूरी है।
लोकतंत्र में ‘सुरक्षा कवच’ स्थायी नहीं हो सकता
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या किसी संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति सवालों से ऊपर हो सकता है?
उत्तर साफ है नहीं। न चुनाव आयुक्त सवालों से ऊपर हैं, न न्यायाधीश, न मंत्री, न अधिकारी, न पत्रकार. संवैधानिक पद जितना ऊंचा होता है, जवाबदेही की जरूरत उतनी ही बढ़ती है। यदि आरोप गलत हैं तो पारदर्शी जांच उन्हें गलत साबित कर सकती है।
यदि आरोप सही हैं तो संस्थाओं को कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन आरोपों को बिना जांच के दबा देना सबसे खतरनाक रास्ता है। लोकतंत्र में सुरक्षा कवच व्यक्ति का नहीं, संविधान का होना चाहिए। सवाल व्यक्ति से बड़ा है आज बहस सिर्फ ज्ञानेश कुमार या सूर्यकांत तक सीमित कर देना आसान होगा। लेकिन असली सवाल इससे कहीं बड़ा है। क्या चुनाव आयोग जनता के भरोसे पर खरा उतर रहा है? क्या न्यायपालिका के फैसलों और नियुक्तियों में पर्याप्त पारदर्शिता है? क्या संवैधानिक संस्थाएं राजनीतिक प्रभाव से पूरी तरह मुक्त दिखाई देती हैं? क्या नागरिक को यह जानने का अधिकार है कि उसके वोट, उसकी न्यायिक याचिका और उसके संवैधानिक अधिकार पर फैसला लेने वाली संस्था ने निर्णय कैसे लिया? इन सवालों से बचना ही सबसे बड़ा संकट होगा। क्योंकि लोकतंत्र में संस्थाएं व्यक्तियों से बड़ी होती हैं। व्यक्ति बदलते हैं, पद बदलते हैं, सरकारें बदलती हैं लेकिन संस्थाओं पर जनता का विश्वास नहीं टूटना चाहिए।इसलिए जरूरत किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में फैसला सुनाने की नहीं, बल्कि उन तमाम सवालों की निष्पक्ष, स्वतंत्र और दस्तावेज-आधारित जांच की है।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह नहीं जब सवाल उठते हैं। सबसे खतरनाक स्थिति वह है जब सवाल उठाना ही बंद हो जाए।
* मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर पूर्व केरल मुख्य सचिव जिजी थॉमसन ने 2016 में भाजपा टिकट पर चुनाव लड़ने का सुझाव देने का आरोप लगाया
* चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवालों के बीच ज्ञानेश कुमार की पुरानी भूमिका और राजनीतिक संपर्कों को लेकर बहस तेज
* सूर्यकांत के न्यायिक उत्थान और उनके महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई को लेकर भी उठाए जा रहे हैं गंभीर सवाल
* आरोप है कि सत्ता, नौकरशाही और न्यायपालिका के बीच प्रभाव का ऐसा तंत्र बना, जिसमें जवाबदेही कमजोर हुई
* चुनावी मामलों में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और अनुच्छेद 142 के इस्तेमाल पर भी आलोचनात्मक सवाल
* गंभीर आरोपों की स्वतंत्र, पारदर्शी जांच ही तय कर सकती है कि आरोप तथ्य हैं, संयोग हैं या राजनीतिक दावे




