बिहार

सफल रहा बिहार में पैसे बांटने का प्रयोग, मोदी जी आगे भी करते रहेंगे इसका उपयोग ?

लोकतंत्र की बोली चुनाव अब जनादेश नहीं, क्या नकद वितरण से तय होंगे?

● सफल रहा बिहार में पैसे बांटने का प्रयोग, मोदी जी आगे भी करते रहेंगे इसका उपयोग ?

● लोकतंत्र की बोली चुनाव अब जनादेश नहीं, क्या नकद वितरण से तय होंगे?

● बिहार चुनाव में कथित नकद हस्तांतरण ने लोकतंत्र पर खड़े किए गंभीर सवाल

● आचार संहिता के बीच महिलाओं के खातों में 10-10 हजार, क्या यह वोट खरीद नहीं!

● ‘रेवड़ी कल्चर’ पर मोदी के प्रवचन बिहार में क्यों हुए गायब

● लगभग 40 हजार करोड़ के कथित वितरण से राज्य की अर्थव्यवस्था पर संकट

● चुनाव आयोग की चुप्पी, निष्पक्षता पर सीधा आघात

● योजनाओं की जगह नकद पैसा, नीति बनाम प्रलोभन की बहस तेज

● क्या विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य अब चुनावी मुद्दे नहीं रहे

● बिहार बना मॉडल, क्या पूरे देश में यही चुनावी फार्मूला?

 

रितिक मौर्य

बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित हो चुके हैं, नई सरकार का गठन भी हो गया है, लेकिन लोकतंत्र के जिस आईने में ये परिणाम झलकते हैं, वह पहले से कहीं ज्यादा धुंधला दिखाई दे रहा है। यह चुनाव केवल सीटों की जीत-हार का मामला नहीं रह गया है, बल्कि इसने भारतीय लोकतंत्र की नैतिक बुनियाद, चुनावी निष्पक्षता और संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। विपक्ष इसे जनादेश मानने से इनकार करते हुए ‘ज्ञानादेश’ करार दे रहा है और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सीधा हमला बोल रहा है। पर सवाल सिर्फ विपक्ष का नहीं है, सवाल उस लोकतांत्रिक प्रक्रिया का है जिस पर पूरे देश को गर्व रहा है। चुनाव से ठीक पहले जिस तरह करोड़ों महिलाओं के बैंक खातों में सीधे नकद राशि डाली गई, उसने इस चुनाव को अभूतपूर्व और खतरनाक दोनों बना दिया। यह कोई सामाजिक सुरक्षा योजना नहीं थी, न कोई दीर्घकालिक कल्याणकारी कार्यक्रम, न ही किसी आपदा राहत का हिस्सा। यह चुनावी घोषणा के साथ किया गया एक सीधा नकद हस्तांतरण था, जिसे आचार संहिता लागू होने के बावजूद अंजाम दिया गया। लगभग डेढ़ करोड़ से अधिक महिला मतदाताओं के खातों में 10-10 हजार रुपये डालना किसी नीति का विस्तार नहीं, बल्कि लोकतंत्र में खुलेआम दखल देने जैसा प्रतीत होता है। लोकतंत्र में मतदाता को लुभाने के लिए घोषणाएं की जाती हैं, वादे किए जाते हैं, विकास के सपने दिखाए जाते हैं। लेकिन जब मतदाता के खाते में सीधे पैसे डालकर वोट का रुख मोड़ने की कोशिश हो, तो यह केवल चुनावी रणनीति नहीं रह जाती। यह लोकतांत्रिक मूल्यों का पतन बन जाती है। यही कारण है कि इस चुनाव के बाद यह बहस तेज हो गई है कि क्या बिहार में जनता ने सरकार चुनी या सरकार ने पैसे के बल पर जनता का समर्थन ‘खरीद’ लिया। विडंबना यह है कि यह सब उस राजनीतिक दल और उस प्रधानमंत्री के नेतृत्व में हुआ है, जिन्होंने कुछ ही वर्ष पहले ‘रेवड़ी संस्कृति’ के खिलाफ पूरे देश में नैतिक प्रवचन दिए थे। मुफ्त योजनाओं को देश की अर्थव्यवस्था के लिए घातक बताने वाले भाषण लाल क़िले तक से दिए गए थे। विपक्षी शासित राज्यों में बिजली, पानी, बस यात्रा जैसी सुविधाओं को रेवड़ी कहकर कोसा गया, उन्हें भावी पीढ़ियों के अधिकारों पर डाका बताया गया। मगर बिहार में वही सत्ता बिना किसी योजना, बिना किसी शर्त और बिना किसी पारदर्शिता के नकद पैसा बांटती दिखाई दी। यह विरोधाभास केवल राजनीतिक नहीं है, यह नैतिक भी है। सवाल यह नहीं कि महिलाओं को सहायता मिलनी चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि चुनाव के ऐन वक्त पर सरकारी ख़ज़ाने का इस्तेमाल कर मतदाताओं को प्रभावित करना किस लोकतांत्रिक सिद्धांत के तहत जायज ठहराया जा सकता है। जब यह आचार संहिता के दौरान हो, तब चुनाव आयोग की चुप्पी और भी ज्यादा खतरनाक हो जाती है। बिहार चुनाव में अपनाया गया यह तरीका एक खतरनाक मिसाल है, जो आने वाले समय में पूरे देश की चुनावी राजनीति को नकद वितरण की दलदल में धकेल सकती है। यदि आज बिहार में लोकतंत्र की कीमत 10 हजार रुपये तय हुई है, तो कल किसी और राज्य में यह कीमत और बढ़ाई जा सकती है। यही वह बिंदु है, जहां यह मामला सिर्फ बिहार का नहीं रह जाता, बल्कि पूरे देश के लोकतांत्रिक भविष्य का सवाल बन जाता है।

नकद वितरण योजना या प्रलोभन?

चुनाव की घोषणा के दिन ही लगभग 1 करोड़ 51 लाख महिलाओं के बैंक खातों में 10-10 हजार रुपये स्थानांतरित कर दिए गए। न कोई नई योजना, न कोई स्पष्ट मानदंड सिर्फ नकद। कहा जा रहा है कि यह राशि किसी अन्य परियोजना के लिए विश्व बैंक से प्राप्त धनराशि से ‘डायवर्ट’ की गई। यदि यह आरोप सही है, तो यह न केवल नैतिक अपराध है बल्कि आर्थिक अनुशासन और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के भरोसे के साथ भी खिलवाड़ है। लगभग 40 हजार करोड़ रुपये की अनुमानित राशि चुनाव से ठीक पहले इस तरह बांट देना क्या विकास है या वोट खरीदने की सुनियोजित रणनीति? यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि चुनाव आचार संहिता के दौरान सरकारी धन का इस तरह उपयोग सीधे तौर पर नियमों का उल्लंघन है।

मोदी का ‘रेवड़ी विरोध’ और बिहार की हकीकत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जुलाई 2022 में लखनऊ से ‘रेवड़ी संस्कृति’ के खिलाफ देश को चेताया था। उन्होंने कहा था कि मुफ्त योजनाएं देश को दीवालिया बना देंगी और आने वाली पीढ़ियों के अधिकार छीन लेंगी। 15 अगस्त 2022 को लाल किले से भी उन्होंने इसी राग को दोहराया और विपक्ष शासित राज्यों दिल्ली, पंजाब, पश्चिम बंगाल की मुफ्त योजनाओं पर निशाना साधा। लेकिन सवाल यह है कि जब बिजली, पानी, बस यात्रा जैसी सुविधाएं उन्हें रेवड़ी लगती थीं, तो बिहार में बिना किसी योजना के सीधे नकद वितरण क्या कहलाएगा? क्या यह रेवड़ी से भी आगे जाकर लोकतंत्र की खुली खरीद नहीं है? क्या प्रधानमंत्री की ये नसीहतें सिर्फ विपक्ष के लिए थीं, स्वयं उनकी पार्टी और गठबंधन के लिए नहीं।

चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल

इस पूरे प्रकरण में चुनाव आयोग की भूमिका सबसे अधिक चिंताजनक है। आचार संहिता लागू होने के बावजूद इतने बड़े पैमाने पर नकद हस्तांतरण हुआ और आयोग मूक दर्शक बना रहा। क्या यह चुप्पी सत्ता और संवैधानिक संस्था की सामूहिक सहमति का संकेत नहीं देती? यदि यही रवैया रहा, तो भविष्य में आचार संहिता केवल कागजी दस्तावेज बनकर रह जाएगी।

विकास के मुद्दे हाशिये पर

बिहार चुनाव ने यह भी साबित किया कि बिजली, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार जैसे बुनियादी मुद्दे अब हाशिये पर धकेले जा रहे हैं। उनकी जगह नकद वितरण ने ले ली है। लोकतंत्र का यह रूपांतरण खतरनाक है, क्योंकि इससे नागरिक अधिकार ‘खरीद’ की वस्तु बनते जा रहे हैं।

अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला बोझ

लगभग 40 हजार करोड़ रुपये बांटने के बाद बिहार की आर्थिक स्थिति पर क्या असर पड़ेगा? क्या राज्य पहले से मौजूद कर्ज और विकास योजनाओं पर इसका बोझ नहीं पड़ेगा? क्या इसका कोई दीर्घकालिक आकलन किया गया? या फिर सत्ता प्राप्ति के लिए आर्थिक भविष्य को दांव पर लगा दिया गया?

बिहार मॉडल राष्ट्रीय खतरा!

सबसे बड़ा सवाल अब भविष्य को लेकर है। यदि बिहार में यह मॉडल सफल रहा, तो क्या आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में यही फार्मूला अपनाया जाएगा? क्या अब चुनाव घोषणापत्र विकास योजनाओं के नहीं, बल्कि बैंक खातों में डाली जाने वाली रकम के होंगे? यदि ऐसा हुआ, तो भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में गर्व करने की स्थिति में नहीं रहेगा, बल्कि वह एक ऐसा उदाहरण बनेगा जहां चुनाव नीतियों से नहीं, पैसों से जीते जाते हैं।

* बिहार चुनाव में कथित नकद वितरण ने लोकतांत्रिक नैतिकता पर सवाल खड़े किए
* आचार संहिता के दौरान सरकारी धन का उपयोग गंभीर उल्लंघन
* ‘रेवड़ी संस्कृति’ पर मोदी के पुराने बयानों से सीधा विरोधाभास
* चुनाव आयोग की चुप्पी से निष्पक्षता संदिग्ध
* विकास और जनहित के मुद्दे हाशिये पर
* राज्य की अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ की आशंका
* बिहार मॉडल पूरे देश के लिए खतरनाक मिसाल
* लोकतंत्र के भविष्य पर मंडराता बड़ा संकट

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