इंफिनिटी अस्पताल का एमडी डॉ.अभिषेक विक्रम सिंह गोवा में कोकीन व छमिया के साथ हुआ था गिरफ्तार, बेहद गन्दा है इसका किरदार

● इंफिनिटी अस्पताल का एमडी डॉ.अभिषेक विक्रम सिंह गोवा में कोकीन व छमिया के साथ हुआ था गिरफ्तार, बेहद गन्दा है इसका किरदार
● ‘दिल के डॉक्टर’ पर संगीन सवाल, राजनीतिक रसूख में दबा मामला?
● सेहत के रक्षक या नशे की रंगीन दुनिया के खिलाड़ी
● गोवा में गिरफ्तारी, बनारस में पसरा था सन्नाटा
● पांच सितारा होटल, कोकीन और वीआईपी संरक्षण
● राजनीतिक रसूख बनाम कानून
● मामला दर्ज, फिर गायब किसके इशारे पर
● चिकित्सा नैतिकता पर गहरा धब्बा
◆ अचूक सँघर्ष
जिस डॉक्टर के हाथों में मरीज अपनी धड़कन सौंपता है, जिसके फैसले पर किसी का जीवन टिका होता है, अगर उसी डॉक्टर का नाम कोकीन, पांच सितारा होटल और वीकेंड पार्टी जैसे शब्दों से जुड़ जाए तो यह सिर्फ एक व्यक्ति की कथित गलती नहीं रहती, यह पूरे चिकित्सा तंत्र, कानून व्यवस्था और राजनीतिक संरक्षण पर एक साथ सवाल खड़ा कर देती है। आरोप लगा था कि बनारस के चर्चित निजी संस्थान इनफिनिटी हॉस्पिटल से जुड़े हृदय रोग विशेषज्ञ (कार्डियोलॉजिस्ट) डॉ. अभिषेक विक्रम सिंह को गोवा में उनकी महिला मित्र के साथ कोकीन सेवन के आरोप में पुलिस ने हिरासत में लिया था। बताया जाता है कि यह कार्रवाई गोवा के पणजी अंतर्गत कलंगट पुलिस ने एक पांच सितारा होटल में चल रही हाई-प्रोफाइल वीकेंड पार्टी के दौरान की थी। लेकिन इस कथित गिरफ्तारी से ज्यादा चौंकाने वाली बात यह नहीं है कि एक डॉक्टर पर नशे का आरोप लगा था। चौंकाने वाली बात यह है कि इतना गंभीर मामला इतनी आसानी से गायब कैसे हो गया। न कोई विस्तृत एफआईआर सार्वजनिक हुई, न चार्जशीट की जानकारी सामने आई, न गोवा पुलिस की ओर से कोई स्पष्ट स्थिति रखी गई। मानो मामला दर्ज ही नहीं हुआ या फिर जानबूझकर दबा दिया गया। यहीं से यह कहानी केवल गोवा की एक रात की नहीं रहती,
यह कहानी बन जाती है सत्ता, रसूख और कानून की असमानता की। सूत्रों के अनुसार, डॉ. अभिषेक विक्रम सिंह उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री और वर्तमान चंदौली सांसद वीरेंद्र सिंह के पुत्र हैं। आरोप है कि इसी राजनीतिक पहचान ने कथित तौर पर कानून के रास्ते में अदृश्य दीवार खड़ी कर दी। वह दीवार, जिसके आगे पुलिस की कार्रवाई ठिठक जाती है, जांच की रफ्तार थम जाती है और मीडिया की आवाज भी अचानक धीमी पड़ जाती है। अगर आम नागरिक होता, अगर कोई सामान्य युवक या युवती होती, तो क्या मामला यूं ही खत्म हो जाता। क्या तब भी पांच सितारा होटल की दीवारों के भीतर हुई कथित कोकीन पार्टी निजी मामला बन जाता। यह सवाल इसलिए और गंभीर हो जाता है क्योंकि आरोप किसी फिल्मी सितारे या पार्टी बाज उद्योगपति पर नहीं, बल्कि एक कार्डियोलॉजिस्ट पर है। जो रोज मरीजों को दवाइयां लिखता है, सर्जरी करता है, और जीवन-मरण के निर्णय लेता है। नशे से जुड़ा कोई भी आरोप, चाहे वह सिद्ध हुआ हो या नहीं, ऐसे पेशे में मरीजों की सुरक्षा और चिकित्सा नैतिकता को सीधे प्रभावित करता है। फिर भी अस्पताल प्रबंधन खामोश रहा, मेडिकल काउंसिल की कोई प्रतिक्रिया नहीं, स्वास्थ्य विभाग ने आंखें बंद कर ली। यह चुप्पी क्या महज संयोग है या फिर यह उस विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग का कवच है, जिसके लिए कानून अलग और आम नागरिक के लिए अलग होता है। यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि बनारस जैसे शहर में, जहां स्वास्थ्य सेवाएं पहले से ही सवालों के घेरे में हैं, ऐसे आरोप पूरे सिस्टम की साख को और कमजोर करते हैं। यदि आरोप झूठे थे, तो सच्चाई सामने क्यों नहीं लाई गई। यदि आरोप सही हैं, तो फिर सवाल सिर्फ डॉ.अभिषेक विक्रम सिंह तक सीमित नहीं रह जाता है। यह सवाल उस राजनीतिक संरक्षण, पुलिस की भूमिका और चिकित्सा संस्थानों की जवाबदेही तक पहुंच जाता है, जो ऐसे मामलों को अंधेरे में धकेल देते हैं।
गोवा की घटना क्या हुआ था उस रात
सूत्रों के मुताबिक गोवा के एक पांच सितारा होटल में वीकेंड पार्टी थी। होटल में नशे की गतिविधियों की सूचना पर कलंगट पुलिस ने कार्रवाई की और इस दौरान डॉ.अभिषेक विक्रम सिंह व उनकी महिला साथी को कोकीन सेवन का आरोप में गिरफ्तार किया गया था। यह कोई साधारण छापा नहीं था, बल्कि एक नियमित पुलिस कार्रवाई बताई जाती है।
गिरफ्तारी या पूछताछ भ्रम क्यों
सबसे बड़ा सवाल है कि अगर गिरफ्तारी हुई थी, तो केस नंबर कहां है, अगर सिर्फ पूछताछ थी, तो मीडिया को क्यों नहीं बताया गया। यह अस्पष्टता अपने आप में संदेह पैदा करती है। डॉ.अभिषेक विक्रम सिंह का संबंध एक प्रभावशाली राजनीतिक परिवार से बताया जाता है।
आरोप है कि इसी कारण मामला आगे नहीं बढ़ा और स्थानीय पुलिस पर ऊपर से दबाव आ गया। केस को गंभीरता से आगे नहीं बढ़ाया गया। हालांकि अस्पताल प्रबंधन ने इस मामले में चुप्पी धारण कर ली थी। एक कार्डियोलॉजिस्ट जो मरीजों के दिल का इलाज करता है
हाई-रिस्क फैसले लेता है, ऐसे में नशे से जुड़ा आरोप मरीजों की सुरक्षा पर सवाल खड़ा करता है। यह मामला अफवाहों से कहीं आगे जाता है। यह उस विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग की कहानी है, जिसके लिए कानून सिर्फ कागज पर मौजूद रहता है। यदि आरोप झूठे थे तो सच्चाई सामने क्यों नहीं लाई गई। सवाल सिर्फ डॉ. अभिषेक विक्रम सिंह का नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम का है जो रसूख के आगे घुटने टेक देता है। क्योंकि चुप्पी यहां विकल्प नहीं, साजिश बन जाती है।
* गोवा में कोकीन सेवन का गंभीर आरोप
* पांच सितारा होटल में पुलिस कार्रवाई की चर्चा
* राजनीतिक रसूख में मामला दबने का आरोप
* अस्पताल और प्रशासन की चुप्पी
* चिकित्सा नैतिकता पर गंभीर सवाल
* पारदर्शी जांच का अभाव




