विचार/मुद्दाशासन प्रशासन

एसआईआर का बुरा हुआ चक्कर, भाजपा बनी घनचक्कर

एसआईआर की आड़ में वोटों का खेल: 3 करोड़ नाम कटे, 3.5 करोड़ जोड़ने की साजिश में उलझी भाजपा

● एसआईआर का बुरा हुआ चक्कर, भाजपा बनी घनचक्कर

● एसआईआर की आड़ में वोटों का खेल: 3 करोड़ नाम कटे, 3.5 करोड़ जोड़ने की साजिश में उलझी भाजपा

● एसआईआर ड्राफ्ट लिस्ट में यूपी से 2.89 करोड़ मतदाता गायब, भाजपा में अंदरूनी घमासान

● हर बूथ पर 200 वोट जोड़ने का फरमान, एक महीने में 3.5 करोड़ नए नामों का लक्ष्य

● सीएम योगी बनाम पश्चिम यूपी के दिग्गज नेता, बीएलए-बीएलओ पर टकराव

● यादव-मुस्लिम वोटरों के बड़े पैमाने पर कटने का आरोप

● दिल्ली व अन्य राज्यों में रह रहे यूपी के लोगों को वोटर बनाने की तैयारी

● डुप्लीकेसी को ‘रणनीति’ में बदलने का आरोप, चुनाव आयोग की प्रक्रिया सवालों में

● लखनऊ, गाजियाबाद, नोएडा समेत शहरी सीटों पर 25 से 30 फीसदी वोट कटे

● करीबी विधानसभा सीटों पर भाजपा को एक लाख वोट तक का नुकसान

अमित मौर्य

लखनऊ। प्रदेश की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां सवाल विपक्ष नहीं, बल्कि सत्ता के भीतर से उठ रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार मुद्दा न तो कानून-व्यवस्था है, न भ्रष्टाचार और न ही अपराध। इस बार बवाल की जड़ खुद चुनावी लोकतंत्र की बुनियाद—मतदाता सूची है। चुनाव आयोग द्वारा कराए जा रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन ने भाजपा के उस चुनावी गणित को हिला दिया है, जिसे 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए अभी से साधा जा रहा था। चुनाव आयोग की एसआईआर ड्राफ्ट लिस्ट में उत्तर प्रदेश से 2.89 करोड़ मतदाताओं के नाम कट जाना कोई मामूली प्रशासनिक आंकड़ा नहीं है। यह यूपी के कुल मतदाताओं का करीब 19 प्रतिशत है। लोकतंत्र में अगर हर पांचवां वोटर अचानक ‘अयोग्य’ घोषित हो जाए, तो सवाल केवल प्रक्रिया का नहीं, बल्कि नियत और नतीजे दोनों का उठता है। भाजपा के लिए यह झटका इसलिए भी बड़ा है, क्योंकि यूपी उसकी सत्ता का सबसे मजबूत स्तंभ है।

2024 के लोकसभा चुनाव में पहले ही पार्टी को राज्य में झटका लग चुका है। अब 2027 की तैयारी के बीच अचानक 3 करोड़ वोटों का ‘गायब’ हो जाना, भाजपा के भीतर बेचैनी और बवाल का कारण बन गया है। सूत्र बताते हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मसले पर पार्टी के शीर्ष नेताओं के साथ बंद कमरे में बैठक की। बैठक में दोषारोपण का दौर चला। योगी खेमे ने आरोप बीएलए (बूथ लेवल एजेंट) पर मढ़ दिया, लेकिन पश्चिम उत्तर प्रदेश के एक कद्दावर नेता ने सवाल दाग दिया कि जब नाम जोड़ने और काटने का काम बीएलओ करते हैं, जो राज्य सरकार के कर्मचारी हैं, तो फिर बीएलए को दोषी ठहराना कितना जायज है। बताया जाता है कि इस सवाल पर मुख्यमंत्री चुप रह गए। यहीं से साफ हो गया कि मामला केवल चुनाव आयोग बनाम राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर केंद्र बनाम राज्य की खींचतान का भी है।

ड्राफ्ट लिस्ट में 12.55 करोड़ वोटरों को जगह मिली है, जबकि पार्टी का आंतरिक अनुमान 15.5 करोड़ वोटरों का था। यानी लगभग 3 करोड़ वोटों की भरपाई हर हाल में करनी होगी। इसी दबाव में पार्टी नेतृत्व ने ऐसा आदेश जारी कर दिया, जिसने एसआईआर की पूरी प्रक्रिया को ही संदिग्ध बना दिया। भाजपा कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों को निर्देश मिला है कि राज्य के 1.77 लाख पोलिंग बूथों पर प्रति बूथ 200 नए वोटर जोड़ो। यह लक्ष्य पूरा होता है तो आंकड़ा पहुंचता है 3.5 करोड़ यानी कटे वोटों से भी ज्यादा। सवाल सीधा है

एक महीने में हर बूथ पर 200 नए वोटर कहां से आएंगे
और अगर आएंगे, तो क्या वे असली होंगे या चुनावी जरूरत के हिसाब से गढ़े जाएंगे।

एसआईआर सुधार या सियासी हथियार

चुनाव आयोग का दावा है कि एसआईआर का मकसद मृत, पलायन कर चुके, अनुपस्थित और डुप्लीकेट वोटरों को हटाना है। कागजों में यह लोकतंत्र को मजबूत करने की प्रक्रिया है, लेकिन यूपी में इसके नतीजे सियासी भूचाल बन गए हैं। भाजपा के ही नेताओं का कहना है कि काटे गए वोटरों में बड़ा हिस्सा यादव और मुस्लिम समुदाय का है। यह वही सामाजिक समूह है, जिसे भाजपा खुलकर अपना विरोधी मानती रही है। खुद सीएम योगी आदित्यनाथ कई बार कह चुके हैं कि भाजपा को मुस्लिम वोटों की जरूरत नहीं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या एसआईआर की प्रक्रिया ‘न्यूट्रल’ थी, या फिर सामाजिक संतुलन को जानबूझकर बदला गया?

हर बूथ 200 वोटर लक्ष्य या दबाव

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि हमें साफ कहा गया है कि 15.5 करोड़ वोटरों का आंकड़ा हर हाल में पूरा करना है। तरीका नहीं पूछा जाएगा, सिर्फ नतीजा देखा जाएगा। इस दबाव में पार्टी कार्यकर्ताओं को फॉर्म-6 थमाकर घर-घर भेजा गया है। नई रणनीति के तहत नए युवा वोटरों को प्राथमिकता जिनके पास पूरे दस्तावेज नहीं, उन्हें ‘मैनेज’ करना बाहर रह रहे यूपी निवासियों को स्थानीय वोटर बनाना है।

दिल्ली मॉडल डुप्लीकेसी की खुली छूट

सबसे गंभीर आरोप है दिल्ली में काम कर रहे यूपी के लोगों को वोटर बनाने की योजना। भाजपा नेता खुलकर मान रहे हैं कि दिल्ली में अगले 5 साल चुनाव नहीं वहां डुप्लीकेसी पकड़ में आने में समय लगेगा। तब तक यूपी का चुनाव निकल जाएगा। यह स्वीकारोक्ति अपने आप में चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सीधा हमला है।

गांव बनाम शहर वोटर की ‘सुविधा’ भी अपराध

एसआईआर में हजारों ऐसे वोटर कटे हैं, जिन्होंने अपनी सुविधा के हिसाब से गांव की जगह शहर में नाम जुड़वाया था या इसके उलट। भाजपा अब चाहती है कि वोटर का नाम वहीं हो, जहां उसने 2024 में वोट डाला था यानी मतदाता नहीं, पार्टी तय करेगी कि वोटर कहां वोट डाले।

लखनऊ से नोएडा तक भाजपा का शहरी संकट

ड्राफ्ट लिस्ट में सबसे बड़ा झटका शहरी सीटों पर लगा है। लखनऊ में लगभग 30 फीसदी वोट कटे, गाजियाबाद में 28 फीसदी, नोएडा, मेरठ, कानपुर, प्रयागराज भारी कटौती यही वे सीटें हैं, जहां भाजपा 5 से 20 हजार वोटों के अंतर से जीती थी। अब इन सीटों पर एक लाख तक वोटों का नुकसान होने का आकलन है।

पार्टी का आदेश, आयोग की अवहेलना

सूत्र बताते हैं कि भाजपा नेताओं को दस्तावेज तैयार करवाने तक के निर्देश दिए गए हैं। पहले वोटर तय, फिर सबूत तैयार अगर यही तरीका है, तो एसआईआर केवल एक औपचारिक पर्दा बनकर रह जाएगा।

* यूपी में एसआईआर से 2.89 करोड़ वोट कटे
* भाजपा का लक्ष्य 3.5 करोड़ नए वोट जोड़ने का
* हर बूथ पर 200 वोटर जोड़ने का दबाव
* डुप्लीकेसी को लेकर खुली स्वीकारोक्ति
* यादव-मुस्लिम वोटरों के बड़े पैमाने पर कटने का आरोप
* शहरी सीटों पर भाजपा को सबसे ज्यादा नुकसान
* चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल

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