वाराणसी पुलिस कमिश्नरेट की लचर कार्यप्रणाली: मोहित अग्रवाल पर भारी, भेलूपुर थाना प्रभारी
इंस्पेक्टर भेलूपुर सुधीर त्रिपाठी ने कानून का बना दिया खिलौना, ये थानाध्यक्ष बहुत है घिनौना

● वाराणसी पुलिस कमिश्नरेट की लचर कार्यप्रणाली-स्लग
● मोहित अग्रवाल पर भारी, भेलूपुर थाना प्रभारी
● इंस्पेक्टर भेलूपुर सुधीर त्रिपाठी ने कानून का बना दिया खिलौना, ये थानाध्यक्ष बहुत है घिनौना
● वाराणसी कमिश्नरेट की पुलिस की ‘ईमानदारी’ का शर्मनाक नमूना
● पीड़ित ने खुद चोर पकड़ा, फिर भी थाने में दबा दिया गया सच
● 11 महीने तक थाने-चौकी का चक्कर, फिर भी न्याय शून्य
● सीसीटीवी फुटेज और चोर पुलिस के सामने, फिर भी कार्रवाई से इनकार
● महमूरगंज चौकी से भेलूपुर थाना तक जिम्मेदारी टालने का खेल
● एसीपी के आदेश पर एफआईआर, लेकिन फाइल में कैद हो गई कार्रवाई
● थाने में ‘तथाकथित भाजपा नेता’ की एंट्री और समझौते का दबाव
● चोरी मामूली, लेकिन पुलिस की भूमिका बेहद गंभीर
● कमिश्नरेट पुलिस पीड़ित के लिए दरवाजे बंद, रसूखदारों के लिए खुले वाराणसी में कानून नहीं, सिफारिश
◆ देवनाथ मौर्य
वाराणसी। जिसे प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र होने का गौरव प्राप्त है, वही शहर आज आम नागरिक के लिए न्याय के मामले में सबसे असहाय होता जा रहा है। यहां अपराध छोटा हो या बड़ा, यदि पीड़ित आम आदमी है और आरोपी रसूखदार या राजनीतिक संपर्क वाला, तो कानून अक्सर आंखें मूंद लेता है। महमूरगंज-विरदोपुर निवासी विकास जायसवाल का मामला इसी सड़ांध भरे सिस्टम की भयावह तस्वीर पेश करता है, जहां पुलिस की कथित ईमानदारी केवल भाषणों और प्रेस नोटों तक सीमित रह गई है। 25 फरवरी 2025 की रात विकास जायसवाल की चार पहिया वाहन टोयोटा उनके घर के बाहर खड़ी थी। सुबह जब वह बाहर आए तो देखा कि वाहन का बायां पहिया चार अज्ञात चोर खोलकर चोरी कर ले गए हैं। यह कोई हाई-प्रोफाइल अपराध नहीं था, लेकिन आम नागरिक के लिए यह सीधी आर्थिक चोट थी। विकास जायसवाल ने कानून पर भरोसा जताते हुए तुरंत महमूरगंज पुलिस चौकी इंचार्ज रोहित दूबे को सूचना दी। उम्मीद थी कि पुलिस प्राथमिक जांच करेगी, सीसीटीवी फुटेज खंगालेगी और चोरों तक पहुंचेगी।
लेकिन यहीं से शुरू होता है पुलिस की निष्क्रियता, लापरवाही और कथित मिलीभगत का लंबा अध्याय।
दिन बीते, हफ्ते गुजरे, महीने निकल गए लेकिन पुलिस की ओर से न कोई ठोस कार्रवाई हुई, न कोई सूचना। तीन महीने बाद भी जब कोई नतीजा नहीं निकला तो पीड़ित को यह एहसास हो गया कि यहां न्याय मांगने से नहीं, छीनने से मिलता है। विकास जायसवाल ने खुद आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली, अपने निजी स्रोतों से जानकारी जुटाई और अंततः चोर तक पहुंच गया। यहां सवाल उठता है कि अगर एक आम नागरिक चोर तक पहुंच सकता है, तो संसाधनों से लैस पुलिस क्यों नहीं और मामला यहीं खत्म नहीं होता। विकास जायसवाल ने चोर को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया। यह वह मोड़ था, जहां कानून को अपना काम करना चाहिए था। लेकिन वाराणसी कमिश्नरेट की तथाकथित कर्तव्य परायण और ईमानदार पुलिस ने इस मौके पर भी आंखें मूंद लेना ही बेहतर समझा। करीब 11 महीने तक पीड़ित भेलूपुर थाना और महमूरगंज पुलिस चौकी के बीच चक्कर लगाता रहा। हर बार आश्वासन मिला देख रहे हैं, जांच चल रही है, ऊपर से आदेश नहीं है। लेकिन जमीनी हकीकत यह रही कि फाइल धूल खाती रही और पीड़ित की उम्मीदें टूटती रहीं। आखिरकार 5 जनवरी 2026 को विकास जायसवाल ने हिम्मत जुटाकर एसीपी गौरव कुमार से मुलाकात की। एसीपी ने पूरा मामला सुनने के बाद एफआईआर दर्ज कर कार्रवाई का निर्देश दिया। अगले दिन 6 जनवरी 2026 को एफआईआर तो दर्ज हो गई, लेकिन यह भी केवल कागजी खानापूर्ति बनकर रह गई।
सबसे चौंकाने वाला मोड़ 28 जनवरी 2026 को आया, जब पीड़ित को फोन कर कहा गया कि चोर पकड़ लिया गया है और थाने आ जाएं। लेकिन जब विकास जायसवाल भेलूपुर थाने पहुंचे, तो वहां कानून नहीं बल्कि राजनीतिक दबाव का खेल चल रहा था। थाने में एक तथाकथित भाजपा नेता मौजूद था, जिसे बुलाकर पुलिस पीड़ित पर मामला समाप्त करने का दबाव बनाने लगी। यहीं से यह मामला केवल चोरी का नहीं, बल्कि पुलिस-राजनीति व रसूख के गठजोड़ का प्रतीक बन जाता है।
घटना का विवरण एक पहिया, लेकिन सवाल पूरे सिस्टम पर
25 फरवरी 2025 की रात महमूरगंज-विरदोपुर इलाके में हुई यह घटना भले ही छोटी प्रतीत हो, लेकिन इसके निहितार्थ बेहद गंभीर हैं। वाहन का पहिया चोरी होना केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था पर सीधा सवाल है। जिस इलाके में यह घटना हुई, वहां कई घरों और प्रतिष्ठानों पर सीसीटीवी कैमरे लगे हैं। इसके बावजूद पुलिस ने प्रारंभिक स्तर पर फुटेज खंगालने की जहमत तक नहीं उठाई।
पुलिस चौकी की भूमिका सूचना के बाद भी सन्नाटा
पीड़ित द्वारा सूचना दिए जाने के बाद महमूरगंज पुलिस चौकी इंचार्ज रोहित दूबे की जिम्मेदारी थी कि वह मौके का मुआयना करते, आसपास के कैमरे देखते और संदिग्धों की पहचान करते। लेकिन तीन महीने तक न कोई पूछताछ, न कोई नोटिस, न कोई रिपोर्ट सामने आई।
पीड़ित बना जांचकर्ता
पुलिस की निष्क्रियता से तंग आकर विकास जायसवाल ने खुद जांच शुरू की। सीसीटीवी फुटेज खंगाले गए, स्थानीय लोगों से पूछताछ की गई और निजी स्रोतों के जरिए चोर की पहचान की गई। यह स्थिति पुलिस व्यवस्था पर करारा तमाचा है।
चोर पुलिस के हवाले, फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं
सबसे गंभीर सवाल यही है कि जब चोर पुलिस के सामने था, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की गई? क्या कोई दबाव था? क्या कोई सांठगांठ थी? या फिर यह केवल लापरवाही थी?
11 महीने का मानसिक उत्पीड़न
लगातार थानों के चक्कर लगाना, हर बार निराश लौटना यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि मानसिक उत्पीड़न का मामला भी बनता है। क्या इसकी कोई जवाबदेही तय होगी?
एसीपी का निर्देश भी बेअसर
एसीपी गौरव कुमार के निर्देश पर एफआईआर दर्ज होना इस बात का प्रमाण है कि मामला सही था। लेकिन इसके बाद भी कार्रवाई न होना यह दर्शाता है कि नीचे का तंत्र आदेशों को गंभीरता से नहीं लेता।
थाने में राजनीति की एंट्री
28 जनवरी 2026 को भेलूपुर थाने में तथाकथित भाजपा नेता की मौजूदगी और समझौते का दबाव इस पूरे मामले को अत्यंत संदिग्ध बनाता है। सवाल है थाने में राजनीतिक व्यक्ति की क्या भूमिका?
कमिश्नरेट सिस्टम पर सवाल
वाराणसी कमिश्नरेट व्यवस्था को अपराध नियंत्रण का मॉडल बताया जाता है। लेकिन यह मामला साबित करता है कि यह मॉडल आम नागरिक के लिए पूरी तरह फेल है। जब पुलिस खुद समझौते की भूमिका में आ जाए, तो पीड़ित न्याय की उम्मीद कहां से करे? विकास जायसवाल का मामला केवल एक पहिया चोरी का नहीं है, यह वाराणसी पुलिस की कार्यप्रणाली पर चार्जशीट है। यह घटना बताती है कि आज भी आम आदमी को न्याय पाने के लिए खुद लड़ना पड़ता है, क्योंकि सिस्टम अक्सर रसूख और सिफारिश के आगे घुटने टेक देता है।
सुधीर त्रिपाठी के कुकर्म की कहानी पीड़ित की जुबानी
न न न चौकिये मत ये यूपी पुलिस की वाराणसी कमिश्नरेट है यहां पीड़ित को ही कहा जा रहा है कि पैसा लेकर सुलह कर लो।जी हां ये निचताईपूर्ण हरकत खुद भेलूपुर थाना प्रभारी सुधीर त्रिपाठी कर रहा है वादी विकास जायसवाल को थाने में घन्टो बैठता है और कहता है कि सुलह कर लो। दूसरी तरफ माल भी बरामद है। पुलिस कमिश्नर आखिर किस बात का क्राइम मीटिंग करते है ये तो वही जाने लेकिन हकीकत में जब रक्षक ही भक्षक बन जाये तो न्याय कहा मिलेगा।सिर्फ अच्छी अच्छी बातें कहने से गुड पुलिसिंग नही होता मोहित अग्रवाल महोदय जमीन पर तो आप की पुलिस पीड़ित को ही धमका रही है।खाकी अगर पीड़ित को न्याय नही दे पा रही है तो लानत है पुलिस पर जो सब कुछ जान कर भी अनजान बन रही है।




