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सूबे के पुलिस प्रमुख राजीव कृष्ण डिजिटल अपराध पर बेहद गम्भीर,लापरवाह पुलिस कर्मियों पर चला देंगे “तीर”

डिजिटल युग में सतर्क नागरिक ही सुरक्षित, साइबर अपराध पर उत्तर प्रदेश पुलिस की दो-टूक

  • डिजिटल सुविधा के साथ बढ़ा खतरा, जागरूकता ही असली सुरक्षा कवच
  • 1930 साइबर हेल्पलाइन पर तुरंत कॉल करें, संदिग्ध खाते हो सकते हैं फ्रीज
  • 55-60 फीसदी मामले वित्तीय फ्रॉड के, लालच और भय बनते हैं अपराधियों के हथियार
  • सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग की लत से सावधान रहने की अपील
  • ‘डिजिटल अरेस्ट’ पूरी तरह फर्जी, कोई एजेंसी ऑनलाइन पैसे नहीं मांगती
  • सेबी-आरबीआई अधिकृत संस्थानों में ही निवेश की सलाह
  • प्रदेश के हर जिले में साइबर थाना, 1581 थानों में हेल्प डेस्क स्थापित
  • 26 हजार पुलिसकर्मी प्रशिक्षित, नागरिकों से ‘साइबर एंबेसडर’ बनने का आह्वान


लखनऊ। डिजिटल क्रांति ने आमजन के जीवन को जितना आसान बनाया है, उतना ही जटिल भी। मोबाइल फोन, इंटरनेट और ऑनलाइन भुगतान अब शहरी ही नहीं, ग्रामीण जीवन की भी अनिवार्य जरूरत बन चुके हैं। कोविड-19 महामारी के बाद डिजिटल लेन-देन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई और अनुमानतः 70 से 80 प्रतिशत नागरिकों ने डिजिटल ट्रांजेक्शन को अपनी सामान्य जीवनशैली का हिस्सा बना लिया। राशन से लेकर रेस्टोरेंट तक, फीस से लेकर फसल भुगतान तक—हर जगह क्यूआर कोड और यूपीआई ने नकदी की जगह ले ली है। लेकिन इसी तेजी से एक और साया भी बढ़ा साइबर अपराध का। सुविधाओं के साथ जोखिम भी आया। ऑनलाइन निवेश, फर्जी कॉल, सोशल मीडिया ठगी और तथाकथित ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे नए-नए हथकंडों ने हजारों परिवारों को आर्थिक और मानसिक संकट में डाला है। प्रदेश के पुलिस महानिदेशक प्रशांत कुमार ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि डिजिटल दुनिया में जागरूकता ही सुरक्षा है। उन्होंने नागरिकों को आगाह किया कि यदि कोई व्यक्ति खुद को पुलिस या किसी जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर वीडियो कॉल पर ‘गिरफ्तारी’ या ‘समझौते’ के नाम पर पैसे मांगता है, तो यह पूरी तरह फर्जी है। भारत में कोई भी सरकारी एजेंसी ऑनलाइन गिरफ्तारी नहीं करती और न ही डिजिटल समझौते के नाम पर धन मांगती है।
डीजीपी ने बताया कि साइबर अपराध मुख्यतः तीन श्रेणियों में सामने आ रहे हैं वित्तीय लेन-देन से जुड़े फ्रॉड, सोशल मीडिया आधारित अपराध और तथाकथित डिजिटल अरेस्ट। इनमें से 55 से 60 प्रतिशत मामले वित्तीय धोखाधड़ी के हैं, जिनमें लालच, लापरवाही और मनोवैज्ञानिक भय अपराधियों के प्रमुख हथियार बनते हैं। उन्होंने नागरिकों से अपील की कि ठगे जाने की स्थिति में तुरंत 1930 साइबर हेल्पलाइन पर कॉल करें। समय पर सूचना देने से संदिग्ध बैंक खातों को फ्रीज कराया जा सकता है और धन की रिकवरी की संभावना बढ़ जाती है। प्रदेश में साइबर सुरक्षा ढांचे के विस्तार का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि वर्ष 2014 में जहां केवल एक साइबर थाना था, वहीं अब प्रत्येक जिले में साइबर थाना स्थापित है और सभी 1581 थानों में साइबर हेल्प डेस्क कार्यरत हैं। लगभग 26 हजार पुलिसकर्मियों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया है। उन्होंने नागरिकों से आग्रह किया कि वे केवल पीड़ित न बनें, बल्कि ‘साइबर सुरक्षा के एंबेसडर’ बनकर समाज में जागरूकता फैलाएं। डिजिटल युग में जिम्मेदार नागरिकता ही सबसे बड़ा बचाव है।

डिजिटल क्रांति सुविधा और चुनौती का संगम

डिजिटल भारत की परिकल्पना ने गांव-गांव तक इंटरनेट और मोबाइल कनेक्टिविटी पहुंचाई है। यूपीआई, नेट बैंकिंग और मोबाइल वॉलेट ने लेन-देन को सेकंडों का काम बना दिया। कोविड-19 के दौरान जब शारीरिक दूरी अनिवार्य हुई, तब डिजिटल भुगतान जीवन रेखा साबित हुआ। परंतु अपराधी भी इसी गति से डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सक्रिय हुए। पहले जहां जेबकतरे बाजार में सक्रिय रहते थे, अब साइबर ठग मोबाइल स्क्रीन के भीतर छिपे बैठे हैं।

साइबर अपराध की पहली श्रेणी वित्तीय फ्रॉड

डीजीपी प्रशांत कुमार ने बताया कि कुल मामलों का 55-60 प्रतिशत हिस्सा वित्तीय लेन-देन से जुड़े साइबर फ्रॉड का है। इसमें फर्जी निवेश योजनाएं, केवाईसी अपडेट के नाम पर ठगी, ओटीपी साझा करवा कर खाते खाली करना और लोन ऐप के जरिए ब्लैकमेल शामिल हैं। अपराधी अक्सर अत्यधिक और सुनिश्चित लाभ का लालच देते हैं। “दोगुना पैसा 30 दिन में” जैसी स्कीमें मनोवैज्ञानिक जाल होती हैं। निवेश केवल सेबी या आरबीआई से अधिकृत संस्थानों में ही करना चाहिए।
दूसरा खतरा: सोशल मीडिया और गेमिंग सोशल मीडिया पर फर्जी प्रोफाइल बनाकर ब्लैकमेल, मॉर्फिंग और साइबर बुलिंग के मामले तेजी से बढ़े हैं। युवाओं और किशोरों को ऑनलाइन गेमिंग की लत के जरिए आर्थिक जाल में फंसाया जा रहा है। डीजीपी ने कहा कि साइबर गेमिंग में हमेशा गेम बनाने वाला जीतता है। यानी प्लेटफॉर्म का एल्गोरिद्म ऐसा होता है कि अंततः लाभ कंपनी को ही होता है।

तीसरी श्रेणी ‘डिजिटल अरेस्ट’

हाल के महीनों में ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर ठगी के मामले सामने आए हैं। अपराधी वीडियो कॉल पर पुलिस या सीबीआई अधिकारी बनकर धमकाते हैं कि आपके नाम से मनी लॉन्ड्रिंग हुई है, आप घर से बाहर न निकलें, खाते में पैसा जमा करें वरना गिरफ्तारी होगी।
डीजीपी ने स्पष्ट किया कोई भी भारतीय एजेंसी ऑनलाइन गिरफ्तारी नहीं करती। ऐसे कॉल तुरंत काटें और 1930 पर सूचना दें।

1930 हेल्पलाइन त्वरित कार्रवाई की कुंजी

साइबर ठगी के मामलों में समय सबसे महत्वपूर्ण कारक है। जितनी जल्दी शिकायत दर्ज होगी, उतनी जल्दी संदिग्ध खाते को फ्रीज कराया जा सकता है।
प्रदेश में साइबर थानों और हेल्पडेस्क की संख्या बढ़ाई गई है। 2014 में केवल एक साइबर थाना था, अब हर जिले में है। 1581 थानों में साइबर हेल्पडेस्क स्थापित हैं।

प्रशिक्षण और तकनीकी सुदृढ़ीकरण

लगभग 26 हजार पुलिसकर्मियों को साइबर अपराध की जांच के लिए प्रशिक्षित किया गया है। डिजिटल फॉरेंसिक, डेटा एनालिटिक्स और बैंकिंग समन्वय की विशेष ट्रेनिंग दी गई है। डीजीपी ने कहा कि केवल पुलिस के प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। समाज को भी जिम्मेदारी निभानी होगी। स्कूल, कॉलेज और सामाजिक संगठनों के माध्यम से साइबर जागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता है। डिजिटल युग में अपराध की प्रकृति बदली है, लेकिन उसका मूल तत्व वही है मानव मनोविज्ञान का शोषण। लालच, भय और असावधानी अपराधियों के सबसे बड़े हथियार हैं। सरकार ने ढांचा मजबूत किया है, थाने बढ़ाए हैं, हेल्पलाइन शुरू की है लेकिन अंतिम सुरक्षा नागरिक की सजगता में है। यदि हर नागरिक संदिग्ध लिंक पर क्लिक करने से पहले सोचे, ओटीपी साझा न करे, निवेश से पहले सत्यापन करे और ठगी होने पर तुरंत 1930 पर कॉल करे तो साइबर अपराध की जड़ कमजोर पड़ सकती है। डिजिटल भारत का सपना तभी सुरक्षित रहेगा जब डिजिटल नागरिक सतर्क रहेगा।

* 70-80 प्रतिशत नागरिक डिजिटल ट्रांजेक्शन अपना चुके
*’55-60 प्रतिशत साइबर अपराध वित्तीय फ्रॉड
‘डिजिटल अरेस्ट’ पूरी तरह फर्जी
* 1930 साइबर हेल्पलाइन पर तुरंत शिकायत करें
सेबी आरबीआई अधिकृत संस्थानों में ही निवेश
* 2014 में एक साइबर थाना, अब हर जिले में
* 1581 थानों में साइबर हेल्प डेस्क
* 26 हजार पुलिसकर्मी प्रशिक्षित
* सोशल मीडिया व गेमिंग की लत से सावधान
* नागरिक बनें साइबर सुरक्षा के एंबेसडर

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