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फ्रांस ने भारत की पीठ पर भोका खंजर,मोदी के कारण बहुत खराब हो रहा है देश का “मंजर”

राफेल विमानों की तकनीक और सोर्स कोड देने से मना किया- कोई काम की नहीं रही डील

  •  कहा- किसी बाहरी देश को नहीं देंगे अपनी 40 साल की मेहनत का फल
  •  तकनीक और सोर्स कोड के लीक होने की बताया खतरा, कहा- कोई नकल कर ले तो?
  •  भारत की ओर से डील के बारे में अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं
  •  रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, डील पर बातचीत अभी जारी
  •  बिना सोर्स कोड के भारत को विमानों के अपने हथियार लगाने में आएगी भारी परेशानी

नई दिल्ली। राफेल विमानों की सप्लाई के लिए भारत की फ्रांस से डील पर ग्रहण लगता दिख रहा है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉ की बीते दिनों भारत यात्रा के दौरान 30 बिलियन डॉलर की इस डील पर दस्तखत होने थे। लेकिन हुए नहीं और इस बारे में भारत सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक सफाई नहीं आई है। वहीं, फ्रांस के एक बिजनेस अखबार ला एसेंशियल दे लीको ने दावा किया है कि फ्रांस सरकार ने इस सबसे बड़ी डील में राफेल विमानों के तकनीकी नियंत्रण को भारत के हाथ में देने से मना कर दिया है।

 

इसका मतलब क्या हुआ?

इसका सीधा मतलब यह हुआ कि भारत को राफेल विमानों के इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल नहीं मिल पाएंगे। यानी भारत को हर बार अपनी मिसाइलों- जैसे ब्रह्मोस और अस्त्र को राफेल से एकीकृत करने के लिए फ्रांस से सोर्स कोड मांगना होगा और इसकी कीमत चुकानी होगी। इसके अलावा राफेल विमानों में भारत अपनी कोई भी स्वदेशी तकनीक नहीं लगा पाएगा। इससे पहले भारत ने दावा किया था कि फ्रांस ने राफेल की इस डील में उसकी इस शर्त को मान लिया है कि वह भारत में 50 प्रतिशत स्वदेशीकरण की शर्त को मान गया है और वह विमानों की तकनीक का हस्तांतरण भारत को करेगा और सोर्स कोड भी देगा। भारत के लिए राफेल का सोर्स कोड इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तानी वायुसेना के चीन में बने जेएफ 15 विमानों के मिसाइल हमले के बाद राफेल को जवाबी हमले से पले पूरे एक दिन जमीन पर इसलिए रोकना पड़ा था, क्योंकि भारत के पास अस्त्र नाम की मिसाइल होते हुए भी उसे राफेल से जोड़ा नहीं जा सका, क्योंकि हमारे पास सोर्स कोड नहीं था। अगर एक बार फिर ऐसे ही जंग के हालात हुए तो भारत के लिए राफेल विमानों की उपयेगिता ही शून्य रह जाएगी।

फ्रांस ने क्यों मना किया?

फ्रांसिसी अखबार के अनुसार, फ्रांस सरकार ने भारत को इसलिए तकनीक हस्तांतरण से मना किया, क्योंकि राफेल विमानों में स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर नाम की तकनीक लगी हुई है, जो एक डिजिटल शील्ड की तरह है और यह दुश्मन के रेडार और मिसाइलों के हमले को रोकती है। अखबार का यह भी कहना है कि यह राफेल विमानों का एक अद्वीतीय फीचर है और फ्रांस इस तकनीक को भारत के साथ साझा नहीं करना चाहता, क्योंकि इससे भारत के हाथ से तकनीक के लीक होने का खतरा है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि अगर फ्रांस से भारत को सोर्स कोड और तकनीक नहीं मिली तो भारतीय वायुसेना इन विमानों को आजादी से उड़ा नहीं पाएगी।

भारत को कितना नुकसान?

फ्रांस से 114 राफेल विमानों का सोर्स कोड नहीं मिलने से भारतीय इंजीनियर अपने हथियारों को विमान में जोड़ नहीं पाएंगे। इनमें सबसे प्रमुख है भारत की नई अस्त्र मिसाइल और स्मार्ट एंटी एयरफील्ड वेपन। दोनों ही हथियारों को राफेल विमानों के कंट्रोल सिस्टम से जोड़ने की जरूरत होती है और इसके लिए भारत को हर हाल में सोर्स कोड की जरूरत होगी। लेकिन अगर सोर्स कोड न हो तो विमानों में किसी भी तरह का बदलाव करने के लिए भारत को हर बार राफेल की निर्माता कंपनी दसॉ एविएशन और उसकी तकनीकी सहायक कंपनी थेल के पास जाकर कोड खरीदना पड़ेगा। अखबार के अनुसार, भारत ने फ्रांस से पूरी तरह से तैयार होकर आने वाले 36 और नौसेना के लिए राफेल मरीन एम फाइटर विमानों का सोर्स कोड न देने की बात मान ली है। हालांकि, भारतीय रक्षा मंत्रालय को अभी भी इस बात की उम्मीद है कि फ्रांस से आने वाले नए 114 विमानों के लिए फ्रांसिसी सरकार सोर्स कोड और तकनीकी हस्तांतरण के वादे को पूरा करेगी।

डील पर अभी भी बातचीत जारी

भारत और फ्रांस के बीच 114 राफेल विमानों की खरीद पर अभी दस्तखत नहीं हुए हैं। रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि की है कि डील पर अभी बातचीत चल रही है और भारत अब फ्रांस से तकनीक हस्तांतरण और सोर्स कोड देने की गारंटी मांग रहा है। इसका मतलब है कि भारत की चिंता केवल इस बात पर नहीं है कि इन विमानों का भारत में संयुक्त रूप से उत्पादन हो। भारत की चिंता इस बात को लेकर है कि फ्रांस से हमें राफेल विमानों की तकनीक और सोर्स कोड मिले, ताकि भविष्य में भारत के लिए और उन्नत विमानों का निर्माण आसान हो सके। भारत को इस डील से रक्षा क्षेत्र की नौकरियों में इजाफा होने और टाटा एडवांस सिस्टम या हिंदुस्तान एयरनॉटिक्स लिमिटेड जैसी सहयोगी कंपनियों की तकनीकी महारत में इजाफे की भी उम्मीद है।

फ्रांस ने बनाया आईपीआर का बहाना

एक ओर जहां भारत मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत राफेल विमानों को अपने घर में बनाकर अपनी तकनीकी क्षमता में इजाफा करना चाहता है, वहीं फ्रांस ने बौद्धिक संपदा अधिकार का हवाला देते हुए भारत को तकनीकी हस्तांतरण से इनकार कर दिया है। फ्रांस का कहना है कि वह अपने बौद्धिक संपदा अधिकार के नियम से कोई समझौता नहीं करेगा। उसकी दलील है कि राफेल विमानों का सोर्स कोड उसकी 40 सालों की रिसर्च और विकास का एक व्यापारिक रहस्य है और वह इसे किसी दूसरे देश के साथ साझा नहीं कर सकता। फ्रांस की तर्क है कि राफेल विमान इस समय इजिप्ट, कतर, ग्रीस और क्रोएशिया जैसे देशों के पास भी हैं। ऐसे में भारत को सोर्स कोड देने का मतलब इन सभी देशों की सुरक्षा के साथ समझौता करना होगा।

फ्रांस को भारत पर भरोसा नहीं

राफेल डील के खटाई में जाने के सबसे प्रमुख कारणों में से एक यह बताया जा रहा है कि फ्रांसिसी सरकार को भारत पर यकीन नहीं है। फ्रांस के राजनयिकों का कहना है कि भारत को राफेल के कल-पुर्जों की आने वाले समय में कोई कमी नहीं आएगी। लेकिन फ्रांस अपनी तकनीक किसी अन्य देश को नहीं दे सकता। खासकर ऐसे किसी भी देश को, जिससे तकनीक के लीक होने का खतरा हो। अगर राफेल की तकनीक कहीं लीक हो गई तो कोई अन्य देश इसकी नकल बना सकता है। यही कारण है कि फ्रांस के वार्ताकार इस समय बीच का रास्ता खाजने में जुटे हैं। सूत्रों का कहना है कि फ्रांस भारत को सोर्स कोड की जगह इंटरफेस कंट्रोल दस्तावेज या एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस का अधिकार दे सकता है। उनका कहना है कि इससे भारत को राफेल की अंदरूनी तकनीक को जाने बिना अपने हथियारों को विमानों में लगाने की सुविधा होगी। लेकिन इसका मतलब यह भी होगा कि भारतीय वायुसेना के पायलट अपनी पूरी आजादी के साथ इन विमानों को न तो उड़ा नहीं सकेंगे।

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