
– जापान को पछाड़ने अब करना होगा 2 साल का इंतजार
– बजट से पहले जीडीपी को आंकने का आधार वर्ष बदलकर भारत ने की बड़ी गलती
– वित्त मंत्री का बजट इस साल फिर गड़बड़ाया, देश को 12 लाख करोड़ का सीधा नुकसान
– कर्ज बनाम जीडीपी का अनुपात भी बजट अनुमानों से अधिक रहने की संभावना
– ईरान के तेल परिवहन का रास्ता रोकने से भारत पर पड़ेगा गंभीर प्रभाव
– कतर से भी अभी लंबे समय तक नहीं मिलेगी गैस, बढ़ सकते हैं तेल के दाम
नई दिल्ली। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार का बजट एक बार फिर फेल हो गया है। बजट के फेल होने का कारण सरकार का वह गणित है, जो उसने बजट के बाद अपनाया और इसका नतीजा यह निकला कि देश को 12 लाख करोड़ रुपए की चपत लग गई। केवल यही नहीं, बल्कि देश की जीडीपी को भी नुकसान हुआ और वह 345 लाख करोड़ पर आ पहुंची, जबकि सरकार ने बजट में 357 लाख करोड़ का अनुमान लगाया था।
अब ऐसे में भारत को तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के लिए जापान को हराने में दो साल तक का इंतजार करना पड़ सकता है। यह इसलिए हुआ, क्योंकि डॉलर के भाव पर भारत की इकोनमी 3.79 ट्रिलियन डॉलर पर आ टिकी है, जबकि पिछले साल दिसंबर में केंद्र सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था के 4.1 ट्रिलियन के होने की घोषणा की थी, जो कि जापान के 4 ट्रिलियन की इकोनमी से कहीं ज्यादा है। लेकिन रुपए के मूल्य में लगातार आई गिरावट और देश की अर्थव्यवस्था में कमजोर के कारण भारत 3.79 ट्रिलियन की इकोनमी बन गया, जबकि जापान की इकोनमी ने उछाल मारते हुए 4.4 ट्रिलियन को पार कर लिया। भारत ने तब बताया था कि देश 2026-27 में दुनिया की तीसरी इकोनमी बन जाएगा। मगर अब कहा जा रहा है कि भारत को यह उपलब्धि हासिल करने में 2028 तक का वक्त लगेगा और वह भी तब, जबकि जापान की आर्थिक स्थिति कमजोर हो जाए और भारत आगे के दो साल में लगातार तरक्की करे।

इसलिए हुआ यह बदलाव
असल में भारत ने जीडीपी को आंकने का आधार वर्ष केंद्रीय बजट के फौरन बाद फरवरी के आखिरी सप्ताह में बदलकर 2023 कर लिया है। इसका सीध असर यह पड़ा कि भारत की नॉमिनल जीडीपी में 12 लाख करोड़ की गिरावट आई और वह 345 लाख करोड़ पर आ गया। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी को बजट का ऐलान करते समय आर्थिक स्थिति को 357 लाख करोड़ का बताया था। केंद्र सरकार का बजट भी इसी आंकड़े के आधार पर बना था। क्राइसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डीके जोशी कहते हैं कि उन्हें इस साल मार्च की तिमाही में जोरदार आर्थिक बढ़त की उम्मीद है। उनका दावा है कि इस तिमाही में भारत की खपत में काफी वृद्धि होगी, जिसमें अक्तूबर के बाद से गिरावट देखी जा रही थी। खपत को बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने पिछले साल के आखिर में जीएसटी की दरों में व्यापक बदलाव करते हुए 18 प्रतिशत के स्लैब को हटाकर दरों में संयोजन किया था। हालांकि, सरकार के इस कदम से भी खपत में इजाफा नहीं हुआ। इसके बजाय घरेलू सामान बनाने वाली कंपनियों ने चीजों की मात्रा घटा दी और दाम बढ़ा दिए। इस मुनाफे के गणित को खाद्य तेलों की स्थिति से समझा जा सकता है, जो अब एक लीटर के बजाय 850 मिलीलीटर के पैक में आता है और इतनी मात्रा के तेल की कीमत भी ज्यादा है। वहीं, भारत के चीफ इकोनमिक एडवाजर वी. नागेश्वरन कहते हैं कि भारत तेजी से दुनिया की तीसरी बड़ी इकोनमी बनने की दिशा में आगे बजा रहा है। उनके अनुसार, भारत अपने प्रतिद्वंद्वी जापान को पछाड़ सकता है। हालांकि, इसमें समय लगेगा और इसमें कुछ साल और लग सकते हैं। उनका यह भी कहना था कि सरकार के आर्थिक सुधार और दुनिया की जिओ पॉलिटिकल परिस्थितियां, दोनों ही भारत के अनुकूल हैं और यही कारण है कि देश 7 प्रतिशत की एक-समान विकास दर से आगे बढ़ रहा है। इस बीच, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की नवंबर 2025 को जारी रिपोर्ट कहती है कि इस एक-समान आर्थिक विकास दर को देखते हुए भारत को 2027 तक 4.96 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी बन जाना चाहिए था। इसका मतलब यह है कि भारत को अगले साल तक जापान को पछाड़कर दुनिया की तीसरी इकोनमी बन जाना चाहिए था, लेकिन अब केंद्र सरकार के अनुसार इसमें और देर लगने का मतलब यही है कि देश की आर्थिक विकास दर अनुमान से कहीं नीचे है।
बिगड़ा वित्तीय घाटे का गणित
जीडीपी के कम होने के अलावा इसे आंकने का आधार वर्ष 2023 करने से भारत सरकार के वित्तीय घाटे का गणित भी बिगड़ गया है। इससे पहले भारत ने साल 2031 के लिए जीडीपी के मुकाबले कर्ज का अनुपात 50 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया था। लेकिन इस साल की नॉमिनल जीडीपी 345 लाख करोड़ होने का मतलब है कि यह अनुमान से 3.3 प्रतिशत पहले ही हो गई है। इससे लक्षित वित्तीय घाटा 16.96 लाख करोड़ के मुकाबले, जो जीडीपी का 4.4 फीसदी है, ज्यादा होने की आशंका बन गई है। इसे देखते हुए 2026 में वित्तीय घाटा अब 4.51 प्रतिशत रहने की संभावना है, जो कि बजट में 4.36 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया था। इसी तरह, आधार वर्ष को बदलने से 2024 और 2025 के वित्तीय घाटे को भी नए सिरे से बदलने की जरूरत है, जो कि 5.7 प्रतिशत और 5.5 पतिशत रहने की संभावना है।
तेल के खेल से होगा नुकसान
अब ईरान और अमेरिका-इजरायल की जंग के हालात में अगर हॉर्मूज जलडमरुमध्य लंबे समय तक बंद रहता है और वहां से तेल की आवाजाही नहीं हो पाती है तो भारत की इकोनमी को और नुकसान पहुंच सकता है। ईरान ने दुनिया के 20 प्रतिशत तेल की आवाजाही वालजे इलाके को बंद कर तेल टैंकरों का रास्ता रोक दिया है। उधर, हूतियों ने लाल सागर का मुंह बंद कर दिया है। अमेरिका ने पहले ही भारत पर रूस से तेल खरीदने पर 25 प्रतिशत का टैरिफ लगाकर हमें वेनुजुएला से तेल खरीदने पर मजबूर कर दिया है। इसी बीच, ईरान के हमलों के बाद कतर ने भी अपने यहां से गैस की आपूर्ति रोक दी है। अब अगर इन दोनों कारणों से विश्व में कच्चे तेल के दाम 100 डॉलर से उुपर गए तो भारत को भी अपने यहां तेल के दाम में भारी इजाफा करना होगा। यह कदम न केवल केंद्र सरकार को राजनीतिक रूप से कमजोर करेगा, बल्कि तेल के पूल में घाटा बढ़ने से देश का व्यापार घाटा भी ज्यादा होगा। ऐसे में भारत का जीडीपी और कर्ज का अनुपात अब करीब 2 प्रतिशत ज्यादा यानी 57.5 प्रतिशत हो सकता है। यह भारत के बजट अनुमान 50 प्रतिशत से 7.5 फीसदी ज्यादा है। आईसीआरए की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर कहती हैं कि वैश्विक परिस्थितियों में मौजूद चुनौतियों को देखते हुए 2031 तक भारत को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है और इसीलिए देश की आर्थिक स्थिति को फिलहाल अनुमानों के आधार पर आंकने में कई दिक्कतें पेश आ सकती है।



