
* अगर आपको प्लान में रोजाना 2 जीबी डाटा है तो अलग से चुकाने होंगे 60 रुपए
* दूरसंचार विभाग को सितंबर तक मॉडल पेश करने का कहा
* विशेषज्ञों ने किया आगाह, पर सरकार को नहीं है किसी की परवाह
* बीएसएनएल को पूरी तरह से खत्म करने की तैयारी, छंटाई को कहा
* बच्चों को इंटरनेट से दूर करने के नाम पर अभिभावकों पर पड़ेगी महंगाई की मार
नई दिल्ली। भारत के करीब 100 करोड़ मोबाइल धारकों ने बीते साल 2025 में 229 अरब जीबी डाटा खरीदा। मोबाइल और इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर कंपनियां भारत सरकार से स्पेक्ट्रम खरीदकर डाटा बेचती हैं। भारत में लोग इंटरनेट सेवाओं का उपयोग करने के लिए वही डाटा उनसे खरीदते हैं। उस पर सेवा शुल्क और जीएसटी भी चुकाते हैं1 लेकिन अब केंद्र की नरेंद्र मोदी सत्ता उस डाटा के उपयोग पर भी टैक्स लगाने पर विचार कर रही है। ऐसा करने वाला भारत दुनिया का पहला देश हो सकता है। पीएम नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में टेलीकॉम सेक्टर की पहली समीक्षा बैठक में दूरसंचार विभाग से इस संबंध में आगामी सितंबर तक एक ढांचा बनाने को कहा गया है।
पाई-पाई को मोहताज भारत सरकार लोगों के एक जीबी डेटा के उपयोग पर 1 रुपए का टैक्स वसूलना चाहती है। इससे सरकार को 22 हजार 900 करोड़ रुपए की आमदनी होने वाली है। ऐसे में अगर कोई टेलीकॉम कंपनी का रोजाने का एक जीबी डाटा इस्तेमाल करता है तो उसे महीने के 30 रुपए चुकाने पड़ सकते हैं। इस तरह से सरकार को हर महीने खरबों रुपए की आय हो सकती है। सात जनवरी को पीएम की अगुवाई में हुए टेलीकॉम सेक्टर की मीटिंग में मोबाइल डाटा पर टैक्स लगाने का प्रस्ताव पारित हुआ है।

डाटा पर बेलगाम खर्च को रोकने की कवायद
नरेंद्र मोदी सरकार मोबाइल डाटा पर बेलगाम खर्च को रोकने की कवायद के नाम पर इस गैरवाजिब टैक्स को लागू करना चाहती है। केंद्र की दलील है कि इससे इंटरनेट डाटा का सृनकारी उपयोग सुनिश्चित हो सकता है। इस समय टेलीकॉम उपभोक्ता सेल्युलर डाटा पर 18 फीसदी जीएसटी देते हैं। केंद्र सरकार ने बच्चों के द्वारा डिजटल डाटा के इस्तेमाल पर पहले भी चिंता जताई है। लेकिन केंद्र का यह ताजा कदम सेल्युलर कंपनियों को स्पेक्ट्रम और लाइसेंस फीस से होने वाली आय के बाद भी डाटा पर टैक्स लगाने की कवायद पर चिंता जाहिर करता है।
विशेषज्ञों ने केंद्र को किया आगाह
भारत सरकार के दूरसंचार नियामक प्राधिकरण के पूर्व प्रमुख सलाहकार सत्य एन गुप्ता ने पहले ही केंद्र सरकार को इस तरह के किसी भी टैक्स के खिलाफ आगाह किया था। उनकी दलील है कि डाटा पर टैक्स को न केवल लागू कराने में मुश्किलें पेश आएंगी, बल्कि इंटरनेट डाटा के वाजिब उपयोग को लेकर भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी इसका गलत प्रभाव पड़ने आशंका जताई गई थी। उन्होंने कहा कि अगर भारत सरकार लोगों के डाटा यूज पर ऐसा कोई टैक्स लगाती है तो इससे भारत की नेतृत्वकारी छवि को नुकसान पहुंचेगा। टेलीकॉम विभाग की एक रिपोर्ट में गुप्ता के इस बयान को बाकायदा कोड किया गया है। मोदी सरकार की इस बैठक में केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया भी मौजूद थे।
यह है सरकार का असल मकसद
माना जा रहा है कि नरेंद्र मोदी सरकार इंटरनेट डाटा का उपयोग कम करवाना चाहती है, ताकि सरकार के गलत फैसलों का विरोध करने में होने वाला डाटा खर्च रुक सके। केंद्र सरकार के पास देश के हर व्यक्ति के डेटा उपयोग की पूरी जानकारी है। मिसाल के लिए अगर आप अपने इंटरनेट डेटा का उपयोग ज्यादातर व्हाट्सएप, रील देखने या वीडियो देखने में करते हैं तो आपको हर रोज के एक या दो रुपए देना महंगा नहीं पड़ेगा, क्योंकि आपको इनकी आदम पड़ चुकी है। वहीं, अगर आप इंटरनेट डाटा का उपयोग नई रिसर्च, जानकारियां या रिपोर्ट हासिल करने के लिए करते हैं तो केंद्र सरकार को आशंका रहेगी कि कहीं आप इन सूचनाओं का प्रसार न करें और उन्हें ज्यादा लोगों तक न पहुंचाएं। ऐसे बोलने वाले लोगों को हतोत्साहित करने के लिए सरकार डाटा उपयोग पर टैक्स लगाना चाहती है। यह सब लोगों को अपना स्क्रीन टाइम कम करने के लिए लागू किया जाएगा। रोज डाटा पर 2 रुपए देने का मतलब होगा महीने के 60 रुपए अधिक खर्च करना। इससे बचने के लिए लाखों लोग कम डाटा वाला प्लान खरीदेंगे, ताकि पैसे ही बचत हो। वे इंटरनेट पर कम वक्त बिताएंगे, जिससे उन तक सही सूचनाएं नहीं पहुंच पाएंगी और वे जरूरी सूचनाओं से वंचित रह जाएंगे। केंद्र सरकार इंटरनेट की लत से बच्चों को बचाने के लिए यह कदम उठाने जा रही है। लेकिन इसके लिए बच्चों के हाथों में मोबाइल और सोशल मीडिया पर उनकी मौजूदगी कम करने की जगह सरकार डाटा पर एक-समान टैक्स लागू कर यह काम करना चाहती है, जिसकी मार वयस्कों पर खासतौर पर पड़ेगी, जो कि असल में डाटा के खरीदार हैं। इसी को दखते हुए मोदी सरकार ने दूरसंचार विभाग को ऐसा एक मॉडल बनाने को कहा है, जो बच्चों को इंटरनेट के उपयोग को हतोत्साहित करे और सरकार की कमाई भी बढ़ाए। यह बात सबसे पहले भारत सरकार के इस साल के इकोनॉमिक सर्वे में छपी थी कि देश के युवाओं में इंटरनेट की लत पड़ती जा रही है। लेकिन सरकार ने इसे रोकने के लिए डाटा पर टैक्स लगाने का फैसला लिया है।
बीएसएनएल के पर कतरने की तैयारी
जिओ और एयरटेल को आगे लोकर सरकारी कंपनी बीएसएनएल की क माई को पहले ही डुबो चुकी भारत सरकार अब सरकारी क्षेत्र की इस टेलीकॉम कंपनी के पर कतरने की तैयारी कर चुकी है। बैठक में बीएसएनएल से अपने भारी-भरकम स्टाफ की कटौती करने को कहा गया है। इससे साफ है कि इस कदम से हजारों लोग सड़क पर आ जाएंगे। कंपनी से कहा गया है कि वे अनुपयोगी स्टाफ को हटा दें और स्टाफ बढ़ाने की जगह मौजूदा स्टाफ का ही पुर्नसंयोजन कर काम चलाएं। इस साल के मार्च आखिर तक बीएसएनएल के पास 54,875 का स्टाफ है, जिससे उसे होने वाली कमाई का 37 फीसदी सैलरी और भत्तों में खर्च हो जाता है। सूत्रों का कहना है कि यह रिलायंस जिओ और भारतीय एयरटेल के सैलरी और भत्तों पर होने वाले खर्च से कहीं अधिक है। दूसरी ओर रिलायंस जिओ ने इसी अवधि में 1490 रुपए की कमाई की और इसका केवल 1.6 प्रतिशत ही सैलरी और भत्तों पर खर्च किया।




