मोदी के 56 इंच का सीना हुआ तार- तार ट्रम्प ने छुड़ा दिया पीएम का बुखार
ट्रंप की दादागिरी के सामने भारत की खामोशी, क्या कूटनीति या मजबूरी में घिर गए हैं मोदी

- ईरान पर हमले और वैश्विक कानूनों की धज्जियां
- संयुक्त राष्ट्र को किनारे कर अमेरिका का एकतरफा एजेंडा
- ट्रंप की आक्रामक विदेश नीति से असहज दुनिया
- रूस और चीन की चुप्पी ने बढ़ाया संकट
- मोदी की खामोशी पर देश में उठते सवाल
- 1971 की इंदिरा बनाम 2026 के दशक का भारत
- आर्थिक निर्भरता और वैश्विक व्यापार की मजबूरियां
- क्या भारत के पास विकल्प है या सिर्फ संतुलन की राजनीति
(सुनील कुमार) दुनिया के इतिहास में कई ऐसे दौर आए जब ताकतवर देशों ने अंतरराष्ट्रीय नियमों और संस्थाओं को दरकिनार कर अपनी मनमानी की। लेकिन मौजूदा दौर में जो स्थिति बन रही है, वह शायद पहले कभी इतनी खुली और बेशर्म नहीं रही। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के बाद से दुनिया जिस तरह की आक्रामक और अस्थिर राजनीति देख रही है, उसने वैश्विक व्यवस्था की बुनियाद को ही हिला दिया है। संयुक्त राष्ट्र जैसे संस्थान, जिनके सहारे विश्व शांति और संतुलन की उम्मीद की जाती थी, वे अब खुद हाशिए पर खड़े नजर आते हैं। ट्रंप की विदेश नीति अब पारंपरिक कूटनीति की सीमाओं से बहुत आगे निकल चुकी है। ईरान पर हमले की धमकियां हों, या इजराइल के साथ मिलकर मध्य-पूर्व में खुली सैन्य आक्रामकता अमेरिका अब उन अंतरराष्ट्रीय मानकों की परवाह करता हुआ नहीं दिखता जिन्हें वह खुद कभी दुनिया के सामने आदर्श के रूप में पेश करता था। हालात इतने विचित्र हैं कि इजराइल जैसे सहयोगी देश की तरफ से यह तक कहा जा रहा है कि ईरान का अगला सर्वोच्च नेता जो भी होगा, उसे खत्म कर दिया जाएगा। यह बयान सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी नहीं बल्कि वैश्विक कानून और संप्रभुता की अवधारणा को खुली चुनौती है। दुनिया के कई देश इस घटनाक्रम को देखकर हैरान हैं। खासकर इसलिए क्योंकि जिन देशों को ईरान का करीबी मित्र माना जाता रहा है रूस और चीन भी इस मुद्दे पर असामान्य रूप से शांत दिखाई दे रहे हैं। न कोई कड़ा बयान, न कोई प्रत्यक्ष समर्थन। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विश्लेषकों के मुताबिक इसकी एक बड़ी वजह वैश्विक शक्ति संतुलन में आए बदलाव हैं। ऐसे माहौल में भारत की स्थिति भी कम जटिल नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को लेकर देश के भीतर सवाल उठने लगे हैं कि ट्रंप की इस आक्रामक नीति के सामने भारत की आवाज इतनी धीमी क्यों है। आलोचकों का कहना है कि भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश को कम से कम सिद्धांत के स्तर पर तो अंतरराष्ट्रीय कानूनों और संप्रभुता के पक्ष में खुलकर बोलना चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ यह भी एक कठोर सच है कि आज की दुनिया 1971 की दुनिया नहीं है। उस दौर में जब भारत ने पूर्वी पाकिस्तान को बांग्लादेश बनने में मदद की थी, तब वैश्विक राजनीति का स्वरूप अलग था। सोवियत संघ जैसी ताकत भारत के साथ खड़ी थी, गुटनिरपेक्ष आंदोलन प्रभावशाली था और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की निर्भरता आज जितनी गहरी नहीं थी। आज की दुनिया में अर्थव्यवस्था और राजनीति का रिश्ता बहुत गहरा हो चुका है। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है, और भारत की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा उसके साथ व्यापार, निवेश और तकनीकी सहयोग से जुड़ा हुआ है। लाखों भारतीय अमेरिका में काम करते हैं, अरबों डॉलर का व्यापार दोनों देशों के बीच होता है, और रणनीतिक साझेदारी भी लगातार मजबूत हुई है। यही वह जटिल परिस्थिति है जिसमें भारत को अपनी विदेश नीति तय करनी पड़ रही है। एक तरफ राष्ट्रीय स्वाभिमान और वैश्विक नैतिकता की अपेक्षाएं हैं, दूसरी तरफ आर्थिक और रणनीतिक वास्तविकताएं। मोदी सरकार ट्रंप के सामने चुप क्यों है क्या आज की दुनिया में किसी भी देश के पास इतनी स्वतंत्रता बची है कि वह अमेरिका जैसी महाशक्ति के सामने खुलकर टकराव का रास्ता चुन सके। भारत की चुप्पी को कुछ लोग कूटनीतिक परिपक्वता मानते हैं, जबकि कुछ इसे राष्ट्रीय आत्मसम्मान के खिलाफ समझते हैं। लेकिन इतना तय है कि ट्रंप की आक्रामक राजनीति ने दुनिया को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां हर देश को अपने हित, अपने साहस और अपनी सीमाओं के बीच संतुलन साधना पड़ रहा है।

ट्रंप की आक्रामक विदेश नीति और बदलती वैश्विक व्यवस्था
अमेरिकी राजनीति हमेशा से ही दुनिया पर गहरा प्रभाव डालती रही है, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में यह प्रभाव एक नए और अधिक आक्रामक रूप में सामने आया है। ट्रंप का दूसरा कार्यकाल शुरू होने के बाद से ही उनकी नीतियों ने यह संकेत दे दिया था कि अमेरिका अब पारंपरिक कूटनीतिक मर्यादाओं को बहुत महत्व नहीं देगा। ट्रंप की नीति का मूल आधार अमेरिका फर्स्ट है। इस विचारधारा के तहत अमेरिका अपनी रणनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताओं को सर्वोपरि मानता है, भले ही इसके लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और समझौतों को नजरअंदाज क्यों न करना पड़े। पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका ने कई अंतरराष्ट्रीय समझौतों और संगठनों से दूरी बना ली है। यह प्रवृत्ति वैश्विक व्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका साबित हुई है।
ईरान संकट और मध्य-पूर्व की अस्थिरता
मध्य-पूर्व लंबे समय से वैश्विक राजनीति का सबसे संवेदनशील क्षेत्र रहा है। तेल संसाधनों, धार्मिक संघर्षों और भू-राजनीतिक महत्व के कारण यह क्षेत्र महाशक्तियों के लिए हमेशा रणनीतिक रहा है। ईरान के साथ अमेरिका का टकराव इस क्षेत्र की अस्थिरता को और बढ़ा रहा है। इजराइल के साथ अमेरिका की करीबी साझेदारी ने इस टकराव को और अधिक जटिल बना दिया है। इजराइल द्वारा ईरान के नेतृत्व को लेकर दी गई
धमकियां अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नया और खतरनाक अध्याय खोलती हैं।
रूस और चीन की रणनीतिक चुप्पी
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे आश्चर्यजनक बात रूस और चीन की चुप्पी है। दोनों देशों को अक्सर अमेरिका के प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जाता है, लेकिन ईरान संकट के मामले में उनकी प्रतिक्रिया बेहद सीमित रही है। इसके पीछे कई कारण अमेरिका के साथ आर्थिक संबंध, संभावित कूटनीतिक वार्ताएं, वैश्विक शक्ति संतुलन की रणनीति है।
भारत के सामने बड़ी चुनौती
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपनी विदेश नीति में संतुलन कैसे बनाए। एक तरफ अमेरिका के साथ बढ़ती रणनीतिक साझेदारी है, जिसमें रक्षा, तकनीक और व्यापार शामिल हैं। दूसरी तरफ भारत पारंपरिक रूप से स्वतंत्र विदेश नीति और वैश्विक संतुलन की बात करता रहा है।
1971 और आज की दुनिया
भारत की वर्तमान स्थिति की तुलना अक्सर 1971 के दौर से की जाती है। उस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अमेरिका के दबाव के बावजूद बांग्लादेश के मुद्दे पर निर्णायक कदम उठाया था। लेकिन आज की वैश्विक परिस्थितियां बिल्कुल अलग हैं। वैश्विक व्यापार का विस्तार, आर्थिक उदारीकरण, तकनीकी और निवेश की निर्भरता इन सबने निर्णयों को पहले से कहीं अधिक जटिल बना दिया है।
आर्थिक निर्भरता का दबाव
आज भारत और अमेरिका के बीच व्यापार अरबों डॉलर का है। आईटी उद्योग, फार्मास्यूटिकल्स, सेवा क्षेत्र और निवेश के क्षेत्र में दोनों देशों के संबंध बहुत गहरे हैं। अमेरिका में लाखों भारतीय काम करते हैं और हर साल बड़ी मात्रा में धन भारत भेजते हैं। ऐसे में अमेरिका के साथ किसी भी तरह का टकराव सिर्फ कूटनीतिक मामला नहीं बल्कि आर्थिक जोखिम भी बन सकता है।
मोदी सरकार की रणनीति
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने पिछले एक दशक में अमेरिका के साथ संबंधों को काफी मजबूत किया है।
कई रणनीतिक समझौते हुए हैं, रक्षा सहयोग बढ़ा है और तकनीकी साझेदारी भी मजबूत हुई है। इसलिए मौजूदा संकट में भारत की रणनीति खुली टकराव की बजाय संतुलन बनाए रखने की दिखाई देती है। ट्रंप की नीतियां दुनिया के लिए चुनौती भी हैं और अवसर भी। भारत अगर संतुलित कूटनीति अपनाता है तो वह वैश्विक राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। लेकिन इसके लिए उसे अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों के बीच बेहद सावधानी से संतुलन बनाना होगा।
* ट्रंप की विदेश नीति ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को चुनौती दी
* संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक समझौतों की उपेक्षा
* ईरान और मध्य-पूर्व में बढ़ता सैन्य तनाव
* रूस और चीन की रणनीतिक चुप्पी
* भारत के सामने कूटनीतिक संतुलन की चुनौती
* आर्थिक निर्भरता बनाम राष्ट्रीय स्वाभिमान
* 1971 के दौर और आज की वैश्विक राजनीति का अंतर
* भारत के लिए संभावनाएं और जोखिम दोनों




