
* अदानी को फायदा दिलाने के लिए केंद्र सरकार से जानबूझकर ज्यादा बिजली मांगी
* टेंडर की शर्तों को बदला, जिससे अदानी की एंट्री हो आसान
* केंद्र ने भी अदानी को दी विशेष रियायतें और असम की जरूरत को किया अनदेखा
* शुरुआती विरोध के बाद असम के चीफ सेक्रेट्री ने हिमंता सरकार का अब साथ दिया
सौम्यदीप्ता रॉय सरमा गुवाहाटी।असम में विधानसभा चुनाव का ऐलान होने के बाद सीएम हिमंता बिस्वा सरमा एक और बड़े घोटाले में फंसते दिख रहे हैं। उन्होंने चुनाव से महीनों पहले अदानी पावर के साथ एक ऐसे समझौते पर दस्तखत किए हैं, जिसके तहत अदानी पावर की एक्स्ट्रा बिजली भी असम ही खरीदेगा। इतनी बिजली असम खुद इस्तेमाल नहीं कर सकता, क्योंकि उसे इतनी बिजली की जरूरत नहीं है। इसके बावजूद असम सरकार ने दानी के साथ 12 हजार 500 करोड़ रुपए का समझौता किया है। खोजी पत्रकारों के संगठन रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने एक बार फिर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध और खुद अंदरूनी दस्तावेजों के आधार पर इस राज से पर्दा उठाया है।
असम सरकार ने नवंबर 2025 में इस बारे में अदानी पावर के साथ समझौता किया है। इसमें साफ कहा गया है कि असम सरकार अदानी पावर को अगले पांच साल के भीतर 12,500 करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान करेगी और वह भी उस बिजली के लिए, जिसका वह खुद इस्तेमाल नहीं कर सकती। अदानी पावर की इतनी बिजली असम को एक आर्थिक ताकत के रूप में स्थापित करने के मकसद से पैदा की जा रही है, जबकि हालत यह है कि असम को इतनी ज्यादा बिजली की जरूरत ही नहीं है। तरक्की के इसी रास्ते पर यह भी अनुमान लगाया गया है कि असम सरकार के पास अदानी पावर से तैयार हुई 19 हजार करोड़ रुपए की बिजली के इस्तेमाल की क्षमता ही नहीं है। इसका मतलब है कि असम सरकार ने जानबूझकर राज्य के आर्थिक विकास का मॉडल ही गलत बनया है, ताकि अदानी पावर को फायदा हो सके।

असम की जनता चुकाएगी अदानी का कर्ज
रिपोर्टर्स कलेक्टिव के पास उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, असम के ऊर्जा विभाग ने अदानी के 3200 मेगावाट के बिजली समझौते को जानबूझकर मंजूरी दी है, जबकि इसकी जरूरत ही नहीं थी। असम को 2035-36 तक के आर्थिक विकास के लिए केवल 2829 मेगावाट बिजली की जरूरत है, जो कि कोयला आधारित बिजली से हासिल हो सकती है। इसके बावजूद असम की हिमंता बिस्वा सरकार ने अदानी से 3200 मेगावाट बिजली का सौदा किया, ताकि उसे फायदा पहुंचाया जा सके, जबकि असम सरकार को इसकी जरूरत ही नहीं थी। अब असम की आम जनता को बिना बिजली खर्च किए ही 2030 तक सरकार के इस करार के तहत बिल भरना होगा और यह बात आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ जा सकती है। उपलब्ध दस्तावेजों से यह साफ होता है कि हिमंता बिस्वा की सरकार ने केंद्र सरकार को बिजली ही जरूरत के हिसाब से भेजी मांग को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया। असम सरकार ने केंद्र से कहा कि उसे 6000 मेगावॉट बिजली की जरूरत है, जो कि राज्य की मौजूदा बिजली खपत से दोगुना अधिक है।
नियमों को जानबूझकर अनदेखा किया गया
असम को जरूरत से अधिक बिजली मुहैया कराने के लिए निकाले गए टेंडर की शर्तों में नियमों को भी जानबूझकर अनदेखा किया गया, क्योंकि बिस्वा सरकार अदानी को फायदा देना चाहती थी। नियमों में साफ कहा गया है कि टेंडर उठाने वाली कंपनी के पास जमीन और वनभूमि पर अधिकार का प्रमाण पत्र होना चाहिए। असम सरकार ने दोनों काम अदानी पावर पर डाल दिया। इससे प्रोजेक्ट की लागत बढ़ गई। इसके बाद केंद्र सरकार ने भी राष्ट्रसेठ अदानी के पक्ष में खेला किया और अदानी को विशेष छूट दी। यह जानते हुए भी कि अदानी का कोल आधारित बिजली का प्लांट कोयले के भंडार से काफी दूर है, उसे विशेष सुविधा दी गई। इस बात को केंद्र सरकार ने चतुराई दिखाते हुए आम लोगों के लिए उपलब्ध कागजों में छिपा लिया। इसके बावजूद असम के मुख्य सचिव रवि कोटा ने इस प्रोजेक्ट के तहत अदानी को लंबे समय तक बिना बिजली खर्च किए लगातार भुगतान करने को लेकर अपनी आपत्ति जताई। उन्होंने 13 फरवरी 2026 को एक अंग्रेजी अखबार में लिखे लेख में इस समझौते को राज्य की वित्तीय स्थिति और बिजली वितरण एजेंसी पर भारी दबाव बताते हुए इसके बजाय नवीनीकृत ऊर्जा की खरीद को बेहतर विकल्प माना। कोटा ने हालांकि, अपने लेख में असम का नाम तक नहीं लिया, लेकिन उनका लेख खुद ही असम सरकार के अदानी पावर के बीच हुए समझौते की ओर इशारा कर रहा था। अब असम की नौकरशाही के बीच इस बात को लेकर चर्चा शुरू हो गई है कि अदानी पावर के साथ हुए इस समझौते से किस तरह राज्य को नुकसान उठाना पड़ेगा। इस समझौते को असम के बिजली नियंत्रक की ओर से मंजूरी मिल चुकी है।
असम सरकार की बोलती बंद
रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने इस समझौते को लेकर असम सरकार के पास लिखित रूप से सवाल भेजे। लेकिन असम सरकार ने इन सवालों का अभी तक कोई जवाब नहीं दिया। अलबत्ता, राज्य के मुख्य सचिव रवि कोटा ने कई बार याद दिलाने के बाद कुछ सवालों के जवाब जरूर भेजे हैं। अपने जवाब में रवि कोटा ने इस तथ्य से इनकार किया है कि अदानी के साथ 3200 मेगावाट बिजली देने का समझौता असम में बिजली की जरूरत को अनदेखा करते हुए किया गया है और इससे राज्य में बिजली की आपूर्ति जरूरत से अधिक हो जाएगी। उन्होंने यह मानने से भी इनकार कर दिया कि अंग्रेजी अखबार में उनका लेख असम सरकार के इस समझौते को ध्यान में रखकर लिखा गया था। उन्होंने दावा किया कि असम में बिजली की उच्चतम मांग 2021-22 में 2100 मेगावाट से बढ़कर 2024-25 में 2800 मेगावाट हो गई है। इस तरह असम में बिजली की मांग सालाना 8 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। 2032-33 में असम में बिजली की अधिकतम मांगा 5000 मेगावाट तक पहुंचने की उम्मीद है। इसके अलावा कोटा के अनुसार, राज्य के औद्योगिक विस्तार पर सरकार का निवेश बिजली की मांग को और ज्यादा बढ़ाएगा। ऐसे में असम को 1000 मेगावॉट बिजली की और जरूरत पड़ सकती है।



