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मोदी ने तोड़ा देश का भरम, नही आई इनको शरम

विदेश नीति या वैचारिक झुकाव, मोदी की चुप्पी ने तोड़ा भारत की ‘संतुलित कूटनीति’ का भ्रम

  • ईरान हमले पर चुप्पी क्या भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति छोड़ दी
  • पुराने मित्र देशों से दूरी, नए समीकरणों की मजबूरी?
  • क्या मोदी सरकार अब अमेरिका-इजरायल धुरी का हिस्सा बन चुकी है?
  • खाड़ी में फंसे लाखों भारतीयों की सुरक्षा पर सवाल
  • संतुलन की नीति से ‘पक्षधरता’ की ओर भारत का झुकाव
  • नेतन्याहू से नजदीकी कूटनीति या वैचारिक प्रतिबद्धता?
  • पड़ोसी देशों से बिगड़ते रिश्ते, वैश्विक मंच पर बढ़ती अलगाव की आशंका
  • क्या भारत की विदेश नीति अब ‘रणनीति’ नहीं, ‘राजनीति’ से संचालित

भारत की विदेश नीति लंबे समय तक संतुलन और स्वायत्तता की मिसाल मानी जाती रही है। गुटनिरपेक्ष आंदोलन से लेकर बहुध्रुवीय कूटनीति तक भारत ने हमेशा यह दिखाने की कोशिश की कि वह किसी एक धुरी का हिस्सा नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर फैसले लेने वाला स्वतंत्र राष्ट्र है। लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने इस स्थापित धारणा को गहरे संकट में डाल दिया है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति में बदलाव की चर्चा पहले भी होती रही है, लेकिन ईरान पर अमेरिका और इज़रायल के हमलों के बाद प्रधानमंत्री की चुप्पी ने इस बदलाव को स्पष्ट रूप से उजागर कर दिया है। यह सिर्फ एक कूटनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि एक वैचारिक संकेत भी माना जा रहा है।
ईरान, जो दशकों से भारत का रणनीतिक और ऊर्जा सहयोगी रहा है, उस पर हमले होते हैं और भारत की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आती। न युद्ध का विरोध, न नागरिक हताहतों पर चिंता, न ही क्षेत्रीय शांति की अपील। यह चुप्पी केवल शब्दों की कमी नहीं, बल्कि नीति की दिशा का संकेत है। सवाल यह है कि क्या भारत अब अपने पारंपरिक संतुलित रुख से हटकर एक नए वैश्विक ध्रुव की ओर झुक रहा है। क्या अमेरिका और इजरायल के साथ बढ़ती नजदीकी ने भारत को अपने पुराने मित्रों से दूरी बनाने के लिए मजबूर कर दिया है।
यह बदलाव केवल अंतरराष्ट्रीय संबंधों तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा, और खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों भारतीयों की सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। बेंजामिन नेतन्याहू के साथ प्रधानमंत्री की नजदीकी और उनके साथ सार्वजनिक संवाद इस बात का संकेत देते हैं कि भारत अब खुलकर एक पक्ष के साथ खड़ा नजर आ रहा है। लेकिन कूटनीति में ‘पक्षधरता’ हमेशा जोखिम भरी होती है। खासकर तब, जब दांव पर देश के दीर्घकालिक हित हो। इतिहास गवाह है कि भारत ने हमेशा संवाद, शांति और संतुलन का रास्ता चुना है। लेकिन अगर अब यह रास्ता बदल रहा है, तो इसके परिणाम भी दूरगामी होंगे।
सबसे बड़ा सवाल यही है क्या यह बदलाव रणनीतिक मजबूरी है, या वैचारिक झुकाव और अगर यह झुकाव है, तो इसकी कीमत कौन चुकाएगा सरकार, या देश?

संतुलन से पक्षधरता तक: क्या बदल गई भारत की विदेश नीति

भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धांत रणनीतिक स्वायत्तता रहा है। लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने यह संकेत दिया है कि यह स्वायत्तता अब सीमित होती जा रही है। ईरान पर हमले के बाद भारत की चुप्पी इस बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण है। जहां अन्य देशों ने शांति की अपील की, वहीं भारत ने कोई स्पष्ट रुख नहीं लिया।

ईरान पुराना दोस्त, नई दूरी

ईरान सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण स्रोत रहा है। चाबहार पोर्ट से लेकर तेल आयात तक भारत और ईरान के संबंध बहुआयामी रहे हैं। लेकिन हाल के वर्षों में इन संबंधों में ठंडापन आया है। क्या यह अमेरिका के दबाव का परिणाम है या भारत ने खुद अपनी प्राथमिकताएं बदल ली हैं?

अमेरिका-इजरायल धुरी भारत की नई दिशा?

डोनाल्ड ट्रम्प और बेंजामिन नेतन्याहू के साथ भारत की बढ़ती नजदीकी ने यह संकेत दिया है कि भारत अब एक नए वैश्विक गठबंधन की ओर बढ़ रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह गठबंधन भारत के दीर्घकालिक हितों के अनुरूप है?

खाड़ी में भारतीय सबसे बड़ा जोखिम

खाड़ी देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं। किसी भी युद्ध या तनाव का सीधा असर उनकी सुरक्षा और आजीविका पर पड़ता है। सरकार की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए वैचारिक समर्थन या नागरिकों की सुरक्षा? पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका लगभग हर पड़ोसी देश के साथ भारत के संबंध तनावपूर्ण रहे हैं।
यह स्थिति भारत की क्षेत्रीय नेतृत्व क्षमता पर भी सवाल उठाती है।

रूस से दूरी मजबूरी या रणनीति

रूस, जो दशकों से भारत का रक्षा सहयोगी रहा है, उससे भी दूरी बढ़ती नजर आ रही है। तेल आयात में कमी और अमेरिका के साथ बढ़ती साझेदारी इस बदलाव को दर्शाती है। विदेश नीति का उद्देश्य राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना होता है। लेकिन जब इसमें वैचारिक झुकाव हावी हो जाए, तो संतुलन बिगड़ जाता है। क्या भारत इसी दिशा में बढ़ रहा है? अगर भारत ने अपने पारंपरिक मित्रों से दूरी बना ली, तो संकट के समय कौन साथ देगा। यह सवाल आज नहीं, भविष्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। विदेश नीति केवल बयान नहीं होती यह देश की दिशा तय करती है। अगर यह दिशा संतुलन से हटकर झुकाव की ओर जाती है, तो उसका असर पीढ़ियों तक होता है। आज भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसे तय करना है कि वह स्वतंत्र शक्ति बनेगा, या किसी और की रणनीति का हिस्सा। क्योंकि इतिहास में वही देश टिकते हैं जो अपने फैसले खुद लेते हैं…न कि दबाव में।

* ईरान हमले पर भारत की चुप्पी ने उठाए सवाल
* अमेरिका-इजरायल के साथ बढ़ती नजदीकी
* पारंपरिक मित्र देशों से दूरी
* खाड़ी में भारतीयों की सुरक्षा पर खतरा
* पड़ोसी देशों से बिगड़ते संबंध
* विदेश नीति में संतुलन की कमी
* दीर्घकालिक रणनीतिक जोखिम

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