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आईएएस अधिकारी भी नही आ रहे छिछोरेपन बाज,महिला कार्मिकों के प्रति है रंगीन मिजाज

नोएडा का ‘सिस्टम’ आरोपों के घेरे में अपर आयुक्त, शिकायतों के बावजूद खामोशी क्यों?

  • शिकायतें ऊपर तक, कार्रवाई शून्य क्या सिस्टम सच से डर रहा
  • दफ्तर से होटल तक आरोपों की परतें खोलती एक भयावह तस्वीर
  • सत्ता की भाषा या धमकी का तंत्र ‘बर्बाद कर दूंगा’ जैसे शब्दों का राज
  • जांच से पहले ही ‘मैनेजमेंट’ आईसीसी समिति में बदलाव पर उठते सवाल
  • नेटवर्क बनाम नियम क्या रिश्ते कानून से बड़े हो गए
  • महिला सुरक्षा पर सवाल कानून होने के बावजूद डर क्यों
  • रिश्वत, राहत और रहस्य होटल कनेक्शन की अनसुलझी कहानी
  • एक अधिकारी नहीं, पूरा सिस्टम कटघरे में जवाबदेही कब तय होगी

उत्तर प्रदेश की नौकरशाही पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि यहां सत्ता का असली संचालन फाइलों में नहीं, बल्कि नेटवर्क में होता है। जहां पद से ज्यादा प्रभाव काम करता है और नियमों से ज्यादा रिश्ते। गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) में तैनात राज्य कर विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी पर लगे गंभीर आरोप इस धारणा को और मजबूत करते नजर आते हैं। महिला कर्मचारियों के साथ कथित बदसलूकी, मानसिक उत्पीड़न, देर रात वीडियो कॉल, होटल में ठहरने का दबाव, धमकी भरी भाषा का इस्तेमाल, रिश्वत के मामलों में हस्तक्षेप और जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने के आरोप ये सब कोई अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि एक ऐसे सिस्टम की तस्वीर पेश करते हैं, जहां शिकायतें तो दर्ज होती हैं, लेकिन कार्रवाई कहीं खो जाती है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन आरोपों की शिकायत केवल विभागीय स्तर तक सीमित नहीं रही। मुख्यमंत्री कार्यालय, राज्यपाल, राष्ट्रीय महिला आयोग, राज्य महिला आयोग, मुख्य सचिव और यहां तक कि प्रधानमंत्री कार्यालय तक शिकायतें भेजी गईं। बावजूद इसके, कार्रवाई के नाम पर सन्नाटा बना हुआ है। यह मामला केवल एक अधिकारी के आचरण का नहीं है, बल्कि यह सवाल उठाता है कि क्या उत्तर प्रदेश में शिकायतों की सुनवाई वास्तव में होती है या फिर वे भी एक औपचारिकता बनकर रह गई है।

महिला उत्पीड़न के गंभीर आरोप दफ्तर से होटल तक की कहानी

नोएडा जोन में तैनात अपर आयुक्त राज्य कर संदीप भगिया के खिलाफ महिला अधिकारियों द्वारा लगाए गए आरोप बेहद गंभीर हैं। शिकायतों में कहा गया है कि महिला कर्मचारियों के साथ न केवल अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया जाता था, बल्कि उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित भी किया जाता था। आरोपों के मुताबिक, महिलाओं को देर रात वीडियो कॉल करना, उन्हें अपने केबिन या आसपास घंटों खड़ा रखना, घूरना और विरोध करने पर कार्रवाई की धमकी देना जैसी घटनाएं सामने आई हैं। कुछ शिकायतों में यह भी कहा गया है कि महिलाओं पर जबरन होटल में ठहरने का दबाव बनाया गया। यह आरोप यदि सही साबित होते हैं, तो यह केवल विभागीय अनुशासन का मामला नहीं, बल्कि गंभीर आपराधिक प्रकृति का मामला बन सकता है।

धमकियों की भाषा

शिकायतों में यह भी उल्लेख है कि अधिकारी द्वारा अधीनस्थ कर्मचारियों से बातचीत में अपमानजनक और धमकी भरी भाषा का इस्तेमाल किया जाता था।
पे… दूंगा, बर्बाद कर दूंगा, नौकरी खा जाऊंगा, कटोरा लेकर घूमोगे जैसे शब्द केवल गुस्से का इजहार नहीं, बल्कि सत्ता के दुरुपयोग की झलक देते हैं। इस तरह की भाषा किसी भी प्रशासनिक ढांचे में भय का माहौल पैदा करती है, जहां कर्मचारी अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने से डरने लगते हैं।

आंतरिक समिति में बदलाव जांच पर सवाल

महिलाओं के कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न से जुड़े मामलों के लिए बने कानून कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 के तहत हर संस्थान में आंतरिक शिकायत समिति का गठन अनिवार्य है। आरोप है कि 8 अगस्त को बनाई गई समिति में कुल 6 सदस्य थे, लेकिन जब खुद अधिकारी पर आरोप लगे और जांच शुरू हुई, तो महज 10 दिनों के भीतर समिति के दो सदस्यों को हटाकर अपने करीबी लोगों को शामिल कर लिया गया।
यदि यह आरोप सही है, तो यह सीधे-सीधे जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास माना जाएगा।

शिकायतों की लंबी सूची, कार्रवाई शून्य

इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि शिकायतें केवल एक जगह नहीं, बल्कि कई उच्च स्तरों पर की गईं। मुख्यमंत्री कार्यालय, राज्यपाल, राष्ट्रीय महिला आयोग, राज्य महिला आयोग, मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव (राज्य कर), प्रधानमंत्री कार्यालय इतने स्तरों पर शिकायत पहुंचने के बावजूद कार्रवाई का अभाव कई सवाल खड़े करता है। क्या सिस्टम सुनने को तैयार नहीं है, या फिर कहीं न कहीं दबाव काम कर रहा है।

होटल में ठहराने का आरोप रिश्वत मामले से जुड़ी कहानी

एक अन्य शिकायत में आरोप लगाया गया है कि 5 लाख रुपये की रिश्वत के आरोप में घिरी एक महिला अधिकारी को राहत देने के नाम पर नोएडा के सेक्टर 57 स्थित एक होटल में तीन दिन तक रखा गया।
शिकायत में यह भी कहा गया है कि इस दौरान उसका शोषण किया गया। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन इस तरह के आरोप प्रशासनिक तंत्र की साख पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

नेटवर्क और दबाव ऊपर तक पहुंच’ का दावा

शिकायतों में यह भी आरोप है कि संबंधित अधिकारी अपने आप को बड़े नेताओं और वरिष्ठ अधिकारियों का करीबी बताते हुए अधीनस्थ कर्मचारियों पर दबाव बनाता है। यह प्रवृत्ति भारतीय नौकरशाही में नई नहीं है, लेकिन जब इसका इस्तेमाल डराने और दबाने के लिए किया जाए, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरा बन जाता है।

आय से अधिक खर्च और कथित वसूली का आरोप

शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि अधिकारी का वेतन लगभग 1.15 लाख रुपये प्रतिमाह है, लेकिन उनके खर्च जैसे 2 लाख रुपये प्रतिमाह मकान का किराया इससे कहीं अधिक हैं। इसके अलावा, ट्रांसपोर्ट नेटवर्क से कथित वसूली के आरोप भी लगाए गए हैं। यदि इन आरोपों की जांच होती है, तो यह मामला भ्रष्टाचार के दायरे में भी जा सकता है।

सिस्टम पर सवाल क्या कार्रवाई होगी

यह पूरा मामला एक बड़े सवाल को जन्म देता है क्या उत्तर प्रदेश में शिकायतों का कोई ठोस नतीजा निकलता है। जब एक अधिकारी के खिलाफ इतने गंभीर आरोप और इतनी ऊंची स्तर की शिकायतें होने के बावजूद कार्रवाई नहीं होती, तो यह आम लोगों के मन में अविश्वास पैदा करता है। यह मामला केवल एक व्यक्ति के खिलाफ आरोपों का नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है, जहां शिकायतें तो दर्ज होती हैं, लेकिन न्याय की प्रक्रिया कहीं अटक जाती है। जरूरत है कि इस मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच हो, ताकि सच्चाई सामने आ सके चाहे वह किसी के भी खिलाफ क्यों न हो। अगर आरोप झूठे हैं, तो उन्हें खारिज किया जाए। लेकिन अगर आरोप सही हैं, तो कार्रवाई भी उतनी ही सख्त होनी चाहिए। क्योंकि कानून का असली अर्थ केवल नियम बनाना नहीं, बल्कि उन्हें लागू करना होता है।

* नोएडा में अपर आयुक्त पर महिला उत्पीड़न के गंभीर आरोप
* धमकी, मानसिक उत्पीड़न और दबाव बनाने के आरोप
* आईसीसी समिति में बदलाव कर जांच प्रभावित करने का आरोप
* कई उच्च स्तरों पर शिकायत, लेकिन कार्रवाई नहीं
* होटल में ठहराने और शोषण के आरोप
* आय से अधिक खर्च और वसूली के आरोप
* सिस्टम की निष्क्रियता पर गंभीर सवाल

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