
– पश्चिम एशिया में शांति बहाली के पीछे चीन, अमेरिका को दी धमकी
– कहा- बात मान लो, वरना नौबत परमाणु युद्ध की आ सकती है
– चीन, सऊदी अरब और संयुक्त राष्ट्र भी बातचीत का हिस्सा बन सकते हैं
– 21 अप्रैल तक है सीजफायर, नतीजा नहीं निकला तो तेल होगी लड़ाई
– ईरान को कंधे पर दागे जाने वाली मिसाइलें देगा चीन
नई दिल्ली/इस्लामाबाद/तेहरान। पश्चिम एशिया की जंग खत्म करवाने के लिए विगत सप्ताह ईरान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता का दूसरा दौर विफल हो गया। दो दिन की इस बातचीत में उन 10 बिंदुओं पर सहमति होनी है, जिन्हें ईरान न सामने रखा है।
अमेरिका की पहल पर ईरान ने दो हफ्ते का युद्धविराम मान लिया है, जो 21 अप्रैल को खत्म होगा। अमेरिका ने कहा है कि अगर इस्लामाबाद शांति वार्ता नाकाम रहती है तो इस बार की जंग पहले से कहीं ज्यादा भयावह होगी, जिसमें ईरान के ढांचागत प्रतिष्ठानों पर हमले किए जाएंगे। ईरान ने मुख्य रूप से प्रतिबंध हटाने, अपने सहयोगी विद्रोहियों पर हमले रोकने, फ्रीज की गईं अपनी संपत्तियों पर रोक हटाने और प्रसंस्कृत परमाणु सामग्री को रक्षात्मक कार्यों के लिए उपयोग और मिसाइलों के निर्माण को संप्रभुता संपन्न अधिकार मानने की मांग की है। इस बातचीत पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं, क्योंकि युद्ध के कारण तेल, गैस, सेमीकंडक्टर चिप और खाद्यान्नों की सप्लाई बुरी तरह से बाधित हुई है।

बातचीत हुई फेल मंडराता युद्ध का खतरा
इस बीच, युद्ध विराम के लिए दो हफ्ते की समयसीमा का पूरा उपयोग करते हुए अमेरिकी सेना ने खुद को भावी युद्ध के लिए तैयार करना शुरू कर दिया है। पश्चिम एशिया में अमेरिकी गठबंधन की 50 हजार फौजें पहले से ही तैनात हैं। अब इसमें और इजाफा किया जा रहा है। मिसाइल रक्षा प्रणालियों को मजबूत किया जा रहा है। अमेरिकी फाइटर विमानों की नई खेप मंगवाई गई है। इसे देखते हुए लगा रहा है कि अगर समझौता अमेरिकी शर्तों के अनुसार नहीं हुआ तो जंग के बादल फिर मंडरा सकते हैं। ईरान की आईआरजीसी भी तैयारियों में जुटी है। ताजा खबर यह है कि चीन ने ईरान को कंधे पर दागी जाने वाली जमीन से हवा में मार करने वाली मैनपैड मिसाइलें देने का फैसला किया है। ये मिसाइलें ईरान को अगले कुछ दिनों में मिल जाएंगी। अगर ऐसा हुआ तो अमेरिकी लड़ाकू विमानों के लिए इससे खतरा पैदा हो सकता है। इससे पहले चीन ने सोडियम परक्लोरेट से भरे 5 जहाज ईरान भेजे थे। इस सामग्री से मिसाइलों के ठोस ईंधन तैयार होते हैं। इस्लामाबाद की शांति वार्ता में ईरान की ओर से विदेश मंत्री अरागची और संसद के स्पीकर गालीबाफ नेतृत्व कर रहे हैं, जबकि अमेरिकी की ओर से उप राष्ट्रपति जेडी वांस और मुख्य वार्ताकार स्टीव विट्कॉफ भाग ले रहे हैं। बातचीत में चीन, सउादी अरब और संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधियों के भी वर्चुअल जुड़न की संभावना है।
शांति वार्ता के पीछे है चीन
माना जा रहा है कि चीन ने ही इसलामाबाद के माध्यम से ईरान को शांति वार्ता के लिए राजी किया है। चीन ने यह पहली अमेरिकी राष्ट्रपति डोलान्ड ट्रंप के उस ऐलान के बाद की, जिसमें उन्होंने ईरान को पाषाण युग में पहुंचा देने की शमकी दी थी। बेहद जानकार सूत्रों का यह भी कहना है कि गुरुवार रात ट्रंप ने अपने समकक्ष चीनी राष्ट्रपति शी जिन पिंग से फोन पर बातचीत की और हॉर्मूज जलडमरूमध्य को खुलवाने के लिए सैन्य सहायता मांगी। इसके जवाब में चीनी राष्ट्रपति ने साफ कर दिया कि हॉर्मूज ईरान का संप्रभु इलाका है और उस पर किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। चीनी राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि अमेरिका को ईरान का हक वापस कर शांति वार्ता के प्रति सकारात्मक रुख अपनाना चाहिए, वरना नौबत परमाणु युद्ध की भी आ सकती है। माना जा रहा है कि चीन की इसी परोक्ष धमकी के बाद ट्रंप ने इजरायल को लेबनान पर बमबारी रोकने और हिज्बुल्लाह से बातचीत करने का आदेश दिया है। तेलअवीव पर आए दिन रॉकेट और मिसाइल दागने वाले हिज्बुल्लाह से कई साल बाद इजरायल की पहली बार शांति वार्ता होने जा रही है। माना जा रहा है कि ईरान को पाषाण युग में पहुंचाने की धमकी से चीन चिंता में पड़ गया है, क्योंकि बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव के तहत चीन ने ईरान के ढांचागत विकास में करोड़ों डॉलर लगाए हैं और अगर उन्हें अमेरिकी हमलों से नुकसान होता है तो इससे चीन भी प्रभावित होगा। इसे ध्यान में रखकर ही शी ने ईरान को शांति वार्ता के लिए राजी होने को कहा है। सूत्रों का यह भी कहना है कि अगर शांति वार्ता नाकाम होती है तो इस बार की लड़ाई निर्णायक होगी और इससे पूरी दुनिया पर संकट के बादल गहरा सकते हैं।
बातचीत की टाइमिंग बदली
इस्लामाबाद में होने वाली ईरान-अमेरिका की बातचीत में बिगड़ गयी है। तस्नीम न्यूज के मुताबिक अब यह बातचीत सुबह 8 बजे की बजाय दोपहर बाद शुरू हो सकती है,अत्यंत खेद का विषय है,बातचीत विफल हो गयी।जैसा कि पहले ही कई सवाल उठ रहे थे, जैसे शर्तें क्या होंगी और किस क्रम में बातचीत आगे बढ़ेगी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वार्ता से पहले ईरान को कड़ी चेतावनी दी है और कहा है कि ईरान के पास कोई विकल्प नहीं है। ट्रंप ने ये भी दावा किया कि ईरान को हर हाल में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलना होगा। ट्रंप ने दावा किया है कि ‘ईरान के पास कोई ऑप्शन नहीं है और वो सिर्फ बातचीत के लिए जिंदा है।’ हालांकि, ईरान के लिए हॉर्मूज को खोलना इतना आसान भी नहीं होगा, क्योंकि उसने हॉर्मूज में बारूदी सुरंगें बिछा दी हैं। इन्हें हटाने में महीनों लग सकते हैं। तेहरान चाहता है कि शांति समझौते में लेबनान को भी शामिल किया जाए और होर्मुज जलडमरूमध्य पर भी उसका नियंत्रण बना रहे। वहीं वॉशिंगटन, तेहरान के परमाणु संवर्धन और सैन्य क्षमताओं को सीमित करना चाहता है।
क्या हैं ईरान की मांगें?
• ईरान चाहता है कि अमेरिका अपने सभी सैन्य ठिकानों से अपनी सेना हटा ले।
• वह अपने बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को जारी भी रखना चाहता है।
• ईरान होर्मुज स्ट्रेट पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहता है और इस जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर प्रति बैरल 1 डॉलर का शुल्क लगाया हुआ है। इस शर्त से ईरान को काफी आर्थिक और रणनीतिक बढ़त मिल जाएगी।
• इसके अलावा, ईरान एक ‘अनाक्रमण संधि’ भी चाहता है, ताकि, अमेरिका की ओर से भविष्य में होने वाले हमलों को रोका जा सके।
• वह चाहता है कि इस क्षेत्र से अमेरिका की सेना पूरी तरह हट जाए और लेबनान सहित सभी मोर्चों पर जारी लड़ाई समाप्त हो जाए।
• ईरान चाहता है कि अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगे सभी प्रतिबंध हटा दिए जाएं और वह अपने परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण बनाए रखे, जिसमें संवर्धन और आर्थिक नीति शामिल है।
• तेहरान यूरेनियम संवर्धन पर कोई समझौता नहीं करना चाहता
• वह सभी अमेरिकी प्रतिबंधों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों को भी हटवाना चाहता है। साथ ही, वह पुनर्निमाण सहायता और हमलों के लिए हर्जाना भी चाहता है।
क्या हैं अमेरिका की मांगे?
• अमेरिका, ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमताओं पर अंकुश लगाना चाहता है।
• वॉशिंगटन ने तेहरान से यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह से बंद करने और संवर्धित यूरेनियम के अपने भंडार को छोड़ने पर जोर दिया है।
• ईरान अपने बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को कम करे और क्षेत्र में सहयोगी आतंकवादी ग्रुप्स का समर्थन बंद करे।
• अमेरिका होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से निर्बाध वैश्विक पहुंच भी चाहता है।
• अमेरिका एक स्थिर समझौते पर पहुंचने तक क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति बनाए रखना चाहता है।



